india-map

अपने सांसद को खोजें

Switch to English
  • सांसद और विधायक
    संसद राज्य 2024 चुनाव
  • विधान मंडल
    संसद
    प्राइमर वाइटल स्टैट्स
    राज्यों
    विधानमंडल ट्रैक वाइटल स्टैट्स
    चर्चा पत्र
  • बिल
    संसद राज्य स्टेट लेजिस्लेटिव ब्रीफ
  • बजट
    संसद राज्य चर्चा पत्र
  • नीति
    चर्चा पत्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति मंथली पॉलिसी रिव्यू कमिटी की रिपोर्ट राष्ट्रपति का अभिभाषण वाइटल स्टैट्स COVID-19
  • करियर

अपने सांसद को खोजें

संसद राज्य 2024 चुनाव
प्राइमर वाइटल स्टैट्स
विधानमंडल ट्रैक वाइटल स्टैट्स
चर्चा पत्र
संसद राज्य स्टेट लेजिस्लेटिव ब्रीफ
संसद राज्य चर्चा पत्र
चर्चा पत्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति मंथली पॉलिसी रिव्यू कमिटी कीरिपोर्ट राष्ट्रपति का अभिभाषण वाइटल स्टैट्स COVID-19
  • नीति
  • कमिटी की रिपोर्ट
  • डिजिटल भारत निधि के तहत योजनाओं/परियोजनाओं की समीक्षा

नीति

  • चर्चा पत्र
  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति
  • कमिटी की रिपोर्ट
  • राष्ट्रपति का अभिभाषण
  • मंथली पॉलिसी रिव्यू
  • वाइटल स्टैट्स
पीडीएफ

डिजिटल भारत निधि के तहत योजनाओं/परियोजनाओं की समीक्षा

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • संचार और सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयरपर्सन: डॉ. निशिकांत दुबे) ने 6 अगस्त, 2026 को 'सार्वजनिक और निजी क्षेत्र द्वारा लागू डिजिटल भारत निधि के तहत योजनाओं/परियोजनाओं के प्रदर्शन की समीक्षा' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में दूरसंचार सेवाओं को वित्तीय सहयोग देने के उद्देश्य से 2002 में यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड बनाया गया था। 2024 में इसका नाम बदलकर डिजिटल भारत निधि (डीबीएन) कर दिया गया। डीबीएन का उद्देश्य उन सभी इलाकों में दूरसंचार सेवाओं को सहयोग देना है जहां ये सेवाएं ठीक से नहीं पहुंच पाई हैं। इसका उद्देश्य दूरसंचार तकनीक में अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) को मदद देना भी है। डीबीएन से वित्तपोषित मुख्य योजनाओं में भारतनेट और सीमांत व दूर-दराज के इलाकों में 4G मोबाइल परियोजनाएं शामिल हैं। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • भारतनेट के तहत सीमित प्रगति और उपयोग: भारतनेट कार्यक्रम का उद्देश्य देश भर की सभी ग्राम पंचायतों और गांवों को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी प्रदान करना है। कमिटी ने कहा कि फरवरी 2026 तक, सिर्फ 30% ग्राम पंचायतों में ही भारतनेट कनेक्शन चालू था। इन ग्राम पंचायतों में से 77% में इस्तेमाल के लिए ब्रॉडबैंड कनेक्शन थे। कमिटी ने टेंडर फाइनल करने में देरी, कार्यान्वयन एजेंसियों के साथ विवाद, ऐसी एजेंसियों में क्षमता की कमी और ज़मीन से जुड़ी मंज़ूरी मिलने में देरी जैसी समस्याओं पर गौर किया। इस संबंध में उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) राज्य-वार प्रदर्शन ऑडिट, (ii) घरों में कनेक्शन बढ़ाकर और नेटवर्क की खाली पड़ी क्षमता को किराए पर देकर इसका इस्तेमाल बढ़ाना, और (iii) समय पर टेंडरिंग और कॉन्ट्रैक्ट फाइनल करना।

  • सुरक्षा के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में कनेक्टिविटी परियोजनाओं की चुनौतियां: कमिटी ने गौर किया कि (फरवरी 2026 तक) वामपंथी अतिवाद प्रभावित क्षेत्रों में प्रस्तावित 4जी मोबाइल टावरों में से लगभग 93% और सीमा चौकियों पर स्थित लगभग 42% टावर चालू कर दिए गए थे। कमिटी ने पाया कि इन क्षेत्रों में टावर लगाने में कई बड़ी मुश्किलें आ रही हैं जैसे कठिन भौगोलिक क्षेत्र, सुरक्षा संबंधी चुनौतियां, वन विभाग से मंजूरी मिलने में देरी और लॉजिस्टिक्स पहुंचाने में दिक्कतें। कमिटी ने कार्यान्वयन एजेंसियों को लॉजिस्टिकल और सुरक्षा सहायता देने, और मंज़ूरी की प्रक्रिया तेज़ करने के लिए मंत्रालयों और एजेंसियों के बीच तालमेल करने का सुझाव दिया।

