- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) बिल, 2026 को 28 जुलाई, 2026 को राज्यसभा में पेश किया गया। बिल सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास एक्ट, 2006 में संशोधन का प्रयास करता है। इस कानून का उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमईज़) को बढ़ावा देना और उनके विकास में सहायता करना है।
-
एमएसएमईज़ का वर्गीकरण: यह एक्ट उद्यमों को एमएसएमईज़ के तौर पर इस आधार पर वर्गीकृत करता है कि उनमें कितना निवेश किया गया है: (i) मैन्यूफैक्चरिंग के मामले में संयंत्र और मशीनरी में, और (ii) सेवा के मामले में उपकरणों में। यह सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के बीच वर्गीकरण के लिए निवेश की सीमाएं भी तय करता है। बिल इन सीमाओं को हटाता है और मानदंडों में बदलाव करता है। यह केंद्र सरकार को उद्यमों को एमएसएमई के तौर पर वर्गीकृत करने का अधिकार देता है जो इन आधारों पर होगा: (i) संयंत्र और मशीनरी या उपकरण में निवेश और (ii) टर्नओवर। इन सीमाओं को अधिसूचना के ज़रिए तय किया जाएगा।
-
रजिस्ट्रेशन: इस एक्ट के तहत, मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में मध्यम उद्यम शुरू करने वाले व्यक्ति को एक निर्दिष्ट अथॉरिटी के पास मेमोरेंडम जमा करना होगा। दूसरे एमएसएमई अपनी मर्ज़ी से मेमोरेंडम जमा कर सकते हैं। इसके बजाय बिल में यह प्रावधान है कि सभी एमएसएमईज़ के लिए मेमोरेंडम जमा करना स्वैच्छिक होगा। केंद्र सरकार इसके लिए एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म शुरू करेगी। राज्य सरकारें भी इसके लिए एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म शुरू कर सकती हैं।
-
सीपीएसईज़ के लिए TReDS के ज़रिए निपटान अनिवार्य: बिल में यह प्रावधान है कि प्रत्येक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (सीपीएसई) के लिए एमएसएमईज़ से वस्तुओं या सेवाओं की खरीद के सभी इनवॉयस का निपटान ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) प्लेटफॉर्म के ज़रिए करना अनिवार्य होगा। TReDS एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म है जिसे आरबीआई रेगुलेट करता है। यह प्लेटफॉर्म एमएसएमईज़ को खरीदारों से मिलने वाले इनवॉयस के बदले फाइनांसरों से धन जुटाने की सुविधा देता है। केंद्र और राज्य सरकारें सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों, प्राधिकरणों या संस्थाओं के लिए TReDS के ज़रिए चालान का निपटान अनिवार्य कर सकती हैं।
-
मध्यस्थता के लिए समय-सीमा: एक्ट सूक्ष्म और लघु उद्यम परिषदों या उनके द्वारा निर्दिष्ट मध्यस्थता सेवा प्रदाताओं को इस बात के लिए अधिकृत करता है कि वे मध्यस्थता के ज़रिए भुगतान संबंधी विवादों का निपटान कर सकते हैं। बिल में यह भी कहा गया है कि पहली उपस्थिति के लिए तय की गई तारीख से 90 दिनों के भीतर मध्यस्थता की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए।
-
आर्बिट्रेशन के लिए समय-सीमा: अगर मध्यस्थता से मामला नहीं सुलझता तो एक्ट के अनुसार मामले को आर्बिट्रेशन के लिए भेजना अनिवार्य है। बिल में यह भी कहा गया है कि मध्यस्थता समाप्त होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर मामले को आर्बिट्रेशन के लिए भेजा जाना चाहिए। इसमें यह भी जोड़ा गया है कि मुकदमे की कार्यवाही पूरी होने की तारीख से 90 दिनों के भीतर निर्णय सुनाया जाना चाहिए।
-
फैसले पर विवाद: इस कानून के तहत परिषद के किसी आदेश या फैसले को रद्द करने के लिए अदालत में अर्ज़ी दी जा सकती है लेकिन इसके लिए फैसले की रकम का 75% हिस्सा जमा करना होगा। बिल में मध्यस्थता से हुए समझौते के खिलाफ भी ऐसी अर्ज़ी देने की अनुमति है। जब तक मामले का निपटारा नहीं हो जाता, अदालत जमा की गई रकम का एक हिस्सा एमएसएमई सप्लायर को देने का आदेश देगी। यह हिस्सा कितना होगा, यह अदालत तय करेगी कि क्या उचित है। बिल में यह भी कहा गया है कि अगर कोई मामला छह महीने से ज़्यादा समय से लंबित है तो फैसले की रकम का कम से कम 50% हिस्सा सप्लायर को देना अनिवार्य है।
-
अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाना: बिल में कहा गया है कि रजिस्ट्रेशन के लिए जान-बूझकर गलत जानकारी देने पर निम्नलिखित सज़ा हो सकती है: (i) पहली बार ऐसा करने पर चेतावनी, (ii) इसके बाद नियम तोड़ने पर 1,000 रुपए से 50,000 रुपए तक का जुर्माना। अधिकारियों द्वारा मांगी गई जानकारी न देने पर भी यही जुर्माना लगेगा। मौजूदा कानून के तहत इस अपराध के लिए निम्नलिखित जुर्माना लगता है: (i) पहली बार दोषी पाए जाने पर 1,000 रुपए तक, और (ii) उसके बाद दोषी पाए जाने पर 1,000 रुपए से 10,000 रुपए के बीच।
-
इस कानून के तहत खरीदार को वार्षिक खातों में एमएसएमई सप्लायर्स के बकाये भुगतान की रिपोर्ट देनी होगी। इस प्रावधान का उल्लंघन करने पर कम से कम 10,000 रुपए का जुर्माना लगता है। बिल में इसकी जगह ये प्रावधान किए गए हैं: (i) पहली बार उल्लंघन पर चेतावनी, (ii) दूसरी बार उल्लंघन पर 10,000 रुपए से 50,000 रुपए के बीच जुर्माना, और (iii) इसके बाद उल्लंघन करने पर 50,000 रुपए से एक लाख रुपए के बीच जुर्माना।
-
संशोधन एक्ट के लागू होने के बाद हर तीन वर्ष में जुर्माना न्यूनतम राशि के 10% तक बढ़ जाएगा।
-
एडजुडिकेशन और अपील: केंद्र सरकार विकास आयुक्त को एडजुडिकेटिंग अधिकारी नियुक्त करेगी। एडजुडिकेटिंग अधिकारी के फैसलों के खिलाफ अपील एमएसएमई सचिव के पास की जा सकेगी।
डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

