सिलेक्ट कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल, 2025

 

  • जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल, 2025 पर लोकसभा की सिलेक्ट कमिटी (चेयर: श्री तेजस्वी सूर्या) ने 13 मार्च, 2026 को अपनी रिपोर्ट पेश की। यह बिल 17 केंद्रीय कानूनों में संशोधन करके अपराधों और दंड को डीक्रिमिनलाइज करता है या उन्हें युक्तिसंगत बनाता है। इनमें मोटर वाहन एक्ट, 1988, लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009, एप्रेंटिस एक्ट, 1961 और नई दिल्ली नगर पालिका परिषद एक्ट, 1994 शामिल हैं। कमिटी के प्रमुख निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करना: कमिटी ने कुछ ऐसे अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करने का सुझाव दिया है जो मूल रूप से बिल में शामिल नहीं थे। उदाहरण के लिए, दिल्ली नगर निगम एक्ट, 1957 के तहत, संपत्ति कर का जानबूझकर भुगतान न करने पर सात वर्ष तक की कैद और कर चोरी की गई राशि के कम से कम 50 प्रतिशत का जुर्माना लगाया जा सकता है। कमिटी ने इस अपराध को डीक्रिमिनलाइज करने और इसके बजाय चोरी किए गए या चोरी करने के प्रयास वाले कर का 50 प्रतिशत दीवानी दंड लगाने का सुझाव दिया है।

  • इस बिल में लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 के तहत कुछ अपराधों के पहले मामले पर सुधार नोटिस का प्रावधान है। बिल के अनुसार, दूसरे और उसके बाद के मामलों के लिए आपराधिक जुर्माना लगाया जाएगा। कमिटी ने दूसरे उल्लंघन के लिए जुर्माने के स्थान पर दीवानी दंड लगाकर, एक अधिक क्रमिक संरचना का सुझाव दिया है।

  • जुर्माने और आर्थिक दंड में संशोधन: कमिटी ने कुछ मामलों में जुर्माने और दंड की राशि और बढ़ाने का सुझाव दिया है। उदाहरण के लिए, मोटर वाहन एक्ट, 1988 के तहत, एग्रीगेटर द्वारा लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन करने पर 5,000 रुपए के आपराधिक जुर्माने का प्रावधान है। बिल में इसके बजाय दीवानी दंड लगाया गया है, लेकिन राशि अपरिवर्तित रखी गई है। कमिटी ने जुर्माने की राशि को बढ़ाकर 50,000 रुपए से एक लाख रुपए तक करने का सुझाव दिया है।

  • निर्णय और अपील: कमिटी ने कुछ मामलों में अपील दाखिल करने और निपटाने के लिए समय सीमा निर्दिष्ट करने और कुछ कानूनों के तहत अधिकारियों की योग्यता निर्धारित करने का सुझाव दिया है।

  • कुछ अपराधों को बहाल रखना: बिल उन कानूनों में से कुछ अपराधों को हटाता है जिनमें वह संशोधन कर रहा है। कमिटी ने इनमें से कुछ प्रावधानों को बहाल रखने का सुझाव दिया है। उदाहरण के लिए, भारतीय रिज़र्व बैंक एक्ट, 1934 के तहत, बही-खाते या दस्तावेज़ प्रस्तुत न करने पर एक लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। बिल में इस प्रावधान को हटाने का प्रस्ताव है, हालांकि कमिटी ने इसे बहाल रखने का सुझाव दिया है।

  • ड्रग और कॉस्टमैटिक एक्ट, 1940 के तहत, कुछ प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए आयुर्वेदिक, सिद्ध या यूनानी दवाओं की बिक्री या निर्माण करना कारावास और जुर्माने से दंडनीय है। बिल में ऐसे मामलों में कारावास का प्रावधान समाप्त किया गया है। कमिटी ने जन स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए कारावास की अवधि को बहाल रखने का सुझाव दिया है, सिवाय उस अपराध के जिसमें दवा के निर्माण या स्टोरेज के स्थान का खुलासा न किया गया हो।

  • प्रावधानों को हटाना: कमिटी ने इन कानूनों से कुछ प्रावधानों को हटाने का भी सुझाव दिया है। उदाहरण के लिए, बिल दिल्ली नगर निगम एक्ट, 1957 के तहत व्यक्तियों के लिए जन्म और मृत्यु की जानकारी देने के अनिवार्य प्रावधान को हटाता है, लेकिन अस्पतालों के लिए इसे बरकरार रखता है। कमिटी ने कहा कि अस्पतालों के लिए भी इसे हटा देना चाहिए क्योंकि यह पहले से ही एक अन्य कानून के दायरे में आता है।

  • अतिरिक्त कानूनों में डीक्रिमिनलाइजेशन: कमिटी ने 65 अतिरिक्त कानूनों की समीक्षा की। उसने सुझाव दिया कि इन कानूनों में डीक्रिमिनलाइजेशन के प्रस्तावों की व्यापक समीक्षा की जाए। इनमें रेल एक्ट, 1989, राष्ट्रीय राजमार्ग एक्ट, 1956, पेटेंट एक्ट, 1970, भारतीय वन एक्ट, 1927, खाद्य सुरक्षा और मानक एक्ट, 2006 और भारतीय मानक ब्यूरो एक्ट, 2016 शामिल हैं।

  • डीक्रिमिनलाइजेशन के लिए सामान्य सिद्धांत: कमिटी ने डीक्रिमिनलाइजेशन के लिए कुछ सिद्धांतों की रूपरेखा तैयार की है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) यह सुनिश्चित करना कि जुर्माना और दंड अपराध की गंभीरता और अपराधी के प्रोफ़ाइल के अनुपात में हों, (ii) नियमों के बजाय कानून में ही न्यूनतम और अधिकतम दंड निर्दिष्ट करना, (iii) कुछ मामलों में एक स्तरीय अनुपालन संरचना शुरू करना, जहां पहले या दूसरे अपराध पर दीवानी दंड लगता है, और बाद के अपराधों पर सख्त जुर्माना लगाया जाता है, (iv) छोटे अपराधों के लिए एक सरलीकृत समझौता प्रक्रिया, और (v) प्रत्येक कानून के भीतर निर्णय और अपील प्रक्रियाओं की स्पष्ट रूप से व्याख्या करना।

  • केंद्रीयकृत रेगुलेटरी प्रबंधन प्रणाली: कमिटी ने मंत्रालयों के लिए रेगुलेटरी अनुपालन हेतु एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने का सुझाव दिया है। इससे डेटा साझा करना आसान होगा, प्रशासनिक कार्यों का दोहराव कम होगा, रेगुलेटर्स अनुपालन के पहले के रिकॉर्ड्स का पता लगेगा और सरकारी नियमों को लागू करने में पारदर्शिता और जवाबदेही आएगी।

 

 

 

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