बिल की मुख्य विशेषताएं
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विदेशी अंशदान (रेगुलेशन) संशोधन बिल, 2026 ऐसे संगठन के विदेशी अंशदान और परिसंपत्तियों की निगरानी, प्रबंधन और निपटान के लिए एक रूपरेखा पेश करता है, जिसका एफसीआरए सर्टिफ़िकेट समाप्त हो गया है।
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किसी संगठन का एफसीआरए सर्टिफ़िकेट तब समाप्त होता है, जब उसे सरकार ने रद्द कर दिया हो, संगठन ने उसे सरेंडर कर दिया हो या रिन्यूअल के लिए अर्जी न दी गई हो या उस अर्जी को खारिज कर दिया गया हो।
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बिल ऐसे मामलों में विदेशी अंशदान और परिसंपत्तियों की देखरेख, प्रबंधन और निपटारे के लिए एक निर्दिष्ट अथॉरिटी का गठन करता है। अगर ऐसे मामलों में कोई पूजा स्थल शामिल है तो अथॉरिटी को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका धार्मिक स्वरूप बना रहे।
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बिल इस एक्ट के उल्लंघन के लिए अधिकतम सजा को पांच साल के कारावास से घटाकर एक साल करता है।
प्रमुख मुद्दे और विश्लेषण
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बिल प्रावधान करता है कि एफसीआरए सर्टिफ़िकेट समाप्त हो जाने पर परिसंपत्तियों का नुकसान होगा। इसके मायने यह हैं कि जिन संगठनों ने अपने एफसीआरए सर्टिफ़िकेट को रिन्यू नहीं कराया है, उन्होंने पहले विदेशी फंड्स से जो परिसंपत्तियां बनाई थीं, वे अब निर्दिष्ट अथॉरिटी के कब्जे में चली जाएंगी।
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इसका एक असर यह भी होगा कि कोई भी संगठन विदेशी फंड्स से बनाई गई अपनी परिसंपतियों को गंवाए बिना एफसीआरए फ्रेमवर्क से बाहर नहीं निकल सकता। इन परिसंपत्तियों को अपने पास रखने के लिए उसे लगातार अपना एफसीआरए सर्टिफ़िकेट रिन्यू कराते रहना होगा। इसके अतिरिक्त एफसीआरए के नियम संगठनों पर सर्टिफ़िकेट बहाल रखने के लिए खर्च करने की शर्तें भी थोपते हैं।
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यह बिल उन परिसंपत्तियों के साथ अलग तरह का व्यवहार करता है जो एफसीआए सर्टिफ़िकेट वाले संगठनों ने बनाई हैं बनाम उन परिसंपत्तियों के, जो सरकार से सिर्फ पूर्व मंजूरी लेकर बनाई गई हैं।
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यह एक्ट या बिल ऐसे मामलों के लिए अपील का कोई प्रावधान नहीं करता, जहां केंद्र सरकार एफसीआरए सर्टिफ़िकेट को रिन्यू करने से मना कर देती है। रिन्यूअल खारिज करने से पहले संगठन को अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं मिलेगा।
भाग क: बिल की मुख्य विशेषताएं
संदर्भ
