लेजिसलेटिव ब्रीफ

भारतीय साक्ष्य बिल, 2023

बिल की मुख्‍य विशेषताएं

  • भारतीय साक्ष्य बिल, 2023 (बीएसबी) भारतीय साक्ष्य एक्ट, 1872 (आईईए) की जगह लेता है। यह आईईए के अधिकांश प्रावधानों को बरकरार रखता है जिनमें इकबालिया बयान यानी कन्फेशन, तथ्यों की प्रासंगिकता और बर्डन ऑफ प्रूफ शामिल हैं।
  • आईईए दो प्रकार के सबूतों का प्रावधान करता है – डॉक्यूमेंटरी और ओरल। डॉक्यूमेंटरी सबूत में प्राइमरी (मूल डॉक्यूमेंट) और सेकेंडरी (जो मूल डॉक्यूमेंट के कंटेंट को साबित करते हैं) सबूत शामिल हैं। बीएसबी इस फर्क को बरकरार रखता है। इसमें डॉक्यूमेंट की परिभाषा में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड शामिल हैं।
  • आईईए के तहत, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सेकेंडरी सबूत के रूप में वर्गीकृत किया गया है। बीएसबी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को प्राइमरी सबूत के रूप में वर्गीकृत करता है। बिल इसके दायरे को बढ़ाता है, जिससे उसमें सेमीकंडक्टर मेमोरी या किसी संचार उपकरण (स्मार्टफोन, लैपटॉप) में स्टोर की गई जानकारी को शामिल किया जा सके। 
  • आईईए के तहत विभिन्न परिस्थितियों में सेकेंडरी सबूत की आवश्यकता हो सकती है, जैसे कि जब ओरिजिनल उस व्यक्ति के कब्जे में हो जिसके खिलाफ डॉक्यूमेंट को साबित करने की मांग की गई हो या नष्ट कर दिया गया हो। बीएसबी का कहना है कि अगर डॉक्यूमेंट की सच्चाई पर सवाल है तो सेकेंडरी सबूत की जरूरत हो सकती है।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है। बीएसबी ऐसे रिकॉर्ड को स्वीकार करने की अनुमति देता है, लेकिन जांच प्रक्रिया के दौरान ऐसे रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ और संदूषण को रोकने के लिए कोई सुरक्षा उपाय नहीं देता।
  • वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तभी डॉक्यूमेंट्स के तौर पर स्वीकार किए जा सकते हैं, जब उन्हें प्रमाणित करने के लिए साथ में एक सर्टिफिकेट हो। बीएसबी में भी यही प्रावधान है। बीएसबी इलेक्ट्रॉनिक सबूत को भी डॉक्यूमेंट्स के तौर पर वर्गीकृत करता है (जिसके लिए प्रमाणीकरण की जरूरत नहीं हो सकती है)। इससे विरोधाभास पैदा होता है।
  • आईईए के तहत पुलिस हिरासत में आरोपी से प्राप्त जानकारी से मिलने वाला कोई तथ्य साबित करने योग्य (यानी प्रूवेबल) हो सकता है। बीएसबी ने इस प्रावधान को बरकरार रखा है। दूसरी तरफ अदालतों और समितियों ने कहा है कि पुलिस हिरासत में तथ्यों की खोज जोर-जबरदस्ती से की जा सकती है, और वह भी बिना किसी पर्याप्त सुरक्षा उपाय के।
  •  आईईए (और बीएसबी) ऐसी जानकारी को स्वीकार करने की अनुमति देता है, जो आरोपी के पुलिस हिरासत में होने के दौरान हासिल की गई थी, लेकिन तब नहीं, जब वह बाहर था। विधि आयोग ने इस फर्क को दूर करने का सुझाव दिया था।
  • विधि आयोग के कई सुझावों को बिल में शामिल नहीं किया गया है। इनमें यह धारणा शामिल है कि अगर पुलिस हिरासत में कोई आरोपी घायल हो जाता है तो पुलिस अधिकारी ने ही उसे चोट पहुंचाई है।

भाग क : बिल की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

भारतीय साक्ष्य एक्ट, 1872 (आईईए) भारतीय न्यायालयों में सबूतों की स्वीकार्यता यानी एडमिसिबिलिटी से संबंधित है। यह सभी दीवानी और फौजदारी कार्यवाहियों पर लागू होता है। पिछले कुछ वर्षों में आईईए को कुछ आपराधिक सुधारों और तकनीकी प्रगति के अनुरूप करने के लिए संशोधित किया गया है। 2000 में सेकेंडरी सबूत के रूप में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए आईईए में संशोधन किया गया था।[1]  2013 में इसमें संशोधन कर बलात्कार के मामलों में सहमति से संबंधित प्रावधान जोड़े गए। इसके जरिए यह साबित करने की जिम्मेदारी अब आरोपी की है कि सहमति दी गई थी, और यह भी कहा गया कि सहमति का निर्धारण करते समय पीड़िता का चरित्र और उसका यौन इतिहास प्रासंगिक नहीं होगा।1

