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साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी ब्रीफ : जीन एडिटिंग

 

 

 

 

 

 

जीन एडिटिंग की मदद से अब किसी भी जीव के डीएनए में सटीक बदलाव करना मुमकिन हो गया है। इसका इस्तेमाल मेडिकल रिसर्च, बीमारियों के इलाज और कृषि क्षेत्र को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है। इस ब्रीफ में हम इन तकनीकों, उनके संभावित उपयोग और उनसे जुड़ी चिंताओं का उल्लेख कर रहे हैं।

सारांश

  • जीन एडिटिंग में जीनोम के विशेष स्थानों पर जेनेटिक मैटीरियल को जोड़ने, हटाने या बदलने के लिए एंजाइम्स का इस्तेमाल किया जाता है।  

  • जीन एडिटिंग के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। CRISPR-Cas9 इनमें से सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीका है। इसे बैक्टीरिया के प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र से ग्रहण किया गया है।

  • जीन एडिटिंग के कई उपयोग हैं, जैसे बीमारियों का इलाज, संक्रामक रोगों का नियंत्रण और फसलों में सुधार।

  • इसके कई संभावित खतरे भी हैं, जैसे डीएनए में अनचाहे एडिट्स से सुरक्षा जोखिम, डिजाइनर बेबी बनाने में इस्तेमाल, इकोलॉजिकल खतरा और जेनेटिकली एडिटेड जीवों को पहचानने की रेगुलेटरी चुनौतियां।

पृष्ठभूमि

कोशिकाएं सभी जीवित जीवों की मूलभूत संरचना होती हैं।[1]  लगभग सभी कोशिकाओं में डीएनए (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) होता है।1  डीएनए में जीवित जीव के विकास, जीवित रहने और प्रजनन के लिए आवश्यक निर्देश होते हैं।[2]  जीन डीएनए का एक खंड होता है।1  यह माता-पिता से संतान को मिलता है और इसमें ऐसे निर्देश होते हैं जो आंखों के रंग या बालों के प्रकार जैसे लक्षणों को निर्धारित करते हैं (अक्सर अन्य जीन्स के साथ मिलकर)।1  मनुष्यों में 20,000 से 25,000 जीन्स होने का अनुमान है।1  अधिकांश यौन प्रजनन करने वाली प्रजातियों (मनुष्यों सहित) के जीवों में अधिकांश जीन्स की दो प्रतियां, यानी कॉपियां होती हैं। इनमें एक प्रति मां से तो दूसरी पिता से मिलती है।1  डीएनए के पूरे सेट को जीनोम कहा जाता है।[3]  

हजारों वर्षों से मनुष्य वांछनीय गुणों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए पौधों और पशुओं की चुनींदा ब्रीडिंग करते आ रहे हैं।[4]  जैसे पत्तागोभी, ब्रोकोली और फूलगोभी को उनकी जंगली किस्मों से विकसित किया गया। इसके लिए अच्छे पत्तों और फूलों वाले पौधों को चुन-चुनकर विकसित किया गया।4,[5]  विज्ञान में हुई तरक्की ने अब यह संभव कर दिया है कि प्रयोगशाला में किसी जीव के जीन्स में सीधे बदलाव किए जा सकें। इसमें नया जीन डालना, किसी पुराने जीन को हटाना या निष्क्रिय करना, या जीन के सीक्वेंस को बदलना शामिल है।[6]  इन तकनीकों को जेनेटिक इंजीनियरिंग कहा जाता है।6  जिन पौधों, पशुओं या सूक्ष्म जीवों के जीन्स इस तरह बदले जाते हैं, उन्हें जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म (जीएमओ) कहा जाता है।[7]  इसका एक उदाहरण बीटी-कपास है। यह कपास की ऐसी किस्म होती है, जिसे बॉलवर्म (कपास को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े) से बचाने के लिए प्रयोगशाला में तैयार किया गया है।[8]  2024 तक भारत में कुल कपास की खेती के 96% से भी ज्यादा हिस्से में बीटी-कपास ही उगाया जाता है।[9]

जीन एडिटिंग

जीन एडिटिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें डीएनए को निर्धारित स्थानों पर बदला जा सकता है।[10] इसमें खास तरह के एंजाइम्स का इस्तेमाल किया जाता है और एक या एक से अधिक चुनींदा स्थानों पर डीएनए सीक्वेंस में हेरफेर किया जाता है।[11]  ये तकनीक ‘कैंची’ की तरह काम करती है और डीएनए को किसी चुनींदा स्थान से काटा जा सकता है।[12]  फिर डीएनए को निर्धारित स्थान पर हटाया जा सकता है, जोड़ा जा सकता है या बदला जा सकता है।12  कई अलग-अलग कामों के लिए जीन एडिटिंग का इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है। जैसे जीन-एडिटेड टमाटरों को विकसित करना, जो ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद कर सकते हैं और मरीजों के स्टेम सेल में बदलाव करके सिकल सेल जैसी बीमारियों का इलाज करना।[13],[14]

