लेजिसलेटिव ब्रीफ 

असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) बिल, 2020

बिल की मुख्‍य विशेषताएं

  • असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) ऐसी तकनीक को कहा जाता है जिसमें मानव शरीर के बाहर गैमेट (स्पर्म या एग) को रखने के बाद उसे या फर्टिलाइज्ड एंब्रेयो को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है और इस प्रकार गर्भावस्था हासिल की जाती है। इन प्रक्रियाओं में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (लैब में एग को फर्टिलाइज करना), गैमेट डोनेशन और सेरोगेसी शामिल हैं।
     

  • बिल में शादीशुदा इनफर्टाइल कपल्स और एक निश्चित आयु तक की महिला को एआरटी प्रक्रियाओं को कमीशन करने की अनुमति दी गई है। बिल गैमेट डोनर्स के लिए विशिष्ट आयु वर्ग भी निर्दिष्ट करता है। एग डोनर्स को शादीशुदा होना चाहिए और उसके एक बच्चा भी होना चाहिए जिसकी उम्र कम से कम तीन वर्ष हो। कमीशनिंग पार्टी को एग डोनर्स का बीमा कराना होगा ताकि हर तरह के जोखिम से उसकी रक्षा हो।     
     

  • एआरटी सेवाओं को रेगुलेट करने के लिए राष्ट्रीय और राज्य बोर्ड्स बनाए जाएंगे। इसके अतिरिक्त एक नेशनल रजिस्ट्री बनाए जाएगी जिसके पास सभी एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स का विवरण होगा। एआरटी क्लिनिक और बैंक अपने डोनर्स और कमीशनिंग पार्टी का विवरण समय समय पर रजिस्ट्री को देंगे जो इस विवरण को राष्ट्रीय बोर्ड के साथ साझा कर सकती है।
     

  • गैमेट्स की बिक्री या खरीद करने पर 5-10 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। इसके बाद हर बार अपराध करने पर 8-12 वर्ष की कैद और जुर्माना हो सकता है।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • संसद में सेरोगेसी और एआरटी प्रक्रियाओं को रेगुलेट करने के लिए अलग-अलग बिल्स लाए गए हैं। इन बिल्स में क्लिनिक्स के रजिस्ट्रेशन की अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं और कमीशनिंग पार्टी के लिए आयु आधारित पात्रता मानदंड भी अलग-अलग दिए गए हैं। हालांकि सेरोगेसी की प्रक्रिया के कुछ पहलुओं को अलग से रेगुलेट करने की जरूरत हो सकती है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इन दोनों बिल्स में रजिस्ट्रेशन और पात्रता के एक समान पहलुओं पर अलग-अलग किस्म के प्रावधान क्यों हैं। 
     

  • बिल में एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स से यह अपेक्षा की गई है कि वे नेशनल रजिस्ट्री के साथ कमीशनिंग पार्टी और डोनर्स का विवरण साझा करेंगे। रजिस्ट्री नेशनल बोर्ड के साथ इस विवरण को साझा कर सकती है। लेकिन इस विवरण को साझा करने से पार्टी की प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।  
     

  • बिल के अनुसार, एग डोनर को शादीशुदा महिला होना चाहिए, जिसका कम से कम तीन वर्ष का एक बच्चा हो। साथ ही डोनर्स को इस संबंध में सलाह देने की जरूरत नहीं है कि गैमेट डोनेशन के क्या जोखिम हो सकते हैं। यह एआरटी पर मौजूदा दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता है। 
     

  • इच्छुक कपल को एआरटी प्रक्रियाओं की कमीशनिंग के लिए पात्रता की किन शर्तों को पूरा करना होगा, बिल उन्हें स्पष्ट करता है। इसके अतिरिक्त वह कहता है कि सरकार नियमों के जरिए अतिरिक्त शर्तों को निर्धारित कर सकती है। यहां यह सवाल किया जा सकता है कि क्या नियमों द्वारा इन शर्तों को निर्धारित करने की शक्ति देना उचित होगा।

भाग क : बिल की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजीज़ (एआरटी) का मतलब होता है, ऐसे फर्टिलिटी ट्रीटमेंट्स जिनका उद्देश्य इनफर्टिलिटी का शिकार कपल्स के लिए रीप्रोडक्शन में मदद करना है, या ऐसे लोगों की मदद करना है जोकि कृत्रिम तरीकों से बच्चे की इच्छा रख सकते हैं। इन प्रक्रियाओं में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (लैब में एग को फर्टिलाइज करना), गैमेट डोनेशन (स्पर्म या एग) और जेस्टेशनल सेरोगेसी (जब बच्चा सेरोगेट माता से बायोलॉजिकली संबंधित नहीं होता) शामिल हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (2017) के साथ साझा किए गए निजी अनुमानों के अनुसार, भारत में प्रजनन आयु वर्ग में आने वाले लगभग 2.8 करोड़ कपल्स इनफर्टाइल हैं और इनमें से लगभग 1% इनफर्टिलिटी इवैल्यूएशन की मांग करते हैं।[1] इनफर्टिलिटी के उपाय की तलाश करने वालों में 20-25% लोग इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन ट्रीटमेंट कराते हैं और इनमें से 1% को सेरोगेसी की जरूरत होती है। 