विधि आयोग ने कई अवसरों पर आईईए की जांच की है और हिरासत में हिंसा, पुलिस को इकबालिया बयान की स्वीकार्यता और जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) जैसे मामलों पर संशोधन का सुझाव दिया है। विधि आयोग के प्रमुख सुझावों पर अधिक जानकारी के लिए तालिका 1 देखें।[2],[3]  भारतीय साक्ष्य बिल, 2023 को 11 अगस्त, 2023 को लोकसभा में पेश किया गया था। यह आईईए का स्थान लेने का प्रयास करता है। गृह मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी ने बिल की समीक्षा की है।[4]   

मुख्य विशेषताएं   

भारतीय साक्ष्य बिल, 2023 (बीएसबी) आईईए के अधिकांश प्रावधानों को बरकरार रखता है। इनमें निम्नलिखित शामिल है:

  • स्वीकार्य सबूत: कानूनी कार्यवाही में शामिल पक्ष केवल स्वीकार्य सबूत प्रस्तुत कर सकते हैं। स्वीकार्य सबूत को 'फैक्ट्स इन इश्यू' (विवाधक तथ्य) या 'रेलेवेंट फैक्ट्स' (सुसंगत तथ्य) के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। फैक्ट्स इन इश्यू किसी भी ऐसे तथ्य को कहा जाता है जो कानूनी कार्यवाही में दावा किए गए या अस्वीकार किए गए किसी भी अधिकार, दायित्व या असमर्थता के अस्तित्व, प्रकृति या सीमा को निर्धारित करते हैं। रेलेवेंट फैक्ट वे तथ्य होते हैं जो किसी दिए गए मामले से प्रासंगिक हैं। आईईए दो प्रकार के सबूत प्रदान करता है- डॉक्यूमेंटरी और ओरल सबूत।
  • सिद्ध तथ्य: किसी तथ्य को तब सिद्ध माना जाता है, जब प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर, न्यायालय यह मानता है कि या तो: (i) वह अस्तित्व में है, या (ii) उसके अस्तित्व की इतनी संभावना है कि एक विवेकशील व्यक्ति को ऐसे कार्य करना चाहिए जैसे कि वह मामले की परिस्थितियों में मौजूद हो।
  • पुलिस के सामने इकबालिया बयान: किसी पुलिस अधिकारी के सामने इकबालिया बयान अस्वीकार्य है। पुलिस हिरासत में जुर्म का इकबाल भी अस्वीकार्य है, जब तक कि उसे मजिस्ट्रेट ने दर्ज न किया हो। हालांकि अगर हिरासत में किसी आरोपी से प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप कोई तथ्य खोजा जाता है, तो उस जानकारी को स्वीकार किया जा सकता है, अगर वह स्पष्ट रूप से खोजे गए तथ्य से संबंधित है।