रेखाचित्र 1: जीन एडिटिंग

पिछले तीन दशकों में जीन एडिटिंग के कई तरीके विकसित किए गए हैं (देखें बॉक्स 1)। इनमें सबसे प्रसिद्ध तकनीक CRISPR-Cas9 है।11  इसे बैक्टीरिया के एक ऐसे प्राकृतिक तरीके से लिया गया है, जिसे वे वायरस से अपना बचाव करने के लिए इस्तेमाल करते है।[15]  जब कोई वायरस किसी बैक्टीरिया की कोशिका को संक्रमित करता है तो उस वायरस के जेनेटिक मैटीरियल का एक छोटा सा हिस्सा बैक्टीरिया के जीनोम के एक खास हिस्से में जमा हो जाता है जिसे CRISPR लोकस कहा जाता है।15 इससे बैक्टीरिया को ‘वायरस को याद रखने’ में मदद मिलती है। अगर वायरस दोबारा संक्रमण फैलाता है तो बैक्टीरिया उसी जमा किए गए जेनेटिक मैटीरियल का इस्तेमाल करके गाइड आरएनए (राइबोन्यूक्लिक एसिड) पैदा करता है।15 ये गाइड आरएनए हमला करने वाले वायरस के जेनेटिक मैटीरियल के खास हिस्सों से जुड़ जाते हैं।15 इसके बाद बैक्टीरिया द्वारा बनाया गया Cas9 प्रोटीन उन खास स्थानों से वायरस के जेनेटिक मैटीरियल को काट देता है।15  इस प्रकार गाइड आरएनए और Cas9 प्रोटीन ही CRISPR-Cas9 तकनीक के सबसे प्रमुख हिस्से हैं।

Cas9 तकनीक की इसी ‘काटने’ की क्षमता का इस्तेमाल दूसरे जीवों के डीएनए पर किया जाता है। एक बार कटने के बाद कोशिकाएं स्वाभाविक रूप से उस टूट-फूट को ठीक करने की कोशिश करती हैं।[16]  यह मरम्मत कई तरीकों से हो सकती है।16 इनमें से एक तरीके में कोशिका बस डीएनए के टूटे हुए सिरों को आपस में जोड़ देती है।[17]  इस प्रक्रिया में अक्सर डीएनए के कुछ छोटे हिस्से डिलीट हो जाते हैं, जिससे उस जीन की कार्यक्षमता रुक या बदल सकती है।17 एक दूसरे तरीके में कोशिका किसी डीएनए टेम्पलेट की नकल करके उस टूट-फूट को ठीक करती है।[18]  वैज्ञानिक जीन एडिटिंग में इस प्रक्रिया का लाभ उठाने के लिए कट वाली जगह पर बाहर से एक डीएनए टेम्पलेट भेजते हैं।18  इसके बाद कोशिका उस दरार को भरने के लिए इसी टेम्पलेट का इस्तेमाल करती है।18  इससे वैज्ञानिक अपनी पसंद के विशेष सीक्वेंस को जोड़ या बदल सकते हैं।18

बॉक्स 1: जीन एडिटिंग की विभिन्न तकनीक

CRISPR-Cas9 के अलावा जीन एडिटिंग के लिए सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली तकनीकों में जिंक-फिंगर न्यूक्लिएस (ZFNs) और TALE न्यूक्लिएस (TALENs) हैं।11  ये सभी जीनोम के भीतर एक या अधिक चुनींदा स्थानों पर जेनेटिक मॉडिफिकेशंस करने के लिए एंजाइम्स का उपयोग करते हैं।11   हालांकि CRISPR–Cas9 के विपरीत, जो लक्षित डीएनए सीक्वेंस की पहचान करने के लिए गाइड आरएनए का उपयोग करता है, ZFNs और TALENs विशेष रूप से तैयार किए गए प्रोटीन, यानी जिंक-फिंगर प्रोटीन और TALE प्रोटीन का उपयोग करते हैं।11   

जीन एडिटिंग के लिए ZFN का प्रयोग सबसे पहले 2002-03 के आसपास शुरू हुआ, जिसके बाद 2010 में TALEN और 2013 में CRISPR-Cas9 का विकास हुआ।[19] बाद में Cas प्रोटीन के कई अन्य प्रकार भी विकसित किए गए।19  TALEN और CRISPR-Cas9 की तुलना में, ZFN में प्रयुक्त जिंक-फिंगर प्रोटीन को बनाना काफी जटिल है, जो डीएनए की अलग-अलग जगहों को लक्षित करने की इसकी क्षमता को सीमित करता है।11 CRISPR-Cas9 प्रणाली क्रांतिकारी रही है क्योंकि यह सस्ती और उपयोग में आसान है।11 हालांकि इन सभी तकनीकों में अनचाहे बदलाव होने की आशंका रहती है (आगे के पेज पर अनचाहे प्रभाव वाला खंड देखें)।11  

