स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
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शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री दिग्विजय सिंह) ने 9 दिसंबर, 2025 को "उच्च शिक्षा में शिक्षा ऋण और वित्तीय पहुंच संबंधी योजनाओं की समीक्षा" पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
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शिक्षा ऋणों की उपलब्धता में गिरावट: सक्रिय शिक्षा ऋणों की संख्या 2014 में 23 लाख से घटकर 2025 में 21 लाख हो गई। हालांकि कुल ऋण राशि 2014 में 52,327 करोड़ रुपए से बढ़कर 2025 में 1.37 लाख करोड़ रुपए हो गई, जो प्रति विद्यार्थी उधार में भारी वृद्धि दर्शाती है। कमिटी ने गौर किया कि ये आंकड़े शिक्षा ऋणों की बढ़ती लागत के बावजूद उनकी उपलब्धता में गिरावट का संकेत देते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि उच्च शिक्षा के लिए शिक्षा ऋण स्वीकृत करते समय गरीबी रेखा से नीचे के विद्यार्थियों को प्राथमिकता दी जाए। कमिटी ने गौर किया कि केंद्र सरकार शिक्षा ऋणों पर ब्याज छूट प्रदान करने वाली योजनाएं लागू कर रही है। हालांकि वंचित वर्गों, ग्रामीण पृष्ठभूमि या दूरदराज के क्षेत्रों के विद्यार्थियों में इन योजनाओं के बारे में जागरूकता कम है।
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शिक्षा ऋण पर ब्याज दर: कमिटी ने कहा कि ब्याज दर 7.5% से 15% के बीच है, जिससे शिक्षा की कुल लागत बढ़ जाती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि शिक्षा ऋणों पर भारी सबसिडी दी जानी चाहिए। कमिटी ने सुझाव दिया कि उच्च शिक्षा विभाग, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआईI) और वित्तीय सेवा विभाग के साथ मिलकर सभी बैंकों के लिए एक समान नीति विकसित करे और शिक्षा ऋणों के लिए एक समान और उचित ब्याज दर निर्धारित करे।
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शिक्षा ऋण के लिए नीतिगत सीमाओं में संशोधन: कमिटी ने गौर किया कि कोलेट्रल मुक्त शिक्षा ऋण की सीमा 2010 से संशोधित नहीं की गई है। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (पीएसएल) के तहत शिक्षा ऋण की सीमा भी 2020 से संशोधित नहीं की गई है। उच्च शिक्षा की लागत में वृद्धि के बावजूद ऐसा है। कमिटी ने इन सीमाओं को संशोधित करने का सुझाव दिया।
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सिबिल स्कोर देने से छूट: कमिटी ने पाया कि अधिकांश आबादी पहली बार ऋण ले रही है। क्रेडिट इतिहास न होने के कारण उनके शिक्षा ऋण आवेदन अस्वीकार कर दिए जाते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि मुफ्त राशन प्राप्त करने वाले परिवारों को शिक्षा ऋण आवेदन के समय सिबिल स्कोर प्रदान करने की शर्त से छूट दी जानी चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट किए जाने चाहिए कि ऋण मॉडल आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, के साथ भेदभाव न करें।
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पीएम-विद्यालक्ष्मी योजना: इस योजना का उद्देश्य निर्दिष्ट उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) में योग्यता के आधार पर प्रवेश पाने वाले सभी विद्यार्थियों को बिना किसी गिरवी या गारंटी के शिक्षा ऋण उपलब्ध कराना है। कमिटी ने गौर किया कि योजना के तहत लाभार्थियों की संख्या कम है। फरवरी से अगस्त 2025 के बीच, 55,887 आवेदनों में से 30,442 आवेदन स्वीकृत किए गए और 21,967 आवेदनों का वितरण किया गया। कई बैंकों ने एक भी आवेदन स्वीकृत नहीं किया था। कमिटी ने समय पर स्वीकृति और वितरण के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी करने का सुझाव दिया। कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि: (i) योजना का विस्तार करके 902 निर्दिष्ट उच्च शिक्षा संस्थानों के अलावा अन्य संस्थानों को भी शामिल किया जाए, क्योंकि अधिकांश उच्च शिक्षा संस्थान इसके अंतर्गत नहीं आते हैं, और (ii) योजना के तहत लाभार्थियों की संख्या बढ़ाई जाए।
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ऋण का पुनर्भुगतान: कमिटी ने शिक्षा ऋण संबंधी विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत मोराटोरियम की अवधि को एक वर्ष से बढ़ाकर दो वर्ष करने का सुझाव दिया। इससे रोजगार पाने में कठिनाई का सामना कर रहे विद्यार्थियों को लाभ होगा। कमिटी ने ऐसे पुनर्भुगतान मॉडल की अनुमति देने का सुझाव दिया जो आय-आधारित किस्तों का प्रावधान करते हों। ऐसे मॉडल में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि शिक्षा ऋण प्रदान करने वाले बैंकों में नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स में वृद्धि न हो।
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शिकायत निवारण: कमिटी ने विभाग को एक समर्पित विद्यार्थी शिकायत पोर्टल स्थापित करने और उसे आरबीआई के ओम्बड्समैन प्लेटफॉर्म और हेल्पलाइन सेवाओं के साथ एकीकृत करने का सुझाव दिया। देरी होने पर मुआवजा प्रदान किया जाना चाहिए।
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प्रत्येक शाखा में नोडल अधिकारी: कमिटी ने सुझाव दिया कि प्रत्येक बैंक की हर शाखा में एक नोडल अधिकारी होना चाहिए। यह अधिकारी शिक्षा ऋण का आवेदन करने वाले विद्यार्थियों को तकनीकी सहयोग प्रदान करने के लिए जिम्मेदार होगा।
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