बीएसबी में प्रस्तावित प्रमुख परिवर्तनों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • डॉक्यूमेंटरी सबूत: आईईए के तहत, एक डॉक्यूमेंट में राइटिंग, मैप और कैरिकेचर शामिल होते हैं। बीएसबी का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को भी डॉक्यूमेंट माना जाएगा। डॉक्यूमेंटरी सबूत में प्राइमरी और सेकेंडरी सबूत शामिल हैं। प्राइमरी सबूत में ओरिजिनल डॉक्यूमेंट और उसके हिस्से, जैसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और वीडियो रिकॉर्डिंग शामिल हैं। सेकेंडरी सबूत में डॉक्यूमेंट और मौखिक विवरण शामिल होते हैं जो ओरिजिनल के कंटेंट को साबित कर सकते हैं। बीएसबी इस वर्गीकरण को बरकरार रखता है।
  • ओरल सबूत: आईईए के तहत, ओरल यानी मौखिक सबूत में जांच के तहत तथ्य के संबंध में गवाहों द्वारा अदालतों में दिए गए बयान शामिल हैं। बीएसबी मौखिक सबूत को इलेक्ट्रॉनिक रूप से देने की अनुमति देता है। इससे गवाहों, आरोपी व्यक्तियों और पीड़ितों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से गवाही देने की अनुमति मिल जाएगी।
  • सबूत के रूप में इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड की स्वीकार्यता: डॉक्यूमेंटरी सबूत में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स में मौजूद जानकारी शामिल होती है जो कंप्यूटर द्वारा प्रस्तुत ऑप्टिकल या मैग्नेटिक मीडिया में प्रिंट या स्टोर की गई है। ऐसी जानकारी कंप्यूटर या विभिन्न कंप्यूटरों के कॉम्बिनेशन से स्टोर या प्रोसेस की जा सकती है। बीएसबी प्रावधान करता है कि इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड का पेपर रिकॉर्ड जैसा ही कानूनी प्रभाव होगा। बिल इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के दायरे को बढ़ाता है, जिससे उसमें सेमीकंडक्टर मेमोरी या किसी संचार उपकरण (स्मार्टफोन, लैपटॉप) में स्टोर की गई जानकारी को शामिल किया जा सके। इसमें ईमेल, सर्वर लॉग, स्मार्टफोन, लोकेशनल सबूत और वॉयस मेल के रिकॉर्ड भी शामिल होंगे।
  • सेकेंडरी सबूत: बीएसबी के तहत सेकेंडरी सबूत में निम्नलिखित भी शामिल होंगे: (i) ओरल और लिखित एडमिशंस, और (ii) उस व्यक्ति की गवाही जिसने डॉक्यूमेंट्स की जांच की है और डॉक्यूमेंट्स की जांच में कुशल है। एक्ट के तहत, विभिन्न परिस्थितियों में सेकेंडरी सबूत की आवश्यकता हो सकती है, जैसे कि जब ओरिजिनल उस व्यक्ति के कब्जे में हो जिसके खिलाफ डॉक्यूमेंट को साबित करने की मांग की गई हो या नष्ट कर दिया गया हो। बीएसबी यह भी कहता है कि अगर डॉक्यूमेंट की सच्चाई पर सवाल है तो सेकेंडरी सबूत की जरूरत हो सकती है।
  • ज्वाइंट ट्रायल्स: ज्वाइंट ट्रायल एक ही अपराध के लिए एक से अधिक व्यक्तियों के ट्रायल को कहा जाता है। आईईए का कहना है कि ज्वाइंट ट्रायल यानी संयुक्त मुकदमे में, अगर किसी एक आरोपी द्वारा किया गया कबूलनामा, जो अन्य आरोपियों को भी प्रभावित करता है, साबित हो जाता है, तो इसे दोनों के खिलाफ कबूलनामा माना जाएगा। बीएसबी इस प्रावधान में एक स्पष्टीकरण जोड़ता है। इसमें कहा गया है कि कई व्यक्तियों का मुकदमा, जहां एक आरोपी फरार हो गया है या उसने गिरफ्तारी वारंट का जवाब नहीं दिया है, उसे संयुक्त मुकदमा माना जाएगा।

भाग ख: मुख्य मुद्दे और विश्लेषण

सबूत के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स की स्वीकार्यता

आईईए के तहत, डॉक्यूमेंटरी सबूत को प्राइमरी या सेकेंडरी सबूत के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। प्राइमरी सबूत ओरिजिनल डॉक्यूमेंट को कहा जाता है, जबकि सेकेंडरी सबूत में ऐसे डॉक्यूमेंट शामिल होते हैं जो ओरिजिनल के कंटेंट को साबित कर सकते हैं। विभिन्न परिस्थितियों में सेंकेंडरी सबूत की जरूरत हो सकती है, जब ओरिजिनल नष्ट हो गया हो या उस व्यक्ति के कब्जे में हो जिसके खिलाफ डॉक्यूमेंट को साबित करने की मांग की गई हो। डॉक्यूमेंट में राइटिंग, मैप और कैरिकेचर शामिल हैं। बीएसबी इन प्रावधानों को बरकरार रखता है और डॉक्यूमेंट्स की परिभाषा में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जोड़ता है।

 आईईए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सेकेंडरी सबूत के रूप में स्वीकार करने की अनुमति देता है और ऐसे सबूत को स्वीकार करने की प्रक्रिया निर्दिष्ट करता है। बीएसबी ने यह स्पष्ट करने के लिए इसमें संशोधन किया है कि उचित हिरासत से मिलने वाले इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को प्राइमरी सबूत माना जाएगा, जब तक कि विवादित न हो। अगर इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड एक से ज्यादा फ़ाइलों में स्टोर है, तो हरेक फ़ाइल को प्राइमरी सबूत माना जाएगा। बिल इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की परिभाषा में सेमीकंडक्टर मेमोरी या स्मार्टफोन (ईमेल, लोकेशन और वॉयस मेल सहित) में स्टोर जानकारी को भी शामिल करता है।

इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को प्राइमरी सबूत मानने से दो मुद्दे उठते हैं। हम नीचे उनकी चर्चा कर रहे हैं।

इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स से छेड़छाड़

2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड छेड़छाड़ और तब्दीली के प्रति संवेदनशील हैं।[5] उसने कहा था कि पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना, अगर पूरा मुकदमा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के सबूत पर आधारित है, तो इससे न्याय मज़ाक बन सकता है।5  बीएसबी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को स्वीकार्यता प्रदान करता है और कहता है कि अदालत सबूत पर राय कायम करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक सबूत के एग्ज़ामिनर से सलाह करके अपने स्वविवेक का इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि यह सुनिश्चित करने के लिए कोई सुरक्षा उपाय प्रदान नहीं किए गए हैं कि तलाशी और जब्ती या जांच प्रक्रिया के दौरान इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ न की जाए। गृह मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2023) ने इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड की प्रामाणिकता और अखंडता की सुरक्षा के महत्व पर जोर दिया था क्योंकि उनमें छेड़छाड़ की आशंका होती है।इसने यह अनिवार्य करने का सुझाव दिया था कि जांच के दौरान सबूत के रूप में जमा किए गए इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड को सुरक्षित रूप से कस्टडी की एक उचित कड़ी में संभाला और प्रोसेस किया जाए।

2021 में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की खोज और जब्ती के दौरान न्यूनतम सुरक्षा उपायों के लिए दिशानिर्देश पेश किए।[6]  इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) यह सुनिश्चित करना कि एक योग्य फोरेंसिक एग्ज़ामिनर खोज टीम के साथ हो, (ii) जांच अधिकारी को इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की खोज और जब्ती के दौरान जब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का उपयोग करने से रोकना, और (iii) किसी भी इलेक्ट्रॉनिक स्टोरेज उपकरण (जैसे पेन ड्राइव या हार्ड ड्राइव) को जब्त करना और उन्हें फैराडे बैग में पैक करना।फैराडे बैग इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल्स के ट्रांसमिशन को रोकते हैं जो डिवाइस में स्टोर किए गए डेटा को बाधित या नष्ट कर सकते हैं।

यूरोपीय संघ में ड्राफ्ट डायरेक्टिव प्रपोज़ल फॉर अ म्यूचुअल एडमिसिबिलिटी ऑफ एविडेंस एंड इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस इन क्रिमिनल प्रोसीडिंग्स का उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक सबूत के उपयोग के लिए समान न्यूनतम मानक स्थापित करना है।[7]  इसके मुख्य सिद्धांतों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) इलेक्ट्रॉनिक सबूत के उपयोग को केवल तभी अनिवार्य करना जब पर्याप्त सबूत हों कि इसमें हेरफेर या जालसाजी नहीं की गई है, (ii) यह सुनिश्चित करना कि प्रस्तुति के समय से लेकर हिरासत की कड़ी तक हेरफेर के खिलाफ सबूत पर्याप्त रूप से सुरक्षित हैं, और (iii) अभियुक्त के अनुरोध पर आईटी विशेषज्ञों की भागीदारी की जरूरत।7  संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रस्तावक को रिकॉर्ड की प्रामाणिकता साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत प्रदान करना होता है।[8] किसी इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया या सिस्टम द्वारा उत्पन्न रिकॉर्ड और ऐसी प्रक्रिया या सिस्टम से कॉपी किए गए डेटा के मामले में, रिकॉर्ड या डेटा को एक क्वालिफाइड व्यक्ति द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए।

 

इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता अस्पष्ट हो सकती है

बीएसबी में डॉक्यूमेंट्स की परिभाषा में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड शामिल हैं। यह आईईए के प्रावधान को बरकरार रखता है कि सभी डॉक्यूमेंट्स प्राइमरी सबूत के रूप में स्वीकार्य होने चाहिए, जब तक कि वे सेकेंडरी सबूत न माने जाएं (ओरिजिनल नष्ट हो गया हो, या उस व्यक्ति के पास हो जिसके खिलाफ डॉक्यूमेंट साबित करने हों)। हालांकि, यह उस प्रावधान को भी बरकरार रखता है जिसके तहत सभी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तभी डॉक्यूमेंट्स के तौर पर मंजूर होते हैं, जब उनके साथ प्रमाणित सर्टिफिकेट हो। अन्य प्रावधान लागू होते हुए भी यह प्रावधान उन पर हावी होगा। ये परिवर्तन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता के संबंध में अस्पष्टता पैदा कर सकते हैं।