2005 में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एआरटी (सेरोगेसी की प्रक्रियाओं सहित) सेवा प्रदान करने वाले क्लिनिक्स के रेगुलेशन के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे।[2]  दिशानिर्देशों में एआरटी सेवाएं प्रदान करने वाले क्लिनिक्स के रजिस्ट्रेशन, सिंगल महिला और कपल्स को एआरटी सेवाओं के लिए मंजूरी और एआरटी बैंक्स को डोनर्स को क्षतिपूर्ति देने से संबंधित प्रावधान हैं। दिशानिर्देश सेरोगेट माताओं को नागरिकता तथा सेरोगेट्स को क्षतिपूर्ति देने से संबधित प्रावधानों को निर्दिष्ट करते हैं।  

2019 में सरकार ने सेरोगेसी (रेगुलेशन) बिल को पेश किया।[3] बिल में सेरोगेसी क्लिनिक्स के रजिस्ट्रेशन का प्रावधान है। वह कमीशनिंग कपल्स और सेरोगेट्स के पात्रता मानदंडों को स्पष्ट करता है और सरोगेसी की नीतियों पर सरकार को सलाह देने के लिए बोर्ड्स बनाने का प्रावधान करता है। इस बिल को राज्यसभा की सिलेक्ट कमिटी को रेफर किया गया।[4]   बिल की समीक्षा करने पर कमिटी ने सुझाव दिया कि फर्टिलिटी सेवाओं, यानी एआरटी और सेरोगेसी सेवाएं देने वाले क्लिनिक्स और बैंक्स को रेगुलेट करने के लिए पहले एक व्यापक कानून पेश किया जाए। इसके बाद 14 सितंबर, 2020 को लोकसभा में असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) बिल, 2020 को पेश किया गया। 3 अक्टूबर, 2020 को इस बिल को परिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण संबंधी स्टैंडिंग कमिटी को रेफर किया गया।  

मुख्य विशेषताएं

  • एआरटी सेवाओं का प्रावधान: बिल के अनुसार, एआरटी में ऐसी सभी तकनीक शामिल हैं जिनमें मानव शरीर के बाहर स्पर्म या ओसाइट (अपरिपक्व एग सेल) को रखकर किसी महिला की प्रजनन प्रणाली में गैमेट या भ्रूण को प्रत्यारोपित करके गर्भावस्था हासिल की जाती है। इसमें गैमेट (स्पर्म या ओसाइट का) डोनेशन, इन विट्रो फर्टिलाइजेशन और जेस्टेशनल सेरोगेसी शामिल हैं। एआरटी सेवाएं निम्नलिखित के जरिए प्रदान की जाती हैं: (i) एआरटी क्लिनिक, जोकि एआरटी संबंधी उपचार और प्रक्रियाएं प्रदान करते हैं, और (ii) एआरटी बैंक, जोकि गैमेट्स जमा करते हैं, उन्हें स्क्रीन और स्टोर करते हैं।
     
  • एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स का रजिस्ट्रेशन: बिल के अनुसार, हर एआरटी क्लिनिक और बैंक को नेशनल रजिस्ट्री ऑफ बैंक्स एंड क्लिनिक्स ऑफ इंडिया में रजिस्टर होना चाहिए। बिल के अंतर्गत नेशनल रजिस्ट्री बनाई जाएगी और वह देश में सभी एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स के विवरणों वाले केंद्रीय डेटाबेस की तरह काम करेगी। राज्य सरकारें रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए रजिस्ट्रेशन अथॉरिटीज़ की नियुक्तियां करेंगी। क्लिनिक और बैंक को सिर्फ तभी रजिस्टर किया जाएगा, अगर वे कुछ मानदंडों का पालन करेंगे (विशेषज्ञता प्राप्त कर्मचारी, भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डायगनॉस्टिक सुविधाएं)। रजिस्ट्रेशन पांच वर्षों के लिए वैध होगा और अगले पांच वर्षों के लिए रीन्यू किया जा सकता है।
     
  • बोर्ड्स: बिल में प्रावधान है कि सेरोगेसी (रेगुलेशन) बिल, 2019 के अंतर्गत गठित राष्ट्रीय और राज्य बोर्ड्स एआरटी सेवाओं के रेगुलेशन के लिए क्रमशः राष्ट्रीय और राज्य बोर्ड्स के तौर पर काम करेंगे। राष्ट्रीय बोर्ड की मुख्य शक्तियों और कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) एआरटी संबंधी नीतिगत मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देना, (ii) बिल के कार्यान्वयन की समीक्षा करना और उसकी निगरानी करना, (iii) एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स के लिए आचार संहिता और मानदंड बनाना, और (iv) बिल के अंतर्गत गठित विभिन्न निकायों का पर्यवेक्षण। राष्ट्रीय बोर्ड के सुझावों, नीतियों और रेगेलुशंस के अनुसार राज्य बोर्ड एआरटी की नीतियों और दिशानिर्देशों के प्रवर्तन के बीच समन्वय स्थापित करेंगे।
     
  • कमीशनिंग पार्टी के लिए पात्रता के मानदंड: एआरटी सेवाओं को शादीशुदा कपल्स या सिंगल महिलाओं द्वारा कमीशन किया जा सकता है, जहां(i) महिला विवाह की वैध आयु से अधिक और अधिकतम 50 वर्ष की हो, और (ii) पुरुष विवाह की वैध आयु से अधिक और अधिकतम 55 वर्ष का हो। शादीशुदा कपल्स को अनफर्टाइल भी होना चाहिए यानी असुरक्षित सहवास के एक साल बाद तक गर्भ धारण करने में असमर्थ होना या किसी मेडिकल स्थिति से पीड़ित होना चाहिए जोकि गर्भधारण करने से रोकती हो।
     
