- कॉरपोरेट कानून (संशोधन) बिल, 2026 को 23 मार्च, 2026 को लोकसभा में पेश किया गया। बिल कंपनी एक्ट, 2013 और सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) एक्ट, 2008 में संशोधन करने का प्रयास करता है। बिल के अंतर्गत प्रमुख संशोधनों में निम्नलिखित शामिल हैं:
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अपराधों का डीक्रिमिनलाइजेशन: बिल दोनों कानूनों के अंतर्गत कई अपराधों को डीक्रिमिनाइज करता है। यह इन अपराधों के लिए कारावास या जुर्माने के स्थान पर नागरिक दंड (सिविल पैनेल्टी) का प्रावधान करता है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) उत्पादक कंपनी के मामलों से संबंधित जानकारी देने में जानबूझकर विफल रहना, (ii) नियमों का उल्लंघन, (iii) रजिस्ट्रार द्वारा अपेक्षित जानकारी या दस्तावेज प्रस्तुत करने में विफल रहना, (iv) खाता बही से जुड़े नियमों का उल्लंघन, और (v) रजिस्ट्रार के किसी भी अनुरोध (समन के अलावा) का अनुपालन न करना।
कंपनी एक्ट, 2013
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कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर): एक्ट के तहत, जिन कंपनियों का वित्तीय स्तर निम्नलिखित किसी भी एक शर्त को पूरा करता है, उन्हें अपनी सीएसआर नीति के तहत पिछले तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम दो प्रतिशत हिस्सा समाज सेवा पर खर्च करना होगा: (i) 500 करोड़ रुपए या उससे अधिक की शुद्ध संपत्ति, (ii) 1,000 करोड़ रुपए या उससे अधिक का कारोबार, या (iii) 5 करोड़ रुपए या उससे अधिक का शुद्ध लाभ। बिल में शुद्ध लाभ की सीमा को बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए या सरकार द्वारा तय की गई राशि कर दिया गया है। साथ ही बिल यह भी कहता है कि जो कंपनियां निर्दिष्ट शर्तों को पूरा करेंगी, उन्हें सीएसआर से जुड़े नियमों को मानने की जरूरत नहीं होगी।
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अनुपालन: बिल का उद्देश्य कुछ अनुपालनों को सरल बनाना है। यह निर्धारित श्रेणियों की कंपनियों को निर्धारित श्रेणियों के दस्तावेजों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजने की अनुमति देता है। साथ ही यह प्रावधान करता है कि कंपनी अपनी वार्षिक आम बैठक भौतिक रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यमों से कर सकती है, हालांकि, उसे प्रत्येक तीन वर्ष में कम से कम एक बार भौतिक बैठक करनी होगी। बिल में निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाली कंपनियों को ऑडिटर नियुक्त करने के नियम से छूट दी गई है। इसके अलावा बिल में कुछ कानूनी हलफनामों की जगह स्व-घोषणाओं (सेल्फ डेक्लेरेशन) का विकल्प दिया गया है।
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छोटी कंपनियां: एक्ट के तहत, लघु कंपनी वह कंपनी है जिसकी: (i) चुकता शेयर पूंजी (पेड-अप शेयर कैपिटल) 50 लाख रुपए से अधिक न हो या निर्धारित सीमा 10 करोड़ रुपए से अधिक न हो, तथा (ii) कारोबार 2 करोड़ रुपए से अधिक न हो या निर्धारित सीमा 100 करोड़ रुपए से अधिक न हो। बिल में इसकी ऊपरी सीमा को बढ़ाकर: (i) शेयर पूंजी को 20 करोड़ रुपए और (ii) कारोबार को 200 करोड़ रुपए कर दिया गया है।
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कंपनी के विलय या एकीकरण की योजना: एक्ट कुछ कंपनियों के विलय या एकीकरण के लिए अनुमोदन के नियमों को निर्दिष्ट करता है, जैसे: (i) दो या दो से अधिक लघु कंपनियां, और (ii) एक होल्डिंग कंपनी और उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनियां। कंपनी के विलय या एकीकरण की योजना के लिए अभी उन शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी है जिनके पास कुल 90% शेयर हों। नए बिल में इस नियम को बदलने का प्रस्ताव है। अब केवल बैठक में मौजूद और वोट देने वाले सदस्यों के बहुमत की मंजूरी चाहिए जिनके पास कम से कम 75% शेयर हों। इसके अलावा लेनदारों की मंजूरी की सीमा को भी 90% से घटाकर 75% कर दिया गया है।
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शेयरों का बाय-बैक: एक्ट के तहत, कोई कंपनी अपने खुद के शेयर या अन्य निर्दिष्ट प्रतिभूतियां खरीद सकती है (इसे बाय-बैक कहा जाता है)। बाय-बैक कंपनी की कुल चुकता पूंजी और फ्री रिजर्व के 25% से अधिक नहीं होना चाहिए। बिल में यह भी कहा गया है कि कंपनियों के निर्धारित वर्गों के लिए, बाय-बैक एक निर्धारित प्रतिशत तक हो सकता है।
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मूल्यांकन प्राधिकरण: इस बिल में भारतीय इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी बोर्ड (आईबीबीआई) को मूल्यांकन प्राधिकरण के रूप में नामित किया गया है। आईबीबीआई मूल्यांकन करने वालों (वैल्यूअर्स) को रजिस्ट्रेशन और मान्यता का सर्टिफिकेट देने के लिए जिम्मेदार होगा। यह केंद्र सरकार को मूल्यांकन के मानकों पर अपने सुझाव देगा और अनुपालन सुनिश्चित करेगा।
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राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (एनएफआरए): कानून के तहत एनएफआरए को एकाउंटिंग और ऑडिटिंग मानकों की निगरानी के लिए बनाया गया है। बिल एनएफआरए की शक्तियों को और बढ़ाता है। उदाहरण के लिए, एनएफआरए जांच के तरीके पर नियम निर्दिष्ट कर सकता है, और सलाह दे सकता है, फटकार लगा सकता है या चेतावनी जारी कर सकता है।
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कर्मचारी मुआवजा योजना: मौजूदा कानून में कर्मचारियों को स्टॉक ऑप्शन देने की अनुमति है। यह नया बिल कंपनी की शेयर पूंजी की कीमत से जुड़ी दूसरी योजनाओं को भी मान्यता देता है। इसमें मुआवजे के कुछ नए तरीके शामिल हो सकते हैं, जैसे रिस्ट्रिक्टेड स्टॉक यूनिट्स (एक तय समय के बाद मिलने वाले शेयर) और स्टॉक एप्रिसिएशन राइट्स (शेयर की कीमत बढ़ने पर मिलने वाला आर्थिक लाभ)।
सीमित देयता भागीदारी एक्ट, 2008
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ट्रस्ट को एलएलपी में बदलना: बिल कुछ खास ट्रस्ट्स को एलएलपी में बदलने का प्रावधान करता है। यह नियम उन ट्रस्ट्स पर लागू होता है, जो (i) भारतीय ट्रस्ट एक्ट, 1882 या किसी अन्य केंद्रीय या राज्य कानून के तहत बनाए गए हों, (ii) सेबी या आईएफएससी अथॉरिटी के पास रजिस्टर्ड हों, और (iii) निर्दिष्ट कार्यों में लगे हों।
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