विदेशी अंशदान (रेगुलेशन) एक्ट, 2010 (एफसीआरए) व्यक्तियों, संगठनों और कंपनियों द्वारा विदेशी अंशदान (यानी अनुदान या दान) की स्वीकृति और उपयोग को रेगुलेट करता है।[1] इसका उद्देश्य ऐसे अंशदान को राष्ट्रीय हित के लिए नुकसानदेह गतिविधियों में इस्तेमाल होने से रोकना भी है। अगर किसी संस्था को अपने कामकाज के लिए विदेशी अंशदान चाहिए तो इसके लिए उसे एफसीआरए सर्टिफ़िकेट प्राप्त करना होता है। इससे पहले 1976 के एक्ट में, जिसके स्थान पर 2010 का एक्ट लाया गया, इस सर्टिफ़िकेट की वैधता समयबद्ध नहीं थी (यानी यह हमेशा वैध रहता था)।[2] 2010 के एक्ट में यह नियम बनाया गया कि यह सर्टिफ़िकेट पांच वर्ष के लिए मिलेगा और हर पांच वर्ष में इसे रिन्यू कराना होगा। साथ ही सिर्फ एक बार विदेशी अंशदान लेने वालों को पहले से अनुमति लेनी होगी (प्रायर परमिशन)।1
गृह मंत्रालय के अनुसार, 2019 से 2022 के बीच 13,520 संगठनों को 55,741 करोड़ रुपए के विदेशी अंशदान मिले।[3] एफसीआरए पोर्टल से संकेत मिलता है कि 15 जुलाई, 2026 तक 14,449 सक्रिय एफसीआरए सर्टिफ़िकेट हैं, 22,498 को रद्द कर दिया गया है और 15,212 को समाप्त माना गया है।[4]
विदेशी अंशदान (रेगुलेशन) संशोधन बिल, 2026 को 25 मार्च, 2026 को लोकसभा में पेश किया गया। यह बिल एक निर्दिष्ट अथॉरिटी का पद बनाता है जो ऐसे किसी भी संगठन की परिसंपत्तियों को अपने कब्जे में लेगा, उनका प्रबंधन और निपटारा करेगा जिसका एफसीआरए सर्टिफ़िकेट रदद्, सरेंडर या समाप्त हो चुका है।[5] कोई सर्टिफ़िकेट तब समाप्त माना जाता है जब संगठन पांच वर्ष की वैधता अवधि समाप्त होने से पहले उसे रिन्यू न कराए। बिल तीन परिस्थियों में निगरानी बढ़ाने का प्रस्ताव रखता है। पहला- किसी संगठन का सर्टिफ़िकेट छिनने पर उसकी परिसंपत्तियों को कैसे संभाला जाए, दूसरा- जो संगठन काम नहीं कर रहे हैं, उनका प्रबंधन कैसे हो, तीसरा- प्रशासनिक और अनुपालन संबंधी प्रक्रियाओं को कैसे पूरा किया जाए।
मुख्य विशेषताएं
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सर्टिफ़िकेट का समाप्त होना: एक्ट के तहत, जिन संगठनों को विदेशी अंशदान चाहिए, उन्हें केंद्र सरकार के पास पंजीकरण कराना होगा और एक सर्टिफ़िकेट हासिल करना होगा। यह सर्टिफ़िकेट हर पांच वर्ष में रिन्यू होना चाहिए। एक्ट यह प्रावधान करता है कि केंद्र सरकार यह सर्टिफ़िकेट रद्द कर सकती है, या संगठन उसे सरेंडर कर सकता है, अगर वह आगे विदेशी अंशदान को प्राप्त करना या उसका इस्तेमाल करना नहीं चाहता। यह सर्टिफ़िकेट रद्द किया जा सकता है, अगर: (i) सर्टिफ़िकेट के धारक ने कोई गलत या झूठा बयान दिया हो, (ii) सर्टिफ़िकेट या इस एक्ट के किसी नियम और शर्त का उल्लंघन किया गया हो, (iii) सरकार को लगता है कि इसे रद्द करना जनहित में होगा या (iv) सर्टिफ़िकेट धारक ने अपने चुनींदा क्षेत्र में लगातार दो वर्षों तक समाज कल्याण का कोई उचित कार्य न किया हो, या वह पूरी तरह से बंद हो गया हो।
बिल में यह कहा गया है कि निम्नलिखित स्थितियों में पंजीकरण सर्टिफ़िकेट समाप्त माना जाएगा, अगर: (i) उसके समाप्त होने से पहले रिन्यूअल न किया गया हो, (ii) रिन्यूअल की अर्जी न दी गई हो, या (iii) रिन्यूअल की अर्जी को खारिज कर दिया गया हो।