जीन एडिटिंग के उपयोग

बायोमेडिकल रिसर्च: मानव बीमारियों के अध्ययन और नए टीकों या इलाज के परीक्षण के लिए कोशिकाओं और पशुओं के मॉडल का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।[20],[21]  जीन एडिटिंग तकनीकों ने कोशिकाओं और पशुओं के सटीक मॉडल बनाना संभव कर दिया है और उन पशुओं की किस्मों का विस्तार भी किया है, जिन्हें मॉडल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।[22] उदाहरण के लिए सिस्टिक फाइब्रोसिस (एक जेनेटिक बीमारी) के लिए बनाए गए चूहों के मॉडल में बैक्टीरिया के संक्रमण जैसे लक्षण विकसित नहीं होते हैं जो आम तौर पर इनसानों में देखे जाते हैं।[23] हालांकि इनका उपयोग मुख्य रूप से इसलिए किया जाता था क्योंकि बड़े पशुओं की तुलना में उनके जेनेटिक्स में बदलाव करना आसान था।[24]  लेकिन CRISPR के कारण अब सुअर जैसे बड़े पशुओं के मॉडल का भी उपयोग किया जा सकता है जिनकी जैविक प्रणालियां इनसानों से मिलती हैं।22 इसके अलावा ऑर्गन चिप्स (ऐसी प्रणालियां जो मानव अंगों के कामकाज की नकल करती हैं) के साथ CRISPR का जुड़ाव भी तेजी से बढ़ रहा है जो भविष्य में बीमारियों को समझने के लिए भी बेहतर तकनीक प्रदान कर सकता है।[25]  

बीमारियों का इलाज: जीन एडिटिंग तकनीक का उपयोग सिकल सेल रोग (देखें बॉक्स 2) और β-थैलीसीमिया जैसी जेनेटिक बीमारियों का इलाज करने के लिए किया जाता है।[26]  इनका उपयोग कैंसर से लड़ने के लिए मानव प्रतिरक्षा कोशिकाओं की प्राकृतिक क्षमता बढ़ाने के लिए भी किया जाता है।[27] यह टी-कोशिकाओं (एक प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिका जो कैंसर की कोशिकाओं को मारती है) को मजबूत बनाकर किया जा रहा है। इसके लिए या तो उन जीन्स को हटा दिया जाता है जो उनकी सक्रियता को रोकते हैं, या फिर ऐसे जीन्स जोड़े जाते हैं जो उन्हें कैंसर कोशिकाओं की पहचान करने में मदद करते हैं।[28],[29]  CRISPR आधारित सटीक एडिटिंग टूल्स में प्रगति से प्वाइंट म्यूटेशंस (डीएनए सीक्वेंस में छोटे बदलाव) को ठीक करना भी संभव हो रहा है।[30]  इससे आने वाले समय में ऐसी कई बीमारियों का इलाज हो सकेगा, जिन्हें अभी लाइलाज माना जाता है।

बॉक्स 2: सिकल सेल के इलाज के लिए जीन एडिटिंग

सिकल सेल रोग (एससीडी) पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली एक जेनेटिक बीमारी है जो हीमोग्लोबिन को प्रभावित करती है। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी) में पाया जाने वाला वह मुख्य प्रोटीन है जो शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाता है।[31]  आम तौर पर आरबीसी गोल और चपटी (डिस्क जैसी) होती हैं जिससे वे रक्त वाहिकाओं में आसानी से बह सकती हैं।31  एससीडी में जीन म्यूटेशन की वजह से आरबीसी का आकार सिकल (हंसिए) जैसा हो जाता है जो रक्त के बहाव को रोक सकता है।31  अब तक ब्लड और बोन मैरो ट्रांसप्लांट ही इसका एकमात्र इलाज था।31  हालांकि सही डोनर न मिल पाने और डोनर कोशिकाओं द्वारा मरीज के शरीर पर हमला करने जैसी जटिलताओं के जोखिम के कारण इसका उपयोग सीमित रहा है।[32]  दिसंबर 2023 में यूएस एफडीए (फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) ने Casgevy को कुछ रोगी समूहों पर प्रयोग को मंजूरी दी है। यह पहली ऐसी कोशिका आधारित जीन थेरेपी है जिसे मंजूरी मिली है।[33] इस इलाज में मरीज की स्टेम कोशिकाओं को CRISPR तकनीक का उपयोग करके बदला जाता है ताकि एक ऐसे हीमोग्लोबिन का उत्पादन बढ़ाया जाए जो कोशिकाओं को सिकल के आकार में बदलने से रोके।33  इस प्रकार जीन एडिटिंग का उपयोग ऐसी पुरानी बीमारियों को नियंत्रित करने की बजाय उन्हें पूरी तरह से ठीक करने के लिए किया जा रहा है।

