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आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में भारत की भूमिका और उपस्थिति

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • विदेश मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयरपर्सन: डॉ. शशि थरूर) ने 30 जुलाई, 2026 को ‘आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में भारत की भूमिका और उपस्थिति’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी ने ध्रुवीय क्षेत्रों में भारत की उपस्थिति और वैज्ञानिक अनुसंधान में हुई प्रगति की समीक्षा की। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव इस प्रकार हैं:

  • भारत की आर्कटिक कूटनीति: भारत, आर्कटिक परिषद का एक पर्यवेक्षक (ऑब्ज़र्वर) देश है। यह परिषद आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देने वाला एक अंतर-सरकारी मंच है। कमिटी ने पाया कि भारत की वर्तमान स्थिति 'पर्यवेक्षक' की है, इसलिए निम्नलिखित मामलों में उसकी भूमिका और कार्यक्षेत्र सीमित है: (i) निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी, (ii) आर्थिक योगदान, और (iii) सीधे तौर पर अनुसंधान करना। कमिटी ने सुझाव दिया कि जब भी परिषद की समीक्षा की जाए, सरकार को इस परिषद की पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

  • कमिटी ने गौर किया कि चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूएई जैसे अन्य एशियाई देशों के आर्कटिक देशों के साथ भारत की तुलना में ज़्यादा मज़बूत संबंध हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि भारत अन्य सदस्यों और पर्यवेक्षकों के साथ द्विपक्षीय संबंध और मज़बूत करे। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) भारत, जापान, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया के बीच एक चतुर्भुज समझौता किया जाए, और (ii) आर्कटिक के जनजातीय समूहों और स्थानीय लोगों के साथ संपर्क बढ़ाया जाए।

  • पोलर एंबेसेडर की नियुक्ति: कमिटी ने कहा कि आर्कटिक परिषद के सदस्यों और पर्यवेक्षकों, जैसे चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के पास ध्रुवीय मामलों से निपटने के लिए संस्थागत तंत्र मौजूद है। इनमें विशेष रूप से नियुक्त एंबेसडर (राजदूत) या एक अलग पोलर/आर्कटिक अफेयर्स डेस्क शामिल हो सकते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि ध्रुवीय कूटनीति को बेहतर बनाने के लिए भारत को भी एक पोलर एंबेसडर नियुक्त करना चाहिए।

  • ग्लोबल कॉमन्स का प्रबंधन: अभी आर्कटिक क्षेत्र पर आठ क्षेत्रीय देशों का संप्रभु नियंत्रण (अधिकार) है। अंटार्कटिका के विपरीत इसे 'ग्लोबल कॉमन्स' (वैश्विक साझा संपदा) नहीं माना जाता है। ग्लोबल कॉमन्स वे संसाधन होते हैं जो किसी भी एक देश के राजनीतिक नियंत्रण से बाहर होते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया है कि भारत आर्कटिक को "क्वासी-ग्लोबल कॉमन्स" (यानी पूरी तरह से नहीं, बल्कि काफी हद तक साझा संपदा मानना) के रूप में मान्यता दिलाने का प्रयास करे।

  • उत्तरी समुद्री मार्ग का विकास: कमिटी ने कहा कि ध्रुवीय बर्फ पिघलने के कारण आर्कटिक महासागर में जहाजों का आवागमन आसान हो गया है। भारत के लिए उत्तरी समुद्री मार्ग (एनएसआर) स्वेज़ नहर का एक किफायती विकल्प हो सकता है। यह जहाजों के समय को कम कर सकता है और समुद्री डकैती वाले खतरनाक इलाकों से बचने में मदद कर सकता है। भारत और रूस ने एनएसआर को विकसित करने और इस मार्ग से माल ढुलाई को 2030 तक बढ़ाकर 50 लाख टन करने के लिए एक संयुक्त कार्य समूह का गठन किया है। समिति ने सुझाव दिया कि यह कार्य समूह अपने व्यवहार्यता अध्ययन में तेज़ी लाए।

  • समुद्री संसाधनों का दोहन: कमिटी ने गौर किया कि भारत सरकार अब ऐसे नियम बना रही है जिससे भारतीयों को अंटार्कटिका के समुद्र से क्रिल (एक प्रकार का छोटा झींगा) पकड़ने की कानूनी मंजूरी मिल सके। कमिटी ने पाया कि दक्षिणी महासागर की खाद्य श्रृंखला का एक अनिवार्य हिस्सा माने जाने वाले क्रिल का घनत्व 1970 के दशक के बाद से 80% तक कम हो गया है। कमिटी ने यह भी गौर किया कि भारत ने दक्षिणी महासागर में सतत रूप से मछली पकड़ने को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया है। उसने सुझाव दिए कि भारत: (i) पर्यावरणीय जोखिम का मूल्यांकन करने के बाद क्रिल पकड़ने में शामिल हो, और (ii) पूर्वी अंटार्कटिका और वेडेल सागर में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों के निर्माण का प्रयास करे।

  • कमिटी ने पाया कि एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) और एयर कंडीशनर बनाने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिज आर्कटिक में उपलब्ध हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि खनिज संसाधनों की आपूर्ति को आर्कटिक देशों के साथ भारत की बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

  • अनुसंधान में रुकावट: कमिटी ने ध्रुवीय अनुसंधान में भारत के सामने आने वाली चुनौतियों का जिक्र किया, जैसे: (i) अधिकतर आर्कटिक क्षेत्र किसी न किसी देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार के अधीन होने के कारण अनुसंधान पर प्रतिबंध, (ii) आर्कटिक महासागर तक सीमित पहुंच, (iii) अनुसंधान केंद्रों तक पहुंचने में लॉजिस्टिक्स संबंधी चुनौतियां, (iv) अपर्याप्त बजट आवंटन, और (v) अपर्याप्त वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारी। कमिटी ने मौजूदा ध्रुवीय अनुसंधान योजना के परिव्यय में 30% की बढ़ोतरी करने और राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र में अतिरिक्त स्थायी पदों को सृजित करने का सुझाव दिया। खास तौर पर कमिटी ने गौर किया कि नॉर्वे सरकार ने स्वालबार्ड में अनुसंधान पर प्रतिबंध लगा दिए हैं, जहां भारत का हिमाद्री अनुसंधान स्टेशन स्थित है। उसने सुझाव दिए कि विदेश मंत्रालय को सीधे नॉर्वे सरकार के साथ बातचीत करनी चाहिए।

  • अनुसंधान के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर: कमिटी ने पाया कि भारत के पास अपना कोई 'आइस-क्लास' (बर्फ में चलने वाला) जहाज़ नहीं है और लॉजिस्टिक्स व अनुसंधान के लिए उसे महंगे किराए वाले विदेशी जहाज़ों पर निर्भर रहना पड़ता है। कमिटी ने बर्फ तोड़ने की क्षमता वाले एक खास ध्रुवीय अनुसंधान जहाज़ के निर्माण में तेज़ी लाने की सलाह दी। साथ ही कमिटी ने अंटार्कटिका में 'मैत्री-II' स्टेशन का काम जल्द पूरा करने का भी सुझाव दिया क्योंकि मौजूदा 'मैत्री' स्टेशन अपनी निर्धारित 10 वर्ष की जीवन अवधि को पार कर चुका है।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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