कैग रिपोर्ट का सारांश
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भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने 18 दिसंबर, 2025 को ‘दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) और प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य)’ पर अपनी ऑडिट रिपोर्ट जारी की। डीडीयूजीजेवाई योजना को ग्रामीण बिजली वितरण को सुदृढ़ करने के लिए 2014 में शुरू किया गया था। जबकि सभी गैर-बिजलीकृत ग्रामीण घरों को लास्ट-माइल कनेक्टिविटी पहुंचाने और बिजली उपलब्ध कराने के लिए 2017 में सौभाग्य योजना को शुरू किया गया था। कैग के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
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डीडीयूजीजेवाई के तहत प्रदर्शन: केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत कुल 75,893 करोड़ रुपए के परिव्यय को मंजूरी दी जिसमें 63,027 करोड़ रुपए की बजटीय सहायता शामिल थी। वास्तविक व्यय 64,495 करोड़ रुपए था, जिसमें 45,025 करोड़ रुपए की बजटीय सहायता शामिल थी। मार्च 2022 तक कृषि फीडर सेपरेशन की कुल संख्या 7,833 थी, जबकि 9,019 की मंजूरी और 16,500 के लिए कैबिनेट अनुमोदन था। परियोजनाओं को छह महीने के भीतर आवंटित किया जाना था और मंजूरी के बाद 24 महीने के भीतर पूरा किया जाना था। 82% परियोजनाओं में कार्यों के आवंटन में देरी हुई और 92% में पूरा होने में देरी हुई। 47% परियोजनाओं को पूरा होने में दो वर्ष से अधिक की देरी हुई। 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 13 में बिजली वितरण में होने वाले नुकसान को कम करने का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका।
कैग ने पाया कि बिजली मंत्रालय ने व्यवहार्यता अध्ययन नहीं किया यानी मंत्रालय ने यह जांच नहीं की कि क्या परियोजनाएं तकनीकी और आर्थिक रूप से संभव हैं। इसके परिणामस्वरूप फीडर सेपरेशन और प्रणाली सुदृढ़ीकरण के कार्यों में घटक-वार लक्ष्यों की प्राप्ति में 47% से 218% तक का भारी अंतर देखा गया। कैग ने यह भी देखा कि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) फील्ड सर्वे के बिना तैयार की गई थी, जो योजना के दिशानिर्देशों का उल्लंघन था। कैग ने सुझाव दिया कि मंत्रालय को कार्य स्वीकृत करने से पहले व्यवहार्यता अध्ययन और विस्तृत फील्ड सर्वे करना चाहिए। इससे योजना में सुधार होगा और कार्यान्वयन के दौरान होने वाले अंतरों या बदलावों में कमी आएगी।
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डीडीयूजीजेवाई के तहत गुणवत्ता आश्वासन: कैग ने डीडीयूजीजेवाई योजना के तहत गुणवत्ता नियंत्रण में कमियां पाईं। योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार, वितरण कंपनियों को खुद अपने स्तर पर जांच करनी थी कि काम की गुणवत्ता सही है या नहीं, यानी इनहाउस क्वालिटी चेक। जबकि थर्ड पार्टी मॉनटरिंग का काम ग्रामीण बिजलीकरण निगम (आरईसी) को करना था। आरईसी निरीक्षणों के दौरान चिह्नित 6.13 लाख कमियों/दोषों में से 1.09 लाख को समय पर दूर नहीं किया गया। कैग ने यह भी पाया कि छह राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की वितरण कंपनियों ने अनिवार्य गुणवत्ता आश्वासन योजनाएं तैयार नहीं कीं, और 11 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने अधिकृत विक्रेताओं की सूची अपलोड नहीं की। कैग ने वितरण कंपनी और आरईसी, दोनों स्तरों पर सख्त गुणवत्ता जांच और निगरानी तंत्र का सुझाव दिया।
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सौभाग्य के तहत प्रदर्शन: इस योजना के तहत स्वीकृत राशि 14,082 करोड़ रुपए थी, जबकि वास्तविक व्यय 9,246 करोड़ रुपए रहा। सौभाग्य डैशबोर्ड के अनुसार, तीन करोड़ घरों के प्रारंभिक लक्ष्य के मुकाबले 2.62 करोड़ घरों को बिजलीकृत किया गया। इनमें से 74 लाख घरों को डीडीयूजीजेवाई के तहत और 37 लाख घरों को राज्य योजनाओं के तहत बिजलीकृत किया गया। कैग ने गौर किया कि मार्च 2019 तक 100% लक्ष्य हासिल करने की घोषणा की गई थी। हालांकि मार्च 2019 तक सात राज्यों में 19 लाख घरों में बिजली नहीं थी। कैग ने यह भी गौर किया कि डीपीआर जमा करने में देरी हुई और फील्ड सर्वे नहीं किए गए। कैग ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) योजना शुरू करने से पहले लाभार्थियों का सटीक डेटा एकत्र करना, (ii) डीपीआर तैयार करने से पहले फील्ड सर्वे सुनिश्चित करना और (iii) सत्यापित घरेलू सूचियों के आधार पर धनराशि आवंटन की योजना बनाना।
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सौभाग्य के तहत गुणवत्ता आश्वासन: सौभाग्य योजना के तहत वितरण कंपनी द्वारा आंतरिक गुणवत्ता जांच और आरईसी द्वारा थर्ड पार्टी मॉनिटरिंग की जरूरत थी। कैग ने पाया कि 21 राज्यों में फैली 479 परियोजनाओं में से 224 परियोजनाओं में वितरण कंपनियों ने व्यापक गुणवत्ता आश्वासन योजनाएं तैयार नहीं कीं। 80 परियोजनाओं में गुणवत्ता आश्वासन योजनाएं कॉन्ट्रैक्टर एग्रीमेंट में शामिल नहीं थीं। कैग ने यह भी पाया कि आरईसी ने मई और अक्टूबर 2019 में क्वालिटी मॉनिटर नियुक्त किए, जबकि योजना मार्च 2019 तक पूरी होनी थी। इससे निगरानी का उद्देश्य ही विफल हो गया। कैग ने सुझाव दिया कि बिजली मंत्रालय को भविष्य की योजनाओं में गुणवत्ता आश्वासन तंत्र का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना चाहिए और नियंत्रण एवं निगरानी तंत्र को मजबूत करना चाहिए।
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आरईसी द्वारा वित्तीय प्रबंधन: सौभाग्य योजना के तहत आरईसी ने कार्यों को पूरा करने के लिए वितरण कंपनी को धनराशि जारी की। मार्च 2020 में आरईसी ने अतिरिक्त बजटीय उधार (ईबीआर) के माध्यम से 500 करोड़ रुपए जुटाए जिसमें से 96 करोड़ रुपए मार्च 2021 तक खर्च हो गए। जबकि 352 करोड़ रुपए पहले से उपलब्ध थे, फिर भी 404 करोड़ रुपए बिना उपयोग के रह गए। कैग ने पाया कि योजना के तहत धनराशि की जरूरत का अधिक आकलन किया गया था। कैग ने सुझाव दिया कि आरईसी को केवल निर्धारित जरूरत के अनुसार ही ईबीआर फंड जुटाने चाहिए।
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