  • डोनर्स के लिए पात्रता के मानदंड: बैंक 21 से 55 वर्ष के बीच के पुरुषों का सीमन और 23 से 35 वर्ष के बीच की महिलाओं के एग्स ले सकता है। एग डोनर ऐसी महिला होनी चाहिए जिसकी कभी न कभी शादी हुई हो और उसका कम से कम एक जीवित बच्चा हो (न्यूनतम तीन वर्ष का)। महिला अपने जीवन में सिर्फ एक बार एग्स डोनेट कर सकती है और उससे अधिकतम सात एग्स लिए जा सकते। बैंक एक से अधिक कमीशनिंग पार्टी (यानी सेवा की मांग करने वाले कपल्स या सिंगल महिलाओं) को सिंगल डोनर का गैमेट सप्लाई नहीं कर सकता। 
     
  • सेवाएं प्रदान करने की शर्तें: एआरटी प्रक्रियाओं को कमीशिंग पार्टी और डोनर्स की लिखित सहमति से संचालित किया जाएगा। कमीशनिंग पार्टी एग डोनर को बीमा कवरेज देगी (किसी नुकसान या मौत के लिए)। क्लिनिक भ्रूण के प्रत्यारोपण से पहले जेनेटिक बीमारी की जांच करेगा और वह सेक्स-सिलेक्टिव सेवाएं नहीं दे सकता (यानी जन्म से पहले भ्रूण की जांच नहीं करेगा)।
     
  • एआरटी के जरिए जन्मे बच्चे के अधिकार: एआरटी से जन्मे बच्चे को कमीशनिंग कपल का बायोलॉजिकल बच्चा माना जाएगा और वह कमीशनिंग कपल के प्राकृतिक बच्चे को उपलब्ध सभी अधिकारों और सुविधाओं का पात्र होगा। डोनर का बच्चे पर कोई पेरेंटल अधिकार नहीं होगा।
     
  • एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स के कार्य: एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स नेशनल रजिस्ट्री के साथ निम्नलिखित से संबंधित जानकारियों को साझा करेंगे: (i) कमीशनिंग पार्टीज़ और डोनर्स का नामांकन, (ii) संचालित होने वाली प्रक्रियाएं, और (iii) प्रक्रियाओं के परिणाम। इसके अतिरिक्त नेशनल रजिस्ट्री को ट्रांसफर करने के बाद डोनेशंस के रिकॉर्ड्स कम से कम 10 वर्षों तक रखे जाएंगे। मानव गैमेट्स और एंब्रेयो का इस्तेमाल करते हुए एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स को निम्नलिखित करना होगा: (i) रेगुलेशंस द्वारा निर्दिष्ट तरीके से एग्स को हार्वेस्ट करना, और (ii) रेगुलेशंस द्वारा निर्दिष्ट संख्या में किसी महिला के यूटेरस में एग्स या एंब्रेयो को रखना। 
     
  • अपराध और सजाबिल के अंतर्गत अपराधों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) एआरटी के जरिए जन्मे बच्चों का परित्याग या उनका शोषण, (ii) मानव एंब्रेयो या गैमेट्स को खरीदना, बेचना, व्यापार या आयात करना, और (iii) कमीशनिंग कपल, महिला या गैमेट डोनर का किसी तरह से शोषण करना। पहली बार अपराध करने पर पांच से 10 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ेगा। इसके बाद अपराध करने पर आठ से 12 वर्ष की कैद और 10 से 20 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ेगा।
     
  • राष्ट्रीय या राज्य बोर्ड की शिकायत पर ही अदालत किसी अपराध का संज्ञान लेगी।

भाग ख: प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

सेरोगेसी सेवाओं और दूसरी एआरटी सेवाओं के रेगुलेशन में ओवरलैप

2016 में सेरोगेसी प्रक्रियाओं को रेगुलेट करने के लिए बिल पेश किया गया।[5]   यह बिल सेरोगेसी क्लिनिक्स के रजिस्ट्रेशन का प्रावधान करता है, कमीशनिंग कपल्स और सेरोगेट्स के लिए पात्रता मानदंडों को स्पष्ट करता है और सेरोगेसी संबंधी नीतियों पर सरकार को सलाह देने के लिए राष्ट्रीय और राज्य बोर्ड का गठन करता है। इस बिल को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्टैंडिंग कमिटी को भेजा गया जिसने कुछ सुझाव दिए।1  हालांकि 16वीं लोकसभा के भंग होने के साथ बिल लैप्स हो गया और 2019 में उसके स्थान पर दूसरा बिल लाया गया।3 इस बिल को राज्यसभा की सिलेक्ट कमिटी को भेजा गया।4  

