स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

प्रतिभूति बाजार संहिता, 2025

 

  • वित्त से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री भर्तृहरि महताब) ने 23 जुलाई, 2026 को प्रतिभूति बाजार संहिता, 2025 पर अपनी रिपोर्ट पेश की। यह संहिता दिसंबर 2025 में लोकसभा में पेश की गई थी। इसका उद्देश्य निम्नलिखित कानूनों को निरस्त करके उनके स्थान पर नए कानून लाना है: (i) प्रतिभूति अनुबंध (रेगुलेशन) एक्ट, 1956, (ii) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) एक्ट, 1992, और (iii) डिपॉजिटरी एक्ट, 1996। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • शक्तियां सौंपना: कमिटी ने गौर किया कि बिल के कई प्रावधान सेबी को व्यापक विवेकाधीन शक्तियां प्रदान करते हैं। कमिटी ने यह भी पाया कि पर्याप्त मार्गदर्शनों के अभाव में ये शक्तियां कानूनी अनिश्चितता और असंगत व्याख्या पैदा कर सकती हैं और इससे रेगुलेटरी निश्चितता कम हो सकती है। डेलिगेटेड लेजिसलेशन (जब विधायिका कानून बनाने की अपनी कुछ शक्ति किसी सरकारी विभाग को सौंप देती है) को आवश्यक विधायी नीति या मौलिक कानूनी परिणामों के मामलों को तय नहीं करना चाहिए। कमिटी ने सुझाव दिया कि रेगुलेशन बनाने की शक्तियों से जुड़े हर प्रावधान में यह स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए कि डेलिगेशन यानी शक्तियां सौंपे जाने का दायरा, उद्देश्य और सीमाएं क्या हैं।

कमिटी ने उस प्रावधान को हटाने का भी सुझाव दिया जिसके तहत सेबी रेगुलेशंस के ज़रिए 'मार्केट अब्यूज़' (बाज़ार के गलत इस्तेमाल) की परिभाषा का दायरा बढ़ा सकता है। इस संहिता के तहत, मार्केट अब्यूज़ के लिए जेल की सज़ा, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। साथ ही, यह संहिता सेबी को रेगुलेशंस के ज़रिए एडजुडिकेशन की प्रक्रिया निर्दिष्ट करने का अधिकार भी देती है। कमिटी ने कहा कि एडजुडिकेशन के लिए प्रक्रियात्मक सुरक्षा-उपायों जैसे मामलों को स्पष्ट कानूनी सिद्धांतों के तहत तय किया जाना चाहिए। यह संहिता सेबी को यह अधिकार भी देती है कि वह रजिस्ट्रेशन और निगरानी का काम मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (एमआईआईज़) और सेल्फ रेगुलेटरी संगठनों को सौंप सकता है। एमआईआईज़ में स्टॉक एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉरपोरेशंस और डिपॉजिटरीज़ शामिल हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि इस संहिता में निम्नलिखित बातें स्पष्ट होनी चाहिए: (i) सौंपे जाने वाली शक्तियों का स्वरूप और सीमा और उनके नियम, (ii) इन संस्थाओं की जवाबदेही का ढांचा, (iii) उनके फैसलों की समीक्षा करने का तरीका, और (iv) सेबी की निगरानी और देखरेख की शक्तियां।

  • अपराध और दंड: कमिटी के अनुसार, हालांकि संहिता का उद्देश्य आपराधिक ज़िम्मेदारी को केवल गंभीर और योजनाबद्ध कदाचार तक ही सीमित रखना है, फिर भी संहिता में बताए गए कुछ दीवानी उल्लंघन और क्रिमिनल अपराध आपस में मेल खाते (ओवरलैप करते) हैं। इससे अनिश्चित प्रवर्तन (लागू होने में अनिश्चितता) और कानूनी मुकदमों का जोखिम बढ़ सकता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि अपराधों से जुड़ी इन धाराओं का पुनर्गठन (रीस्ट्रक्चर) किया जाए और इन्हें पूरी तरह दोबारा लिखा (रीड्राफ्ट किया) जाए।

