विचारणीय मुद्दे:

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल, 2026

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, "ट्रांसजेंडर" एक व्यापक शब्द है। इसमें वे सभी व्यक्ति शामिल हैं जिनकी जेंडर आइडेंटिटी जन्म के समय निर्धारित जेंडर से मेल नहीं खाती।[1] 2011 की जनगणना के अनुसार, 'अन्य' के रूप में खुद आइडेंटिफाई करने वाले व्यक्तियों की संख्या 4,87,803 (कुल जनसंख्या का 0.04%) है।[2]  यह 'अन्य' श्रेणी उन व्यक्तियों पर लागू होती है जो स्वयं को पुरुष या महिला के रूप में नहीं पहचानते, और इसमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति भी शामिल हैं। आगामी जनगणना 2027 में, परिवार के मुखिया के जेंडर से संबंधित आंकड़े तीन श्रेणियों के अंतर्गत एकत्र किए जाएंगे: पुरुष, महिला और ट्रांसजेंडर।[3]  

2013 में सरकार ने ट्रांसजेंडर मुद्दों पर एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। इस समिति ने पाया कि समाज में फैली बुराई और भेदभाव के कारण इन लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, नौकरी और जरूरी कागज़ात बनवाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।[4] 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की अपना जेंडर खुद चुनने के अधिकार को मान्यता दी। साथ ही सरकार को निर्देश दिया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कानूनी पहचान, कल्याणकारी योजनाएं और भेदभाव से सुरक्षा दी जाए।[5] श्री तिरुचि शिवा ने वर्ष 2014 में "ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का अधिकार बिल" नामक एक प्राइवेट मेंबर बिल (गैर सरकारी सदस्यों का बिल) पेश किया, जो 2015 में राज्यसभा में पारित हो गया। लेकिन यह बिल लोकसभा में लंबित रहा।[6]  इसके बाद सरकार ने 2016 में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) बिल पेश किया। इस बिल की एक स्टैंडिंग कमिटी ने समीक्षा की जिसने इसकी परिभाषाओं, सर्टिफिकेशन और भेदभाव से बचाव के तरीकों पर अपने सुझाव दिए।[7],[8] 16वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही दोनो बिल निरस्त हो गए। सरकार ने 2019 में इसका एक संशोधित संस्करण पेश किया।

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) बिल, 2019 को 26 नवंबर, 2019 को पारित किया गया।[9] 2019 के एक्ट में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसका जेंडर जन्म के समय निर्धारित जेंडर से मेल नहीं खाता है, और इसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) एक ट्रांस-पुरुष या ट्रांस-महिला, (ii) इंटरसेक्स वैरिएशंस वाला व्यक्ति, (iii) जेंडरक्वीर, और (iv) किन्नर, हिजड़ा, जोगता और अरावनी के रूप में सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान रखने वाले व्यक्ति। इस एक्ट में कहा गया कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपनी स्व-निर्धारित जेंडर आइडेंटिटी का अधिकार होगा। इसमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति के लिए पहचान पत्र जारी करने की प्रक्रिया का भी उल्लेख है। इस एक्ट के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियो के साथ भेदभाव करना प्रतिबंधित है। इसमें शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा, कहीं भी आने-जाने की आजादी और अन्य सेवाओं में मनाही या अनुचित व्यवहार करना शामिल है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध अपराधों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) जबरन या बंधुआ मजदूरी, (ii) सार्वजनिक स्थानों के उपयोग से वंचित करना, (iii) घर और गांव से निकालना, और (iv) शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक या आर्थिक शोषण। इन अपराधों के लिए सजा छह महीने से दो वर्ष तक और जुर्माना हो सकती है।

लोकसभा में 13 मार्च, 2026 को ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल, 2026 को पेश किया गया।[10] बिल ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) एक्ट, 2019 में संशोधन करता है।

बिल की मुख्य विशेषताएं

  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में बदलाव: एक्ट में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसका जेंडर उसके जन्म के समय निर्धारित जेंडर से मेल नहीं खाता है। बिल इस परिभाषा को हटाता है। इसके अलावा बिल में यह भी कहा गया है कि इसमें वे लोग शामिल नहीं होंगे (और न ही कभी शामिल रहे हैं) जिनका सेक्सुअल ओरिएंटेशन अलग है या जिनकी स्वयं द्वारा महसूस की गई (सेल्फ पर्सीव्ड) सेक्सुअल आइडेंटिटी अलग है।

