स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
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विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी) ने 7 अगस्त, 2026 को 'हिमालयी क्षेत्र के जंगलों में आग, उसके प्रतिकूल प्रभाव और शमन के उपाय' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी ने जंगल में आग के कारणों और प्रभाव, तथा उसकी निगरानी, रोकथाम और प्रबंधन के उपायों की समीक्षा की। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
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जंगल की आग में क्षेत्रीय भिन्नताएं: कमिटी ने कहा किया कि पश्चिमी और पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में जंगल की आग के कई कारण हैं, जिसके लिए रोकथाम के उपाय क्षेत्र विशिष्ट होने चाहिए। कमिटी ने यह भी कहा कि भारत में जलवायु परिवर्तन और जंगल की आग के बीच संबंध बताने वाला कोई विशेष अध्ययन नहीं हुआ है। पश्चिमी हिमालय में चीड़ के जंगल पर्यावरण के हिसाब से अच्छे बांज के जंगलों को खत्म कर रहे हैं और जंगलों में आग की लगभग 57% घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में मणिपुर में लगने वाली लगभग दो तिहाई आग का कारण झूम खेती है। कमिटी ने इस संबंध में निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) हर क्षेत्र के लिए विशिष्ट रोकथाम की रूपरेखा और जलवायु परिवर्तन व जंगलों में आग के बीच के संबंधों पर अनुसंधान, तथा (ii) आने वाले मौसम की तैयारियों के लिए खतरे का पहले से आकलन करने वाली प्रणाली। पश्चिमी हिमालय के लिए कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) समर्पित बांज और देवदार पुनर्जीवन मिशन, (ii) सदाबहार नुकीली पत्तियों वाले शंकुधारी (कॉनिफेरस) जंगलों के काटने या किसी और काम में इस्तेमाल करने पर कड़ी नजर, (iii) न्यूनतम खरीद मूल्य के साथ सीजन से पहले चीड़ की पत्तियों का संग्रह और (iv) इन पत्तियों से कोयला/ईंधन (ब्रिकेट) बनाने वाले उद्योगों को सहायता। पूर्वी हिमालय के लिए कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) जिन गांवों के जंगलों में आग नहीं लगेगी, उन्हें प्रोत्साहन, (ii) वन विभाग में समयबद्ध भर्ती, (iii) एक एकल क्षेत्रीय कार्य योजना, और (iv) बाहरी वनस्पतियां, जो वहां के मूल जंगलों को नुकसान पहुंचा रही हैं, को पूरी तरह से खत्म करने का मिशन।
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मानव और पारिस्थितिकी पर असर: कमिटी ने कहा कि जंगल की आग से हताहत हुए लोगों या पीड़ितों को दिए गए मुआवजे का कोई एकत्रित रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। उसने गौर किया कि इससे जवाबदेही और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण में बाधा आती है और एक केंद्रीकृत हताहत और मुआवजा डेटाबेस बनाने का सुझाव दिया। कमिटी ने यह भी कहा कि हिमालय के जंगल भूजल पुनर्भरण और झरनों के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं, जिस पर इस क्षेत्र की अधिकांश आबादी निर्भर है। कमिटी ने सुझाव दिया कि आग लगने के बाद का प्रोटोकॉल विकसित किया जाए, साथ ही प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने के लिए जल क्षेत्र का आकलन किया जाए। इसके अलावा प्रभावित इलाकों के झरनों को दोबारा जीवित करने का काम सबसे पहले शुरू किया जाए।