गृह मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2023) ने कहा है कि बीएसबी निर्दिष्ट करता है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को प्राइमरी सबूत द्वारा सिद्ध किया जाना चाहिए, जबकि सर्टिफिकेट के प्रमाणीकरण के जरिए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता वाले सेक्शन को बरकरार रखता है।4 कमिटी ने सुझाव दिया है कि सर्टिफिकेट के जरिए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स की स्वीकार्यता वाले सेक्शन के अनुसार ही इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स को साबित करने का प्रावधान किया जाए।

 

पुलिस कस्टडी में खोजे गए तथ्यों की चुनौतियां

पुलिस हिरासत में जोर-ज़बरदस्ती से प्राप्त की गई जानकारी साबित हो सकती है

आईईए में प्रावधान है कि अगर पुलिस हिरासत में किसी आरोपी से प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप कोई तथ्य खोजा जाता है, तो उस जानकारी को स्वीकार किया जा सकता है, अगर वह स्पष्ट रूप से खोजे गए तथ्य से संबंधित हो। बीएसबी ने इस प्रावधान को बरकरार रखा है। पिछले कुछ वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न विधि आयोग की रिपोर्ट्स में कहा गया है कि आरोपी को हिरासत में रखने के दौरान जब तथ्य खोजे जाते हैं तो हो सकता है कि उस पर दबाव बनाया गया हो और उसे यातना दी गई हो।2,3,[9]  विधि आयोग (2003) ने सुझाव दिया था कि पुलिस हिरासत में धमकाकर, जोर-ज़बरदस्ती से, हिंसा या यातना का इस्तेमाल करके खोजे गए तथ्यों को साबित योग्य (प्रूवेबल) नहीं होने चाहिए।

 

तथ्य की स्वीकार्यता इस बात पर निर्भर कि इसे पुलिस हिरासत के बाहर या भीतर प्राप्त किया गया था

आईईए के तहत, पुलिस हिरासत में किसी आरोपी से प्राप्त जानकारी स्वीकार्य है, अगर वह खोजे गए तथ्य से संबंधित है, जबकि वैसी ही जानकारी तब स्वीकार्य नहीं है, जब वह पुलिस हिरासत के बाहर किसी आरोपी से प्राप्त हुई हो। बीएसबी ने यह अंतर बरकरार रखा है। 1960 में इस प्रावधान की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह हिरासत में और बाहर के व्यक्तियों के बीच अनुचित भेदभाव पैदा करता है।[10] न्यायालय ने इसकी संवैधानिकता को बरकरार रखा था और कहा था कि कानून ने पुलिस हिरासत के बाहर और भीतर के लोगों के लिए अलग-अलग नियम बनाकर एक उचित अंतर कायम किया है। विधि आयोग (2003) ने यह सुनिश्चित करने के लिए इस प्रावधान को फिर से तैयार करने का सुझाव दिया था कि तथ्यों से संबंधित जानकारी प्रासंगिक होनी चाहिए, चाहे बयान पुलिस हिरासत में दिया गया हो या बाहर।3

विभिन्न समितियों और न्यायालयों के सुझाव

विभिन्न समितियों और न्यायालयों के सुझाव

तालिका 1 में आपराधिक सुधारों पर सरकार को सलाह देने वाले विधि आयोग और केंद्र सरकार द्वारा गठित विभिन्न समितियों के प्रमुख सुझाव दिए गए हैं।

तालिका 1: आईईए पर विभिन्न समितियों और सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव

मुख्य सुझाव

बिल में शामिल हैं अथवा नहीं

पुलिस हिरासत; पुलिस के सामने इकबालिया बयान

मलिमथ समिति: पुलिस अधिकारियों के सामने इकबालिया बयान पर सेक्शंस को रद्द किया जाए (आईईए सेक्शन.25-29)।[1]

नहीं, क्लॉज 22, 23 में मूल प्रावधानों को बरकरार रखा गया है

 

विधि आयोग: पुलिस हिरासत में अभियुक्तों से प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप किसी भी धमकी, जबरदस्ती, हिंसा या यातना का उपयोग करके पाए गए तथ्य साबित करने योग्य नहीं होने चाहिए।3