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विदेशी अंशदान से बनी संपत्तियों को सौंपना: एक्ट के अनुसार, अगर सर्टिफ़िकेट सरेंडर या रद्द कर दिया जाता है, तो विदेशी अंशदान और उससे बनी परिसंपत्तियां उस अथॉरिटी के पास चली जाएंगी, जिसे निर्दिष्ट किया गया हो। बिल में यह भी जोड़ा गया है कि सर्टिफ़िकेट समाप्त होने पर भी परिसंपत्तियां उस अथॉरिटी के पास चली जाएंगी। बिल एक्ट के पुराने प्रावधानों की जगह नए प्रावधान लाया है। इसमें एक 'निर्दिष्ट अथॉरिटी' का प्रावधान है, जिसके पास विदेशी अंशदान और परिसंपत्तियां चली जाएंगी; इसमें वे संपत्तियां भी शामिल हैं जो आंशिक रूप से विदेशी अंशदान से बनी हैं। यह कब्जा तब तक अस्थायी होगा, जब तक नया सर्टिफ़िकेट न मिल जाए या पुराना सर्टिफ़िकेट रिन्यू या बहाल न हो जाए। ऐसा न होने पर परिसंपत्तियां स्थायी रूप से उस अथॉरिटी के पास ही रह जाएंगी। अगर सर्टिफ़िकेट रिन्यू हो जाता है, बहाल हो जाता है या नया मिल जाता है तो निर्दिष्ट अथॉरिटी विदेशी अंशदान या परिसंपत्तियों का बिना इस्तेमाल किया हुआ हिस्सा वापस कर देगी।
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परिसंपत्तियों के सौंपे जाने के बाद कार्रवाई: निर्दिष्ट अथॉरिटी को स्थायी रूप से निहित परिसंपत्ति का इस्तेमाल जनहित के कामों के लिए करना होगा। वह ऐसी परिसंपत्ति को केंद्र या राज्य सरकार के मंत्रालयों, विभागों, अथॉरिटी या एजेंसियों को हस्तांतरित कर सकती है। वह बिक्री या अन्य प्रक्रियाओं के जरिए भी परिसंपत्ति का निपटान कर सकती है। निपटान से मिली रकम और बिना इस्तेमाल हुआ विदेशी अंशदान भारत के समेकित कोष में जमा किया जाएगा।
अगर स्थायी रूप से सौंपी गई कोई परिसंपत्ति पूरी तरह या आंशिक रूप से पूजा-स्थल है, तो उस निर्दिष्ट अथॉरिटी को उसका प्रबंधन ऐसे व्यक्ति को और ऐसे तरीके से सौंपना होगा, जैसा नियमों में तय किया गया हो। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पूजा-स्थल का धार्मिक स्वरूप बना रहे।
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पूर्व अनुमति वाली संस्थाओं के लिए शर्तें: इस कानून के तहत, जो संस्थाएं केंद्र सरकार के पास एफसीआरए सर्टिफ़िकेट के साथ पंजीकृत नहीं हैं, उन्हें विदेशी अंशदान लेने से पहले केंद्र सरकार से मंजूरी लेनी होगी। पहले से मंजूरी उसी खास उद्देश्य के लिए दी जाती है जिसके लिए इसे मांगा गया है, और यह किसी खास स्रोत से मिलने वाले अंशदान के लिए होती है। कानून में यह भी कहा गया है कि ऐसी मंजूरी उस खास उद्देश्य या विदेशी अंशदान की खास रकम के लिए ही मान्य होगी। बिल में यह भी जोड़ा गया है कि ऐसा विदेशी अंशदान उस समय-सीमा के भीतर ही प्राप्त और इस्तेमाल किया जाना चाहिए जोकि निर्दिष्ट किया जाए।
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प्रमुख पदाधिकारियों की भूमिका: इस एक्ट के तहत, किसी कंपनी द्वारा किए गए अपराधों के लिए आपराधिक जिम्मेदारी उसके निदेशकों और उसके कामकाज के लिए जिम्मेदार अन्य व्यक्तियों की होती है। यह बिल "मुख्य पदाधिकारियों" को परिभाषित करता है जिन्हें जिम्मेदार ठहराया जाएगा। इन मुख्य पदाधिकारियों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) कंपनी के निदेशक, (ii) फर्म का पार्टनर, (iii) ट्रस्ट का ट्रस्टी, (iv) हिंदू अविभाजित परिवार का कर्ता, (v) किसी