रिपोर्ट का सारांश
वित्त आयोग (एफसी) एक ऐसी संवैधानिक संस्था है जिसे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संबंधों पर सुझाव देने के लिए राष्ट्रपति द्वारा गठित किया जाता है। 16वें वित्त आयोग (चेयर: डॉ. अरविंद पनगढ़िया) की रिपोर्ट 2026-27 और 2030-31 की पांच वर्षीय अवधि के लिए 1 फरवरी, 2026 को संसद में पेश की गई। आयोग के प्रमुख सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
केंद्रीय करों में राज्यों का हिस्सा
केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में राज्यों का हिस्सा 41% रखने का सुझाव दिया गया है। यह वही हिस्सेदारी है जिसका सुझाव 15वें वित्त आयोग ने दिया था। विभाज्य पूल की गणना केंद्रीय सरकार द्वारा जुटाए गए कुल कर राजस्व में से कर वसूलने की लागत, उपकर और अधिभारों को घटाने के बाद की जाती है।
हस्तांतरण का मानदंड
राज्यों के बीच केंद्रीय करों के बंटवारे को तय करने के लिए वित्त आयोग एक फार्मूला बनाता है जिसमें कुछ खास पैमानों को अलग-अलग महत्व यानी वेटेज दिया जाता है। निम्नलिखित तालिका 1 में उन मानदंडों को दर्शाया गया है जिनका उपयोग 16वें वित्त आयोग द्वारा केंद्रीय करों में प्रत्येक राज्य की हिस्सेदारी निर्धारित करने के लिए किया गया है और उन्हें दिया गया महत्व यानी वेटेज भी प्रदर्शित है। अनुलग्नक में तालिका 3 में प्रत्येक राज्य का हिस्सा दर्शाया गया है।
तालिका 1: राज्यों के बीच केंद्रीय करों के वितरण के लिए मानदंड
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मानदंड |
15वां विआ 2021-26 |
16वां विआ 2026-31 |
|
आय की दूरी |
45% |
42.5% |
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जनसंख्या (2011) |
15% |
17.5% |
|
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन |
12.5% |
10% |
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क्षेत्र |
15% |
10% |
|
वन |
10% |
10% |
|
कर और राजकोषीय प्रयास |
2.5% |
- |
|
जीडीपी में योगदान |
- |
10% |
|
कुल |
100% |
100% |
स्रोत: 15वें और 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट्स; पीआरएस।
प्रति व्यक्ति जीएसडीपी की दूरी (आय दूरी): 16वें वित्त आयोग ने आय की दूरी को किसी राज्य की प्रति व्यक्ति जीएसडीपी और सबसे अधिक प्रति व्यक्ति जीएसडीपी वाले शीर्ष तीन बड़े राज्यों की औसत प्रति व्यक्ति जीएसडीपी के बीच के अंतर के रूप में परिभाषित किया है। प्रति व्यक्ति जीएसडीपी की गणना 2018-19 और 2023-24 की अवधि के औसत के रूप में की गई है, जिसमें महामारी का वर्ष 2020-21 शामिल नहीं है। राज्यों के बीच समानता बनाए रखने के लिए, कम प्रति व्यक्ति जीएसडीपी वाले राज्यों को इस पैमाने पर अधिक हिस्सा मिलेगा।
जनसंख्या: इस मानदंड पर 2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या में हिस्सेदारी के आधार पर हस्तांतरण में हिस्सेदारी निर्धारित की जाती है।
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन: 15वें वित्त आयोग ने कुल प्रजनन दर (टीएफआर) के आधार पर जनसंख्या नियंत्रण के लिए राज्यों को पुरस्कृत करने हेतु इस मानदंड को लागू किया था। 16वें वित्त आयोग ने टीआरएफ में बदलाव पर निर्भर रहने की बजाय, 1971 और 2011 के बीच हुई जनसंख्या वृद्धि को आधार बनाकर इसे फिर से परिभाषित किया है। कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को इस मानदंड के अंतर्गत अधिक हिस्सा मिलेगा।
वन: 16वें वित्त आयोग ने कुल वन क्षेत्र में किसी राज्य की हिस्सेदारी और 2015 से 2023 के बीच कुल वन क्षेत्र में हुई वृद्धि में उसकी हिस्सेदारी, दोनों को महत्व दिया है। इसके अलावा कुल वन क्षेत्र की गणना करते समय खुले वनों को भी ध्यान में रखा गया है। इसके विपरीत, 15वें वित्त आयोग ने केवल सघन और मध्यम सघन जंगलों को ही ध्यान में रखा था और इस मानदंड को केवल कुल वन क्षेत्र में हिस्सेदारी के आधार पर परिभाषित किया था।