तथ्य प्रासंगिक होने चाहिए चाहे वे पुलिस हिरासत में पाए गए हों या हिरासत से बाहर।3

विधि आयोग: एक नया प्रावधान डालें जिसमें कहा गया हो कि अगर पुलिस हिरासत में कोई व्यक्ति घायल हो जाता है, तो यह माना जाएगा कि पुलिस ने उसे घायल किया है। बर्डन ऑर प्रूफ अधिकारी पर होगा।[2]

विधि आयोग: पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति को शारीरिक चोट पहुंचाने के लिए पुलिस अधिकारी के खिलाफ मुकदमा चलाने से संबंधित एक नया प्रावधान शामिल किया जाए। अदालत यह मानेगी कि अधिकारी ने चोट पहुंचाई है।[3] न्यायालय अनुमान लगाने से पहले निम्नलिखित पर विचार करेगा: (i) हिरासत की अवधि, (ii) चोट के बारे में पीड़ित द्वारा दिए गए बयान, (iii) एक चिकित्सक द्वारा जांच, और (iv) मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज कोई भी बयान।

इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स का प्रमाणीकरण

सर्वोच्च न्यायालय: अगर डिवाइस के मालिक ने ओरिजिनल डॉक्यूमेंट अदालत में प्रस्तुत किया है तो सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं है।[4]  हालांकि अगर डिवाइस किसी कंप्यूटर सिस्टम या नेटवर्क का हिस्सा है जिसे भौतिक रूप से नहीं लाया जा सकता है, तो सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए।

भेद दूर नहीं किया गया

सबूत में सरकार का विशेषाधिकार

विधि आयोग: आईईए सेक्शन 123; संबंधित विभाग के प्रमुख की अनुमति के बिना राज्य के मामलों से संबंधित अप्रकाशित आधिकारिक रिकॉर्ड तक अनधिकृत पहुंच निषिद्ध है।[5] अगर अनुमति सार्वजनिक हित के विरुद्ध है तो उसे अस्वीकार किया जा सकता है और अधिकारी को अनुमति देने से इनकार करने का कारण बताना होगा। अदालत अतिरिक्त हलफनामे का अनुरोध कर सकती है और रिकॉर्ड पेश करने के लिए समन जारी कर सकती है। उसके पास सबूत की स्वीकार्यता निर्धारित करने का अधिकार है।

नहीं, मूल प्रावधानों को क्लॉज 129, 130 में बरकरार रखा गया है

विधि आयोग: आईईए सेक्शन 124; अगर न्यायालय निर्णय लेता है कि इससे सार्वजनिक हित को नुकसान होगा, तो सरकारी अधिकारियों को आधिकारिक विश्वास में किए गए संचार को प्रकट करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।15  अगर कोई सरकारी अधिकारी किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने में आपत्ति करता है जिसके प्रकटीकरण की आवश्यकता हो सकती है, तो अदालत को इनकार करने से पहले आपत्ति की प्रकृति और कारणों के बारे में निजी तौर से पूछताछ करनी चाहिए।

ज़िरह (क्रॉस एग्जामिनेशन)

विधि आयोग: आईईए सेक्शन 145; पूर्व लिखित बयानों की ज़िरह में मौखिक बयान भी शामिल होने चाहिए।2,3

नहीं, मूल प्रावधान क्लॉज 148 में बरकरार रखा गया है

साजिश के लिए आपराधिक दायित्व

सर्वोच्च न्यायालय: आईईए सेक्शन 10; आईईए के तहत, साजिश के संदर्भ में कार्य करने वाले/कार्य करने चुके किसी भी व्यक्ति द्वारा कही गई, की गई या लिखी गई कोई भी बात एक प्रासंगिक तथ्य मानी जाती है। इस तरह के तथ्य को अपने अस्तित्व और उनकी संलिप्तता को साबित करने के लिए साजिश का हिस्सा माने जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ सबूत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई मौकों पर इस बात पर जोर दिया है कि संदर्भ में अभिव्यक्ति की व्याख्या सामान्य इरादे को आगे बढ़ाने के अर्थ में की जानी चाहिए।[6],[7],[8],[9] 

नहीं, मूल प्रावधान क्लॉज 8 में बरकरार रखा गया है

अन्य

विधि आयोग: आईईए सेक्शन 21; आईईए ऐसे एडमिशंस के लिए प्रावधान करता है जिन्हें साबित किया जा सकता है। इसे उन एडमिशंस से निपटना चाहिए जिन्हें साबित किया जा सकता है और जिन्हें साबित नहीं किया जा सकता है। प्रावधान को दो भागों में विभाजित किया जाना चाहिए जिसमें उन एडमिशंस पर विस्तृत जानकारी प्रदान की जानी चाहिए जिन्हें साबित किया जा सकता है और जिन्हें साबित नहीं किया जा सकता है।2