सोसायटी, ट्रस्ट, ट्रेड यूनियन या व्यक्तियों के संगठन का पदाधिकारी, गवर्निंग बॉडी का सदस्य, मैनेजिंग कमिटी का सदस्य या कोई अन्य कंट्रोलिंग अथॉरिटी, और (vi) किसी संगठन के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार कोई अन्य व्यक्ति। संगठन से जुड़े अपराध के लिए मुख्य पदाधिकारी को जिम्मेदार माना जाएगा, जब तक कि वह यह साबित न कर दे कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने पूरी सावधानी बरती थी। अगर कोई संगठन बंद हो जाता है या काम करना बंद कर देता है, तो बिल आखिरी मुख्य पदाधिकारियों पर केंद्र सरकार को सूचित करने की कानूनी जिम्मेदारी डालता है। ऐसा न करने पर, संगठन का विदेशी अंशदान स्थायी रूप से निर्दिष्ट अथॉरिटी के पास चला जाएगा।
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अपराध और दंड: इस एक्ट के तहत, इसके प्रावधानों या नियमों का उल्लंघन करने पर पांच वर्ष तक का कारावास, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। बिल में कारावास की अधिकतम सजा को घटाकर एक वर्ष कर दिया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि इस कानून के तहत किसी अपराध की जांच शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी।
ख: मुख्य मुद्दे और विश्लेषण
लाइसेंस रीन्यू न होने पर परिसंपत्तियों को सौंपना
एक्ट कुछ संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी अंशदान के उपयोग को रेगुलेट करता है और ऐसे कार्यों में इसके उपयोग पर रोक लगाता है जो देशहित के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। ऐसी संस्थाओं को विदेशी फंडिंग तभी मिल सकती है, जब उन्हें सर्टिफ़िकेट दिया जाए। इस सर्टिफ़िकेट को हर पांच वर्ष में रिन्यू किया जाना जरूरी है। किसी संस्था द्वारा कानून के किसी प्रावधान का उल्लंघन करने पर या कुछ खास परिस्थितियों में सरकार एफसीआरए सर्टिफ़िकेट रद्द कर सकती है। इसमें सर्टिफ़िकेट या रिन्यूअल की शर्तों का उल्लंघन करना, लगातार दो वर्षों तक अपने चुनींदा क्षेत्र में कोई उचित कार्य न करना शामिल है या फिर अगर सरकार को ऐसा लगता है कि यह जनहित में जरूरी है तो भी सर्टिफ़िकेट रद्द किया जा सकता है। 2020 में इस एक्ट में संशोधन किया गया ताकि कोई संस्था अपना एफसीआरए सर्टिफिकेट सरेंडर कर सके, अगर इसकी अनुमति हो।[6] अगर किसी संस्था का एफसीआरए सर्टिफ़िकेट रद्द हो जाता है या वह अपना सर्टिफ़िकेट सरेंडर कर देती है तो विदेशी अंशदान और उस अंशदान से बनाई गई परिसंपत्ति का अधिकार एक निर्दिष्ट अथॉरिटी को मिल जाएगा।
बिल में यह भी कहा गया है कि एफसीआरए सर्टिफ़िकेट को समाप्त माना जाएगा, अगर: (i) रिन्यूअल के लिए कोई अर्जी नहीं दी गई हो, (ii) रिन्यूअल को खारिज कर दिया गया हो, या (iii) उसके समाप्त होने से पहले रिन्यूअल न मिला हो। रद्द करने और सरेंडर करने के अलावा, एफसीआरए सर्टिफ़िकेट का रिन्यूअल न होने पर भी संस्था की परिसंपत्ति और विदेशी फंड एक निर्दिष्ट अथॉरिटी के पास चले जाएंगे। यह अथॉरिटी संस्था की परिसंपत्ति और गतिविधियों का प्रबंधन करेगी और संस्था द्वारा नया सर्टिफ़िकेट