वेक्टर जनित रोगों पर नियंत्रण: CRISPR-Cas9 तकनीक मच्छरों और अन्य कीड़ों द्वारा फैलाई जाने वाली बीमारियों को कम करने की संभावना प्रदान करती है।[34]  उदाहरण के लिए एनोफिलीज मच्छरों के जीन्स को इस तरह बदला जा सकता है कि उनके शरीर के भीतर मलेरिया का परजीवी विकसित न हो पाए।[35]  हालांकि सामान्य परिस्थितियों में अगली पीढ़ी के केवल आधे मच्छरों में ही यह संशोधित जीन पहुंच पाएगा।34 किसी आबादी में लक्षण फैलाने के लिए जीन ड्राइव का उपयोग किया जाता है। जीन ड्राइव उन प्रणालियों को कहा जाता है जो पीढ़ियों में जीन के वंशानुगत होने की संभावना को बढ़ाती हैं।34 CRISPR-Cas9 आधारित जीन ड्राइव में, गाइड RNA, Cas9 और संभवतः एक वांछित जीन को एनोफिलीज़ मच्छरों की प्रजनन कोशिकाओं में रखा जाता है।[36]  यह प्रणाली वांछित जीन्स को फैलाने में मदद करती है। उदाहरण के लिए, जब किसी संतान को विरासत में एक 'एडिट किया हुआ जीन' और एक 'सामान्य जीन' मिलता है, तो Cas9 प्रोटीन उस सामान्य कॉपी को काट देता है और कोशिका एडिट किए हुए जीन की नकल करके उस टूटे हुए हिस्से को ठीक कर देती है।[37] इस प्रक्रिया से संतान के पास एडिट किए गए जीन की दो कॉपियां हो जाती हैं, जिससे उसकी लगभग सभी अगली संतानों को विरासत में वही बदला हुआ जीन मिलता है।37

रेखाचित्र 2: जीन ड्राइव चुनिंदा जीन्स की वंशानुगति की संभावना को बढ़ाते हैं

 

जीन-एडिटेड फसलें: फसलों में जीन एडिटिंग का उपयोग विभिन्न लक्षणों को शामिल करने के लिए किया जाता है जैसे कि अधिक पैदावार (उसी भूमि से अधिक भोजन), बीमारियों और कीड़ों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता और सूखे जैसे पर्यावरणीय कारकों को सहने की अधिक शक्ति। उदाहरण के लिए गेहूं के पौधे को फफूंद से बचाने के लिए एडिट किया गया है और टमाटर के पौधों को विटामिन डी पैदा करने के लिए तैयार किया गया है।[38],[39]  इसी तरह चावल से उन जीन्स को हटाया जा रहा है जो उसे मिट्टी में खारेपन के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।[40] आम तौर पर मिट्टी का खारापन चावल की बढ़त को रोकता है और पैदावार कम कर देता है।40  (जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों पर अधिक जानकारी के लिए देखें पीआरएस ब्रीफ Genetically Modified Crops)।

पालतू पशुओं में उपयोग: जीन एडिटिंग का इस्तेमाल पालतू पशुओं को बीमारियों और मौसम की मार से बचाने के लिए किया जाता है। जैसे CRISPR-Cas9 तकनीक से ऐसे सूअर तैयार किए जा रहे हैं जिन पर पोरसाइन रेस्पिरेटरी सिंड्रोम का असर कम होता है। यह बीमारी सूअरों में निमोनिया फैलाती है और इससे उनकी मौत का खतरा रहता है।[41] इसी तरह मवेशियों में गर्मी सहने की क्षमता बढ़ाई गई है।[42],[43] डेयरी मवेशियों के जीन में बदलाव करके उन्हें बिना सींग वाला बनाया गया है। यह हाथ से उनके सींग काटने की प्रक्रिया का एक बेहतर विकल्प है।[44]

बॉक्स 3: भारत में हाल के कुछ घटनाक्रम

  • सिकल सेल का इलाज: नवंबर 2025 में केंद्र सरकार ने BIRSA 101 के विकास की घोषणा की, जो सिकल सेल रोग के लिए भारत की पहली स्वदेशी CRISPR आधारित जीन थेरेपी है।[45] इसके उत्पादन को शुरू करने के लिए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ तकनीक साझा करने का एक समझौता भी किया गया है।45
  • CRISPR-Cas9 का स्वदेशी विकल्प: नवंबर 2025 में केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान ने जीन एडिटिंग की एक नई भारतीय तकनीक विकसित की है।[46] इसका उद्देश्य CRISPR-Cas सिस्टम के मुकाबले एक छोटा, कम खर्चीला और आईपी-फ्री (बिना किसी पेटेंट वाला) विकल्प तैयार करना है।46
  • जीन-एडिटिंग वाली चावल की किस्में: मई 2025 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने धान की दो ऐसी जीन-एडिटेड किस्में तैयार कीं, जिनसे पैदावार ज्यादा होती है, पानी कम लगता है और जो खारेपन व सूखे को भी आसानी से झेल लेती हैं।[47]
  • भैंस में जीन्स को निष्क्रिय करना: जून 2024 में नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने भैंस की प्रजनन कोशिकाओं में एक जीन को निष्क्रिय करने के लिए CRISPR-Cas9 का इस्तेमाल किया।[48],[49]  यह जीन दूध में पाए जाने वाले एक सामान्य एलर्जेन का उत्पादन करता है।49   

