रिपोर्ट का सारांश
-
रसायन एवं उर्वरक से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री आज़ाद कीर्ति झा) ने 1 दिसंबर, 2025 को 'उर्वरकों के आयात को कम करने के उद्देश्य से उर्वरकों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता- इससे संबंधित बाधाओं की समीक्षा' विषय पर अपनी रिपोर्ट पेश की। पर्याप्त खाद्य उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए यूरिया, डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम (एनपीके) जैसे उर्वरकों का उपयोग किया जाता है ताकि घरेलू मांग को पूरा किया जा सके। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
-
घरेलू क्षमता बढ़ाना: कमिटी ने उर्वरकों की घरेलू खपत और उत्पादन के बीच अंतर पाया। उसने नई निवेश नीति के तहत घरेलू यूरिया उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक कार्यबल गठित करने का सुझाव दिया। साथ ही उसने यह सुझाव भी दिया कि नए संयंत्रों की स्थापना के लिए वित्तीय और कर प्रोत्साहन देकर फॉस्फेटिक और पोटैशियम (पीएंडके) उर्वरकों की उत्पादन क्षमता को भी बढ़ाया जाना चाहिए। कमिटी ने गौर किया कि भारत निर्माण विधि तकनीक (प्रोसेस टेक्नोलॉजी) की लाइसेंसिंग के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर है। उसने सुझाव दिया कि उर्वरक संयंत्रों की स्थापना और उनके रखरखाव के लिए स्वदेशी तकनीक का विकास किया जाए।
-
आयात निर्भरता को कम करना: कमिटी ने गौर किया यूरिया की कुल लागत का 90% हिस्सा प्राकृतिक गैस है जिसका अधिकांश भाग दीर्घकालिक समझौतों के माध्यम से आयात किया जाता है। केवल 26% प्राकृतिक गैस ही घरेलू स्तर पर प्राप्त की जाती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि गैस खरीद तंत्र में संशोधन किया जाए ताकि प्रतिस्पर्धी कीमतों पर प्राकृतिक गैस की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। इससे सरकार पर सबसिडी का बोझ भी कम होगा। कमिटी ने सुझाव दिया कि सरकार आयात निर्भरता और उत्पादन लागत को कम करने के लिए प्राकृतिक गैस निकासी परियोजनाओं में तेजी लाए।
-
पीएंडके उर्वरकों के उत्पादन को बढ़ाना: भारत अपनी जरूरत का 95% फॉस्फेट और 100% पोटाश दूसरे देशों से खरीदता है। कमिटी ने पाया कि कच्चे माल की वैश्विक कीमतों में वृद्धि, विनिमय दर में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान से उर्वरकों की घरेलू लागत प्रभावित होती है। कमिटी ने घरेलू स्तर पर फॉस्फेट और पोटेशियम उर्वरकों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए शुरू की गई परियोजनाओं को समय पर पूरा करने का सुझाव दिया। साथ ही उसने कच्चे माल से समृद्ध देशों के साथ दीर्घकालिक समझौतों और संयुक्त उद्यम परियोजनाओं को बढ़ावा देने का भी सुझाव दिया।
-
पुराने यूरिया संयंत्रों का अपग्रेडेशन: कमिटी ने पाया कि चालू 33 यूरिया संयंत्रों में से 27 संयंत्र 25 वर्ष से अधिक पुराने हैं और 7 संयंत्र 50 वर्ष से अधिक पुराने हैं। कमिटी ने इस बात पर जोर दिया कि अगले पांच वर्षों में इस क्षेत्र को नई तकनीक की ओर बढ़ना होगा। कमिटी ने इन संयंत्रों के अपग्रेडेशन, आधुनिकीकरण और पुनरुद्धार के लिए एक विशेष कार्यबल गठित करने का सुझाव दिया। कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि सरकार आयात की आवश्यकता को कम करने के लिए नई ब्राउन-फील्ड (मौजूदा जगहों पर विस्तार) और ग्रीन-फील्ड (बिल्कुल नए सिरे से) उर्वरक परियोजनाओं को लागू करे।
-
उर्वरक बिक्री के दौरान अनियमितताओं पर नियंत्रण: कमिटी ने उर्वरकों की कालाबाजारी और हेराफेरी को एक चिंता का विषय बताया क्योंकि सबसिडी देने में सरकार पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। इस समस्या के समाधान के लिए कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) कालाबाजारी रोकने के लिए सख्त नीतियां बनाना, (ii) उर्वरक की गुणवत्ता की जांच के लिए प्रयोगशालाओं का एक नेटवर्क स्थापित करना, और (iii) शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना।
-
यूरिया सबसिडी योजना: यूरिया सबसिडी योजना केंद्रीय क्षेत्र की योजना है जो (i) स्वदेशी संयंत्रों को यूरिया सबसिडी, (ii) यूरिया के आयात पर सबसिडी और (iii) देश भर में यूरिया के परिवहन के लिए माल ढुलाई सबसिडी प्रदान करती है। कमिटी ने पाया कि इस योजना से फसलों की पैदावार बढ़ रही है और किसानों का खर्च कम हो रहा है। कमिटी ने सुझाव दिया कि उर्वरक विभाग 31 मार्च, 2025 के बाद यूरिया सबसिडी योजना को आगे बढ़ाने पर विचार करे।
-
नैनो उर्वरकों का उत्पादन और संवर्धन: कमिटी ने पाया कि नैनो उर्वरक दीर्घकाल में पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में वास्तव में सस्ते होते हैं। इसके निम्नलिखित कारण हैं: (i) उत्पादन के लिए कच्चे माल की कम आवश्यकता, (ii) पोषक तत्वों को सोखने की उच्च क्षमता, और (iii) कम उर्वरक के उपयोग से फसलों की अधिक पैदावार। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) नैनो उर्वरकों का प्रचार करना और उत्पादन बढ़ाना तथा (ii) नैनो उर्वरकों के छिड़काव के लिए ड्रोन हेतु उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना शुरू करना।
-
उर्वरकों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना: कमिटी ने पाया कि रासायनिक उर्वरकों (मुख्यतः यूरिया) के असंतुलित उपयोग, सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपेक्षा और जैविक पदार्थों की कम मात्रा के कारण मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हो रही है। कमिटी ने सुझाव दिया कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग, फसल चक्र और खेती के प्राकृतिक तरीकों को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रशिक्षित किया जाए।
डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

