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पीडीएफ

उर्वरक (आवाजाही नियंत्रण) आदेश, 1973 के कार्यान्वयन का मूल्यांकन

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • रसायन और उर्वरकों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री आज़ाद कीर्ति झा) ने 6 अगस्त, 2026 को ‘उर्वरक (आवाजाही नियंत्रण) आदेश, 1973 के कार्यान्वयन का मूल्यांकन' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। उर्वरक (आवाजाही नियंत्रण) आदेश, 1973 (एफसीएमओ) को अनिवार्य वस्तु एक्ट, 1955 के तहत जारी किया गया था। इसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं: (i) उर्वरकों को उनके निर्धारित गंतव्य राज्यों से दूसरी तरफ मोड़े जाने (कालाबाजारी/तस्करी) को रोकना, (ii) अनाधिकृत अंतर-राज्यीय आवाजाही पर रोक लगाना, और (iii) यह सुनिश्चित करना कि उर्वरकों का वितरण केंद्र सरकार की आवंटन नीति और मौसमी आपूर्ति श्रृंखलाओं के अनुरूप बना रहे। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • एफसीएमओ की समीक्षा: कमिटी ने यह गौर किया कि यह आदेश 1973 में लागू किया गया था, जो वर्तमान डिजिटल इकोसिस्टम से पहले का है। उसने कहा कि उर्वरकों के रेगुलेशन और प्रवर्तन में उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए एफसीएमओ को अपडेट करने की जरूरत है। कमिटी ने गौर किया कि कई राज्यों में लगाए गए मौद्रिक जुर्माने, कालाबाजारी से होने वाले स्पष्ट आर्थिक लाभ की तुलना में बहुत ही कम थे। कुछ मामलों में तो जुर्माना लगाया ही नहीं गया था। कमिटी ने उर्वरक विभाग को एफसीएमओ, 1973 की व्यापक और समयबद्ध समीक्षा करने का सुझाव दिया ताकि: (i) इसे वर्तमान डिजिटल प्रवर्तन संरचना के अनुरूप ढाला जा सके, (ii) इसके जुर्माने और प्रवर्तन प्रावधानों को मजबूत किया जा सके, (iii) यह सुनिश्चित किया जा सके कि जुर्माना उतना ही बड़ा हो, जितनी बड़ी मात्रा में उर्वरक की कालाबाजारी या हेराफेरी की गई है, और (iv) केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारियों की स्पष्ट रूप से निशानदेही की जा सके।

  • प्रवर्तन का मानकीकरण: कमिटी ने यह गौर किया कि एफसीएमओ के तहत कानून को लागू करने के लिए कोई केंद्रीय मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) निर्धारित नहीं है, जिससे विभिन्न राज्यों के बीच कार्रवाई में काफी असमानता आती है। उसने विभाग को एक ऐसा एसओपी निर्धारित करने का सुझाव दिया जो निम्नलिखित कार्यों के लिए एक समान प्रक्रिया तय करे: (i) औचक निरीक्षण, (ii) आवाजाही की चेकिंग, (iii) एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (आईएफएमएस) के माध्यम से डिजिटल सत्यापन, (iv) अवैध सामग्री को जब्त करना, और (v) मामले दर्ज करना तथा कानूनी कार्रवाई शुरू करना।

  • रिक्तियां: कमिटी ने यह गौर किया कि उर्वरक की अत्यधिक खपत वाले कई राज्यों में प्रवर्तन अधिकारियों के पद बड़े पैमाने पर खाली पड़े हैं। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में फर्टिलाइजर इंस्पेक्टर के 64% पद खाली थे। कमिटी ने कहा कि विभाग ने इस कमी को दूर करने के लिए कोई ठोस या ध्यान देने योग्य प्रयास नहीं किया है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) जिन राज्यों में 30% से अधिक पद खाली हैं, वहां एक समयबद्ध लक्ष्य के तहत उर्वरक निरीक्षणालय के इन महत्वपूर्ण खाली पदों को तुरंत भरा जाए, और (ii) राज्यों को हर साल मिलने वाले उर्वरक के कोटे की समीक्षा इस आधार पर की जाए कि उनके पास कालाबाजारी रोकने के लिए कितने अधिकारी और मुस्तैदी है।

  • प्रवर्तन में कमियां: कमिटी ने यह गौर किया कि औचक निरीक्षणों, नियमों के उल्लंघन और दर्ज की गई एफआईआर की संख्या की तुलना में अपराधियों को सजा मिलने की दर बहुत कम है। उसने कहा कि रिपोर्ट्स होने के बावजूद, बार-बार अपराध करने वालों की पहचान करने की कोई व्यवस्था नहीं थी। कमिटी ने यह भी कहा कि आपराधिक अदालती कार्यवाही वर्षों तक लंबित रही। कमिटी ने विभाग को निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) बार-बार नियम तोड़ने वालों की एक सूची तैयार कर उसे आईएफएमएस पोर्टल से जोड़ा जाए, और (ii) इस आदेश के तहत मामलों के त्वरित निपटारे को सुनिश्चित करने वाले उपायों की जांच की जाए। कमिटी ने नेपाल और म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों में उर्वरकों की सीमा पार तस्करी की रिपोर्ट्स पर भी गौर किया जिससे सरकारी सबसिडी का भारी नुकसान होता है। कमिटी ने पड़ोसी देशों के साथ औपचारिक सूचना साझाकरण और तालमेल के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित करने का सुझाव दिया।

  • आकस्मिक योजना: कमिटी ने यह गौर किया कि उर्वरकों के लिए इस समय कोई औपचारिक बफर स्टॉक नीति नहीं अपनाई जा रही है। उसने विभाग को आपूर्ति में आने वाली रुकावटों से निपटने के लिए एक उर्वरक रणनीतिक रिजर्व और आकस्मिक प्रोटोकॉल तैयार करने का सुझाव दिया।

  • उर्वरकों का दूसरा उपयोग: कमिटी ने यह गौर किया कि नीम-लेपित यूरिया को बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग के लिए इस्तेमाल जा रहा था। उसने कहा कि औद्योगिक उपयोग को रोकने के लिए यूरिया पर नीम की कोटिंग करने का उपाय पूरी तरह से पर्याप्त सुरक्षा उपाय साबित नहीं हुआ है। कमिटी ने औद्योगिक उपयोग को रोकने के लिए रियल-टाइम इनपुट आधारित एक निगरानी तंत्र स्थापित करने का सुझाव दिया। उसने उन जिलों में, जहां यूरिया का उपयोग करने वाले उद्योग स्थित हैं, यूरिया के असामान्य उठाव की पहचान करने के लिए आईएफएमएस डेटा के समय-समय पर विश्लेषण का सुझाव दिया। कमिटी ने वास्तविक औद्योगिक खपत और अवैध उपयोग के बीच अंतर करने के लिए औद्योगिक उपयोगकर्ताओं का पंजीकरण अनिवार्य करने का भी सुझाव दिया जिसमें उनकी उत्पादन आवश्यकताओं के आधार पर यूरिया की मात्रा की सीमा सत्यापित की गई हो।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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