india-map

अपने सांसद को खोजें

Switch to English
  • सांसद और विधायक
    संसद राज्य 2024 चुनाव
  • विधान मंडल
    संसद
    प्राइमर वाइटल स्टैट्स
    राज्यों
    विधानमंडल ट्रैक वाइटल स्टैट्स
    चर्चा पत्र
  • बिल
    संसद राज्य स्टेट लेजिस्लेटिव ब्रीफ
  • बजट
    संसद राज्य चर्चा पत्र
  • नीति
    चर्चा पत्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति मंथली पॉलिसी रिव्यू कमिटी की रिपोर्ट राष्ट्रपति का अभिभाषण वाइटल स्टैट्स COVID-19
  • करियर

अपने सांसद को खोजें

संसद राज्य 2024 चुनाव
प्राइमर वाइटल स्टैट्स
विधानमंडल ट्रैक वाइटल स्टैट्स
चर्चा पत्र
संसद राज्य स्टेट लेजिस्लेटिव ब्रीफ
संसद राज्य चर्चा पत्र
चर्चा पत्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति मंथली पॉलिसी रिव्यू कमिटी कीरिपोर्ट राष्ट्रपति का अभिभाषण वाइटल स्टैट्स COVID-19
  • नीति
  • कमिटी की रिपोर्ट
  • देश में ट्रिब्यूनल प्रणाली के कामकाज की समीक्षा

नीति

  • चर्चा पत्र
  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति
  • कमिटी की रिपोर्ट
  • राष्ट्रपति का अभिभाषण
  • मंथली पॉलिसी रिव्यू
  • वाइटल स्टैट्स
पीडीएफ

देश में ट्रिब्यूनल प्रणाली के कामकाज की समीक्षा

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

 