बिल की समीक्षा करते हुए दोनों कमिटियों ने निम्नलिखित पर गौर किया: (i) सेरोगेसी प्रक्रियाओं को असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) का इस्तेमाल किए बिना संचालित नहीं किया जा सकता, और (ii) सेरोगेसी और दूसरी एआरटी प्रक्रियाओं को सामान्यतया एक ही क्लिनिक में संचालित किया जाता है। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि पहले एआरटी सेवाएं प्रदान करने वाले क्लिनिक्स को रेगुलेट करने के लिए एक व्यापक कानून पेश किया जाना चाहिए, और अलग सेरोगेसी कानून में सेरोगेसी प्रक्रियाओं के इस्तेमाल से जुड़ी समस्याओं को निर्दिष्ट किया जा सकता है। इसके बाद एआरटी बिल, 2020 को पेश किया गया। हालांकि सेरोगेसी और एआरटी, दोनों बिल्स में क्लिनिक्स के रेगुलेशन के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं (जोकि इस बात पर आधारित हैं कि वे सेरोगेसी की सेवा देते हैं या दूसरी एआरटी सेवाएं प्रदान करते हैं)। इसके अतिरिक्त वे कमीशनिंग पार्टीज़ के लिए पात्रता के अलग-अलग मानदंड निर्दिष्ट करते हैं (जोकि इस बात पर आधारित है कि वे कौन सी सेवा चाहते हैं- एआरटी या फिर सेरोगेसी)। साथ ही इन दोनों बिल्स में एक से अपराध करने पर (जैसे गैमेट्स की बिक्री) अलग-अलग सजा निर्दिष्ट की गई है। 

उदाहरण के लिए सेरोगेसी प्रक्रियाओं को संचालित करने वाले क्लिनिक्स को तीन वर्षों के लिए रजिस्ट्रेशन दिया जाएगा, जबकि दूसरी एआरटी सेवाएं देने वाले क्लिनिक्स को पांच वर्षों के लिए रजिस्ट्रेशन दिया जाएगा। इसी तरह असुरक्षित सेक्स के एक वर्ष बाद तक गर्भधारण न कर पाने वाले शादीशुदा कपल्स एआरटी सेवा प्राप्त कर सकते हैं लेकिन उन्हें सेरोगेसी के लिए पांच वर्ष की प्रतीक्षा करनी होगी।    

उल्लेखनीय है कि एआरटी बिल में कमीशनिंग कपल्स के पात्रता मानदंड उन कमिटीज़ के सुझावों के अनुरूप हैं जिन्होंने सेरोगेसी बिल की समीक्षा की थी। उदाहरण के लिए सेरोगेसी बिल, 2016 की समीक्षा करने वाली स्टैंडिंग कमिटी ने सुझाव दिया था कि इनफर्टिलिटी की अवधि को एक वर्ष कर दिया जाए, और दोनों कमिटीज़ ने सुझाव दिया था कि महिलाओं (विधवा या तलाकशुदा) को सेरोगेसी सेवाएं प्राप्त करने की अनुमति दी जाए। वैसे बिल में कमिटीज़ के दूसरे सुझावों को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए स्टैंडिंग कमिटी ने सुझाव दिया था कि सेरोगेसी के पात्रता मानदंडों को व्यापक बनाया जाना चाहिए ताकि इसमें लिव-इन कपल्स को शामिल किया जा सके।1  कमिटी ने इस बात पर बल दिया था कि सर्वोच्च न्यायालय ने लिव-इन कपल्स को कानूनी मान्यता दी है। बिल के अंतर्गत ‘महिलाएं’ तो एआरटी सेवाएं प्राप्त कर सकती हैं लेकिन लिव-इन कपल्स नहीं।

चूंकि बिल को कमिटी के सुझावों के बाद पेश किया गया था, इसलिए सेरोगेसी बिल और एआरटी बिल, दोनों में सामंजस्य बनाने के लिए प्रासंगिक परिवर्तन करना उचित हो सकता है। नीचे तालिका 1 में दोनों बिल्स के बीच मुख्य भिन्नताओं को प्रस्तुत किया गया है।

उल्लेखनीय है कि एआरटी बिल (2014) के ड्राफ्ट में सेरोगेसी को एक ऐसी व्यवस्था बताया गया था जोकि एआरटी तकनीकों का इस्तेमाल करके संचालित की जाती है। इसमें क्लिनिक्स के रेगुलेशन पर एक समान प्रावधान, कमीशनिंग पार्टीज़ और डोनर्स के आयु संबंधी पात्रता मानदंड और एक समान अपराध और सजा निर्दिष्ट की गई थी।[6] इसके अतिरिक्त बिल में सेरोगेसी पर एक खंड अलग से था। बिल को संसद में पेश नहीं किया गया। 

 तालिका 1सेरोगेसी बिल, 2019 और एआरटी बिल, 2020 के मुख्य प्रावधानों के बीच तुलना 

 

सेरोगेसी (रेगुलेशन) बिल, 2019 (लोकसभा में पारित) 

एआरटी बिल, 2020 

इनफर्टिलिटी

  • इनफर्टिलिटी असुरक्षित सेक्स के पांच वर्ष बाद तक गर्भधारण करने में सक्षम न होना है। शादीशुदा कपल्स को सेरोगेसी की सेवा प्राप्त करने के लिए इनफर्टिलिटी को साबित करना होगा।   
  • इनफर्टिलिटी असुरक्षित सेक्स के एक वर्ष बाद तक गर्भधारण करने में सक्षम न होना है। शादीशुदा कपल्स को एआरटी सेवा हासिल करने के लिए इनफर्टाइल होना चाहिए। 