जीडीपी में योगदान: 16वें वित्त आयोग ने एक नया मानदंड पेश किया है जो राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान को मापता है। यह 15वें वित्त आयोग द्वारा उपयोग किए गए कर और राजकोषीय प्रयासों के मानदंड की जगह लेता है जो अधिक कर संग्रह वाले राज्यों को पुरस्कृत करता था। जीडीपी में किसी राज्य के योगदान की गणना, उसकी जीएसडीपी के वर्गमूल (इस्क्वॉयर रूट) और सभी राज्यों की जीएसडीपी के वर्गमूल के योग के अनुपात के रूप में की जाती है। प्रत्येक राज्य की जीएसडीपी को 2018-19 और 2023-24 के बीच की औसत सांकेतिक जीएसडीपी के रूप में मापा गया है (जिसमें महामारी वाले वर्ष 2020-21 को शामिल नहीं किया गया है)।
सहायतानुदान
16वें वित्त आयोग ने पांच वर्षों की अवधि में 9.47 लाख करोड़ रुपए के अनुदानों का सुझाव दिया है। इनमें निम्नलिखित क्षेत्रों के लिए अनुदान शामिल हैं: (i) शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकाय, और (ii) आपदा प्रबंधन। 16वें वित्त आयोग ने 15वें वित्त आयोग द्वारा सुझाए गए निम्नलिखित अनुदानों को बंद कर दिया है: (i) राजस्व घाटा अनुदान, (ii) शिक्षा, न्याय, सांख्यिकी और कृषि के लिए क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान, और (iii) राज्य-विशिष्ट अनुदान। राज्यवार विवरण के लिए कृपया अनुलग्नक देखें।
तालिका 2: 2026-31 की अवधि के लिए सहायता अनुदान (करोड़ रुपए में)
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अनुदान |
राशि |
|
स्थानीय सरकार |
7,91,493 |
|
ग्रामीण स्थानीय निकाय |
4,35,236 |
|
मूल अनुदान |
3,48,188 |
|
प्रदर्शन अनुदान |
87,048 |
|
शहरी स्थानीय निकाय |
3,56,257 |
|
मूल अनुदान |
2,32,125 |
|
प्रदर्शन अनुदान |
58,032 |
|
विशेष अवसंरचना घटक |
56,100 |
|
शहरीकरण प्रीमियम |
10,000 |
|
आपदा प्रबंधन |
1,55,916 |
|
कुल |
9,47,409 |
स्रोत: 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट; पीआरएस।
स्थानीय निकायों के लिए अनुदान: 16वें वित्त आयोग ने ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के लिए क्रमशः 44 लाख करोड़ रुपए और 36 लाख करोड़ रुपए के अनुदान का सुझाव दिया है। ये अनुदान मूल (80%) और प्रदर्शन-आधारित (20%) घटकों में विभाजित हैं। शहरी स्थानीय निकायों के लिए विशेष अवसंरचना अनुदान और शहरीकरण प्रीमियम अनुदान का भी सुझाव दिया गया है। इन पर आगे विस्तार से चर्चा की गई है। स्थानीय निकायों को मिलने वाले सभी अनुदान इन तीन प्रवेश-स्तरीय मानदंडों को पूरा करने पर ही उपलब्ध होंगे: (i) संविधान के अनुसार स्थानीय निकायों का गठन, (ii) स्थानीय निकायों के अनंतिम और ऑडिट किए गए खातों को पब्लिक डोमेन में प्रकाशित करना, और (iii) राज्य वित्त आयोग का समय पर गठन।
बुनियादी अनुदान: मूल अनुदान का 50% अनटाइड होगा और शेष 50% टाइड होगा जोकि निम्नलिखित से जुड़ा होगा: (i) स्वच्छता और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, और/या (ii) जल प्रबंधन।
प्रदर्शन अनुदान: स्थानीय निकायों के लिए अनुदान राज्य के प्रदर्शन और स्थानीय निकाय के प्रदर्शन से संबंधित अनुदान में विभाजित किया गया है। राज्य के प्रदर्शन संबंधी अनुदान तब उपलब्ध कराए जाएंगे जब राज्य अपने स्वयं के संसाधनों से स्थानीय निकायों को एक तय सीमा तक धनराशि हस्तांतरित करना शुरू करेंगे। स्थानीय निकाय संबंधी प्रदर्शन अनुदान आयोग द्वारा स्वयं के स्रोतों से राजस्व वृद्धि के लिए निर्दिष्ट न्यूनतम लक्ष्यों की उपलब्धि से जुड़े हैं।
