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वैकल्पिक विवाद निवारण व्यवस्था की मजबूती के लिए संस्थागत तंत्र तैयार और विकसित करना

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री बृज लाल) ने 7 अगस्त, 2026 को "वैकल्पिक विवाद निवारण व्यवस्था की मजबूती के लिए संस्थागत तंत्र तैयार और विकसित करना" पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। वैकल्पिक विवाद निवारण (एडीआर) व्यवस्था ऐसे तरीके होते हैं जिनसे मध्यस्थता, आर्बिट्रेशन या सुलह-समझौते के ज़रिए औपचारिक अदालती प्रक्रिया से बाहर विवादों को सुलझाया जाता है। कमिटी के निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • मध्यस्थता: मध्यस्थता एक्ट, 2023 में भारत में विवाद निवारण की प्रक्रिया को औपचारिक रूप देने के लिए मध्यस्थता परिषद (एमसीआई) के गठन का प्रावधान है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) एमसीआई को जल्द से जल्द काम में लाना, (ii) इसके नियमों को लागू करने के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय करना, और (iii) 2023 के एक्ट के बाकी के सेक्शंस की अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया में तेज़ी लाना।

  • आईआईएसी: कमिटी ने गौर किया कि वर्ष 2022 में अपनी स्थापना के बाद से इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर (आईआईएसी) ने लगभग तीन वर्षों में केवल 17 मामलों की सुनवाई की है। कमिटी ने कहा कि महत्वपूर्ण सार्वजनिक व्यय के बावजूद, आईआईएसी को बहुत कम लोग जानते और उसका इस्तेमाल करते हैं। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को शामिल करके मध्यस्थों के पैनल का विस्तार और विविधीकरण किया जाए, (ii) अंतरराष्ट्रीय स्तर के अच्छे तौर तरीकों के अनुरूप व्यवस्था बनाई जाए, (iii) मामलों को तय समय में निपटाने की सख्त निगरानी हो, और (iv) मामलों की संख्या और दुनिया भर में इस सेंटर की साख बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच बनाई जाए, उनसे संपर्क साधा जाए और जरूरी बदलाव किए जाएं।

  • डीआईएसी में सुविधाओं की कमी: कमिटी ने कहा कि दिल्ली इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर (डीआईएसी) में आने वाले मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद वहां जगह, सुनवाई की सुविधाओं और कर्मचारियों की संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) सेंटर की जगह और सुविधाओं को बढ़ाया जाए, (ii) प्रशासनिक काम संभालने के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों को काम पर रखा जाए, और (iii) फाइनांशियल प्लानिंग को और बेहतर बनाया जाए।

  • नाल्सा की फंडिंग: कमिटी ने कहा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नाल्सा- एनएएलएसए) को वर्ष 2026-27 में 550 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे जो कि 1,059 करोड़ रुपए की अनुमानित जरूरत से काफी कम है। इसके अलावा, कर्मचारियों के कुल 45 पदों में से 16 पद खाली पड़े थे। कमिटी ने सुझाव दिया कि खाली पदों को समय पर भरा जाए और बजट की इस कमी को दूर किया जाए।

  • सार्वजनिक अनुबंधों में अनिवार्यता: कमिटी ने कहा कि लोग अभी भी आपसी स्तर पर ही विवाद सुलझाने में लगे हैं, जिसकी वजह से मान्यता प्राप्त संस्थाओं का चलन बहुत कम है। कमिटी ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में, अनुबंध का ड्राफ्ट तैयार करते समय संस्थागत मध्यस्थता पर विचार ही नहीं किया जाता है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) औद्योगिक निकायों के साथ औपचारिक समझौते किए जाएं, और (ii) वाणिज्यिक अनुबंधों में आईआईएसी को नामित विवाद समाधान मंच बनाया जाए।

  • न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा: कमिटी ने कहा कि मध्यस्थता के मामलों में अदालत का अत्यधिक या असंगत हस्तक्षेप प्रक्रिया को धीमा और कमजोर करता है। कमिटी ने मध्यस्थता के मामलों में अदालती हस्तक्षेप के दायरे को स्पष्ट और सीमित करने के लिए सख्त और साफ दिशानिर्देश तैयार करने का सुझाव दिया।

  • एडीआर करियर को प्रोत्साहन देना: कमिटी ने कहा कि एडीआर की भूमिकाओं को पूर्णकालिक करियर के बजाय अंशकालिक या सेवानिवृत्ति के बाद किए जाने वाले कार्य के रूप में देखा जाता है। इससे युवा पेशेवर इस क्षेत्र में आने से कतराते हैं। एडीआर को एक सुव्यवस्थित पेशे के रूप में विकसित करने के लिए कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं: (i) एक्रेडिटेशन प्रणाली, स्वीकृत योग्यताएं और करियर में आगे बढ़ने के स्पष्ट रास्ते स्थापित किए जाएं, और (ii) विश्वविद्यालयों की कानूनी शिक्षा में एडीआर को शामिल किया जाए।

  • संस्थान पूर्व मध्यस्थता: कमिटी ने गौर किया कि संस्थान पूर्व मध्यस्थता और समझौता (पीआईएमएस) तंत्र का बहुत कम उपयोग किया गया है। कमिटी ने यह भी देखा कि कई वादी पीआईएमएस को सिर्फ प्रक्रियागत औपचारिकता मानते हैं या बिना गंभीर इरादे के साथ इसमें भाग लेते हैं। कमिटी ने पीआईएमएस को अनिवार्य बनाने और इसमें शामिल होने से इनकार करने वाले पक्षों पर आर्थिक दंड लगाने का सुझाव दिया।

  • लोक अदालतें: मुकदमेबाजी से पहले और अदालतों में लंबित मामलों को सुलझाने के लिए राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर लोक अदालतों को संचालित किया जाता है। कमिटी ने पाया कि लोक अदालतें बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा कर रही हैं। समझौतों की गुणवत्ता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए, कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) यह तय करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जाएं कि कौन से मामले लोक अदालत में जाएंगे, और समझौते कैसे कराए जाएंगे, और (ii) समझौतों से जुड़े डेटा की बेहतर निगरानी की जाए।

  • तकनीकी एकीकरण: कमिटी ने पाया कि वर्चुअल सुनवाई और ऑनलाइन विवाद समाधान जैसी डिजिटल प्रक्रियाओं को अपनाने की गति अभी भी धीमी है। गैर-शहरी क्षेत्र खराब कनेक्टिविटी, यूजर-फ्रेंडली प्लेटफॉर्म की कमी और कम डिजिटल तत्परता (रेडीनेस) से जूझ रहे हैं। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) न्यूनतम डिजिटल मानक और दिशानिर्देश तैयार किए जाएं, (ii) आसान और यूजर-फ्रेंडली डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए जाएं, और (iii) हितधारकों के लिए बुनियादी डिजिटल प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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