  • कार्मिक, जन शिकायत, कानून और न्याय मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री बृज लाल) ने 7 अगस्त, 2026 को "देश में ट्रिब्यूनल प्रणाली के कामकाज की समीक्षा" पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। ट्रिब्यूनल ऐसी संस्थाएं होती हैं जिन्हें न्यायिक या अर्ध-न्यायिक काम करने के लिए बनाया गया है। इनका उद्देश्य न्यायपालिका पर मुकदमों का बोझ कम करना या तकनीकी मामलों के लिए विषय-संबंधी विशेषज्ञता को शामिल करना है। कमिटी ने पांच ट्रिब्यूनल के कामकाज और क्षमताओं की समीक्षा की: (i) इनकम टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल (आईटीएटी), (ii) रेलवे दावा ट्रिब्यूनल (आरसीटी), (iii) दूरसंचार विवाद निवारण एवं अपीलीय ट्रिब्यूनल (टीडीएसएटी), (iv) राष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल (एनजीटी), और (v) राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी)। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
  • ट्रिब्यूनल्स में रिक्तियां: कमिटी ने गौर किया कि जिन ट्रिब्यूनल्स की समीक्षा की गई, उनमें से लगभग सभी में सदस्यों की कमी थी। आईटीएटी में, मई 2026 तक सदस्यों के लिए मंज़ूर 126 पदों में से 27 पद खाली थे। राष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में 10 न्यायिक और 10 एक्सपर्ट सदस्यों की ज़रूरत है, जबकि अभी वहां पांच न्यायिक और छह एक्सपर्ट सदस्य ही हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि संभावित खाली पदों के लिए नियुक्ति की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दी जानी चाहिए, ताकि पद छोड़ने वाले सदस्यों की जगह तुरंत नए सदस्य लाए जा सकें। कमिटी ने यह भी सुझाव दिया कि राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में बढ़ते मामलों को देखते हुए, वहां अतिरिक्त बेंच और सदस्यों की ज़रूरत की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए।
  • कमिटी ने यह भी गौर किया कि अस्थायी, कॉन्ट्रैक्ट या आउटसोर्स किए गए गैर-न्यायिक कर्मचारियों पर निर्भरता से प्रशासनिक दक्षता और मामलों की शेड्यूलिंग पर असर पड़ता है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) वेटलिस्ट और रिज़र्व पैनल बनाना, (ii) विभाग में कर्मचारियों की कमी या आवश्यकता का नियमित रूप से आकलन करना, और (iii) सीधी भर्ती के मौके बढ़ाने के लिए एनसीएलटी भर्ती नियम, 2020 में संशोधन करना।
  • डिजिटल एडजुडिकेशन और साइबर सुरक्षा: कमिटी ने कहा कि आईटीएटी ने अपने e-Dwar पोर्टल के माध्यम से अपीलों और आवेदनों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से दाखिल करने (ई-फाइलिंग) की व्यवस्था लागू की है। इस संबंध में कमिटी ने करदाताओं की जानकारी के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियमित रूप से साइबर-सुरक्षा ऑडिट करने का सुझाव दिया।
  • रेलवे दावा ट्रिब्यूनल (आरसीटी) ने e-RCT प्रोजेक्ट को लागू करके डिजिटलीकरण की पहल की है। कमिटी ने इस पहल के दायरे को बढ़ाने का सुझाव दिया ताकि पूरी तरह से डिजिटल ई-फाइलिंग सिस्टम और रियल-टाइम केस ट्रैकिंग की सुविधा शुरू की जा सके। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) आरसीटी दावे को कहीं से भी फाइल करने की अनुमति देना, (ii) मुकदमे से पहले मध्यस्थता की व्यवस्था शुरू करना, और (iii) मुआवज़े को एक समान बनाना।
  • कमिटी ने कहा कि एनजीटी में कोई विशेष कंप्यूटर या आईटी सेक्शन नहीं था। कमिटी ने सभी बेंचों पर खास तकनीकी पदों के साथ एक व्यवस्थित आईटी डिवीज़न बनाने का सुझाव दिया। इससे ई-फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई में मदद मिलेगी।
  • लंबित मामलों का निपटारा: कमिटी ने कहा कि सभी ट्रिब्यूनल्स में व्यवस्थागत देरी ही मुख्य बाधा बनी हुई है। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) आरसीटी में लिखित बयानों के लिए समय-सीमा घटाकर 45 दिन और डिविजनल रेलवे मैनेजर (डीआरएम) की रिपोर्ट के लिए 60 दिन की जाए, (ii) एनसीएलटी में लंबे समय से लंबित कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया के मामलों को प्राथमिकता दी जाए, और (iii) एनजीटी के पुराने मामलों की चरणबद्ध निगरानी की जाए ताकि यह पता चले कि देरी कहां हो रही है और उसे ठीक किया जाए। कमिटी ने यह भी कहा कि एनसीएलटी में इनसॉल्वेंसी के मामलों के लिए अलग से विशेष अदालतें बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। इससे उन अदालतों पर काम का बोझ कम होगा, जिन्हें अभी कंपनी कानून और इनसॉल्वेंसी, दोनों तरह के मामले एक साथ देखने पड़ते हैं। 
  • इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियां: कमिटी ने ट्रिब्यूनल्स में इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कमियों को रेखांकित किया, जैसे: (i) पुरानी पड़ चुकी इमारतें, (ii) किराए के परिसर, और (iii) अनुपयुक्त सरकारी और कॉरपोरेट बिल्डिंग्स से संचालित होने वाली एनसीएलटी की बेंचेस। कमिटी ने इस इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने के लिए पर्याप्त बजटीय सहायता देने का सुझाव दिया। उसने आगे सुझाव दिया कि: (i) चालू निर्माण परियोजनाओं को पूरा किया जाए, (ii) नए स्थानों (साइट्स) का मूल्यांकन किया जाए, और (iii) नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम (एनसीएमएस) के नियमों के मुताबिक पक्की और स्थायी अदालतें बनाई जाएं, ताकि कामकाज की क्षमता बढ़े और जरूरत पड़ने पर जगह की कोई कमी न हो।
  • टीडीएसएटी का क्षेत्राधिकार: दूरसंचार विवाद निपटान और अपीलीय ट्रिब्यूनल के लिए कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) दूरसंचार उपभोक्ताओं के विवादों में इसकी भूमिका को बढ़ाना, (ii) एक स्वतंत्र दूरसंचार लोकपाल बनाना और (iii) आधार से संबंधित अपील प्रक्रियाओं के बारे में लोगों में जागरूकता फैलाना।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

 

हमें फॉलो करें

Copyright © 2026    prsindia.org    All Rights Reserved.