  • दूर-दराज़ और बिना कवरेज वाले इलाकों में परियोजनाओं के तहत सीमित कवरेज और सेवा की गुणवत्ता: डीबीएन-फंडेड 4जी सैचुरेशन प्रोजेक्ट और आकांक्षी जिला योजना का उद्देश्य उन गांवों तक 4जी कनेक्टिविटी पहुंचाना है जहां अभी तक यह सुविधा नहीं है। कमिटी ने कहा कि फरवरी 2026 तक 4जी सैचुरेशन प्रोजेक्ट के तहत प्रस्तावित टावरों में से लगभग 61% टावर चालू हो चुके हैं। आकांक्षी जिला योजना के तहत प्रस्तावित टावरों में से लगभग 81% टावर चालू हो चुके हैं। इसके अलावा, कमिटी ने पाया कि मोबाइल कनेक्टिविटी परियोजना के थर्ड-पार्टी ऑडिट में कवरेज की कमी, कमज़ोर सिग्नल और एक ही तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर दोबारा बनाने जैसी समस्याएं सामने आईं। कमिटी ने ज़मीनी स्तर पर काम को बेहतर बनाने और ऑडिट में मिली कमियों पर कार्रवाई करने का सुझाव दिया।

  • पूर्वोत्तर इलाकों में टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर लगाने में चुनौतियां: कमिटी ने गौर किया कि पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए व्यापक दूरसंचार विकास योजना के तहत योजनाबद्ध (2जी) मोबाइल टावरों में से 68% टावर लगाए जा चुके थे (फरवरी 2026 तक)। कमिटी ने कुछ चुनौतियों पर गौर किया, जैसे मुश्किल इलाके, उग्रवाद की समस्याएं, सेवा की खराब गुणवत्ता, और बार-बार सड़क चौड़ीकरण जिसके कारण ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी) को दूसरी जगह लगाना पड़ता है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) मुश्किल इलाकों में टेलीकॉम ऑपरेटरों के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर साझा करना, और (ii) इन इलाकों में नेटवर्क क्वालिटी का मूल्यांकन करने के लिए सेवा गुणवत्ता के तय मानकों के साथ परिणाम-आधारित ढांचा बनाना।

  • पीएसयूज़ की भूमिका: कमिटी ने पाया कि डीबीएन द्वारा वित्तपोषित अधिकांश योजनाओं में बीएसएनएल और आईटीआई जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को परियोजना प्रबंधन और कार्यान्वयन से संबंधित भूमिकाओं में शामिल किया गया है। कमिटी ने यह भी पाया कि योजनाओं के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का प्रदर्शन और क्रियान्वयन भिन्न-भिन्न है। कमिटी ने परियोजना-पूर्व मूल्यांकन और संविदात्मक दायित्वों को सुदृढ़ करने तथा शामिल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन शुरू करने का सुझाव दिया। कमिटी ने अपनी सहायक कंपनी पॉवरटेल के माध्यम से दूरसंचार टेलीकॉम सेवाओं का विस्तार करने और ओएफसी बिछाकर भारतनेट को सहयोग देने में पॉवर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की भूमिका को भी रेखांकित किया। कमिटी ने सलाह दी है कि दूरसंचार और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच बेहतर और अधिक तालमेल स्थापित किया जाए।

  • आरएंडडी को इस्तेमाल में लाए जा सकने वाली टेक्नोलॉजी में बदलना: डीबीएन के तहत टेलीकॉम टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (टीटीडीएफ) योजना का उद्देश्य दूरसंचार तकनीक में आरएंडडी को बढ़ावा देना है। कमिटी ने कहा कि जिस रिसर्च को सरकारी फंड मिल रहा है, उसे ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में उपयोग योग्य समाधानों में बदलना बेहद जरूरी है। कमिटी ने जमीनी स्तर पर तुरंत इस्तेमाल के लिए तैयार तकनीक के विकास को प्राथमिकता देने, ग्रामीण इलाकों में पायलट परियोजनाओं का दायरा बढ़ाने और टीटीडीएफ -फंडेड इनोवेशन और भारतनेट के बीच मज़बूत संबंध बनाने का सुझाव दिया।  

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

हमें फॉलो करें

Copyright © 2026    prsindia.org    All Rights Reserved.