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पीडीएफ

इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता के कामकाज की समीक्षा और उभरते मुद्दे

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • वित्त से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री भर्तृहरि महताब) ने 2 दिसंबर, 2025 को 'इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता के कामकाज की समीक्षा और उभरते मुद्दे' विषय पर अपनी रिपोर्ट पेश की। इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता (आईबीसी) भारत में मई 2016 में लागू की गई थी। इसने कंपनियों, सीमित देयता भागीदारी और व्यक्तियों की इनसॉल्वेंसी, रिवाइवल और लिक्विडेशन से संबंधित कानूनों को समेकित और समयबद्ध तरीके से संशोधित किया। कमिटी के प्रमुख निष्कर्षों और सुझावों में निम्न शामिल हैं:

  • देनदारों के लिए रेज़ोल्यूशन के बाद की चुनौतियां: कमिटी ने रेज़ोल्यूशन के बाद की चुनौतियों को चिन्हित किया जैसे कि रेगुलेटरी मंजूरियां मिलने में देरी और देनदार की डिफ़ॉल्ट की स्थिति के कारण नए वित्तपोषण हासिल करने में समस्याएं। इन चुनौतियों को हल करने के लिए कमिटी ने देनदारों के लिए "कोई बकाया नहीं" प्रमाणपत्र और वैधानिक मंजूरियां जारी करने के लिए एक ऑनलाइन तंत्र स्थापित करने का सुझाव दिया। ये मंजूरियां रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जारी की जाएंगी।

  • विलंब और न्यायिक क्षमता: कमिटी ने इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया को समाप्त करने में विलंब के कई कारण बताए जैसे: (i) एनसीएलटी बेंचों की कमी, (ii) न्यायिक और प्रशासनिक रिक्तियां, और (iii) प्रमोटरों और रेज़ोल्यूशन के असफल आवेदकों द्वारा मूल्य को कम करने वाली तुच्छ मुकदमेबाजी। कमिटी ने सुझाव दिया कि कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (मंत्रालय) को अतिरिक्त एनसीएलटी बेंच बनानी चाहिए और एक केंद्रीकृत केस मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म के संचालन में तेजी लानी चाहिए। कमिटी ने यह भी कहा कि फालतू आवेदनों के लिए दंड बढ़ाया जाए और रेज़ोल्यूशन के असफल आवेदकों के लिए अनिवार्य अग्रिम जमा राशि निर्धारित की जाए।

  • संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का मूल्यांकन: कमिटी ने कहा कि जहां लेनदार लिक्विडेशन के मूल्य का 170% वसूल करते हैं, वहीं स्वीकृत दावों में से केवल 32.8% ही वसूल हो पाते हैं। इसका कारण यह है कि कंपनियां इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया में तब दाखिल होती हैं, जब उनकी परिसंपत्तियां पहले से ही बहुत अधिक संकटग्रस्त होती हैं। इस विलंब से परिसंपत्तियों के वसूली मूल्य में कमी आ सकती है। कमिटी ने यह भी कहा कि मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी के कारण परिसंपत्तियों के संकटग्रस्त बिक्री मूल्य (यानी कम दाम) निर्धारित होते हैं। इन समस्याओं को हल करने के लिए कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) परिसंपत्तियों का मूल्यांकन एक चलते हुए व्यवसाय के रूप में किया जाए, (ii) परिसंपत्तियां बेचने के लिए बोली की प्रक्रिया को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जाए, और (iii) लिक्विडेटर और पंजीकृत मूल्यांकनकर्ताओं के लिए काम करने की मानक प्रक्रियाएं (एसओपी) और रेज़ोल्यूशन के बाद मूल्यांकन की समीक्षा के लिए नियम बनाए जाएं।

  • मकान के खरीदारों के अधिकार: आईबीसी के तहत, मकान के खरीदारों के संघ ‘लेनदारों की कमिटी’ (सीओसी) के 66% सदस्यों की मंजूरी के साथ रेज़ोल्यूशन प्लान पेश कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, आईबीसी के तहत इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया शुरू करने के लिए मकान खरीदारों की न्यूनतम संख्या 100 या कुल आवंटियों का 10% होनी चाहिए। कमिटी ने कहा कि इस प्रावधान के बावजूद मकान खरीदार सीओसी के अंतिम फैसले पर निर्भर रहते हैं और उन्हें राहत पाने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं होता। कमिटी ने सुझाव दिया कि मकान खरीदारों के पात्रता मानदंडों पर पुनर्विचार किया जाए। कमिटी ने सुझाव भी दिया कि मंत्रालय इस मुद्दे को हल करने के लिए अन्य मंत्रालयों और विभागों के साथ समन्वय करे।

  • सीमा-पारीय इनसॉल्वेंसी: कमिटी ने संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विधि आयोग (यूएनसीआईटीआरएएल) को कुछ संशोधनों के साथ चुनिंदा रूप से अपनाने का सुझाव दिया। कमिटी ने कहा कि सीमा-पारीय इनसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क न होने के कारण उच्च मूल्य वाले मामलों में भारी नुकसान होता है।

  • संस्थागत मध्यस्थता से पहले: कमिटी ने औपचारिक अदालती प्रक्रिया के बाहर एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के रूप में प्रारंभिक चरण की मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू करने का सुझाव दिया।

  • बचने के लेन-देन (अवॉयडेंस ट्रांजैक्शंस) के प्रयास: कमिटी ने धनराशि के हेरफेर के मुद्दे को एक गंभीर चिंता का विषय बताया क्योंकि इससे मूल्य में भारी कमी आती है और ऋणदाताओं की वसूली प्रभावित होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल्स (आरपी) को अवॉयडेंस ट्रांजैक्शंस की कोशिशों और धनराशि के हेरफेर की गहन और समयबद्ध जांच करने का अधिकार दिया जाए।

  • प्री-पैकेज्ड इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया (पीपीआईआरपी): कमिटी ने लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमईज़) के लिए पीपीआईआर की प्रक्रिया के कम उपयोग पर गौर किया और कहा कि इसका कारण इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रक्रिया संबंधी कमियां हैं। उसने कहा कि इन मुद्दों के कारण बैंक सरफेसी और ऋण समाधान ट्रिब्यूनल्स जैसे वैकल्पिक वसूली तंत्रों को अपनाने के लिए मजबूर होते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि संकटग्रस्त एमएसएमईज़ की सहायता के लिए पीपीआईआरपी को सरल बनाया जाए। कमिटी ने स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने, जागरूकता बढ़ाने और बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों को प्रोत्साहन प्रदान करने का भी सुझाव दिया। 

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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