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पीडीएफ

उर्वरकों की कुशल आवाजाही के लिए लॉजिस्टिक्स का प्रबंधन और जबरन बंडलिंग पर रोक

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • रसायन और उर्वरकों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री आज़ाद कीर्ति झा) ने 6 अगस्त, 2026 को 'पीक सीज़न के दौरान उर्वरकों की कुशल आवाजाही और किफायती कीमतों पर उपलब्धता के लिए लॉजिस्टिक्स को व्यवस्थित करना और ज़रूरी उर्वरकों के साथ गैर-ज़रूरी बूस्टर्स की जबरन बंडलिंग को रोकने के लिए उठाए गए कदम' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • उर्वरकों की जबरन बंडलिंग: कमिटी ने गौर किया कि किसानों को सबसिडी वाले उर्वरक देने के बदले गैर जरूरी उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है जिसे जबरन बंडलिंग कहा जाता है। कमिटी ने गौर किया कि ऐसी गड़बड़ियों के बार-बार सामने आने के बावजूद सिर्फ परामर्श और सार्वजनिक अपील की व्यवस्था है। इसके अलावा कोई रेगुलेटरी फ्रेमवर्क मौजूद नहीं है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) सभी गैर-सबसिडी वाले उत्पादों की अलग से डिजिटल बिलिंग अनिवार्य की जाए और एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली में उचित रूप से इसकी फ्लैगिंग की जाए, (ii) नियमों के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों और उन पर की गई कार्रवाई का डेटा तैयार कर उसे प्रकाशित किया जाए, और (iii) केवल परामर्शों पर निर्भर रहने के बजाय जबरन बंडलिंग को प्रतिबंधित करने और इसके लिए सजा/जुर्माना तय करने हेतु उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 में संशोधन किया जाए।

  • अंतिम छोर तक डिलिवरी पर समन्वय: मौजूदा व्यवस्था के तहत, केंद्र सरकार अपनी भूमिका केवल राज्य स्तर पर उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने तक ही सीमित रखती है। अंतिम छोर तक वितरण यानी किसानों तक उर्वरक पहुंचाने की जिम्मेदारी पूरी तरह से राज्य सरकारों की होती है। कमिटी ने उर्वरकों की कमी, किसानों के विरोध प्रदर्शनों और वितरण व्यवस्था में गड़बड़ियों की बार-बार आने वाली खबरों पर गौर किया। कमिटी ने केंद्र-राज्य के तालमेल को मजबूत करने के लिए एक स्थायी संयुक्त कमान और निगरानी इकाई बनाने का सुझाव दिया। इस इकाई में केंद्रीय उर्वरक विभाग, कृषि विभाग, रेलवे और संबंधित राज्य सरकारों के प्रतिनिधि शामिल होने चाहिए। इस इकाई की जिम्मेदारियों में निम्नलिखित शामिल होना चाहिए: (i) संवेदनशील जिलों के लिए पहले से ही योजना बनाना, (ii) बफर स्टॉक को संकट के समय या सीजन से पहले ही सही जगहों पर सुरक्षित रखवाने की निगरानी करना, (iii) रेलवे रैक आवंटन को बेहतर बनाना, (iv) उर्वरकों की आवाजाही और उपलब्धता की रियल-टाइम निगरानी करना, और (v) कमी होने पर तुरंत सुधारात्मक कार्रवाई की सुविधा प्रदान करना।

  • परिवहन की लागत: कमिटी ने यह गौर किया कि पास में स्रोत उपलब्ध होने के बावजूद उर्वरकों को भौगोलिक रूप से दूर स्थित राज्यों को भेजा जाता है। इसके कारण परिवहन की लागत बढ़ती है जिससे बचा जा सकता था, और माल भाड़ा सबसिडी का बोझ भी अधिक होता है। इसके बावजूद विभाग ने परिवहन के लागत प्रभावों का कोई व्यापक मूल्यांकन नहीं किया। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) अंतर-राज्यीय उर्वरक आवाजाही का समय-समय पर लागत-दूरी विश्लेषण किया जाए, (ii) निकटता या दूरी के आधार पर व्यवस्था को बेहतर बनाया जाए और (iii) एक स्वतंत्र अध्ययन कराया जाए।

  • सबसिडी की नीति: कमिटी ने यह गौर किया कि वर्तमान सबसिडी और मूल्य निर्धारण व्यवस्था के कारण अन्य उर्वरकों की तुलना में यूरिया का अत्यधिक उपयोग हुआ है। इससे मिट्टी की सेहत को नुकसान पहुंचा है और भूजल दूषित हुआ है। कमिटी ने यह भी गौर किया कि उर्वरकों में वर्तमान प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) किसानों पर केंद्रित मॉडल नहीं। यह उर्वरक कंपनियों के लिए एक सबसिडी प्रतिपूर्ति तंत्र के रूप में काम करता है। कमिटी ने वर्तमान मूल्य निर्धारण, सबसिडी और डीबीटी ढांचे की व्यापक समीक्षा करने का सुझाव दिया ताकि मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए धीरे-धीरे खाद के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए, इसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जा सके और यह किसान केंद्रित बने। कमिटी ने यूरिया और अन्य उर्वरकों के दामों के बीच के अंतर को सुव्यवस्थित करने के लिए एक चरणबद्ध योजना तैयार करने का भी सुझाव दिया। आयात पर निर्भरता और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को देखते हुए, कमिटी ने यह गौर किया कि उर्वरक सबसिडी की स्थिरता के लिए एक सुव्यवस्थित मध्यम अवधि की रणनीति की आवश्यकता है।

  • क्षमता का कम उपयोग और आयात पर निर्भरता: कमिटी ने गौर किया कि नई पीढ़ी के कई यूरिया संयंत्र अपनी क्षमता से काफी कम पर काम कर रहे हैं। कमिटी ने कहा कि बार-बार तकनीकी खराबी के कारण रामागुंडम फर्टिलाइजर एंड केमिकल लिमिटेड को 2021-22 से नवंबर 2025 के बीच अनुमानित 7,954 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ था। उसने यह भी कहा कि डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) संयंत्रों की क्षमता का उपयोग 2022-23 के 87.5% से घटकर 2025-26 के पहले 10 महीनों में 67.8% रह गया। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) कम उत्पादन के कारणों की पहचान करने और उसे ठीक करने के लिए नए संयंत्रों की समीक्षा की जाए, (ii) भविष्य में होने वाले सभी तकनीकी हस्तांतरण, प्रदर्शन गारंटी और वारंटी दायित्वों के साथ आएं, और (iii) क्षमता से कम उपयोग होने वाली और बंद पड़ी सभी डीएपी इकाइयों का मूल्यांकन किया जाए।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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