रेगुलेशन

  • फ्रेमवर्क: केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय और राज्य सेरोगेसी बोर्ड बनाएंगी। राष्ट्रीय बोर्ड का काम नीतिगत मामलों पर केंद्र सरकार को सलाह देना और राज्य बोर्ड्स के कामकाज को सुपरवाइज करना है। 
  • रजिस्ट्रेशन: क्लिनिक अथॉरिटी में रजिस्टर होंगे। इस अथॉरिटी में स्वास्थ्य विभाग का एक ज्वाइंट डायरेक्टर रैंक का अधिकारी (चेयरपर्सन) और एक मेडिकल प्रैक्टीशनर शामिल होगा। 
  • रजिस्ट्रेशन 90 दिनों के भीतर दिया जाएगा और तीन वर्ष की अवधि के लिए वैध होगा।
  • फ्रेमवर्क: सेरोगेसी बिल के अंतर्गत गठित राष्ट्रीय और राज्य बोर्ड एआरटी बिल के अंतर्गत बोर्ड के तौर पर काम करेंगे। 
  • बिल में एक नेशनल रजिस्ट्री का भी प्रावधान है जिसमें भारत के सभी एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स के विवरण दर्ज होंगे। 
  • रजिस्ट्रेशन: एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स को इसी प्रकार गठित रजिस्ट्रेशन अथॉरिटीज़ के जरिए नेशनल रजिस्ट्री में रजिस्टर्ड होना चाहिए। अथॉरिटी राज्य बोर्ड को रजिस्ट्रेशन की जानकारी देगी। राज्य बोर्ड के परिसर के निरीक्षण के बाद ही रजिस्ट्रेशन दिया जा सकता है।  
  • रजिस्ट्रेशन 30 दिनों के भीतर दिया जाएगा (या माना जाएगा कि रजिस्ट्रेशन दे दिया गया) और पांच वर्षों के लिए वैध होगा।

कमीशनिंग की पात्रता

  • भारतीय कपल्स: (i) जिसमें महिला की आयु 23-50 वर्ष के बीच और पुरुष की 26-55 वर्ष के बीच हो, (ii) न्यूनतम पांच वर्ष से शादीशुदा हों, और (iii) उनका कोई बायोलॉजिकल, गोद लिया हुआ या सेरोगेट बच्चा न हो। 
  • कमीशनिंग कपल्स (विवाह की वैध आयु वाले) जिसमें महिला की आयु 50 वर्ष से कम और पुरुष की 55 वर्ष से कम हो। 
  • सिंगल महिला एआरटी सेवाएं प्राप्त कर सकती हैं। 
  • विदेशियों के एआरटी सेवाएं हासिल करने पर प्रतिबंध नहीं है। 

अपराध

  • कुछ कार्यों (जैसे गैमेट्स बेचने) पर 10 वर्ष तक की कैद और 10 लाख रुपए तक का जुर्माना है। 
  • सेरोगेसी प्रैक्टीशनर या क्लिनिक के मालिक द्वारा किसी उल्लंघन पर पांच वर्ष तक की कैद और जुर्माने की सजा है, और इसके बाद अपराध करने पर अधिक कड़ी सजा है। 
  • कोई सजा तय न होने पर तीन वर्ष तक की कैद, जुर्माना।
  • कोई भी व्यक्ति सीधे शिकायत दर्ज करा सकता है (संबंधित अथॉरिटी को न्यूनतम 15 दिन के नोटिस के साथ)। 
  • अपराध गैर जमानती हैं।
  •  ऐसे ही कार्यों पर 5-10 लाख रुपए के जुर्माने के साथ प्रतिबंध। एक से अधिक बार उल्लंघन करने पर 8-12 वर्ष की कैद और 10-20 लाख रुपए का जुर्माना। 
  • जिन अपराधों के लिए सजा तय नहीं, उनके लिए ऐसी ही सजा (उपरिलिखित) लागू।
  • सिर्फ राष्ट्रीय बोर्ड, राज्य बोर्ड या उसके अधिकृत अधिकारी ही अदालत में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
  • अपराध जमानती हैं।

जब्त करना

  • सिर्फ रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी परिसर में दाखिल हो सकती है, क्लिनिक की तलाशी ले सकती/ दस्तावेज जब्त कर सकती है।  
  • राष्ट्रीय/राज्य बोर्ड और नेशनल रजिस्ट्री के पास परिसर की तलाशी लेने और दस्तावेजों को जब्त करने का अधिकार है। 

स्टोरेज

  • 25 वर्ष या ऐसी कोई निर्दिष्ट अवधि। 
  • न्यूनतम 10 वर्ष, फिर रजिस्ट्री को रिकॉर्ड्स का ट्रांसफर। 

Sources: The Surrogacy (Regulation) Bill, 2019; ART Bill 2020; Reports of the Standing Committee and Select Committee; PRS. 

डेटा शेयरिंग संबंधी प्रावधान पार्टीज़ की प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है