प्राप्त करने या उसे रिन्यू कराने के बाद बिना इस्तेमाल की गई परिसंपत्ति को वापस कर देगी। अगर संस्था तय समय-सीमा के भीतर ऐसा नहीं करती तो विदेशी फंड और परिसंपत्ति स्थायी रूप से निर्दिष्ट अथॉरिटी के पास चली जाएगी। अथॉरिटी ऐसी परिसंपत्ति को सरकार के मंत्रालयों, विभागों या एजेंसियों को हस्तांतरित कर सकती है। परिसंपत्ति को बिक्री या अन्य प्रक्रियाओं के माध्यम से भी निपटाया जा सकता है, और उससे प्राप्त राशि भारत के समेकित कोष में जमा की जाएगी।
सर्टिफ़िकेट समाप्त होने पर परिसंपत्तियों के हस्तांतरण को पिछली तारीख से लागू होना
ऐसा हो सकता है कि कुछ संगठनों के पास एफसीआरए सर्टिफ़िकेट रहा हो, लेकिन उन्होंने उसे रिन्यू न कराया हो और घरेलू फंड का इस्तेमाल करके अपना कामकाज जारी रखा हो। इस बिल के तहत, ऐसे संगठन की विदेशी फंड से बनाई गई परिसंपत्ति निर्दिष्ट अथॉरिटी के अधिकार में चली जाएगी। उदाहरण के लिए, मान लीजिए किसी हेल्थकेयर संस्था ने एफसीआरए फंड से एक अस्पताल बनाया है। वह पिछले कुछ सालों से घरेलू फंड से अस्पताल चला रही है और उसने अपना एफसीआरए सर्टिफ़िकेट रिन्यू नहीं कराया है। बिल के प्रस्तावित नियमों के तहत, अस्पताल का अधिकार निर्दिष्ट अथॉरिटी के पास चला जाएगा। इस अथॉरिटी के पास अस्पताल को स्वास्थ्य मंत्रालय या राज्य के स्वास्थ्य विभाग को सौंपने या उसे बेचने का अधिकार होगा।
परिसंपत्तियों के नुकसान के बिना एफसीआरए से बाहर निकलने का कोई तरीका नहीं
ऊपर दिए गए उदाहरण से यह भी पता चलता है कि कोई संस्था एफसीआरए फ्रेमवर्क से तब तक बाहर नहीं निकल सकती, जब तक कि विदेशी फंड से बनाई गई उसकी परिसंपत्ति निर्दिष्ट अथॉरिटी को न सौंप दी जाए। सर्टिफ़िकेट सरेंडर करने या उसे रिन्यू न कराने, दोनों ही स्थितियों में परिसंपत्ति का नुकसान होगा। भले ही किसी संस्था को अभी एफसीआरए फंडिंग न मिल रही हो, फिर भी अपनी परिसंपत्ति बनाए रखने के लिए उसे हमेशा अपना सर्टिफ़िकेट रिन्यू कराते रहना होगा। एफसीआरए नियमों में कुछ और शर्तें भी जोड़ी गई हैं, जिन्हें संस्थाओं को अपना एफसीआरए सर्टिफ़िकेट बहाल रखने के लिए पूरा करना होगा।[7] इसलिए जिन संस्थाओं ने विदेशी फंडिंग पर निर्भर रहना बंद कर दिया है, उन्हें भी इस कानून और नियमों के तहत अपनी जिम्मेदारियां पूरी करते रहना होगा; ऐसा न करने पर विदेशी फंड से बनाई गई उनकी परिसंपत्ति ज़ब्त कर ली जाएगी।
एफसीआरए संशोधन नियम, 2026 में यह जोड़ा गया है कि एफसीआरए सर्टिफ़िकेट के रिन्यूअल के लिए, किसी संगठन को अपने चुनींदा क्षेत्र में सामाजिक कल्याण के लिए तब उचित गतिविधि करने वाला माना जाएगा, जब उसने पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपए के विदेशी अंशदान का इस्तेमाल किया हो।