नहीं, मूल प्रावधान क्लॉज 19, 60 और 79 में बरकरार रखा गया है

विधि आयोग: आईईए सेक्शन 21; ऐसे मामले जिनमें डॉक्यूमेंट्स के लिए सेकेंडरी सबूत दिए जा सकते हैं- उनमें ऐसे व्यक्ति शामिल होने चाहिए जिनके पास डॉक्यूमेंट हैं (इसे प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं हैं) लेकिन डॉक्यूमेंट पेश करने के लिए अदालत के आदेशों से भी इनकार करते हैं।2

विधि आयोग: आईईए सेक्शन 80; सबूत के रिकॉर्ड के रूप में प्रस्तुत डॉक्यूमेंट्स की धारणा- इसमें सीआरपीसी की धारा 164 (बीएनएसएस क्लॉज 183) के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया गया बयान और मरने से पहले दिया गया बयान (मरने वाले व्यक्ति के अंतिम शब्द) शामिल होना चाहिए।2

विधि आयोग: स्वतंत्र सबूत द्वारा गवाह की विश्वसनीयता स्थापित करने का नया प्रावधान।3

नोट: यह संक्षिप्तता चलते आईईए पर विभिन्न समितियों और सर्वोच्च न्यायालय के सुझावों का एक उदाहरण है।

स्रोत: एंडनोट्स देखें; पीआरएस।

ड्राफ्टिंग के मुद्दे

तालिका 2 में बीएसबी में ड्राफ्टिंग संबंधी मुद्दों के उदाहरण पेश किए गए हैं।

तालिका 2: बीएसबी में ड्राफ्टिंग संबंधी त्रुटियां

ड्राफ्टिंग संबंधी मुद्दे

क्लॉज

मुद्दे

58

बीएसबी मौखिक इकबालिया बयान को सेकेंडरी सबूत के रूप में जोड़ता है। हालांकि, बीएसबी के क्लॉज 58 का एक उदाहरण कहता है कि न तो ओरिजिनल की तुलना में किसी कॉपी का मौखिक विवरण और न ही ओरिजिनल के फोटोग्राफ का मौखिक विवरण, ओरिजिनल का सेकेंडरी सबूत है।

39, 108

बीएनएस अनसाउंड माइंड के संदर्भ को मेंटस इलनेस से बदलने का प्रयास करता है। बीएसबी के कुछ उदाहरणों में अनसाउंडनेस ऑफ माइंड का संदर्भ है।

सर्टिफिकेट

गृह मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2023) ने कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के प्रभारी व्यक्ति और एक विशेषज्ञ द्वारा भरा गया सर्टिफिकेट इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता के प्रावधान के तहत सभी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। उदाहरण के लिए, सर्टिफिकेट डिवाइस की स्थिति के संबंध में कोई घोषणा नहीं करता है। कमिटी ने इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता वाले सेक्शन के तहत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सर्टिफिकेट में संशोधन का सुझाव दिया है।

124

आईईए के तहत, सभी व्यक्तियों को अदालत में गवाही देने के लिए सक्षम माना जाता है, जब तक कि वे कम उम्र, बुढ़ापे, बीमारी या मानसिक अक्षमता जैसे कारकों के कारण प्रश्नों को समझने या उत्तर देने में असमर्थ न हों। आईईए स्पष्ट करता है कि एक 'विक्षिप्त' (ल्यूनैटिक) तब तक गवाही दे सकता है जब तक वह समझ सकता है और तर्कसंगत रूप से सवालों का जवाब दे सकता है। बीएसबी ने 'विक्षिप्त' शब्द को 'मानसिक बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति' से बदल दिया है। भारतीय विक्षिप्त कानून, 1920 (निरस्त) में 'विक्षिप्त' को 'बेवकूफ' या 'विकृत दिमाग वाला व्यक्ति' के रूप में परिभाषित किया गया है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल एक्ट, 2017 के तहत मानसिक बीमारी की परिभाषा में मानसिक मंदता और दिमाग के अधूरे विकास को शामिल नहीं किया गया है।

