स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
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सार्वजनिक उपक्रम से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री बैजयंत पांडा) ने 6 अगस्त, 2026 को ‘राष्ट्रीय हाइड्रोइलेक्ट्रिक ऊर्जा निगम लिमिटेड (एनएचपीसी)’ पर अपनी रिपोर्ट पेश की। एनएचपीसी सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी है जो हाइड्रोपावर परियोजनाओं को विकसित और संचालित करती है। कमिटी ने एनएचपीसी के कामकाज और इस क्षेत्र पर असर डालने वाले मुद्दों की समीक्षा की। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव इस प्रकार हैं:
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परियोजनाओं की आर्थिक लाभप्रदता में सुधार: कमिटी ने कहा कि अत्यधिक पूंजीगत लागत, निर्माण स्थलों पर पावर ग्रिड की गैरमौजूदगी और राज्य सरकारों द्वारा मुफ्त बिजली की मांग जैसे कारक हाइड्रोपावर परियोजनाओं की आर्थिक लाभप्रदता (कमर्शियल वायबिलिटी) को नुकसान पहुंचाते हैं। राज्य सरकारें जल उपकर भी लगाती हैं, जबकि इन परियोजनाओं में पानी का दोबारा उपयोग हो सकता है (यानी पानी बर्बाद नहीं होता) और इस तरह के कर लगाना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। कमिटी ने आगे यह भी कहा कि समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद संशोधनों के रूप में मुफ्त बिजली और जल उपकर जैसी नई शर्तें जोड़ दी गईं। दूसरी तरफ विद्युत मंत्रालय का कहना है कि जब तक लागत पर सख्त नियंत्रण नहीं रखा जाता, तब तक नई हाइड्रोपावर परियोजनाओं की लागत लगभग सात से आठ रुपए प्रति यूनिट हो जाती है। इससे बिजली खरीद समझौतों को अंतिम रूप देना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) नई हाइड्रोपावर परियोजनाओं के लिए एक व्यवस्थित वायबिलिटी गैप फंडिंग ढांचा तैयार किया जाए, (ii) मुख्य निर्माण कार्य शुरू होने से पहले पावर ग्रिड की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, और (iii) एक मानक मॉडल कार्यान्वयन समझौता तैयार किया जाए जिसमें सुव्यवस्थित विवाद समाधान खंड, कानून में बदलाव से सुरक्षा और एक व्यावहारिक एवं पारस्परिक रूप से सहमत जल उपकर ढांचा शामिल हो।
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सहमति की सीमा को अधिक व्यावहारिक बनाना: वन अधिकार एक्ट, 2006 के तहत, वन क्षेत्र को गैर-वानिकी के लिए इस्तेमाल करने (यानी वन मंजूरी) हेतु संबंधित ग्राम सभा की 100% सहमति ज़रूरी है। कमिटी ने कहा कि कुछ परियोजनाएं इसलिए अनिश्चित काल के लिए रुकी हुई हैं क्योंकि कुछ ग्राम पंचायतों से सहमति मिलने में देरी हो रही है। कमिटी ने राष्ट्रीय महत्व की बड़ी हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए सहमति की सीमा को घटाकर 70%-75% के बीच करने का सुझाव दिया। इसके अलावा कमिटी ने कहा कि मंजूरी की प्रक्रिया को परियोजना की शुरुआती जांच पड़ताल के समय ही शुरू किया जाए, न कि बाद के चरणों में। क्योंकि इसी कारण किसी परियोजना में देरी होती है।
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डिजिटल लैंड बैंक की स्थापना: वन (संरक्षण एवं संवर्धन) एक्ट, 1980 के नियमों के तहत यह ज़रूरी है कि अगर वन भूमि का इस्तेमाल गैर-वानिकी के लिए किया जाता है, तो परियोजना निर्माताओं को क्षतिपूर्ति वनीकरण (बदले में पौधे लगाना) करना होगा। ऐसे क्षतिपूर्ति वनीकरण के लिए उपयुक्त भूमि न होने की स्थिति में निम्नीकृत वन भूमि (खराब या बंजर हो चुकी जंगली जमीन) का इस्तेमाल किया जा सकता है। कमिटी ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसी निम्नीकृत वन भूमि उपलब्ध नहीं है। कमिटी ने यह भी गौर किया कि उपयुक्त भूमि की तलाश करने से भी मंजूरी की प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है। कमिटी ने क्षतिपूर्ति वनीकरण के लिए निम्नीकृत वन भूमि का एक डिजिटल लैंड बैंक बनाने का सुझाव दिया। साथ ही कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि आवेदन के छह महीने के अंदर क्षतिपूर्ति वनीकरण के लिए जगह आवंटित कर दी जानी चाहिए।
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दोहरा मुआवज़ा रोकने के लिए संरचना: कमिटी ने देखा कि अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में एनएचपीसी को अवर्गीकृत राज्य वन भूमि के इस्तेमाल के लिए दोहरा मुआवज़ा देना पड़ता है। पहले वह स्थानीय समुदायों को उनके पारंपरिक भू अधिकारों के नुकसान के लिए मुआवज़ा देता है। फिर राज्य सरकार को भी भुगतान करता है, जो उसी ज़मीन के लिए मुआवज़े का दावा करती है। कमिटी ने गौर किया कि दोहरे मुआवज़े से परियोजना की लागत बढ़ जाती है। कमिटी ने अवर्गीकृत राज्य वन भूमि के मुआवज़े के लिए एक समान ढांचा तैयार करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर अंतर-मंत्रालयी समूह बनाने का सुझाव दिया।
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हाइड्रोपावर और पंप स्टोरेज निर्माण इकोसिस्टम को मज़बूत करना: कमिटी ने कहा कि पंप स्टोरेज की 280 GW की क्षमता के मुकाबले, 10 अप्रैल 2026 तक लगभग 7 GW क्षमता ही स्थापित की गई है (2.5%)। कमिटी ने गौर किया कि पंप स्टोरेज परियोजना से बिजली तो पैदा होती ही है, साथ ही यह अस्थिर सौर और पवन ऊर्जा के लिए लाभ प्रभावी ग्रिड स्तरीय स्टोरेज के तौर पर भी इस्तेमाल हो सकती है। कमिटी ने पंप स्टोरेज परियोजना के विकास के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) परियोजना स्थलों का त्वरित आवंटन, (ii) इन्हें प्राथमिकता के आधार पर मंज़ूरी, और (iii) पंप स्टोरेज परियोजना द्वारा उत्पन्न बिजली की खरीद सुनिश्चित करने के लिए समर्पित तंत्र बनाना।
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कमिटी ने यह भी कहा कि भारत में हाइड्रोपावर और पंप स्टोरेज परियोजना क्षेत्र सिर्फ चार से पांच ठेकेदारों के नेटवर्क पर निर्भर है। जब एक साथ कई परियोजनाओं पर काम किया जाता है तो ठेकेदारों की यह कम संख्या परियोजना के जीवनचक्र को बुरी तरह प्रभावित करती है। कमिटी ने यह भी पाया कि निजी क्षेत्र के पास ऐसी परियोजनाएं विकसित करने के लिए आवश्यक पैमाने पर विशेषज्ञता और उपकरणों की कमी है। उसने ठेकेदारों के इस पूरे इकोसिस्टम को बढ़ाने के लिए एक समर्पित नीतिगत ढांचा विकसित करने का सुझाव दिया जिसमें पूर्व योग्यता प्रोत्साहन, अनुभवी और नए ठेकेदारों के बीच मेंटरशिप की व्यवस्था और विशिष्ट क्षेत्रों में कौशल विकास शामिल हो।
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