जीन एडिटिंग से जुड़ी चिंताएं

सुरक्षा संबंधी चिंताएं

अनचाहे प्रभाव

जीन एडिटिंग तकनीक के कारण निर्धारित डीएनए के अलावा दूसरी जगहों पर भी अनचाहे बदलाव हो सकते हैं, जिन्हें ऑफ टारगेट इफेक्ट्स (अनचाहे बदलाव) कहा जाता है।[50]  उदाहरण के लिए CRISPR-Cas9 से होने वाले ये अनचाहे बदलाव जीन्स के काम करने के तरीके (उनका चालू या बंद होना) में रुकावट डाल सकते हैं जिससे कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियां होने का खतरा रहता है।50 ऑफ टारगेट इफेक्ट्स उन जीवों में हो सकते हैं जहां जीन एडिटिंग का उपयोग किया जाता है जैसे कि पौधे, पशु और मनुष्य।[51] कई कारक यह तय करते हैं कि ये प्रभाव कहां पैदा होंगे, जैसे कि निर्धारित टारगेट की जगह या कोशिका का प्रकार।50  व्यक्तियों के बीच जेनेटिक भिन्नता भी इन्हीं ऑफ टारगेट गतिविधियों को प्रभावित करती है।[52]  किसी खास मरीज पर होने वाले ऑफ टारगेट इफेक्ट का अध्ययन करना भी काफी महंगा और व्यावहारिक रूप से कठिन है।52  अगर इन प्रभावों की पहचान कर भी ली जाए तो भी यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि स्वास्थ्य पर इसका क्या असर होगा।52  हालांकि सटीक एडिटिंग टूल्स में हुई तरक्की ने इन प्रभावों को कम किया है, फिर भी उनकी अपनी कुछ सीमाएं हैं।[53] 

शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया

Cas9 जैसे Cas प्रोटीन उन बैक्टीरिया से लिए गए हैं जो मनुष्यों को अक्सर संक्रमित करते रहते हैं।[54]  जीन एडिटिंग के लिए इन प्रोटीन्स का उपयोग शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून रिस्पांस को सक्रिय कर सकता है।54 प्रतिरक्षा प्रणाली का अर्थ है, किसी बाहरी चीज़ के खिलाफ शरीर की बचाव वाली प्रतिक्रिया- इस मामले में शरीर Cas9 को एक बाहरी हमलावर समझकर उसके खिलाफ काम करता है।[55] कुछ अध्ययनों में Cas प्रोटीन्स के ऐसे नए रूप बनाने की कोशिश की गई है जो शरीर में पहले से मौजूद रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम से कम सक्रिय करें।[56]  फिलहाल, CRISPR पर आधारित ज्यादातर इलाज मरीज की कोशिकाओं को शरीर से बाहर निकालकर उनमें एडिटिंग यानी बदलाव करने पर निर्भर हैं।52,[57]  यह तरीका कुछ मामलों में इम्यून रिजेक्शन (शरीर द्वारा कोशिका को नकारने) के जोखिम को कम कर सकता है।52  हालांकि हर तरह की कोशिका को सुरक्षित रूप से बाहर निकालना, उसमें बदलाव करना और फिर से मरीज के शरीर में ट्रांसप्लांट करना संभव नहीं है।52  ऐसे कई अध्ययन भी किए जा रहे हैं कि जीन एडिटिंग टूल को सीधे शरीर के उन हिस्सों में पहुंचाया जाए जहां कोशिकाएं मौजूद हैं।52  इसके बावजूद मानव शरीर के कई अंगों और ऊतकों तक इन टूल्स को प्रभावी ढंग से पहुंचाना और वहां एडिटिंग करना आज भी एक बड़ी चुनौती है।[58]

जर्मलाइन एडिटिंग

प्रजनन कोशिकाओं जैसे कि एग्स, स्पर्म्स या एंब्रेयो में भी जीन एडिटिंग की जा सकती है।[59]  ये कोशिकाएं अपना डीएनए आने वाली पीढ़ियों को देती हैं इसलिए इनमें किया गया कोई भी बदलाव वंशानुगत हो जाता है। एडिटिंग का एक उद्देश्य यह भी हो सकता है कि मनचाहा बदलाव शरीर की सभी कोशिकाओं में पहुंच जाए। हालांकि एंब्रेयो एडिटिंग से मोज़ेसिज्म की स्थिति पैदा हो सकती है जिसका अर्थ है कि एंब्रेयो में कुछ कोशिकाएं एडिट होंगी और कुछ एडिट नहीं होंगी।59 