बिल एक नेशनल रजिस्ट्री का गठन करता है जोकि देश में सभी एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स के केंद्रीय डेटाबेस के तौर पर काम करेगी। एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स से यह अपेक्षा की जाती है कि वे रजिस्ट्री के साथ कुछ जानकारियों को साझा करेंगे। इसमें निम्नलिखित से संबंधित जानकारियां शामिल हैं: (i) कमीशनिंग पार्टीज़ और डोनर्स का नामांकन, (ii) संचालित होने वाली प्रक्रियाएं, और (iii) प्रक्रियाओं और उनसे जुड़ी जटिलताओं के परिणाम। इससे पार्टीज़ की व्यक्तिगत पहचान योग्य जानकारी (जैसे नाम और पहचान से संबंधित दूसरे विवरण) का खुलासा हो सकता है। इसके अतिरिक्त उनसे रजिस्ट्री की स्थापना के बाद कुछ जानकारियों को साझा करने की अपेक्षा की जाती है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) कमीशनिंग पार्टीज़ की प्रगति, और (ii) स्क्रीन, मेनटेन और सप्लाई किए गए डोनर्स की संख्या। नेशनल रजिस्ट्री को अनुसंधान और नीति निर्माण के उद्देश्य से इस डेटा को राष्ट्रीय बोर्ड से साझा करना होगा। एआरटी क्लिनिक्स और बैंक्स द्वारा डोनर्स और कमीशनिंग पार्टीज़ की व्यक्तिगत जानकारियों को नेशनल रजिस्ट्री के साथ साझा करना, उन लोगों के प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की व्याख्या कुछ इस तरह की है कि प्राइवेसी का अधिकार मूलभूत अधिकार का एक हिस्सा है।[7]  उसने कहा है कि इस अधिकार का उल्लंघन किया जा सकता है, अगर: (i) कोई कानून हो, (ii) वह कानून कोई जन उद्देश्य हासिल करता हो, और (iii) जन उद्देश्य प्राइवेसी के उल्लंघन के अनुपात में हो। बिल व्यक्तिगत जानकारी जमा करने और उसे रजिस्ट्री के साथ साझा करने का कोई उद्देश्य निर्दिष्ट नहीं करता। सरोगेसी बिल की समीक्षा करते हुए स्टैंडिंग कमिटी ने कहा था कि सेरोगेट्स, सेरोगेसी क्लिनिक्स और बैंक्स का रजिस्ट्रेशन निम्नलिखित कारणों से जरूरी है: (i) सेरोगेसी प्रक्रियाओं को असरदार तरीके से रेगुलेट और मॉनिटर करना, और (ii) इस बात की निगरानी करना कि किसी महिला ने कितनी बार सेरोगेसी की है या डोनर ने सेरोगेसी के लिए कितनी बार अपने गैमेट को डोनेट किया है।1  

एआरटी बिल के अंतर्गत एग डोनर अपने जीवनकाल में सिर्फ एक बार अपने एग्स डोनेट कर सकती है। इसलिए उस पर नजर रखना जरूरी हो सकता है। पर यह अस्पष्ट है कि इस प्रक्रिया के दूसरे पक्षों के व्यक्तिगत विवरण क्यों जरूरी हैं। साथ ही नीति निर्माण और शोध के नए क्षेत्रों को चिन्हित करने के लिए नेशनल रजिस्ट्री उस जानकारी (व्यक्तिगत जानकारी सहित) को राष्ट्रीय बोर्ड से साझा कर सकती है। हालांकि अनाम आंकड़े नीति निर्माण के लिए उपयोगी हो सकते हैं, यह अस्पष्ट है कि इसके लिए सभी पक्षों की व्यक्तिगत जानकारी क्यों जरूरी है। उल्लेखनीय है कि मौजूदा मेडिकल प्रैक्टीशनर्स अपने काम के दौरान किसी मरीज के विवरण का खुलासा नहीं कर सकते, सिवाय कुछ मामलों को छोड़कर। यह खुलासा तभी संभव है, जब: (i) अदालती आदेश दिया गया हो, या (ii) विशिष्ट व्यक्ति/समुदाय को गंभीर और पहचान योग्य जोखिम हो।[8]  

एग डोनर्स के पात्रता मानदंड अवरोधक हो सकते हैं 

बिल में स्पष्ट किया गया है कि एग डोनर 23-35 वर्ष की एक ऐसी महिला होनी चाहिए जिसकी कभी न कभी शादी हुई हो, और उसका अपना कम से कम एक जीवित बच्चा हो जिसकी आयु न्यूनतम तीन वर्ष हो। आयु के प्रतिबंध का यह कारण हो सकता है कि डोनर से स्वस्थ और वायबिल एग मिलने की संभावना हो, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि डोनर को शादीशुदा क्यों होना चाहिए या उसका न्यूनतम आयु का एक बच्चा क्यों होना चाहिए।2  उल्लेखनीय है कि एआरटी पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के दिशानिर्देश (2005) में सिर्फ महिला डोनर्स की आयु सीमा तय है, यानी उन्हें डोनेट करने के लिए 18-35 वर्ष का होना चाहिए।2  यह यूके में लागू प्रतिबंधों के समान है।[9]  दक्षिण अफ्रीका में डोनर्स के लिए सिर्फ यही शर्त है कि उनकी आयु कम से कम 18 वर्ष हो।9  

डोनर्स की काउंसिलिंग और सहमति वापस लेने के कोई प्रावधान नहीं

बिल के अंतर्गत एआरटी क्लिनिक्स को कमीशनिंग पार्टीज़ को निम्नलिखित के संबंध में काउंसिलिंग सेवा देनी जरूरी है: (i) क्लिनिक में एआरटी प्रक्रियाओं की सफलता की संभावनाएं, और (ii) प्रक्रियाओं के लाभ और हानियां। लेकिन बिल में डोनर्स के लिए काउंसिलिंग के ऐसे प्रावधान शामिल नहीं हैं। यह मौजूदा प्रक्रिया से अलग है। एआरटी (2005) और बायोमेडिकल रिसर्च (2006) पर आईसीएमआर के दिशानिर्देशों में कहा गया है कि डॉक्टर्स को प्रक्रिया शुरू करने से पहले डोनर्स की काउंसिलिंग करनी होगी (इसमें एग डोनेशन के कारण ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन से संबंधित जोखिमों की काउंसिलिंग भी शामिल है)।2,[10] ऐसे ही प्रावधान एआरटी बिल (2014) के ड्राफ्ट में भी थे।6  2014 के बिल में राष्ट्रीय बोर्ड से यह अपेक्षा की गई थी कि वह काउंसिलर के कर्तव्यों की एक सूची तैयार करेगा जिसमें एग डोनर्स का विशेष संदर्भ होगा। वह एग डोनर्स को बताएगा कि लंबी अवधि में उस पर डोनेशन का क्या असर हो सकता है। वह उसके मनोवैज्ञानिक जोखिमों का मूल्यांकन करेगा और इस बात का मूल्यांकन करेगा कि डोनेशन का उसके मौजूदा संबंधों पर क्या असर होगा।