विशेष अवसंरचना अनुदान: यह घटक 2011 की जनगणना के अनुसार 10-40 लाख की आबादी वाले शहरों में व्यापक अपशिष्ट जल प्रबंधन प्रणाली के विकास से जुड़ा होगा (पात्र शहरों की सूची के लिए परिशिष्ट में तालिका 4 देखें)। पांच वर्षों में 56,100 करोड़ रुपए के अनुदान का सुझाव दिया गया है।
शहरीकरण प्रीमियम अनुदान: इन्हें राज्यों को एकमुश्त अनुदान के रूप में निम्नलिखित कार्यों के लिए जारी किया जाएगा: (i) शहरी क्षेत्रों के आस-पास के गांवों का पास के शहरी स्थानीय निकाय में विलय और (ii) ग्रामीण से शहरी संक्रमण नीति तैयार करना। शहरीकरण प्रीमियम घटक के तहत 10,000 करोड़ रुपए का सुझाव दिया गया है।
आपदा प्रबंधन अनुदान: आयोग ने राज्य आपदा राहत एवं प्रबंधन कोष (एसडीआरएफ और एसडीएमएफ) के लिए 2,04,401 करोड़ रुपए के आपदा प्रबंधन कोष का सुझाव दिया है। केंद्र और राज्यों के बीच लागत साझाकरण का अनुपात इस प्रकार सुझाया गया है: (i) पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 और (ii) अन्य सभी राज्यों के लिए 75:25। कुल मिलाकर केंद्र का हिस्सा 1,55,916 करोड़ रुपए होगा।
राजकोषीय कार्य योजना
आयोग ने केंद्र सरकार को 2030-31 तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.5% तक कम करने का सुझाव दिया है। उसने राज्यों के लिए वार्षिक राजकोषीय घाटे की सीमा जीएसडीपी के 3% निर्धारित करने की भी सुझाव दिया है। उसने राज्यों के लिए बजटेतर उधार की परंपरा को खत्म करने और ऐसे सभी उधारों को उनके बजट के दायरे में शामिल करने का भी सुझाव दिया है। राजकोषीय घाटे और ऋण की परिभाषा का विस्तार किया जाना चाहिए ताकि इसमें सभी बजटेतर उधारियों को समान रूप से शामिल किया जा सके।
आयोग ने अनुमान लगाया है कि केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त ऋण 2026-27 में जीडीपी के 77.3% से घटकर 2030-31 में 73.1% हो जाएगा।
बिजली क्षेत्र के सुधार
आयोग ने सुझाव दिया कि राज्यों को बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के निजीकरण के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करना चाहिए। डिस्कॉम्स के अधिग्रहण के बाद निजी निवेशक को कर्ज के बोझ से बचाने के लिए, कर्ज को अलग रखने हेतु एक विशेष प्रयोजन वाहन (स्पेशल पर्पस व्हीकल) बनाया जा सकता है। इस कर्ज के पूर्व भुगतान या अंतिम पुनर्भुगतान के लिए पूंजीगत निवेश हेतु विशेष सहायता योजना के फंड्स का उपयोग करने की अनुमति दी जा सकती है। आयोग ने य़ह सुझाव भी दिया कि राज्यों को इस सहायता का उपयोग करने की अनुमति केवल निजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही दी जानी चाहिए।
सबसिडी व्यय
आयोग ने राज्यों को अपने सबसिडी व्यय की समीक्षा और उसे सुव्यवस्थित करने का सुझाव दिया। आयोग ने पाया कि बिना शर्त नकद हस्तांतरण प्रदान करने वाली योजनाओं में अक्सर बड़ी संख्या में लाभार्थी होते हैं, लेकिन वे लक्षित नहीं होते। आयोग ने प्रभावी लक्ष्यीकरण सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट वर्जन मानदंड (एक्सक्लूजन क्राइटीरिया) और एक कठोर समीक्षा प्रक्रिया निर्धारित करने का सुझाव दिया। इसके अतिरिक्त आयोग ने बजटेतर उधारी के माध्यम से सबसिडी के वित्तपोषण को बंद करने का भी सुझाव दिया।
आयोग ने राज्यों में सबसिडी और हस्तांतरण की परिभाषा और एकाउंटिंग में मानकीकरण की कमी पर भी गौर किया। आयोग ने पाया कि विभिन्न राज्यों में सबसिडी और हस्तांतरण को सहायता, अनुदान या अन्य व्यय के रूप में गलत तरीके से वर्गीकृत किया जा रहा है। आयोग ने सबसिडी और हस्तांतरण की एकाउंटिंग और उनके खुलासे के लिए एक समान दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव दिया।
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में सुधार