बॉक्स 4: इनसानों के एंब्रेयो में जीन एडिटिंग

प्रजनन कोशिकाओं में बदलाव करने से पूरी आबादी में बदलाव आ सकता है। इसलिए कई देशों में या तो इसके शोध की अनुमति नहीं है या इसके लिए बहुत कड़े नियम हैं।19 हालांकि 2018 में चीन के एक वैज्ञानिक हे जियानकुई ने घोषणा की कि उन्होंने दो ह्यूमन एंब्रेयो के जीनोम को एडिट करने के लिए CRISPR-Cas9 का इस्तेमाल किया है।19  यह कोशिका CCR5 जीन को एडिट करने के लिए की गई थी जो एक ऐसा प्रोटीन बनाता है जिसका इस्तेमाल करके, HIV का वायरस शरीर में घुसता है।19  इन एंब्रेयोज़ को विकसित होने दिया गया और उनसे दुनिया के पहले ऐसे बच्चों का जन्म हुआ, जिनके जीन में वंशानुगत बदलाव किए गए थे।19  हे जियानकुई ने खुलासा किया कि जुड़वां बच्चों में से एक बच्ची HIV के प्रति सुरक्षित होगी क्योंकि उसके CCR5 जीन के दो हिस्सों को हटा दिया गया था।[60]  जबकि दूसरी बच्ची को अब भी संक्रमण हो सकता है क्योंकि एडिटिंग के दौरान अनजाने में उसके CCR5 जीन की एक कॉपी बिना बदलाव के बच गई थी।63  इस प्रयोग की कड़ी आलोचना की गई क्योंकि इसमें पारदर्शिता और स्पष्टता की कमी थी, साथ ही इस जीन को हटाने से भविष्य में होने वाले खतरों के बारे में बहुत कम जानकारी थी।19 

 अगर जीन एडिटिंग एकल कोशिकीय एंब्रेयो के दो कोशिकाओं में विभाजित होने के बाद होती है, तो  मोज़ेसिज्म उत्पन्न हो सकता है।[61]  जैसे दो कोशिका वाले चरण में, एक कोशिका में एक प्रकार का बदलाव हो जाता है, जबकि दूसरी कोशिका में अलग तरह का बदलाव होता है, या कोई बदलाव नहीं होता।60 मोज़ेसिज्म के कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।59  किसी एक व्यक्ति पर इसके परिणामों को अंदाजा लगाना और आने वाली पीढ़ियों पर इसके प्रभावों का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल हो सकता है।59  इसी तरह की चुनौतियां उन पौधों और पशुओं में भी देखी जा सकती हैं, जहां उनकी प्रजनन कोशिकाओं को एडिट किया जाता है।[62],[63]

मानव क्षमताओं को बढ़ाना

मानव क्षमताओं में वृद्धि (अंग्रेजी में ह्यूमन एनहांसमेंट) का मतलब, एक ऐसी कोशिश से है जिसका उद्देश्य मनुष्यों की क्षमता को बेहतर बनाना और उसकी खुशहाली है, तब भी, जब इलाज के लिए कोई बीमारी न हो।[64] उदाहरण के लिए भविष्य में इसके जरिए मनुष्यों की सोचने-समझने की शक्ति या शारीरिक मजबूती को बढ़ाया जा सकता है। समाज में पसंद किए जाने वाले गुणों के हिसाब से एंब्रेयो में बदलाव करके डिजाइनर बेबी तैयार करने के लिए CRISPR जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कई नैतिक सवाल खड़े करता है। इसमें यह सवाल भी शामिल है कि क्या समाज की पसंद के आधार पर किसी के जीन में हमेशा के लिए बदलाव करना सही है।[65],[66] ऐसी चिंताएं तब भी हो सकती हैं, जब केवल बीमारी के इलाज या रोकथाम की बजाय, किसी इनसान को सामान्य से ज्यादा ताकतवर, बुद्धिमान या सुंदर बनाने के लिए जीन एडिटिंग की जाने लगे।[67] 

सूचित सहमति

शोध और डॉक्टरी जांच के दौरान आम तौर पर मरीज और व्यक्ति की सहमति लेना जरूरी होता है और इस सहमति को किसी भी समय वापस लिया जा सकता है।66,[68]  आईसीएमआर ने ऐसे दिशानिर्देश जारी किए हैं कि जिन शोधों में लंबे समय तक फॉलो-अप की जरूरत है, उनमें बीच-बीच में व्यक्ति की दोबारा सहमति लेनी जरूरी है।66,[69] जीन एडिटिंग की प्रकृति अपरिवर्तनीय है, यानी उसे पलटा नहीं जा सकता। खास तौर से प्रजनन कोशिकाओं में जीन एडिटिंग करना। इससे कुछ गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं। जैसे, (i) क्या इसमें भाग लेने वाला व्यक्ति किसी शोध से पीछे हट सकता है, जबकि किए गए बदलावों को वापस पहले जैसे करना चुनौतीपूर्ण है, और (ii) जब जीन एडिटिंग का असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ सकता है तो ऐसे मामलों में दीर्घकालीन निगरानी के लिए सहमति का प्रबंधन कैसे किया जाएगा (यानी भविष्य में पैदा होने वाले बच्चों की सहमति कैसे ली जाएगी)।68

