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पीडीएफ

देश में तिलहन और दलहन का उत्पादन एवं उपलब्धता

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • कृषि, पशुपालन और खाद्य प्रसंस्करण से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री चरणजीत सिंह चन्नी) ने 27 मार्च, 2026 को 'देश में तिलहन और दलहन का उत्पादन एवं उपलब्धता' विषय पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी के प्रमुख निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • आयात पर निर्भरता को कम करना: 2023-24 में भारत ने खाद्य तेल की अपनी जरूरत का 56% (15.7 मिलियन मीट्रिक टन) और दलहन का 2-3 मिलियन मीट्रिक टन आयात किया। कमिटी ने गौर किया कि आयात पर निर्भरता ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाला है और इससे किसानों को वैश्विक कीमतों में होने वाले बदलावों का नुकसान उठाना पड़ता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि पीएम-आशा के तहत तिलहन और दलहन की सरकारी खरीद को कुल पैदावार के 25% से बढ़ाकर 100% कर दिया जाए। कमिटी ने यह भी कहा कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में ताड़ के तेल (पाम ऑयल) की कीमत 800 USD प्रति टन से नीचे गिरती है तो उसके आयात पर 20% की सेफ गार्ड ड्यूटी (यह एक ऐसा टैक्स है जो बाहर से आने वाले सस्ते सामान पर लगाया जाता है, ताकि देश के किसानों और व्यापारियों को नुकसान न हो) या सरकार द्वारा तय कोई अन्य रेट लगाया जाना चाहिए।

  • नए सीड्स (बीज) बिल की तत्काल जरूरत: कमिटी ने गौर किया कि आधुनिक तिलहन और दलहन क्षेत्र की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सीड्स एक्ट, 1966 की व्यापक समीक्षा जरूरी है। कमिटी ने यह भी पाया कि तिलहन और दलहन से संबंधित कानून के कई प्रावधान पुराने हो गए हैं। कमिटी ने एक नया सीड्स बिल लाने का सुझाव दिया ताकि किसानों को समय पर अच्छी क्वालिटी के बीज मिल सकें, बीजों का सर्टिफिकेशन अनिवार्य हो और बीजों के उत्पादन एवं उनके गुणवत्ता नियंत्रण के मानकों में सुधार किया जा सके।

  • बीजों के लिए अधिकतम मूल्य सीमा: कमिटी ने देश में बीजों की कीमतों की एक अधिकतम सीमा तय करने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग या रेगुलेटरी बॉडी बनाने का सुझाव दिया। कमिटी ने सुझाव दिया कि बीजों की सही लागत के आधार पर कीमतें तय करने के लिए एक परामर्शपूर्ण और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। इस आयोग में राज्य सरकारों, बीज उद्योग से जुड़े संघों और किसानों के प्रतिनिधि भी शामिल होने चाहिए।

  • बीज तकनीक: कमिटी ने गौर किया अन्य देशों की तुलना में भारत में तिलहन और दलहन की पैदावार कम है। इसका कारण अच्छे बीजों का कम इस्तेमाल और कई राज्यों में कम ‘बीज प्रतिस्थापन दर’ (एसआरआर) है। एसआरआर यह बताता है कि कुल खेती में से कितने हिस्से पर पुराने बीजों के बजाय सरकारी प्रमाणित बीजों का इस्तेमाल हुआ है। कमिटी ने सुझाव दिया कि जैव-तकनीक में निवेश करके, ऐसे बीज बनाए जाएं जो जलवायु परिवर्तन को झेल सकें, ज्यादा पैदावार दें और जिनमें कीड़े न लगें। इसके अलावा 2030 तक हर जिले में कम से कम एक सीड हब बनाने का सुझाव दिया गया है ताकि शत प्रतिशत एसआरआर का लक्ष्य पूरा किया जा सके। साथ ही किसानों को ब्रीडर बीज खरीदने के लिए पूरी सबसिडी देने का सुझाव भी दिया गया है।

  • सिंचाई की व्यवस्था को बेहतर बनाना: कमिटी ने गौर किया कि भारत में लगभग 70% तिलहन और 75% दलहन की खेती पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है। इस जोखिम को कम करने के लिए कमिटी ने निम्नलिखित उपायों का सुझाव दिया: (i) अगले पांच वर्षों में ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना को उन सभी इलाकों में लागू करना, जहां बारिश के भरोसे दलहन और तिलहन उगाए जाते हैं, (ii) छोटे और सीमांत किसानों के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई सिस्टम पर सबसिडी बढ़ाना, (iii) किसानों को सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों के बारे में हर साल ट्रेनिंग देना, और (iv) वर्तमान योजनाओं के तहत जिलों में सॉइल मॉइस्चर सेंसर (मिट्टी की नमी मापने वाली मशीन) और मौसम के आधार पर सिंचाई का शेड्यूल तय करने के प्रयोग शुरू करना।

  • जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) बीजों और खाद्य पदार्थों के आयात पर रोक: कमिटी ने देश में जीएम फूड के अवैध आयात और बिक्री, और मानव स्वास्थ्य पर उसके बुरे असर पर गौर किया। इसे रोकने के लिए कमिटी ने कानूनों को सख्ती से लागू करने, बंदरगाहों पर लैब की सुविधाओं को आधुनिक बनाने, निगरानी बढ़ाने और खाद्य पदार्थों पर अनिवार्य लेबलिंग का सुझाव दिया ताकि उपभोक्ताओं को पता चल सके कि खाद्य पदार्थ में जीएम वस्तुएं शामिल हैं और वे सोच-समझकर फैसला कर सकें।  

  • बीजों का वितरण: कमिटी ने गौर किया कि SATHI (सीड ऑथेंटिकेशन, ट्रेसेबिलिटी एंड होलिस्टिक इनवेंटरी) पोर्टल देश के लिए एक नेशनल सीड ग्रिड बन सकता है। SATHI एक केंद्रीय पोर्टल है जो बीजों की पूरी सप्लाई चेन (उत्पादन से बिक्री तक) को ऑटोमैटिक तरीके से मैनेज करता है। देश के 25 राज्यों ने बीजों की अपनी सप्लाई चेन को इस प्लेटफॉर्म पर पंजीकृत कर लिया है। कमिटी ने बाकी बचे राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और सभी रेगुलेटरी संस्थाओं को भी इस पर जोड़ने का सुझाव दिया। साथ ही बीज पंजीकरण के लिए ‘एक राष्ट्र एक लाइसेंस’ मॉडल और बीजों की डिजिटल ट्रैकिंग की व्यवस्था को अपनाने का सुझाव दिया। इस प्रणाली को देश भर में बेहतर तरीके से लागू करने के लिए कमिटी ने 2030 तक हर साल प्रति जिला कम से कम 5,000 कृषि प्रसार कार्यकर्ताओं (एक्सटेंशन वर्कर्स) को ट्रेनिंग देने का सुझाव दिया।     

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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