बिल का सारांश

सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन बिल, 2026

 

  • सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन बिल, 2026 को 27 जुलाई, 2026 को लोकसभा पेश किया गया। बिल सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) एक्ट, 2024 में संशोधन का प्रयास करता है। इस एक्ट का उद्देश्य निर्दिष्ट सार्वजनिक परीक्षा प्राधिकरणों द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अनुचित साधनों के इस्तेमाल को रोकना है। इन प्राधिकरणों में निम्न शामिल हैं: (i) संघ लोक सेवा आयोग, (ii) कर्मचारी चयन आयोग, (iii) रेलवे भर्ती बोर्ड, (iv) बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान, (v) राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी, (vi) केंद्र सरकार के मंत्रालय और उनसे जुड़े कार्यालय, और (vii) केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य प्राधिकरण।

  • दंड में बढ़ोतरी: बिल विभिन्न अपराधों के लिए कारावास की सज़ा और जुर्माने की मात्रा बढ़ाता है (तालिका 1)।

तालिका 1: एक्ट और बिल के तहत दंड

अपराध

एक्ट

बिल

किसी व्यक्ति द्वारा अनुचित साधनों का प्रयोग

तीन से पांच वर्ष तक का कारावास, और 10 लाख रुपए तक का जुर्माना

5 से 10 वर्ष तक का कारावास और 50 लाख रुपए तक का जुर्माना

सेवा प्रदाता द्वारा अनुचित तरीके

एक करोड़ रुपए तक का जुर्माना

पांच करोड़ रुपए तक का जुर्माना

सेवा प्रदाता के प्रभारी व्यक्ति

तीन से 10 वर्ष तक का कारावास और एक करोड़ रुपए का जुर्माना

न्यूनतम पांच वर्ष का कारावास और पांच करोड़ रुपए का जुर्माना

संगठित अपराध

पांच से 10 वर्ष तक का कारावास और न्यूनतम एक करोड़ रुपए का जुर्माना

न्यूनतम सात वर्ष का कारावास, न्यूनतम 10 करोड़ रुपए का जुर्माना

  • सेवा प्रदाता पर रोक: यह कानून किसी भी सार्वजनिक परीक्षा के आयोजन की जिम्मेदारी लेने से उन सेवा प्रदाताओं पर चार वर्ष की रोक लगाता है जो अनुचित तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। यह बिल प्रतिबंध की अवधि को बढ़ाकर आठ वर्ष करता है।

  • जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स: इस कानून के तहत केंद्र सरकार अपराधों की जांच किसी भी केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंप सकती है। यह बिल केंद्र सरकार को अपराधों की जांच के लिए एक स्पेशल टास्क फोर्स बनाने का अधिकार देता है।

  • जांच के लिए समय-सीमा: बिल में यह भी कहा गया है कि अपराधों की जांच दो महीने के भीतर पूरी हो जानी चाहिए।

  • स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट: इस बिल के तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को इस कानून के तहत अपराधों की सुनवाई के लिए एक सेशन कोर्ट को स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के तौर पर निर्दिष्ट करना होगा। स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट, भारतीय न्याय संहिता, 2023 या दूसरे कानूनों के तहत जुड़े अपराधों की सुनवाई भी उसी ट्रायल में करेंगे। हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को हर स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए एक या एक से ज्यादा स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर भी नियुक्त करने होंगे। इस कानून के तहत चल रहे सभी लंबित मामले स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट में स्थानांतरित कर दिए जाएंगे।

  • सुनवाई के लिए समय-सीमा: बिल में कहा गया है कि सुनवाई रोज़ाना होनी चाहिए, जब तक कि वहां मौजूद सभी गवाहों के बयान न ले लिए जाएं। अगर जरूरी हो, तो अदालत लिखित में कारण दर्ज करके सुनवाई को अगले दिन के लिए टाल सकती है। चार्जशीट दाखिल होने की तारीख से तीन महीने के अंदर सुनवाई पूरी हो जानी चाहिए। स्थानांतरित किए गए लंबित मामलों में सुनवाई स्थानांतरण की तारीख से तीन महीने के अंदर पूरा हो जानी चाहिए।स्थानांतरित किए गए लंबित मामलों में सुनवाई स्थानांतरण की तारीख से तीन महीने के अंदर पूरा हो जानी चाहिए।
  • अपील: बिल में यह भी कहा गया है कि स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसलों, सज़ा या आदेशों के खिलाफ अपील उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों की पीठ के सामने की जाएगी। अपील को, जहां तक हो सके, स्वीकार किए जाने के तीन महीने के भीतर निपटाया जाना चाहिए। ज़मानत देने या न देने के आदेशों के खिलाफ अपील भी उच्च न्यायालय में की जाएगी। अपील आदेश के 30 दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिए। पर्याप्त कारण होने पर उच्च न्यायालय देरी से दायर की गई अपील पर विचार सकता है, लेकिन 90 दिनों के बाद किसी भी अपील पर विचार नहीं किया जाएगा।

 

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