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पीडीएफ

भारत में क्रॉनिक किडनी रोगों की व्यापकता

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: प्रो. राम गोपाल यादव) ने 7 अगस्त, 2026 को ‘भारत में क्रॉनिक किडनी रोगों की व्यापकता- रोकथाम, पहचान, उपचार और प्रबंधन’ पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी ने भारत में क्रॉनिक किडनी रोगों (सीकेडी) के तेजी से बढ़ते मामलों और प्रवृत्तियों की समीक्षा की। कमिटी के निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • उपचार के लिए बेहतर वित्तीय व्यवस्था की जरूरत: कमिटी ने कहा कि सीकेडी की रोकथाम और इलाज की लागत सालाना दो से पांच लाख रुपए हो सकती है, जबकि मेंटेनेंस डायलिसिस की लागत सालाना तीन से छह लाख रुपए तक हो सकती है। उसने यह गौर किया कि आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) का किडनी ट्रांसप्लांट पैकेज अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद केवल 15 दिनों की देखभाल को कवर करता है, जिसमें लंबे समय तक चलने वाली दवाओं की लागत शामिल नहीं है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) एबी-पीएमजेएवाई के तहत ट्रांसप्लांट के बाद मिलने वाले कवरेज की अवधि को 15 दिनों से बढ़ाकर एक वर्ष किया जाए ताकि इसमें फॉलो-अप, जांच और दवाओं को शामिल किया जा सके, (ii) योजना के पारिवारिक स्वास्थ्य कवर को पांच लाख रुपए से बढ़ाकर प्रति वर्ष 10 लाख रुपए किया जाए, और (iii) सीकेडी इलाज के सभी चरणों में आने वाले खर्च और कमी को समझने के लिए एक राष्ट्रीय लागत अध्ययन कराया जाए।

  • मेडिकल स्पेशलिस्ट्स की कमी: कमिटी ने नेफ्रोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट और प्रशिक्षित डायलिसिस टेक्निशियंस की कमी पर गौर किया। कमिटी ने कई राज्यों के जिला अस्पतालों में नेफ्रोलॉजिस्ट के स्वीकृत और कार्यरत पदों की संख्या शून्य होने पर भी चिंता जताई। कमिटी ने यह भी गौर कि नेफ्रोलॉजिस्ट हर तीन से चार महीने में केवल एक बार जिला अस्पतालों का दौरा करते हैं। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) पिछड़े या कम चिकित्सा सुविधाओं वाले राज्यों, मुख्य रूप से बिहार, ओड़िशा, राजस्थान, असम और छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों के खाली पड़े विशेषज्ञ पदों को भरा जाए, (ii) चरणबद्ध तरीके से सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों में विशेष नेफ्रोलॉजी विभाग स्थापित किए जाएं, और (iii) भविष्य में किडनी विशेषज्ञों की कमी को दूर करने के लिए डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (डीएम) नेफ्रोलॉजी की सीटों को बढ़ाया जाए।

  • रोकथाम पहले की रणनीति: कमिटी ने गौर किया कि भारत में अनुमानित 138 मिलियन लोग सीकेडी से पीड़ित हैं, जिनमें से लगभग दो लाख नए मरीज हर साल गंभीर स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। कमिटी ने कहा कि सिर्फ डायलिसिस और ट्रांसप्लांट पर निर्भर रहना वित्तीय और संरचनात्मक दृष्टि से दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ नहीं है, यानी यह बजट और अस्पतालों के बुनियादी ढांचे पर एक ऐसा बोझ है जिसे लंबे समय तक संभालना मुश्किल है। इसलिए, कमिटी ने यह सुझाव दिया कि गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण से जुड़े कार्यक्रम को 'रोकथाम पहले' की रणनीति पर केंद्रित किया जाना चाहिए। कमिटी ने सुझाव दिया कि जिन लोगों को किडनी की बीमारी का खतरा सबसे ज्यादा है, उनकी पहचान समय रहते करने के लिए आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का इस्तेमाल किया जाए जिसके तहत आशा और एएनएम कार्यकर्ता घर-घर जाकर जांच अभियान चलाएं।

  • जांच का मानकीकरण: सीकेडी की पहचान एस्टीमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (eGFR) के आधार पर की जाती है। यह इस बात को मापता है कि किडनी खून से क्रिएटिनिन जैसे अपशिष्ट पदार्थों को कितनी अच्छी तरह फिल्टर कर रही है। कमिटी ने कहा कि सीकेडी के शुरुआती चरणों में अक्सर कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, और लक्षण सामने आने से पहले मरीज अपनी किडनी की 60-70% कार्यक्षमता खो सकते हैं। उसने कहा कि प्रयोगशालाएं काफी हद तक सीरम क्रिएटिनिन पर निर्भर करती हैं, जो किडनी को गंभीर नुकसान होने के बावजूद सामान्य रह सकता है और यह उम्र, लिंग व मांसपेशियों के वजन या भार के अनुसार बदलता रहता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के हर सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट के साथ eGFR रिपोर्टिंग को अनिवार्य किया जाए। उसने यह भी कहा कि 20 वर्ष और उससे अधिक आयु के प्रत्येक व्यक्ति के लिए वर्ष में दो बार किडनी फंक्शन टेस्ट (केएफटी) कराया जाए, जो गरीबी रेखा से नीचे के मरीजों के लिए मुफ्त और गरीबी रेखा से ऊपर के मरीजों के लिए मामूली शुल्क पर उपलब्ध हो।

  • संसाधनों तक असमान पहुंच: कमिटी ने ट्रांसप्लांट की मांग और उपलब्धता के बीच एक बड़े अंतर पर गौर किया। वर्ष 2019 और 2023 के बीच, जीवित अंग दाताओं में महिलाओं का हिस्सा 64% था, जबकि जिन्हें अंग मिल रहे थे, उनमें 70% पुरुष थे। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) इस लैंगिक असमानता के पीछे के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों पर एक अध्ययन कराया जाए, (ii) प्रत्येक बड़े राज्य के कम से कम तीन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में और छोटे राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों के कम से कम एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रत्यारोपण सुविधाएं स्थापित की जाएं, और (iii) अंग निकालने की प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए।

  • बीमारी बढ़ाने में जलवायु की भूमिका: कमिटी ने गौर किया कि भारत में सीकेडी के कुल मामलों में से 16% मामले अज्ञात कारणों वाले सीकेडी के हैं (जिसे सीकेडीयू कहा जाता है)। यह बीमारी डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर जैसे पारंपरिक जोखिमों के बिना होती है और कृषि व खुले में काम करने वाले युवा मजदूरों को असमान रूप से प्रभावित करती है। कमिटी ने इसके प्रमुख जोखिमों का उल्लेख किया जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) अत्यधिक गर्मी का तनाव, (ii) शरीर में पानी की कमी, (iii) भारी धातु और (iv) कीटनाशकों का प्रभाव। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) कृषि, जल शक्ति, पर्यावरण और श्रम मंत्रालयों के समन्वय से सीकेडीयू की रोकथाम और निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया जाए, (ii) जिला-विशिष्ट उपाय लागू किए जाएं जैसे कि कार्यस्थलों पर पानी पीने के लिए ब्रेक, छायादार रेस्ट एरिया और सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था, तथा (iii) उच्च जोखिम वाले श्रमिकों के लिए कृषि-रसायनों का रेगुलेशन और कार्यस्थल पर किडनी स्वास्थ्य कार्यक्रम की पेशकश।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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