आयोग ने राज्य स्तरीय सार्वजनिक क्षेत्र के 308 निष्क्रिय उद्यमों (एसपीएसई) की समीक्षा करने और उन्हें बंद करने का सुझाव दिया। उसने निष्क्रिय और कम प्रदर्शन करने वाले एसपीएसई को लक्षित करने के लिए राज्य-स्तरीय पीएसई विनिवेश नीति तैयार करने का भी सुझाव दिया।
राज्य स्तरीय या केंद्रीय पीएसईज़, जिन्होंने लगातार चार में से तीन वर्षों तक घाटा उठाया है, को संबंधित कैबिनेट के विचारार्थ रखा जाना चाहिए। कैबिनेट उद्यम के रणनीतिक महत्व के आधार पर उसे बंद करने, निजीकरण करने या जारी रखने का निर्णय ले सकता है।
अनुलग्नक
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तालिका 3: केंद्र द्वारा हस्तांतरित करों में प्रत्येक राज्य का हिस्सा (100 में से)
स्रोत: 14वें, 15वें और 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट्स; पीआरएस। |
तालिका 4: यूएलबी अनुदान के विशेष अवसंरचना घटक के अंतर्गत पात्र शहर
स्रोत: 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट; पीआरएस। |
तालिका 5: वर्ष 2026-31 के लिए राज्यवार अनुदान सहायता का विवरण (करोड़ रुपए में)
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राज्य |
ग्रामीण स्थानीय निकाय अनुदान |
शहरी स्थानीय निकाय अनुदान |
आपदा प्रबंधन अनुदान |
||||
|
मूल |
आरएलबी प्रदर्शन |
राज्य का प्रदर्शन |
मूल |
यूएलबी प्रदर्शन |
राज्य का प्रदर्शन |
||
|
आंध्र प्रदेश |
13,302 |
1,663 |
1,663 |
9,727 |
1,216 |
1,216 |
6,125 |
|
अरुणाचल प्रदेश |
1,358 |
170 |
170 |
186 |
24 |
24 |
616 |
|
असम |
11,663 |
1,459 |
1,459 |
2,598 |
326 |
326 |
5,243 |
|
बिहार |
41,539 |
5,192 |
5,192 |
7,335 |
917 |
917 |
13,615 |
|
छत्तीसगढ़ |
9,331 |
1,167 |
1,167 |
3,992 |
499 |
499 |
2,481 |
|
गोवा |
140 |
17 |
17 |
581 |
73 |
73 |
112 |
|
गुजरात |
15,042 |
1,880 |
1,880 |
19,011 |
2,377 |
2,377 |
8,459 |
|
हरियाणा |
6,616 |
827 |
827 |
6,267 |
784 |
784 |
2,922 |
|
हिमाचल प्रदेश |
2,996 |
374 |
374 |
348 |
44 |
44 |
2,682 |
|
झारखंड |
11,385 |
1,423 |
1,423 |
4,874 |
610 |
610 |
2,806 |
|
कर्नाटक |
15,111 |
1,889 |
1,889 |
14,786 |
1,849 |
1,849 |
6,419 |
|
केरल |
2,647 |
331 |
331 |
13,347 |
1,668 |
1,668 |
1,935 |
|
मध्य प्रदेश |
25,627 |
3,203 |
3,203 |
12,813 |
1,602 |
1,602 |
11,697 |
|
महाराष्ट्र |
26,254 |
3,282 |
3,282 |
37,442 |
4,681 |
4,681 |
29,619 |
|
मणिपुर |
1,009 |
127 |
127 |
487 |
61 |
61 |
259 |
|
मेघालय |
1,183 |
148 |
148 |
302 |
38 |
38 |
437 |
|
मिजोरम |
453 |
57 |
57 |
302 |
38 |
38 |
284 |
|
नागालैंड |
557 |
70 |
70 |
534 |
67 |
67 |
408 |
|
ओड़िशा |
14,973 |
1,871 |
1,871 |
4,062 |
508 |
508 |
8,900 |
|
पंजाब |
6,789 |
849 |
849 |
6,267 |
784 |
784 |
2,477 |
|
राजस्थान |
25,173 |
3,147 |
3,147 |
10,145 |
1,268 |
1,268 |
9,211 |
|
सिक्किम |
174 |
22 |
22 |
162 |
21 |
21 |
455 |
|
तमिलनाडु |
13,544 |
1,693 |
1,693 |
20,054 |
2,508 |
2,508 |
8,486 |
|
तेलंगाना |
7,974 |
997 |
997 |
9,239 |
1,155 |
1,155 |
2,774 |
|
त्रिपुरा |
941 |
118 |
118 |
813 |
102 |
102 |
356 |
|
उत्तर प्रदेश |
66,608 |
8,327 |
8,327 |
26,835 |
3,354 |
3,354 |
15,321 |
|
उत्तराखंड |
3,237 |
405 |
405 |
1,997 |
250 |
250 |
4,954 |
|
पश्चिम बंगाल |
22,562 |
2,821 |
2,821 |
17,619 |
2,202 |
2,202 |
6,869 |
|
कुल |
3,48,188 |
43,524 |
43,524 |
2,32,125 |
29,016 |
29,016 |
1,55,916 |
स्रोत: 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट; पीआरएस।
डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