[8] इसके मायने यह है कि अगर किसी संस्था को दो वर्ष में 10 लाख रुपए से कम विदेशी अंशदान मिलता है, या वह उस रकम को खर्च नहीं कर पाती है, तो उसका लाइसेंस रद्द हो सकता है और उसकी परिसंपत्ति ज़ब्त की जा सकती है। उदाहरण के लिए, किसी संस्था को ग्रामीण इलाके में लाइब्रेरी बनाने और चलाने के लिए एफसीआरए फंडिंग मिलती है। लाइब्रेरी बनाने का खर्च 20 लाख रुपए था, और इसे चलाने का सालाना खर्च लगभग चार लाख रुपए है। संस्था को अपने खर्च के हिसाब से विदेशी फंडिंग मिलती है। यह संस्था अपना सर्टिफ़िकेट रिन्यू नहीं करा पाएगी (क्योंकि दो साल में मिली विदेशी फंडिंग 10 लाख रुपए से कम होगी) और लाइब्रेरी उसके हाथ से चली जाएगी। उस पर निर्दिष्ट अथॉरिटी' का कब्जा होगा। संस्था घरेलू फंड से भी लाइब्रेरी चला सकती है। हालांकि लाइब्रेरी को अपने अधिकार में रखने के लिए संस्था को विदेशी फंडिंग मिलती रहनी चाहिए।
इसलिए अगर कोई संस्था विदेशी फंड से बनाई गई परिसंपत्ति को अपने पास बनाए रखना चाहती है, तो उसे विदेशी फंड मिलना जारी रहना चाहिए। यह प्रावधान उस कानून के खिलाफ हो सकता है, जिसका उद्देश्य विदेशी स्रोतों से मिलने वाली फंडिंग को रेगुलेट करना है।
वे परिसंपत्तियां भी कब्जे में ली जा सकेंगी, जिन्हें बनाने में सिर्फ आंशिक रूप से विदेशी अंशदान का इस्तेमाल हुआ है
बिल में कहा गया है कि भले ही परिसंपत्तियों को आंशिक रूप से विदेशी अंशदान से बनाया या हासिल किया गया हो, वे निर्दिष्ट अथॉरिटी के कब्जे में चली जाएंगी। जिस संगठन की संपत्ति ज़ब्त की गई है, वह निर्दिष्ट अथॉरिटी को आवेदन करके घरेलू स्रोतों से बनाई गई परिसंपत्ति के किसी अलग या पहचाने जा सकने वाले हिस्से को वापस पाने की मांग कर सकता है। संतुष्ट होने पर, अथॉरिटी परिसंपत्ति का वह हिस्सा आवेदक को वापस कर देगी। इससे ऐसी स्थिति बन सकती है कि घरेलू और विदेशी, दोनों तरह के फंड्स से बनाई गई परिसंपत्ति पूरी तरह से निर्दिष्ट अथॉरिटी के अधिकार में चली जाए। उदाहरण के लिए, अगर किसी अस्पताल ने नया वार्ड बनाने के लिए घरेलू और विदेशी, दोनों तरह के दान जुटाए हैं, तो बनने के बाद यह बता पाना मुश्किल होगा कि उस वॉर्ड का कौन सा "अलग या पहचाना जा सकने वाला हिस्सा" घरेलू दान से बना है।
पूर्व मंजूरी के जरिए बनाई गई परिसंपत्ति के साथ अलग तरह का व्यवहार
इस एक्ट के तहत, जिन संस्थाओं के पास एफसीआरए सर्टिफ़िकेट नहीं है और जो केंद्र सरकार के साथ पंजीकृत नहीं हैं, उन्हें विदेशी अंशदान लेने से पहले केंद्र सरकार से मंजूरी लेनी होगी। यह मंजूरी किसी विशेष स्रोत से विदेशी फंड्स लेने और किसी विशेष उद्देश्य के लिए दी जाती है। कानून में यह भी कहा गया है कि यह मंजूरी सिर्फ उसी विशेष उद्देश्य या विदेशी अंशदान की उस विशेष रक़म के लिए मान्य होगी जिसके लिए वह ली गई है। बिल उन परिसंपत्तियों के साथ अलग तरह का व्यवहार कर सकता है, जो एफसीआरए सर्टिफ़िकेट वाली संस्थाओं ने बनाई है, और उनके साथ अलग, जो पहले से मंजूरी लेकर बनाई गई हैं।
बिल में प्रावधान है कि एफसीआरए सर्टिफ़िकेट के रिन्यू न होने की स्थिति में परिसंपत्तियां निर्दिष्ट अथॉरिटी के पास चली जाएंगी, भले ही संगठन को विदेशी अंशदान मिलता रहे। हालांकि यह पूर्व मंजूरी लेकर बनाई गई परिसंपत्तियों पर लागू नहीं होता। उदाहरण के लिए, संगठन A को स्कूल शुरू करने के लिए दो वर्ष तक विदेशी फंडिंग पाने की पहले से मंजूरी मिलती है। दो साल की अवधि खत्म होने के बाद, वह घरेलू फंड का इस्तेमाल करके स्कूल चला सकता है। संगठन B को एफसीआरए सर्टिफ़िकेट मिलता है और वह विदेशी फंड का इस्तेमाल करके स्कूल शुरू करता है। दो साल में वह घरेलू फंड का इस्तेमाल करके स्कूल चलाने लायक हो जाता है और एफसीआरए सर्टिफ़िकेट को रिन्यू न करने का फैसला करता है। संगठन A का बनाया गया स्कूल निर्दिष्ट अथॉरिटी के अधिकार में नहीं आता है, जबकि संगठन B का स्कूल अथॉरिटी के अधिकार में आ जाता है।