इकोसिस्टम पर जीन ड़्राइव्स का असर

आधुनिक जीन एडिटिंग टूल्स जैसे CRISPR-Cas9 मनुष्यों द्वारा डिजाइन किए गए गुणों को फैलाने के लिए जीन ड्राइव्स बना सकते हैं। इसके अनचाहे परिणाम हो सकते हैं। कृषि में हानिकारक प्रजातियों को कम करने या खत्म करने के लिए उपयोग किए जाने वाले जीन ड्राइव के प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं, अगर ये जेनेटिक बदलाव उन प्रजातियों में फैल जाते हैं जिन्हें टारगेट नहीं किया गया था।[70]  जैसे पामर एमारैंथ यूएसए में एक ऐसा खरपतवार है जिसे रोकने में जीन ड्राइव की मदद ली जा सकती है।70  हालांकि एमारैंथस की संबंधित प्रजातियों की खेती मैक्सिको, भारत और चीन में भोजन के लिए की जाती है जिससे यह चिंता बढ़ सकती है कि जीन ड्राइव अनचाहे में इन गैर लक्षित प्रजातियों को प्रभावित कर सकती है।70 इन जोखिमों को देखते हुए जेनेटिक ट्रैकिंग जैसी विधियों से इन प्रभावों की निगरानी करना अनिवार्य हो जाता है।37

जीन ड्राइव का विकास और परीक्षण आम तौर पर नियंत्रित वातावरण में किया जाता है (जैसे प्रयोगशालाओं में)।70  पर्यावरण में जीन ड्राइव को छोड़ने से स्थानीय इकोसिस्टम पर असर हो सकता है।37  उदाहरण के लिए किसी खास पौधे की प्रजाति में बीमारी को फैलने से रोकने के लिए जीन ड्राइव का इस्तेमाल करने से अनजाने में प्राकृतिक संतुलन बदल सकता है (यह बदल सकता है कि किसी वातावरण में कौन सी प्रजाति अधिक प्रभावी हो सकती है)।37  इस बात की चिंता भी जताई जाती है कि किसी भी हस्तक्षेप से पहले ऐसे सभी प्राकृतिक प्रभावों का अनुमान करना संभव नहीं हो सकता है।37 प्राकृतिक जोखिम से निपटने के लिए कुछ हालिया जीन ड्राइव्स को स्व-सीमित (सेल्फ-लिमिटिंग) के तौर पर डिजाइन किया गया है, यानी वे सिर्फ कुछ पीढ़ियों तक फैलेंगे और फिर रुक जाएंगे।[71]     

 

बॉक्स 5: जीन एडिटिंग से संबंधित रेगुलेशंस

यूएसए, यूके, ब्राजील और भारत में जीन एडिटिंग को राष्ट्रीय कानूनों या रेगुलेटरी संस्थाओं के दिशानिर्देशों के तहत रेगुलेट किया जाता है। कई देशों में कुछ रेगुलेशंस के अधीन, पौधों और पशुओं में जीन एडिटिंग की अनुमति है।[72],[73],[74],[75]  मनुष्यों में गैर प्रजनन कोशिकाओं में जीन एडिटिंग की आम तौर पर अनुमति है, लेकिन प्रजनन कोशिकाओं में एडिटिंग पर दुनिया भर के देशों में व्यापक रूप से प्रतिबंध है।19,[76],[77],[78],[79],[80]  यूके में शोध के लिए प्रजनन कोशिकाओं की एडिटिंग की अनुमति है।[81]  यूएसए में शोध के लिए प्रजनन कोशिकाओं की जीन एडिटिंग पर प्रतिबंध नहीं है लेकिन ऐसे शोध के लिए फेडरल फंडिंग नहीं की जाती जिसमें ह्यूमन एंब्रेयो बनाए या नष्ट किए जाते हैं।[82]  

भारत में पर्यावरण संरक्षण एक्ट, 1986 और उससे संबंधित 1989 के नियमों के तहत मुख्य रूप से पौधों और पशुओं में जीन एडिटिंग की जाती है।[83] ये नियम एक मल्टी-टियर रेगुलेटरी प्रणाली की स्थापना करते हैं जैसे किसी वर्तमान शोध में जैव सुरक्षा की निगरानी के लिए रिव्यू कमिटी ऑन जेनेटिक मैन्यूपुलेशन (आरसीजीएम) और जेनेटिकली एडिटेड पौधों और पशुओं को पर्यावरण में छोड़ने को मंजूरी देने के लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी (जीईएसी)।83  जिन जीन एडिटेड पौधों में बाहरी डीएनए नहीं होता, उन्हें जीएमओ की मंजूरी प्रक्रिया से छूट है।[84] मनुष्यों के लिए जीन एडिटिंग के शोध और उपयोग पर आईसीएमआर के दिशानिर्देश लागू होते हैं।66,69  इन दिशानिर्देशों में मनुष्यों में जीन थेरेपी से संबंधित सुरक्षा, सहमति और उपयोग के लिए फ्रेमवर्क निर्दिष्ट किए गए हैं।