एक्ट में निर्दिष्ट परिभाषा में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) वे व्यक्ति जिनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान किन्नर, हिंजड़ा, अरावनी या जोगता के रूप में है, और (ii) वे व्यक्ति जिनके जन्म के समय प्राथमिक यौन विशेषताएं, बाहरी जननांग, क्रोमोसम्स, या हारमोन पुरुष या महिला शरीर के सामान्य मानकों (नॉरमैटिव स्टैंडर्ड) से अलग हैं। बिल में इन श्रेणियों को बरकरार रखा गया है। बिल में एक्ट की निम्नलिखित श्रेणियों को हटा दिया गया है: (i) ट्रांस-पुरुष या ट्रांस-महिला, भले ही उस व्यक्ति ने जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी, हारमोन थेरेपी, लेज़र थेरेपी या ऐसी ही कोई दूसरी थेरेपी कराई हो, अथवा नहीं कराई हो, और (ii) जेंडरक्वीर। बिल में निम्नलिखित को भी शामिल किया गया है: (i) नपुंसक (यूनक) और (ii) ऐसे व्यक्ति जिन्हें म्यूटिलेशन, इमैस्क्यूलेशन, सर्जिकल, रासायनिक या हारमोनल प्रक्रियाओं द्वारा जबरदस्ती ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने को मजबूर किया गया हो।

  • ट्रांसजेंडर पहचान को मान्यता: एक्ट के तहत, एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति ट्रांसजेंडर के रूप में पहचान प्रमाणपत्र जारी करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकता है। बिल में यह भी कहा गया है कि जिला मजिस्ट्रेट एक नामित चिकित्सा बोर्ड के सुझावों की जांच करने के बाद प्रमाणपत्र जारी करेगा। इस बोर्ड की अध्यक्षता मुख्य चिकित्सा अधिकारी या उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी करेंगे। जिला मजिस्ट्रेट अन्य चिकित्सा विशेषज्ञों की सहायता ले सकते हैं।
  • जेंडर में बदलाव: एक्ट में यह प्रावधान है कि अगर कोई ट्रांसजेंडर व्यक्ति जेंडर बदलने के लिए सर्जरी करवाता है, तो वह एक संशोधित पहचान प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकता है। बिल में इसके बजाय व्यक्ति के लिए संशोधित प्रमाणपत्र प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया है। बिल में यह भी कहा गया है कि संबंधित चिकित्सा संस्थान को इस सर्जरी से संबंधित जानकारी जिला मजिस्ट्रेट को देनी होगी। ऐसे व्यक्ति को अब इस एक्ट के तहत प्राप्त अधिकार और फायदे नहीं मिलेंगे।
  • अपराध और सजा: इस बिल में एक्ट में निर्दिष्ट मौजूदा अपराधों में कुछ नए अपराध जोड़े गए हैं। किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से उसका अपहरण करना और उसे गंभीर चोट पहुंचाना, निम्नलिखित सजा के अंतर्गत आएगा: (i) अगर पीड़ित बालिग है तो 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और कम से कम दो लाख रुपए का जुर्माना, और (ii) अगर पीड़ित बच्चा है तो आजीवन कारावास और कम से कम पांच लाख रुपए का जुर्माना। किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर के रूप में पेश होने और भीख मांगने, गुलामी या बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर करने पर निम्नलिखित सजा दी जाएगी: (i) अगर पीड़ित वयस्क है तो पांच से 10 वर्ष तक का कारावास और कम से कम एक लाख रुपए का जुर्माना, और (ii) अगर पीड़ित बच्चा है तो 10 से 14 वर्ष तक का कारावास और कम से कम तीन लाख रुपए का जुर्माना।

 