एफसीआरए सर्टिफ़िकेट के रिन्यू न होने की स्थिति में अपील की व्यवस्था न होना
यह एक्ट किसी संगठन को केंद्र सरकार के उस आदेश के खिलाफ अपील करने की अनुमति देता है जिसमें उसका एफसीआरए सर्टिफ़िकेट रद्द कर दिया गया हो या सर्टिफ़िकेट के लिए आवेदन नामंजूर कर दिया गया हो। कानून का उल्लंघन करके हासिल की गई करेंसी ज़ब्त किए जाने के खिलाफ भी अपील की जा सकती है। अपील उस उच्च न्यायालय में की जाएगी जिसके अधिकार क्षेत्र में संगठन काम करता है। जब केंद्र सरकार एफसीआरए सर्टिफ़िकेट को रिन्यू नहीं करती है, तो ऐसे मामलों में अपील करने का कोई तरीका इस एक्ट में नहीं दिया गया है। बिल में यह प्रावधान है कि अगर सर्टिफ़िकेट को रिन्यू करने से मना कर दिया जाता है, तो संगठन का एफसीआरए सर्टिफ़िकेट खत्म माना जाएगा। एफसीआरए सर्टिफ़िकेट रिन्यू न होने पर संगठन अपनी परिसंपत्ति को गंवा देगा, और वह परिसंपत्ति निर्दिष्ट अथॉरिटी के पास चली जाएगी। सरकार के ऐसे फैसलों के खिलाफ अपील करने का कोई तरीका बिल में नहीं दिया गया है।
एक्ट और बिल, दोनों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि सर्टिफ़िकेट रिन्यूअल खारिज होने से पहले संगठन को अपनी बात रखने का उचित मौका दिया जाए। हालांकि एक्ट संगठनों को सर्टिफ़िकेट रद्द करने और एक्ट के उल्लंघन में प्राप्त की गई करेंसी को जब्त करने के मामलों में अपनी बात रखने का मौका देता है। इस तरह अगर सरकार किसी संगठन का एफसीआरए सर्टिफ़िकेट रिन्यू नहीं करती है तो वह संगठन सुनवाई या फैसले के खिलाफ अपील का कोई मौका पाए बिना, विदेशी फंड से बनाई गई अपनी सभी परिसंपत्तियों को गंवा देगा।
[1]. The Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010.
[2]. The Foreign Contribution (Regulation) Act, 1976.
[3]. Unstarred Question No 2544, Ministry of Home Affairs, Lok Sabha, December 19, 2023, https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/1714/AU2544.pdf?source=pqals.
[4]. FCRA Portal Dashboard, Ministry of Home affairs, as accessed on May 6, 2026, https://fcraonline.nic.in/fc_dashboard.aspx.
[5]. The Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026.
[6]. The Foreign Contribution (Regulation) Amendment Act, 2020.
[7]. The Foreign Contribution (Regulation) Rules, 2011.
[8]. Foreign Contribution (Regulation) Amendment Rules, 2026, S.O. 3272(E), Ministry of Home Affairs, June 22, 2026, https://fcraonline.nic.in/home/PDF_Doc/fc_gaz_23062026.pdf.
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