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पीडीएफ

आपदा प्रबंधन

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • गृह मामलों से संबंधित कमिटी (चेयर: डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल) ने 7 अगस्त, 2026 को 'आपदा प्रबंधन' पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी ने प्राकृतिक और मानव-जनित खतरों के प्रति भारत की संवेदनशीलता की जांच की। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • आपदा प्रबंधन की संरचना में संशोधन: कमिटी ने कहा कि आपदा प्रबंधन पर राष्ट्रीय नीति, 2009 और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 को अपनाए जाने के बाद से आपदा जोखिमों का परिदृश्य बदल गया है। कमिटी ने गौर किया मौसम की चरम घटनाओं की बारंबारता और तीव्रता में वृद्धि तथा तेज़ी से हो रहे शहरीकरण ने आपदा के नए जोखिम पैदा किए हैं। कमिटी ने इन बदलावों को शामिल करने और आपदा प्रबंधन एक्ट, 2005 में 2025 के संशोधनों को लागू करने के लिए राष्ट्रीय नीति और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की समीक्षा करने का सुझाव दिया। इसके अलावा, कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) राज्य और जिला आपदा प्रबंधन योजनाओं को अपडेट करना, (ii) मॉक ड्रिल की बारंबारता बढ़ाना, और (iii) विशेषज्ञ प्रतिक्रिया बलों और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बलों को मज़बूत करना।

  • शहरी आपदा प्रबंधन: कमिटी ने गौर किया कि शहरी इलाके बाढ़, लू, इमारतों के गिरने, बुनियादी ढांचे पर दबाव और रासायनिक व औद्योगिक खतरों की चपेट में तेज़ी से आ रहे हैं। 2025 के संशोधनों के तहत राज्य सरकारों को यह अधिकार भी दिया गया है कि वे राज्य की राजधानियों और म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन वाले शहरों के लिए शहरी आपदा प्रबंधन अथॉरिटी (यूडीएमए) का गठन कर सकती हैं। कमिटी ने गौर किया कि सिर्फ कर्नाटक ने ही बेंगलुरु के लिए यूडीएमए का गठन किया है। कमिटी ने सुझाव दिया कि सभी पात्र क्षेत्रों में यूडीएमए का गठन किया जाना चाहिए। यूडीएमए को शहर के हिसाब से आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार करनी चाहिए और जोखिम का आकलन करना चाहिए।

  • आपदा वित्तपोषण: कमिटी ने कहा कि कई राज्यों ने राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष में काफी मात्रा में बिना खर्च की गई राशि बचाकर रखी है। कमिटी ने यह भी गौर किया कि 15वें वित्त आयोग की अवधि के दौरान, राज्य आपदा न्यूनीकरण कोष के लिए केंद्र द्वारा जारी की गई राशि आवंटित राशि का लगभग 80% रही। यह मुख्य रूप से राज्य-स्तरीय कोषों के गठन में देरी और एनडीएमए की तरफ से परिचालन दिशानिर्देश देर से जारी करने के कारण हुआ था। कमिटी ने 16वें वित्त आयोग के निम्नलिखित सुझावों को लागू करने को कहा: (i) लू और बिजली गिरने को अधिसूचित आपदाओं की सूची में शामिल करना, (ii) जब बिना खर्च की गई राशि पिछले तीन वर्षों के वार्षिक आवंटन के योग से अधिक हो जाए तो फंड की अधिकतम सीमा तय करना, और (iii) वर्तमान आपदा प्रबंधन सूचना प्रणाली की तकनीक को अपग्रेड करना। कमिटी ने यह भी गौर किया कि आपदा से संबंधित खर्च बड़े पैमाने पर राहत-केंद्रित होते हैं और उसकी जगह पर शमन-केंद्रित निवेश किया जाना चाहिए। कमिटी ने आपदा जोखिम निधि के दायरे को बढ़ाने का भी सुझाव दिया जिसमें परिवारों, कृषि और एमएसएमई के लिए बीमा कवरेज शामिल है।

  • बहाली और पुनर्वास: आपदा पश्चात आवश्यकता आकलन (पीडीएनएज़) किसी आपदा से होने वाली भौतिक क्षति, आर्थिक नुकसान और मानवीय प्रभावों का मूल्यांकन करता है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) सभी राज्यों में मानकीकृत पीडीएनए प्रक्रियाओं और समय सीमा को लागू करना, (ii) निष्कर्षों के आधार पर वित्तीय सुधार/पुनरुद्धार सहायता प्रदान करना, (iii) आवास, इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका के पुनर्निर्माण के लिए क्षेत्र-विशिष्ट दिशानिर्देश तैयार करना, (iv) पुनर्निर्माण मानकों को सुनिश्चित करने के लिए उच्च स्तरीय निगरानी और समीक्षा करना, तथा (v) संवेदनशील व्यक्तियों के लिए सामाजिक रूप से समावेशी पुनर्वास और आघात परामर्श (ट्रॉमा काउंसलिंग) प्रदान करना।

  • जोखिम आकलन और पूर्व चेतावनी प्रणालियां: कमिटी ने वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन और खतरों की शीघ्र पहचान करने की आवश्यकता पर बल दिया। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) टाउन प्लानिंग के दौरान यह देखना कि उस इलाके में कौन-कौन सी आपदाएं आ सकती हैं और उनका नक्शा बनाना, (ii) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), रडार और सैटेलाइट डेटा को शामिल करते हुए एक बहु-आपदा प्रारंभिक चेतावनी मंच तैयार करना, (iii) हाइपर-लोकल (अति-स्थानीय) और बहुभाषी संचार प्रणालियां विकसित करना, और (iv) प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर और शहरी विकास परियोजनाओं के लिए आपदा जोखिम प्रभाव आकलन को अनिवार्य बनाना।

  • नदी बेसिन में बाढ़ का प्रबंधन: कमिटी ने यह गौर किया कि बिहार, उत्तर प्रदेश और असम जैसे कई राज्य बार-बार आने वाली नदी की बाढ़, शहरी जलभराव और भूकंप की संवेदनशीलता से जूझते रहते हैं। इस संबंध में उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) शहरी जल निकासी और वर्षा जल प्रणालियों में निवेश करना, (ii) भूकंप-रोधी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना, (iii) पूरी नदी के बहाव क्षेत्र को एक इकाई मानकर बाढ़ प्रबंधन के लिए देश स्तर पर एक साझा सिस्टम बनाना, (iv) सैटेलाइट के जरिए समय-समय पर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का नक्शा बनाना, (v) नदियों के तलों और बाढ़ के मैदानों से अवैध कब्जों को हटाना, (vi) शहरी स्थानीय निकायों के लिए शहर के स्तर पर बाढ़ और जल निकासी योजनाएं अनिवार्य करना, और (vii) आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स), झीलों और प्राकृतिक जल निकासी चैनलों को पुनर्जीवित करना। नदी की बाढ़ से निपटने के लिए कमिटी ने आगे यह सुझाव दिए: (i) बाढ़ और नदी तट के कटाव का दीर्घकालिक प्रबंधन करना, (ii) तटबंधों को मजबूत करना, और (iii) स्थानीय स्तर पर राहत कार्य और पुनर्वास प्रणालियों में सुधार करना।

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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