विचारणीय मुद्दे

“ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा

स्वनिर्धारित पहचान के अधिकार को हटाना

इस एक्ट के अनुसार, ट्रांसजेंडर व्यक्ति वह है जिसका जेंडर जन्म के समय निर्धारित जेंडर से मेल नहीं खाता। इसमें ट्रांस-पुरुष या ट्रांस-महिला, इंटरसेक्स वैरिएशंस वाले व्यक्ति, जेंडरक्वीर और किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति भी शामिल हैं। एक्ट में कहा गया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति को स्वयं द्वारा महसूस की गई (सेल्फ पर्सीव्ड) जेंडर आइडेंटिटी का अधिकार है। यह एक्ट ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जिला मजिस्ट्रेट से पहचान प्रमाणपत्र प्राप्त करने का प्रावधान करता है। यह एक्ट ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कुछ अधिकार और हक भी प्रदान करता है। यहां एक अहम सवाल यह था कि पहचान पत्र का प्रावधान होने के बावजूद, 'सेल्फ-पर्सीव्ड' जेंडर आइडेंटिटी का क्या अर्थ है और इसे कैसे लागू किया जाएगा, यह स्पष्ट नहीं है। इससे संबंधित एक सवाल यह है कि क्या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए कल्याणकारी लाभ प्राप्त करने के लिए जेंडर आइडेंटिटी का सेल्फ परसेप्शन एक पर्याप्त शर्त थी।

इस बिल में उस प्रावधान को हटा दिया गया है जिसके तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सेल्फ-पर्सीव्ड आइडेंटिटी का अधिकार दिया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि इसमें अलग-अलग सेक्सुअल ओरिएंटेशन और सेल्फ-पर्सीव्ड सेक्सुअल आइडेंटिटी वाले व्यक्तियों को शामिल नहीं किया जाएगा और न ही कभी शामिल किया गया है। बिल के उद्देश्यों और कारणों के कथन (एसओआर) में कहा गया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति की मौजूदा परिभाषा अस्पष्ट है, जिससे लक्षित लाभार्थियों की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। यह फौजदारी, दीवानी और निजी कानूनों (पर्सनल लॉ) के कई प्रावधानों को लागू करने और उनके प्रवर्तन को भी असंभव बनाता है। हालांकि बिल लाभार्थियों की पहचान करने में स्पष्टता लाने का प्रयास करता है, ऐसा करने में, वह व्यक्तियों को उनकी सेल्फ-पर्सीव्ड जेंडर आइडेंटिटी के अधिकार से वंचित कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि जेंडर का स्व-निर्धारण व्यक्तिगत स्वायत्तता और आत्म-अभिव्यक्ति का अभिन्न अंग है और अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आता है।5  बिल की समीक्षा करने वाली स्टैंडिंग कमिटी ने भी कहा था कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सर्जरी/हारमोन से अलग, अपना जेंडर (पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर) चुनने का विकल्प होना चाहिए।8  2019 के बिल (जो बाद में 2019 का एक्ट बन गया) के एसओआर में कहा गया था कि यह कानून का उद्देश्य ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान का अधिकार देना, उनकी सेल्फ-पर्सीव्ड जेंडर आइडेंटिटी का हक देना और उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकना है।[11] 

परिभाषा में बदलाव

बिल के एसओआर में कहा गया है कि इस कानून का उद्देश्य उन लोगों के समूह की रक्षा करना है जिन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ट्रांसजेंडर के रूप में जाना जाता है और जिन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसमें यह भी कहा गया है कि एक्ट के तहत लाभ प्राप्त करने वाले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की उचित पहचान के लिए एक सटीक परिभाषा देना आवश्यक है। जिला मजिस्ट्रेट एक चिकित्सा बोर्ड (और यदि आवश्यक हो, तो अन्य चिकित्सा विशेषज्ञों) के सुझावों की जांच करने के बाद ट्रांसजेंडर प्रमाणपत्र जारी करेंगे।