इसके अतिरिक्त कमीशनिंग पार्टीज़ महिला के यूटेरस में एंब्रेयो या गैमेट को ट्रांसफर करने से पहले सहमति वापस ले सकती हैं। लेकिन डोनर्स को अपनी सहमति वापस लेने का ऐसा ही अधिकार नहीं है। आईसीएमआर दिशानिर्देश (2006) और 2014 के बिल में यह प्रावधान था कि महिला के यूटेरस में एंब्रेयो या गैमेट के प्रत्यारोपण से पहले किसी भी समय डोनर अपनी सहमति वापस ले सकता/सकती है।6,10  इसी प्रकार यूके में उपचार में एंब्रेयो या गैमेट के इस्तेमाल से पहले डोनर को सहमति वापस लेने की अनुमति है।9  हालांकि ऐसे प्रावधान एआरटी पर आईसीएमआर के दिशानिर्देशों (2005) में निर्दिष्ट नहीं हैं।2  

संबंधित सरकार की निर्देश जारी करने की शक्ति 

बिल केंद्र और राज्य सरकार को अधिकार देता है कि वे नीतिगत मुद्दों पर केंद्र शासित प्रदेशों और राज्यों में क्रमशः राष्ट्रीय बोर्ड/रजिस्ट्री/रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी और राज्य बोर्ड/रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी को बाध्यकारी निर्देश जारी करें। ये निर्देश ‘भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता’ के हित में जारी किए जा सकते हैं। उन स्थितियों पर विचार करना मुश्किल है, जब एआरटी नीति का राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे से संबंध हो।

उल्लेखनीय है कि दूसरे रेगुलेटरी कानूनों में भी नीतिगत मामलों पर निर्देश जारी करने के अधिकार से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। ये कानून हैं, कंपीटीशन एक्ट, 2002, सेबी एक्ट, 1992 और नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट, 2019। हालांकि इन कानूनों में इन अधिकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा या लोक व्यवस्था से नहीं जोड़ा गया है।

एआरटी के लिए अतिरिक्त पात्रता मानदंड को रेगुलेशंस के जरिए निर्धारित किया जा सकता है

बिल में एआरटी सेवाओं के इच्छुक कपल्स के लिए पात्रता की शर्तों को निर्दिष्ट किया गया है। बिल में कहा गया है कि क्लिनिक्स शादीशुदा कपल्स या शादी की वैध आयु वाली सिंगल महिलाओं को एआरटी सेवाएं दे सकते हैं, और: (i) महिला को अधितम 50 वर्ष का, और (ii) पुरुष को अधिकतम 55 वर्ष का होना चाहिए। इसके अतिरिक्त एआरटी सेवाएं लेने वाले शादीशुदा कपल्स को इनफर्टाइल होना चाहिए यानी असुरक्षित सहवास के एक साल बाद तक गर्भ धारण करने में असमर्थ होना या किसी मेडिकल स्थिति से पीड़ित होना चाहिए जोकि गर्भधारण करने से रोकती हो। इसके अतिरिक्त बिल निर्दिष्ट करता है कि एआरटी बैंक्स 21-55 वर्ष के आयु वर्ग के पुरुषों से सीमन और 23-35 वर्ष के आयु वर्ग की महिलाओं से एग्स ले सकता है। एग डोनर को ऐसी महिला होना चाहिए जिसकी कभी न कभी शादी हुई हो और उसका अपना कम से कम एक बच्चा होना चाहिए (जो न्यूनतम तीन वर्ष का हो)।

बिल में केंद्र सरकार को इस बात की अनुमति दी गई है कि वह इच्छुक कपल्स, महिलाओं और डोनर्स के लिए अतिरिक्त पात्रता मानदंडों को नियमों द्वारा निर्दिष्ट कर सकती है। सवाल यह है कि क्या पात्रता की शर्तों जैसी मुख्य विशेषताओं को पेरेंट कानून में निर्दिष्ट होना चाहिए (किसी परिवर्तन के लिए संसद कानून में संशोधन करती है) या उन शर्तों पर नियम बनाने का अधिकार सरकार को सौंपा जा सकता है। 

कमीशनिंग पार्टीज़ के लिए अपील की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं

बिल के अध्याय III में एआरटी क्लिनिक्स और एआरटी बैंक्स के रजिस्ट्रेशन के प्रावधान निर्दिष्ट हैं। उसमें राज्य सरकार द्वारा नियुक्त रजिस्ट्रेशन अथॉरिटीज़ द्वारा रजिस्ट्रेशन देने, उनके रीन्यूअल और रद्द करने की प्रक्रियाएं दी गई हैं। अध्याय में रजिस्ट्रेशन अथॉरिटीज़ द्वारा रजिस्ट्रेशन को नामंजूर करने, उन्हें सस्पेंड या रद्द करने के आदेश के खिलाफ अपील करने का प्रावधान भी है। हालांकि इस प्रावधान में क्लिनिक्स और कमीशनिंग पार्टीज़ को अपील करने की अनुमति दी गई है। यह स्पष्ट नहीं है कि कमीशनिंग पार्टीज़ को रजिस्ट्रेशन से संबंधित अपील करने की अनुमति क्यों दी गई है।  
 