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निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणालियां: कमिटी ने कहा कि भारत जंगलों में आग की निगरानी के लिए विदेशी सैटेलाइट्स पर निर्भर है और हर दिन कई घंटों तक कोई सैटेलाइट न गुजरने के कारण इसकी निगरानी में एक बड़ा अंतर रह जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए कमिटी ने चौबीसों घंटे लगातार नजर रखने में सक्षम एक घरेलू भूस्थिर सैटेलाइट लॉन्च करने का सुझाव दिया। वर्तमान में, भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ही जंगल की आग के बारे में राज्य सरकारों और नागरिकों को अलर्ट भेजने का काम करता है। कमिटी ने ध्यान दिलाया कि उत्तराखंड में एफएसआई के अलर्ट में से केवल 12.5% ही वास्तविक आग से मेल खाते हैं। कमिटी का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में गलत अलर्ट आने के कारण वन कर्मी इन्हें सामान्य मानकर नजरअंदाज कर सकते हैं। इसके समाधान के लिए कमिटी ने नोडल अधिकारियों को अलर्ट समझने और प्राथमिकता तय करने का व्यवस्थित प्रशिक्षण देने का सुझाव दिया। इसके अलावा कमिटी ने आगाह किया कि एफएसआई का फॉरेस्ट फायर अलर्ट सिस्टम (फास्ट) नागरिकों के खुद के रजिस्ट्रेशन पर निर्भर है, जिससे बिना रजिस्ट्रेशन वाली आबादी इसके दायरे से बाहर रह जाती है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) फास्ट अलर्ट को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के रजिस्ट्रेशन-मुक्त सेल ब्रॉडकास्ट अलर्ट सिस्टम (मोबाइल पर सीधे आने वाले मैसेज) के साथ जोड़ने की संभावना तलाशी जाए, और (ii) आग के खतरे की शुरुआती चेतावनी देने के लिए भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के पूर्वानुमान मॉडल को इसमें शामिल करने हेतु उनके साथ मिलकर काम किया जाए।
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आपदा पर प्रतिक्रिया की क्षमता: कमिटी ने गौर किया कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल हिमालय के जंगलों में लगी आग से निपटने के लिए दो बटालियन तैनात करती है, और छह प्रशिक्षित टीमों में से सिर्फ तीन के पास ऐसे कामों के लिए आधिकारिक मंजूरी है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) तीन और टीमों को मंज़ूरी देना, (ii) ज़्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में आग बुझाने के प्रशिक्षण का दायरा बढ़ाना, और (iii) खास तौर पर क्षेत्रीय प्रतिक्रिया केंद्र बनाना। कमिटी ने सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने के लिए कुछ उपाय भी सुझाए, जैसे: (i) वॉलंटियर्स के लिए इंसेंटिव (जैसे इंश्योरेंस कवर), (ii) पवित्र उपवनों और समुदायों द्वारा सुरक्षित जंगलों को मान्यता देना, और (iii) स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य करना।
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वित्तीय सहायता: वन अग्नि रोकथाम और प्रबंधन (एफएफपीएम) योजना 2025-26 में खत्म हो गई और अभी इसकी समीक्षा हो रही है। यह योजना राज्यों को जंगल की आग को रोकने और उस पर काबू पाने के लिए आर्थिक मदद देती थी। कमिटी ने कहा कि इसके रिन्यूअल का मामला अभी अटका हुआ है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) मंजूरी में तेज़ी लाना, (ii) अंतरिम फंडिंग का तरीका शुरू करना, (iii) भविष्य में फंड जारी करने को नतीजों से जोड़ना, और (iv) पेड़ लगाने के लिए रखे गए फंड का इस्तेमाल करने की बजाय एफएफपीएम के ज़रिए पर्याप्त फंड देना।
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कानूनी सुधार: कमिटी ने गौर किया कि वन कानून अभी भी बिखरा हुआ है और इसका झुकाव बहाली के बजाय सरकारी नियंत्रण की ओर है। कमिटी ने यह भी देखा कि भारत में जंगल की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है। कमिटी ने इस संबंध में निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) वन कानून की व्यापक समीक्षा, (ii) स्थानीय प्रजातियों के साथ क्षतिपूरक वनीकरण और पौधों के जीवित रहने की निगरानी, और (iii) आपदा प्रबंधन एक्ट, 2005 के तहत जंगल की आग को आपदा के रूप में अधिसूचित करना।
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