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पीडीएफ

भारत में सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवा

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: प्रो. राम गोपाल यादव) ने 7 अगस्त, 2026 को 'सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवा' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी ने भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की क्षमता, दक्षता और व्यापकता की समीक्षा की। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • अपर्याप्त बजटीय आवंटन: कमिटी ने कहा कि जीडीपी का 1.4% हिस्सा सरकारी स्वास्थ्य खर्च, सभी को वित्तीय सुरक्षा देने के लिए काफ़ी नहीं है। यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में निर्धारित 2.5% के लक्ष्य से काफ़ी कम है। कमिटी ने सुझाव दिया कि स्वास्थ्य के लिए वित्तपोषण को बढ़ाकर जीडीपी का 2.5% किया जाए और उसके बाद अगले पांच सालों में इसे 5% तक करने के लक्ष्य के लिए एक समय-सीमा वाला रोडमैप बनाया जाए।

  • स्वास्थ्य बीमा योजना के कवरेज को बढ़ाना: कमिटी ने कहा कि आबादी का 30% हिस्सा अभी भी व्यवस्थित वित्तीय स्वास्थ्य सुरक्षा से वंचित है। कमिटी ने उनके लिए स्वैच्छिक अंशदायी बीमा मॉडल शुरू करने का सुझाव दिया। कमिटी ने कहा कि मौजूदा स्वास्थ्य बीमा योजनाएं आउटपेशेंट परामर्श, डायग्नोस्टिक टेस्ट और दवाओं को पर्याप्त रूप से कवर नहीं करती हैं। कमिटी ने भी कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों की तुलना में निजी स्वास्थ्य केंद्रों में आउटपेशेंट का खर्च पांच गुना अधिक होने का अनुमान है। कमिटी ने आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) के कवरेज को बढ़ाते हुए उसमें आउटपेशेंट परामर्श, डायग्नोस्टिक टेस्ट और दवाओं को शामिल करने का सुझाव दिया। यह योजना प्रति परिवार प्रति वर्ष पांच लाख रुपए तक का कैशलेस स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान करती है। कमिटी ने इस योजना के तहत वार्षिक पारिवारिक कवरेज सीमा को बढ़ाकर 10 लाख रुपए करने का भी सुझाव दिया।

  • कमिटी ने यह भी कहा कि भारत के मौजूदा स्वास्थ्य खर्च का लगभग 30% हिस्सा दवाओं पर किया जाता है। कमिटी ने सभी ज़िला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसीज़) और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत आने वाले निजी अस्पतालों में 'जन औषधि केंद्र' खोलने का सुझाव दिया। ये केंद्र सरकार द्वारा चलाए जाने वाले फ़ार्मेसी स्टोर हैं, जहां ब्रांडेड दवाओं की तुलना में कम कीमत पर जेनेरिक दवाएं बेची जाती हैं। कमिटी ने खुले बाज़ार में जीवन रक्षक और बिना डॉक्टर की पर्ची के मिलने वाली (ओटीसी) दवाओं के लिए मूल्य नियंत्रण लागू करने का भी सुझाव दिया।

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य संरचना: कमिटी ने कहा कि स्वास्थ्य के लिए आवंटित बजट का 51% हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए होता है, जबकि द्वितीयक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवा को क्रमशः 28% और 11% मिलता है। कमिटी ने गौर किया कि इससे मरीज़ महंगे निजी स्वास्थ्य सेवा केंद्र में जा सकते हैं। साथ ही, यह भी देखा गया कि प्रति 1,000 आबादी पर निजी क्षेत्र में सिर्फ़ 0.79 बेड उपलब्ध हैं। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) सीएचसी, ज़िला अस्पतालों और राज्य के मेडिकल कॉलेजों में निजी क्षेत्र के पूंजीगत निवेश को बढ़ाना, और (ii) सार्वजनिक स्वास्थ्य संरचना को मज़बूत करने के लिए, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, एक विशेष स्वास्थ्य सेवा पूंजीगत व्यय कोष की स्थापना।

  • निजी क्षेत्र का रेगुलेशन: कमिटी ने कहा कि निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च सरकारी अस्पतालों के मुकाबले काफी ज़्यादा है। कमिटी ने निजी स्वास्थ्य सेवा में ज़रूरत से ज़्यादा कमर्शियलाइज़ेशन, बहुत ज़्यादा बिलिंग और गैर-ज़रूरी मेडिकल प्रक्रियाओं के मामलों पर गौर किया। कमिटी ने सभी निजी अस्पतालों में (i) आम मेडिकल प्रक्रियाओं, (ii) ज़रूरी इलाज और (iii) डायग्नोस्टिक टेस्ट की एक जैसी दर तय करने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी फ्रेमवर्क बनाने का सुझाव दिया। कमिटी पूरे देश में क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट, 2010 को एक समान रूप से लागू करने का भी सुझाव दिया। यह एक्ट क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स के रजिस्ट्रेशन और रेगुलेशन का प्रावधान करता है और उनके कामकाज के न्यूनतम मानक तय करता है।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में मेडिकल प्रोफेशनल्स की कमी: कमिटी ने कहा कि पिछले दशक में एमबीबीएस सीटों में 151% की बढ़ोतरी के बावजूद, ग्रामीण सीएचसीज़ में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की 80% कमी है। कमिटी ने गौर किया कि कई एमबीबीएस ग्रेजुएट्स या तो शहरों में ही काम कर रहे हैं या फिर बेरोजगार हैं। कमिटी ने स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं का समान वितरण सुनिश्चित करने के लिए भौगोलिक रूप से उत्तरदायी तैनाती नीति लागू करने का सुझाव दिया (यानी उन्हें क्षेत्रों के हिसाब से तैनात किया जाए ताकि हर क्षेत्र में उनकी संख्या बराबर बनी रहे)। कमिटी ने इसके लिए राज्य स्तर पर समर्पित स्वास्थ्य भर्ती बोर्ड स्थापित करने का भी सुझाव दिया।

  • नवजात और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल: कमिटी ने नवजात शिशुओं और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल में कमियों पर गौर किया। इस संबंध में उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) केंद्र सरकार वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के लिए राष्ट्रीय नीतियां बनाए, (ii) एबी-पीएमजेएवाई का दायरा बढ़ाकर इसमें पांच वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों को शामिल किया जाए, (iii) स्थानीय सरकारों के लिए बजट का एक निश्चित हिस्सा वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के लिए निर्धारित किया जाए। कमिटी ने सभी ज़िला अस्पतालों और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के लिए खास यूनिट बनाने का भी सुझाव दिया।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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