अनुलग्नक: एआरटी कानूनों के बीच अंतरराष्ट्रीय तुलना 

तालिका 2 में बिल की तुलना विभिन्न देशों के कानूनों से की गई है जोकि एआरटी प्रक्रियाओं को रेगुलेट करते हैं।  

तालिका 2: एआरटी कानूनों के बीच अंतरराष्ट्रीय तुलना 

देश

भारत

युनाइडेट किंगडम 

दक्षिण अफ्रीका

कनाडा

ऑस्ट्रेलिया (विक्टोरिया) 

डोनर को भुगतान

  • मेडिकल खर्च और बीमा कवरेज
  • उपयुक्त मेडिकल खर्च
  • उपयुक्त खर्च  

 

  • यात्रा और काउंसिलिंग सहित प्रतिपूर्तियां
  • उपयुक्त खर्च

कमीशनिंग पार्टी की आयु

  • 21-55 के बीच पुरुष
  • 18-50 के बीच महिला
  • निर्दिष्ट नहीं  
  • न्यूनतम 18 वर्ष
  • निर्दिष्ट नहीं
  • निर्दिष्ट नहीं

एआरटी कमीशन करने का मेडिकल कारण

  • कपल्स को इनफर्टिलिटी साबित करनी होगी  
  • निर्दिष्ट नहीं
  • निर्दिष्ट नहीं   
  • निर्दिष्ट नहीं
  • अगर महिला बिना इलाज के गर्भधारण नहीं कर सकती/बच्चे को कैरी नहीं कर सकती, या महिला/उसके पार्टनर द्वारा जेनेटिक विकृति संचारित करने का खतरा है

एआरटी कमीशन करने के लिए वैवाहिक स्थिति

  • शादीशुदा होना जरूरी, सिंगल महिला को अनुमति
  • जरूरी नहीं  
  • जरूरी नहीं
  • जरूरी नहीं  
  • जरूरी नहीं  

डोनर की आयु

  • 21-55 वर्ष का पुरुष
  • 23-35 वर्ष की महिला जिसका न्यूनतम तीन वर्ष का एक बच्चा हो
  • 18-45 वर्ष के बीच पुरुष  
  • 18-35 वर्ष के बीच महिला (कुछ मामलों को छोड़कर) 
  • न्यूनतम 18 वर्ष की आयु
  • मेडिकल संकेत के मामलों में अपवाद 
  • न्यूनतम 18 वर्ष की आयु  
  • अपने गैमेट के संरक्षण की स्थिति में अपवाद
  • न्यूनतम 18 वर्ष की आयु
  • अगर बच्चे के वयस्क होने से पहले ही इनफर्टाइल होने का जोखिम हो तो उस स्थिति में अपवाद

डोनर्स पर प्रतिबंध

  • एक एग डोनर से सिर्फ एक बार डोनेशन (अधिकतम सात एग्स निकाल सकते हैं) 
  • प्रति डोनर अधिकतम 10 परिवार 
  • डोनेट किए गए गैमेट्स के इस्तेमाल से अधिकतम छह जन्म 
  • निर्दिष्ट नहीं  
  • डोनेट किए गए गैमेट्स को अधिकतम 10 परिवारों के प्रजनन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है

Sources:  India: The Assisted Reproductive Technology (Regulation) Bill, 2020; United Kingdom: The Human Fertilisation and Embryology Act, 2008; Code of Practice, 2019; South Africa: National Health Act, 2003; Regulations Relating to Artificial Fertilisation of Persons, 2012; Canada: Assisted Human Reproduction Act, 2004; Reimbursement Related to Assisted Human Reproduction Regulations; Consent for Use of Human Reproductive Material and In Vitro Embryo Regulations; Australia (Victoria): The Assisted Reproductive Treatment Act, 2008; The Prohibition of Human Cloning for Reproduction Act, 2008; PRS. 

 

[1]. ‘Surrogacy (Regulation) Bill, 2016’, Report No. 102, Standing Committee on Health and Family Welfare, August 10, 2017.  

[2]. National Guidelines for Accreditation, Supervision & Regulation of ART Clinics in India, Indian Council of Medical Research, 2005.

[3]. The Surrogacy (Regulation) Bill, 2019.

[4]. ‘Report of the Select Committee on the Surrogacy (Regulation) Bill, 2019’, Rajya Sabha, February 5, 2020.

[5]. The Surrogacy (Regulation) Bill, 2016

[6]. The Assisted Reproductive Technology (Regulation), Bill, 2014.

[7]. Justice K. S. Puttaswamy and Ors. vs Union of India and Ors, AIR 2017 SC 4161.

[8]Indian Medical Council (Professional Conduct, Etiquette and Ethics) Regulations, 2002

[9]. United Kingdom: The Human Fertilisation and Embryology Act, 2008; South Africa: National Health Act, 2003.

[10]. Ethical Guidelines for Biomedical Research on Human Participants, Indian Council of Medical Research, 2006. 

 

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