  • एसएटी में अपील: संहिता में सेबी और उसके एडजुडिकेटिंग अधिकारियों के उन आदेशों की श्रेणियां सूचीबद्ध की गई हैं जिनके खिलाफ प्रतिभूति अपीलीय ट्रिब्यूनल (एसएटी) में अपील की जा सकती है। कमिटी ने गौर किया कि जो आदेश खास तौर पर इसी सूची में शामिल नहीं हैं, जिनमें कुछ अंतरिम आदेश भी शामिल हैं, वे एसएटी के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो सकते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि सेबी या एडजुडिकेटिंग अधिकारी के आदेश से पीड़ित किसी भी व्यक्ति को एसएटी में अपील करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

  • एमआईआईज़: कमिटी ने गौर किया कि एमआईआईज़ इस पूरे सिस्टम के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि सेबी को रजिस्ट्रेशन रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल करने से पहले केंद्र सरकार से सलाह लेनी चाहिए। साथ ही एमआईआईज़ के उप-नियम बनाने में आम तौर पर सार्वजनिक परामर्श लिया जाना चाहिए। एमआईआईज़ को असाधारण परिस्थितियों से निपटने के लिए पूर्व सुनवाई के बिना भी अंतरिम अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार दिया जाना चाहिए। संहिता के तहत, केंद्र सरकार निर्दिष्ट मामलों में एमआईआई को सुपरसीड (अधिकार अपने नियंत्रण में लेना) कर सकती है। कमिटी ने सुपरसीड करने की अधिकतम अवधि तय करने का सुझाव दिया, ताकि यह एक अस्थायी और असाधारण उपाय बना रहे।

  • पीएसयूज़ के लिए अपवाद: संहिता केंद्र सरकार को अधिकार देती है कि वह सेबी के रेगुलेशंस के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयूज़) को लिस्टिंग और खुलासा करने की शर्तों से छूट दे सकती है। कमिटी ने माना कि आम तौर पर, ऐसी शर्तें सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र, दोनों की कंपनियों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। कमिटी ने सुझाव दिया कि ऐसी कोई भी छूट जनहित में हर मामले की अलग-अलग जांच के आधार पर दी जानी चाहिए। साथ ही, इसके कारणों को लिखित रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।

  • जांच और एडजुडिकेशन: कमिटी ने अवैध लाभ और नुकसान की गणना के तरीके और मानदंडों पर नियम बनाने के लिए बोर्ड को विशेष रूप से सशक्त करने का सुझाव दिया। कमिटी ने पाया कि इससे एडजुडिकेशन में निश्चितता और एकरूपता आएगी। संहिता के अनुसार, जांच 180 दिनों के भीतर पूरी हो जानी चाहिए। कमिटी ने इस समय-सीमा को बढ़ाकर एक साल वर्ष करने का सुझाव दिया। कमिटी ने गौर किया कि ज़्यादातर जांच को पूरा होने में लगभग एक से डेढ़ वर्ष का समय लगता है।

  • निवेशक शिकायत निवारण: संहिता के अनुसार, सेबी निवेशक शिकायत निवारण तंत्र और निवेशक चार्टर ‘बना सकती है’। कमिटी ने सुझाव दिया कि ‘सकती है’ (may) की जगह ‘बनाएगी’ (shall) का प्रयोग किया जाए ताकि इन उपायों को अनिवार्य बनाया जा सके। संहिता के तहत सेबी विशिष्ट शिकायतों के निवारण के लिए एक ओम्बड्सपर्सन को निर्दिष्ट कर सकती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि ओम्बड्सपर्सन द्वारा शिकायत निवारण के लिए 120 दिनों की अधिकतम समय-सीमा (आउटर लिमिट) जोड़ी जानी चाहिए।

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