स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग बिल, 2019 

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयरपर्सनराम गोपाल यादव) ने 27 नवंबर, 2019 को राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग बिल, 2019 पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। बिल भारतीय मेडिकल सेंट्रल काउंसिल एक्ट, 1970 को रद्द करता है और आयुर्वेद, यूनानी, सिद्द और सोवा-रिग्पा की शिक्षा और प्रैक्टिस को रेगुलेट करता है। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग का संयोजनकमिटी ने कहा कि बिल में प्रस्तावित एनसीआईएसएम की सदस्य संख्या और राज्यों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जाना चाहिए ताकि वह प्रभावी तरीके से कार्य कर सके। उसने कहा कि भारत में आठ लाख पंजीकृत आयुष डॉक्टर हैं। इनमें से 56आयुर्वेद, 6.4यूनानी और 1.4सिद्ध और नेचुरोपैथ हैं। बिल आयुर्वेद से तीन सदस्य और यूनानी, सिद्ध तथा सोवा-रिग्पा से एक-एक सदस्य का प्रावधान करता है। डॉक्टरों को उचित प्रतिनिधित्व मिले, इसके लिए कमिटी ने सुझाव दिया कि आयुर्वेद के डॉक्टरों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए इसलिए उनकी संख्या तीन से छह की जाए। उसने सुझाव दिया कि एनसीआईएसएम की कुल सदस्य संख्या 29 से 44 की जाए। इन 44 सदस्यों में चेयरपर्सन, 20 पदेन सदस्य और 23 पार्ट टाइम सदस्य होंगे।
     
  • स्वायत्त बोर्ड:  बिल एनसीआईएसएम की निगरानी में कुछ स्वायत्त बोर्डों का गठन करता है। ये बोर्ड हैं: (i) आयुर्वेद बोर्ड और यूनानी, सिद्ध एवं सोवा-रिग्पा बोर्ड, (ii) भारतीय चिकित्सा प्रणाली के लिए मेडिकल एसेसमेंट और रेटिंग बोर्ड और (iii) एथिक्स और मेडिकल रेजिस्ट्रेशन बोर्ड। योग और नेचुरोपैथी हेतु केंद्रीय रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के लिए कमिटी ने सुझाव दिया कि एनसीआईएसएम के अंतर्गत योग और नेचुरोपैथी बोर्ड भी बनाया जाए। उसने भारतीय चिकित्सा, योग और नेचुरोपैथी प्रणाली के अंतर्गत अनुसंधान बोर्ड बनाने का भी प्रस्ताव दिया।
     
  • अपीलीय क्षेत्राधिकारएनसीआईएसएम के सभी फैसले केंद्र सरकार के अपीलीय क्षेत्राधिकार में आते हैं। इस संबंध में कमिटी ने कहा कि केंद्र सरकार को अपीलीय क्षेत्राधिकार देना सेपेरेशन ऑफ पावर के संवैधानिक प्रावधान से मेल नहीं खाता। उसने सुझाव दिया कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली और होम्योपैथी के लिए एक मेडिकल अपीलीय ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाए। इसके चेयरपर्सन के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय का एक वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश होगा। इसके अतिरिक्त इसके चार सदस्य होंगे (जिन्हें मेडिकल प्रोफेशन और शिक्षा, भारतीय चिकित्सा प्रणाली, होम्योपैथी और स्वास्थ्य प्रशासन की विशेष जानकारी हो)। एनसीआईएसएम के फैसले केंद्र सरकार के स्थान पर इस ट्रिब्यूनल के अपीलीय क्षेत्राधिकार में आएंगे। 
     
  • फीस का रेगुलेशनकमिटी ने कहा कि राज्यों में यह मौजूदा प्रक्रिया है कि वह निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस को रेगुलेट करते हैं। यह स्थानीय कारकों, आरक्षण कोटा और संबंधित राज्यों के अन्य मुद्दों पर निर्भर करता है। हालांकि बिल में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली के कॉलेजों की फीस का रेगुलेशन किया जाए। रेगुलेशन के अभाव में निजी मेडिकल कॉलेज अत्यधिक फीस वसूल सकते हैं। इसलिए कमिटी ने सुझाव दिया कि निजी मेडिकल कॉलेजों और मानद विश्वविद्यालयों की कम से कम 50सीटों के लिए फीस को रेगुलेट किया जाए।
     
  • सलाहकार परिषद:  बिल के अंतर्गत केंद्र सरकार भारतीय चिकित्सा प्रणाली के लिए एक सलाहकार परिषद बना सकती है। इस परिषद के जरिए राज्य/केंद्र शासित प्रदेश एनसीआईएसएम के समक्ष अपने विचार और चिंताएं प्रस्तुत कर सकते हैं। कमिटी ने कहा कि सलाहकार परिषद में राज्य चिकित्सा परिषद के कोई प्रतिनिधि नहीं हैं। इसलिए उसने सुझाव दिया कि राज्य चिकित्सा परिषदों का प्रतिनिधित्व करने का कोई प्रावधान होना चाहिए। 
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  • शिक्षकों की परीक्षाबिल में यह प्रस्तावित है कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली के शिक्षण को पेशे के तौर पर अपनाने वाले पोस्ट ग्रैजुएट विद्यार्थियों को नेशनल टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट पास करना होगा। हालांकि कमिटी ने कहा कि यह उन शिक्षकों पर लागू नहीं होता, जिनकी नियुक्ति बिल के लागू होने से पहले हो गई है। कमिटी ने यह भी कहा कि ऐसे बहुत से शिक्षक हैं जिनके पास पोस्ट ग्रैजुएट डिग्री नहीं है लेकिन वे इस शिक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं। ऐसे शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का प्रावधान होना चाहिए जिसके बाद न्यूनतम क्वालिफाइंग टेस्ट हो। इससे यह सुनिश्चित होगा कि उनका ज्ञान व्यापक और अपडेटेड हो गया है। 

 

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