स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
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ग्रामीण विकास से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री सप्तिगिरी शंकर उलाका) ने 11 अगस्त, 2026 को ‘डिजिटल इंडिया भूमि रिकॉर्ड्स आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) का कार्यान्वयन’ पर अपनी रिपोर्ट पेश की। भूमि के लिखित और जगह से जुड़े रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने, ज़मीन के रजिस्ट्रेशन और सर्वे सिस्टम को आधुनिक बनाने और आधुनिक रिकॉर्ड रूम बनाने के लिए 2008 में राष्ट्रीय भूमि रिकॉर्ड्स आधुनिकीकरण कार्यक्रम शुरू किया गया था। 2016 में, इसे फिर से तैयार किया गया और ज़मीन के रिकॉर्ड और रजिस्ट्रेशन सिस्टम के पहले से चल रहे कंप्यूटराइजेशन के साथ मिलाकर 'डिजिटल इंडिया भूमि रिकॉर्ड्स आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) बनाया गया। इसे 2025-26 तक जारी रखने की मंज़ूरी दी गई है। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
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डीआईएलआरएमपी के तहत प्रगति: कमिटी ने कहा कि जनवरी 2026 तक खतौनियों (रिकॉर्ड ऑफ राइट्स) का 99.8% हिस्सा कंप्यूटरीकृत हो चुका है, 97.4% कैडस्ट्रल मैप्स (ज़मीन के नक्शे) डिजिटलीकृत हो चुके हैं, 95.7% सब-रजिस्ट्रार ऑफिस कंप्यूटरीकृत हो चुके हैं, और 88.6% रजिस्ट्रेशन कार्यालय राजस्व कार्यालय के साथ एकीकृत हो चुके हैं। कमिटी ने यह भी पाया कि कई राज्यों में कुछ अहम काम अभी भी बाकी हैं, जैसे कि मॉडर्न रिकॉर्ड रूम बनाना, सर्वे और री-सर्वे करना, और लिखित ज़मीन के रिकॉर्ड को डिजिटलीकृत (स्पेशियल) मैप्स के साथ जोड़ना। कमिटी ने इन गतिविधियों को तय समय-सीमा के भीतर पूरा करने और आने वाले वर्षों के लिए डीआईएलआरएमपी की मंज़ूरी और उसे लागू करने की प्रक्रिया में तेज़ी लाने का सुझाव दिया।
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ऑटो-ट्रिगर म्यूटेशन: म्यूटेशन का मतलब ज़मीन की बिक्री, विरासत, बंटवारे या अदालती आदेश के बाद भूमि रिकॉर्ड को अपडेट करने की प्रक्रिया से है। कमिटी ने पाया कि पारंपरिक रूप से रजिस्ट्री (रजिस्ट्रेशन) और दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) दो अलग-अलग प्रक्रियाएं रही हैं, जिसके कारण खरीदारों को प्रत्येक काम के लिए राजस्व अधिकारियों के पास अलग से जाना पड़ता है। इससे भूमि रिकॉर्ड में देरी और विसंगतियां पैदा होती हैं। वर्तमान में 'ऑटो-ट्रिगर म्यूटेशन' व्यवस्था 17 राज्यों में लागू की जा चुकी है, जहां रजिस्ट्री होते ही कंप्यूटर से अपने आप दाखिल-खारिज की अर्जी जनरेट हो जाती है। कमिटी ने इस ऑटो-ट्रिगर ऑनलाइन म्यूटेशन व्यवस्था को पूरे देश में लागू करने का सुझाव दिया है। साथ ही उसने म्यूटेशन, रिकॉर्ड सुधार और अन्य राजस्व मामलों के निपटारे के लिए एक समय-सीमा तय करने की भी सलाह दी है।
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आधुनिक रिकॉर्ड रूम्स: आधुनिक रिकॉर्ड रूम तहसील/तालुका स्तर पर ज़मीन के रिकॉर्ड को व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखने, उनकी इंडेक्सिंग, प्रबंधन और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें खोजने की सुविधा देते हैं। कमिटी ने पाया कि हालांकि डिजिटल एक्सेस से राजस्व कार्यालय जाने की ज़रूरत कम हो जाती है, फिर भी मालिकाना हक़ की पुष्टि, ज़मीन के रिकॉर्ड को अपडेट करने और विवादों को सुलझाने के लिए फिजिकल रिकॉर्ड एक महत्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं। कमिटी ने गौर किया कि आधुनिक रिकॉर्ड रूम बनाने की दिशा में प्रगति तुलनात्मक रूप से कम (72.5%) रही है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) आधुनिक रिकॉर्ड रूम का काम पूरा करना, (ii) पुराने ज़मीन के रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण और संरक्षण, और (iii) फिजिकल और डिजिटल रिकॉर्ड के संरक्षण, उन्हें खोजने और उनके रखरखाव के लिए स्टैंडर्ड और प्रोटोकॉल विकसित करना। कमिटी ने सभी राज्यों में डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित खतौनी को कानूनी मान्यता दिलाने का भी सुझाव दिया।
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छठी अनुसूची वाले क्षेत्र: छठी अनुसूची वाले क्षेत्र असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के स्वायत्त आदिवासी क्षेत्र हैं। कमिटी ने कहा कि सामुदायिक भू स्वामित्व, परंपरागत पद्धतियां और स्वायत्त जिला परिषद (एडीसीज़) के प्रशासन के कारण इन क्षेत्रों में डिजिटलीकरण चुनौतीपूर्ण है। कमिटी ने इन क्षेत्रों के लिए विशेष कार्यान्वयन रणनीति का सुझाव दिया जिसे एडीसीज़, राज्य सरकारों और परंपरागत संस्थानों की सलाह से तैयार किया जाए।
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आधार और मोबाइल नंबर लिंकेज: कमिटी ने गौर किया कि खतौनी के साथ सहमति आधारित आधार लिंकेज और मोबाइल नंबर लिकेंज से पहचान की चोरी, अनाधिकृत भूमि हस्तांतरण और धोखाधड़ी से बचने में मदद मिल सकती है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) सभी राज्यों द्वारा सहमति आधारित आधार लिंकेज और मोबाइल नंबर लिंकेज का काम पूरा किया जाए, और (ii) जब लेनदेन या दाखिल खारिज का अनुरोध जमा किया जाता है तो पंजीकृत भूस्वामियों को ऑटोमैटिक एसएमएस और इलेक्ट्रॉनिक अलर्ट मिल जाए।
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नक्शा कार्यक्रम: नेशनल जियोस्पेशियल नॉलेज-बेस्ड लैंड सर्वे ऑफ अर्बन हैबिटेशंस (नक्शा) एक पायलट प्रॉजेक्ट है जोकि शहरी क्षेत्रों में डिजिटल और जियो-रेफ्रेंस्ड भूमि रिकॉर्ड्स बनाता है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) नक्शा पायलट का मूल्यांकन और उसे दूसरे शहरी स्थानीय निकायों तक विस्तारित करने की चरणबद्ध रणनीति, और (ii) कार्यान्वयन के लिए राज्यों को पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहयोग।
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