37

सर्वोच्च न्यायालय ने आईपीसी में 'व्यभिचार' को अपराध करार दिया। बीएनएस में व्यभिचार अपराध नहीं है। हालांकि, बीएसबी में कुछ उदाहरण व्यभिचार को अपराध मानते हैं।

26

उदाहरण (ए) में लिखा है: "सवाल यह है कि क्या ए की हत्या बी द्वारा की गई थी; या दुष्कर्म के दौरान लगी चोटों से मृत्यु हुई है। प्रश्न यह है कि क्या बी द्वारा उसका बलात्कार किया गया था; या सवाल यह है कि क्या ए को बी ने ऐसी परिस्थितियों में मार डाला था कि ए की विधवा द्वारा बी के खिलाफ मुकदमा दायर किया जाएगा। ए द्वारा उसकी मृत्यु के कारण के बारे में दिए गए बयान, क्रमशः हत्या, बलात्कार और विचाराधीन कार्रवाई योग्य गलती का जिक्र करते हुए, रेलेवेंट फैक्ट्स यानी सुसंगत तथ्य हैं।

इस उदाहरण से दो प्रश्न उठते हैं: (क) ए का जेंडर क्या है, क्योंकि उसे एक जगह ‘शी’ लिखा गया जिसके साथ ‘दुष्कर्म’ हुआ है, लेकिन उसकी ‘विधवा’ है, और आगे उसकी मृत्यु के संदर्भ में ‘हिज ऑर हर डेथ’ लिखा है, (ख) क्या ‘रैविश्ड’ (दुष्कर्म) के स्थान पर ‘रेप’ (बलात्कार) लिखा जाना चाहिए?

बीएसबी के तहत, कुछ मामलों में किसी मृत व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति द्वारा दिए गए बयान जिन्हें ढूंढा नहीं जा सकता, उन्हें फैक्ट्स इन इश्यू या रेलेवेंट फैक्ट तथ्य माना जा सकता है। आईईए में ऐसे ही सेक्शन में 'फैक्ट्स इन इश्यू' का कोई उल्लेख नहीं है और केवल 'रेलेवेंट फैक्ट्स' का उपयोग किया जाता है। न्यायिक भाषा में 'फैक्ट्स इन इश्यू' और 'रेलेवेंट फैक्ट्स' के अलग-अलग अर्थ हैं।

स्रोत: भारतीय साक्ष्य बिल, 2023; भारतीय न्याय संहिता, 2023; रिपोर्ट संख्या 248, 'भारतीय साक्ष्य बिल, 2023', गृह मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी, राज्यसभा, 10 नवंबर, 2023, भारतीय विक्षिप्तता अधिनियम, 1912; पीआरएस।

 


[2]. Report No. 69, ‘The Indian Evidence Act, 1872’, Law Commission of India, 1977, Part I, Part II, and Part III.

[3]. Report No. 185, ‘Review of the Indian Evidence Act, 1872’, Law Commission of India, 2003.

[4]. Report No. 248, ‘The Bharatiya Sakshya Bill, 2023’, The Standing Committee on Home Affairs, Rajya Sabha, November 10, 2023.

[5]. Civil Appeal No. 4226 of 2012, Anvar P.V v P.K Basheer, Supreme Court, September 18, 2014.

[6]. Writ Petition No. 11759 of 2020, Mr. Virendra Khanna v. State of Karnataka, Karnataka High Court, March 12, 2021

[8]. Rule 901-902, The Federal Rule of Evidence, The United States of America,

[9]. Appeal (crl.) 664 of 2000, Sanjay @ Kaka Shri Nawabuddin @ Nawab Vinod Kumar v. The State of NCT of Delhi, Supreme Court, February 7, 2001, https://main.sci.gov.in/jonew/judis/17591.pdf.

[10]. 1960 AIR 1125, State of U.P v. Deoman Upadhyaya, Supreme Court, May 06, 1960.

[12]. Report No. 273, Law Commission of India, 2017.

[13]. Report No. 113, Law Commission of India, 1983.

[14]. Civil Appeal No. 20825-6, Arujun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushanrao Gorantyal, Supreme Court, July 14, 2020

[15]. Report No.88, Law Commission of India, 1983.

[16]. State of Gujrat v. Mohammad Atik, Supreme Court, April 3, 1998.

[17]. 1957 AIR 747, Sardul Singh Caveeshar v State of Maharashtra, Supreme Court, May 23, 1957.

[18]. AIR 1940 PC 176, Mirza Akbar v. King Emperor, Privy Council, 1940.

[19]. AIR 1929 Patna 145, Indra Chandra Narang v. Emperor, Patna High Court, 1929.

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