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पीडीएफ

स्टील क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और ‘मेड इन इंडिया’ स्टील उत्पादन के लिए रोडमैप

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • कोयला, खदान और स्टील से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री अनुराग सिंह ठाकुर) ने 22 जुलाई, 2026 को 'स्टील क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और ‘मेड इन इंडिया’ स्टील उत्पादन के लिए रोडमैप' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी ने देश में स्टील क्षेत्र की स्थिति की समीक्षा की और घरेलू स्टील उत्पादन को बढ़ाने वाली योजनाओं की प्रगति का आकलन किया। भारत की जीडीपी में स्टील क्षेत्र का योगदान 2% है और 2018 से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक देश है। देश की स्टील उत्पादन क्षमता 2015 में 110 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) से बढ़कर मार्च 2026 तक 220 MTPA हो गई है। राष्ट्रीय स्टील नीति, 2017 का लक्ष्य 2030-31 तक कुल कच्चा स्टील उत्पादन क्षमता को 300 MTPA तक पहुंचाना है। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव इस प्रकार हैं:

  • स्पेशलिटी स्टील के लिए पीएलआई योजना: उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, वित्तीय प्रोत्साहन के ज़रिए स्पेशलिटी स्टील के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देती है। स्पेशलिटी स्टील एक उच्च-मूल्य वाला स्टील है जिसे महत्वपूर्ण उद्योगों में उपयोग के लिए तैयार स्टील पर कोटिंग, प्लेटिंग या हीट-ट्रीटमेंट करके बनाया जाता है। इसके लिए तीन चरणों में आवेदन मंगाए गए थे। कमिटी ने गौर किया कि पहले दो चरण में कुल 44,106 करोड़ रुपए के निवेश का वादा किया गया था, लेकिन अक्टूबर 2025 तक वास्तविक निवेश 22,973 करोड़ रुपए (वादे का 52%) ही हुआ। कुल उत्पादन 2.3 मिलियन टन रहा, जो 14.3 मिलियन टन के लक्ष्य का सिर्फ 16% था। मंत्रालय का कहना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि यह योजना 2024 से 2028 तक, पांच वर्ष के अलग-अलग चरणों में पूरी होगी। प्रोत्साहन राशि का वितरण 2029 तक जारी रहेगा। प्रतिबद्ध निवेश का शेष 21,133 करोड़ रुपए 2030 तक धीरे-धीरे आएगा। कमिटी ने योजना के तहत आरएंडडी और तकनीक हस्तांतरण के लिए सहयोग को मज़बूत करने का सुझाव दिया।

  • कोकिंग कोल आयात पर निर्भरता को कम करना: कमिटी ने गौर किया कि 2024-25 में कोकिंग कोल के लिए भारत की आयात पर निर्भरता लगभग 85-90% थी जिसमें से 54% आयात अकेले ऑस्ट्रेलिया से होता था। कमिटी ने आपूर्ति पर निर्भरता के जोखिम को कम करने के लिए आयात के स्रोतों में विविधता लाने, यानी अलग-अलग देशों से आयात करने का सुझाव दिया। 'मिशन कोकिंग कोल' का लक्ष्य 2030 तक घरेलू क्रूड कोकिंग कोल के उत्पादन को बढ़ाकर 140 मिलियन टन (MT) और कोल ब्लेंडिंग को 30% करके इस निर्भरता को 65% तक कम करना है। कमिटी ने गौर किया कि ब्लेंडिंग अभी भी लगभग 10% पर बनी हुई है। कमिटी ने यह भी गौर किया कि भारत कोकिंग कोल लिमिटेड ने 2025 में लगभग 40.5 MT क्रूड कोकिंग कोल का उत्पादन किया था।

  • लौह अयस्क की उपलब्धता: कमिटी ने गौर किया कि भारत के हेमेटाइट भंडार का केवल 23% हिस्सा ही उच्च-कोटि (62% से ज़्यादा लोहा) का है। बाकी भंडार मध्यम या निम्न-कोटि के हैं। कमिटी ने निम्न-कोटि के अयस्क कणों (ओर फाइन्स) का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए बेनिफिसिएशन और पेलेटाइजेशन क्षमता को बढ़ाने का सुझाव दिया। बेनिफिशिएशन वह प्रक्रिया होती है जिसमें अयस्क से अशुद्धियों को हटाकर उसे औद्योगिक इस्तेमाल के लायक बनाया जाता है।

  • निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता: कमिटी ने गौर किया भारतीय स्टील निर्यातकों को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है: (i) लॉजिस्टिक्स की अधिक लागत, (ii) गैर-टैरिफ बाधाएं, (iii) सुरक्षात्मक प्रतिबंध, और (iv) कार्बन से जुड़ी रिपोर्टिंग के बढ़ते हुए सख्त नियम, जिसमें यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (सीबीएएम) भी ​​शामिल है। सीबीएएम के तहत कुछ चीजों (जैसे स्टील) के आयात पर टैक्स लगाया जाता है। यह टैक्स इस बात से तय होता है कि उस वस्तु को बनाने में कितना कार्बन प्रदूषण हुआ है। कमिटी ने कहा किया कि इससे प्रतिस्पर्धात्मकता पर काफी असर पड़ सकता है, खासकर एमएसएमई और माध्यमिक उत्पादकों के लिए, जो निहित उत्सर्जन को मापने और उसका डॉक्यूमेंटेशन करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय को प्राथमिकता वाले निर्यात बाजारों और उत्पाद श्रेणियों की पहचान करने के लिए एक विविधीकरण रणनीति पर विचार करना चाहिए।

  • लॉजिस्टिक और इंफ्रास्ट्रक्चर: कमिटी ने गौर किया कि भारतीय स्टील उत्पादक कंपनियों को अपने राजस्व का 16-18% हिस्सा लॉजिस्टिक्स पर खर्च करना पड़ता है, जबकि इसका वैश्विक मानक 10-12% है। कमिटी ने इस अंतर को 2028-29 तक कम करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) समर्पित माल ढुलाई गलियारों को समय सीमा के भीतर लागू करना, (ii) लगभग 1,000 किलोमीटर लंबी फर्स्ट और लास्ट-माइल सड़क कनेक्टिविटी में सुधार करना, और (iii) स्लरी पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाना। कमिटी ने स्टील की ढुलाई के लिए तटीय और अंतर्देशीय जलमार्गों को विकसित करने का भी सुझाव दिया।

  • माध्यमिक स्टील उत्पादकों को डीकार्बोनाइजेशन के लिए सहायता: कमिटी ने माध्यमिक स्टील उत्पादकों के लिए एक चरणबद्ध और किफायती डीकार्बोनाइज़ेशन रोडमैप तैयार करने का सुझाव दिया, साथ ही उनके तकनीकी उन्नयन के लिए लगातार सहायता देने का सुझाव दिया। कमिटी ने गौर किया कि देश की कुल कच्चा स्टील उत्पादन क्षमता में इन उत्पादकों की हिस्सेदारी लगभग 47% है और इनमें एमएसएमई का एक बहुत बड़ा नेटवर्क शामिल है।   

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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