इस बिल में ट्रांसजेंडर व्यक्ति की जो परिभाषा प्रस्तावित की गई है, उसके दो व्यापक वर्ग हैं: (i) मेडिकल/शारीरिक, जिसमें जन्म के समय प्राथमिक यौन विशेषताएं, बाहरी जननांग, क्रोमोसम्स, या हारमोन पुरुष या महिला शरीर के सामान्य मानकों (नॉरमैटिव स्टैंडर्ड) से अलग हैं, या वे व्यक्ति जिन्हें म्यूटिलेशन, इमैस्क्यूलेशन, सर्जिकल, रासायनिक या हारमोनल प्रक्रियाओं द्वारा जबरदस्ती ट्रांसजेंडर पहचाने अपनाने को मजबूर किया गया हो, और (ii) सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान (किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, जोगता, हिजड़ा)। बिल में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणपत्र जारी करने के लिए एक चिकित्सा बोर्ड के सुझाव अनिवार्य किए गए हैं। जबकि पहले वर्ग की पहचान चिकित्सीय आधार पर की जा सकती है, दूसरा वर्ग सामाजिक-सांस्कृतिक है। प्रश्न यह है कि क्या चिकित्सा बोर्ड इन सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों से संबंधित व्यक्तियों की स्पष्ट रूप से पहचान कर सकता है और बिल द्वारा निर्धारित सटीक परिभाषा को प्राप्त करने में सहायता कर सकता है।

अपील की प्रक्रिया का अभाव

इस एक्ट में उन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए किसी भी प्रकार के निवारण तंत्र का प्रावधान नहीं है जिन्हें पहचान पत्र देने से इनकार कर दिया गया है। बिल में भी इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय पोर्टल के अनुसार, वर्तमान में ट्रांसजेंडर प्रमाणपत्र और पहचान पत्र प्राप्त करने के लिए 34,000 आवेदन प्राप्त हुए हैं। अब तक 32,427 प्रमाणपत्र और 32,498 पहचान पत्र जारी किए जा चुके हैं, जबकि 4,000 आवेदन लंबित हैं।[12]  11 मार्च, 2026 तक अस्वीकृत आवेदनों की संख्या 5,566 है।[13]

अपराध और दंड

बिल एक्ट में नए अपराध और दंड जोड़ता है। इन अतिरिक्त अपराधों में अपहरण करना और किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर करने हेतु गंभीर चोट या आघात पहुंचाना शामिल है।

इस बिल में एक्ट के तहत पहले से मौजूद अपराधों की गंभीरता या अवधि में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। इनमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध विभिन्न अपराध शामिल हैं, जैसे: (i) किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को बंधुआ मजदूरी में लिप्त होने के लिए विवश करना या फुसलाना, (ii) किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान पर जाने और उसका उपयोग करने के अधिकार से वंचित करना, (iii) किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को उसके निवास स्थान से जबरन या मजबूर करके निकालना, और (iv) किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के जीवन, सुरक्षा, स्वास्थ्य या कल्याण, चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक, को नुकसान पहुंचाना या चोट पहुंचाना। इन अपराधों के लिए छह महीने से दो वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का वही दंड प्रावधान बरकरार है।

हम इनमें से कुछ अपराधों और दंडों की तुलना भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 के मौजूदा ढांचे में दिए गए प्रावधानों से करते हैं।[14] 

तालिका 1: बिल बनाम भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध और दंड

अपराध

बिल के तहत दंड

   बीएनएस के तहत दंड

बंधुआ मजदूरी में लिप्त होने के लिए विवश करना या उकसान

  • सेक्शन 18 (ए) (मौजूदा एक्ट के तहत): किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को बलात या बंधुआ मजदूरी में लिप्त होने के लिए मजबूर करना
  • दंड: छह महीने से दो साल तक की कैद और जुर्माना
  • सेक्शन 143 (2): शोषण हेतु मानव तस्करी
  • दंड: सात से 10 वर्ष तक कठोर कारावास और जुर्माना (भीख मांगना, गुलामी, जबरन श्रम को भी "शोषण" माना जाता है)

वयस्क पीड़ित: अपहरण करना, जबरदस्ती से गंभीर चोट या स्थायी या गंभीर क्षति पहुंचाना

  • सेक्शन 18 (ई): किसी वयस्क का अपहरण करना और उसे चोट पहुंचाना, ताकि उसे ट्रांसजेंडर के रूप में प्रस्तुत होने के लिए मजबूर किया जा सके
  • दंड: 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की कठोर सजा और जुर्माना (कम से कम दो लाख रुपए)
  • सेक्शन 140 (4): किसी व्यक्ति का अपहरण करना और उसे गंभीर रूप से चोट पहुंचाना
  • दंड: 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना

बाल पीड़ित: अपहरण करना, जबरदस्ती से गंभीर चोट या स्थायी या गंभीर क्षति पहुंचाना

  • सेक्शन 18 (एफ): किसी बच्चे का अपहरण करना और उसे चोट पहुंचाना, ताकि उसे ट्रांसजेंडर के रूप में प्रस्तुत होने के लिए मजबूर किया जा सके
  • दंड: आजीवन कारावास (अनिवार्य) और जुर्माना (कम से कम पांच लाख रुपए)
  • सेक्शन 139 (2): किसी बच्चे का अपहरण और उसे अपंग करना तथा उससे भीख मंगवाना
  • दंड: 20 वर्ष से आजीवन कारावास और जुर्माना

वयस्क पीड़ित: भीख मांगने, गुलामी या जबरन श्रम के माध्यम से शोषण के लिए दबाव डालना

  • सेक्शन 18 (जी): किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर के रूप में प्रस्तुत होने के लिए मजबूर करना और उसे बंधुआ मजदूर के रूप में काम पर रखना
  • दंड: पांच से 10 वर्ष तक की कठोर कारावास और जुर्माना (कम से कम एक लाख रुपए)
  • सेक्शन 143 (2): किसी शोषण हेतु मानव तस्करी (भीख मांगना, गुलामी, जबरन श्रम को भी "शोषण" माना जाता है)
  • दंड: सात से 10 वर्ष का कठोर कारावास और जुर्माना

बाल पीड़ित: भीख मांगने, गुलामी या जबरन श्रम के माध्यम से शोषण के लिए दबाव डालना

  • सेक्शन 18 (एच): किसी बच्चे को ट्रांसजेंडर के रूप में प्रस्तुत होने के लिए मजबूर करना और उसे बंधुआ मजदूर के रूप में काम पर रखना
  • दंड: 10 से 14 वर्ष तक का कठोर कारावास और जुर्माना (कम से कम तीन लाख रुपए)
  • सेक्शन 143 (4): शोषण हेतु मानव तस्करी
  • दंड: 10 वर्ष से आजीवन कारावास और जुर्माना

स्रोत: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) एक्ट, 2019; ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल, 2026; भारतीय न्याय संहिता, 2023 के संबंधित सेक्शंस; पीआरएस।

 

[1] “Transgender persons,” World Health Organisation, http://www.who.int/hiv/topics/transgender/en/

[2] State/UT wise Population of Others (TG) as per Census 2011, Department of Social Justice and Empowerment, Ministry of Social Justice and Empowerment, Accessed March 18, 2025, https://socialjustice.gov.in/common/77891.

[3] “Census 2027”, Ministry of Home Affairs, Press Information Bureau, March 11, 2026, https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2238272&reg=3&lang=2

[4] Report of the Expert Committee on the Issues relating to Transgender Persons, Ministry of Social Justice and Empowerment, January 27, 2014, http://socialjustice.nic.in/writereaddata/UploadFile/Binder2.pdf.

[5] National Legal Services Authority vs. Union of India [(2014) 5 SCC 438], https://api.sci.gov.in/jonew/judis/41411.pdf.

[6] The Rights of Transgender Persons Bill, 2014, Private Member Bill, August 24, 2015, https://cms.rajyasabha.nic.in/UploadedFiles/Debates/OfficialDebatesDatewise/Floor/235/F24.04.2015.pdf.

[8] “Report No. 43: The Transgender Persons (Protection of Rights) Bill, 2016”, Standing Committee on Social Justice and Empowerment, July 21, 2017, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/SCR-%20Transgender%20Bill.pdf.

[10] The Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Bill, 2026, https://prsindia.org/files/bills_acts/bills_parliament/2026/Transgender_Bill_2026_Text.pdf.

[12] National portal for Transgender Persons, Ministry of Social Justice and Empowerment, Accessed on March 20, 2026, https://transgender.dosje.gov.in/

[13] Unstarred Question No 621, Rajya Sabha, Ministry of Social Justice and Empowerment, March 11, 2026, https://sansad.in/getFile/annex/270/AU621_nMOXHs.pdf?source=pqars

[14] The Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023, https://www.mha.gov.in/sites/default/files/250883_english_01042024.pdf.

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