रेगुलेशन के लिए जीन एडिटिंग का वर्गीकरण

परंपरागत जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक ऐसे डीएनए कॉन्बिनेशंस को जोड़कर (या हटाकर) जीनोम में बदलाव करती हैं जो प्राकृतिक रूप से नहीं होते हैं।[85]  इन बदलावों को आम तौर पर पहचाना जा सकता है क्योंकि जोड़े गए बाहरी डीएनए की जानकारी होती है, इन्हें जोड़ने (या हटाने) के बिंदुओं का पता लगाया जा सकता है, और पहचान करने के लिए तय टेस्ट उपलब्ध हैं।85,[86]  इसके विपरीत नई जीन एडिटिंग तकनीक बाहरी डीएनए को शामिल किए बिना, जीन्स में बदलाव कर सकती हैं।85  इससे एडिट किए गए बदलाव और प्राकृतिक रूप से किए गए बदलावों के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है।85  इस प्रकार उन जीन-एडिटेड जीवों की पहचान करना मुश्किल होता है जो जैव सुरक्षा के रेगुलेटरी प्रावधानों के दायरे में आ सकते हैं।[87]

बौद्धिक संपदा के अधिकार

इससे संबंधित दो चिंताएं हैं: (i) क्या मानव जीन पेटेंट के योग्य है, और (ii) जब पूरे जीनोम के विभिन्न हिस्सों पर अलग-अलग पेटेंट लागू होते हैं तो इस ओवरलैंपिंग पेटेंट्स से शोध में समय लग सकता है, और स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग में रुकावट आ सकती है।[88],[89]  जीन को पेटेंट दिया जाना चाहिए या नहीं, यह सवाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादास्पद है। यूरोप में प्राकृति रूप से मिलने वाले जीन को अलग करने पर पेटेंट मिल सकता है, लेकिन कुछ शर्तें पूरी होनी चाहिए जैसे जीन का एक निश्चित तकनीकी उपयोग हो।[90]  यूएस और भारत में प्राकृतिक रूप से मिलने वाले जीन सीक्वेंस को अलग करने पर पेटेंट नहीं मिलता।[91],[92]  

जब कई डीएनए सीक्वेंस पर कई पक्षों का पेंटेंट होता है तो ‘पेटेंट थिकेट्स’ को लेकर चिंताएं जताई जाती हैं (पेटेंट थिकेट्स, यानी पेटेंट्स का जाल या अंबार)।89  पेटेंट थिकेट्स से शोध, परीक्षण और इलाज करने के लिए सभी मंजूरियां जुटाना मुश्किल होता है।87,89  ये उन बीमारियों के लिए खास तौर से प्रासंगिक है जो कई जीन्स के कारण होती हैं, जैसे ह्रदय रोग।[93]


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[62] Frank, M. H., & Chitwood, D. H. (2016).  Plant chimeras: The good, the bad, and the ‘Bizzaria’.  Developmental Biology, 419(1), 41-53, https://doi.org/10.1016/j.ydbio.2016.07.003.

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[65] Ledford, H. (2020).  CRISPR gene editing in human embryos wreaks chromosomal mayhem.  Nature, 583, 17–18, https://doi.org/10.1038/d41586-020-01906-4.  

[66] National Ethical Guidelines for Biomedical and Health Research involving Human Participants, ICMR, October, 2017, https://naitik.gov.in/DHR/resources/app_srv/DHR/global/pdf/downloads/Handbook_on_ICMR_Ethical_Guidelines.pdf. 

[67] National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine.  (2017).  Human genome editing: Science, ethics, and governance.  National Academies Press, https://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/NBK447264/.

[68] Wiley, L., Cheek, M., LaFar, E., Ma, X., Sekowski, J., Tanguturi, N., & Iltis, A. (2025).  The ethics of human embryo editing via CRISPR-Cas9 technology: A systematic review of ethical arguments, reasons, and concerns.  HEC Forum, 37(3), 267–303, https://doi.org/10.1007/s10730-024-09538-1.

[69] National Guidelines for Gene Therapy Product Development and Clinical Trials, ICMR, November 2019, https://www.icmr.gov.in/icmrobject/custom_data/pdf/resource-guidelines/guidelines_GTP.pdf.

[70] National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine.  (2016).  Gene drives on the horizon: Advancing science, navigating uncertainty, and aligning research with public values.  National Academies Press, https://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/NBK379282/. 

[71] Naidoo, K., & Oliver, S. V. (2025).  Gene drives: An alternative approach to malaria control? Gene Therapy, 32(1), 25–37, https://doi.org/10.1038/s41434-024-00468-8. 

[72] Hoffman, N. E. (2021).  Revisions to USDA biotechnology regulations.  Proceedings of the National Academy of Sciences, 118(15), e2004841118,  https://doi.org/10.1073/pnas.2004841118 . 

[73] Turnbull, C., Lillemo, M., & Hvoslef-Eide, T. A. K. (2021).  Global Regulation of Genetically Modified Crops Amid the Gene Edited Crop Boom - A Review.  Frontiers in Plant Science, 12, 630396, https://doi.org/10.3389/fpls.2021.630396. 

[74] Genetic Technology (Precision Breeding) Act 2023, UK, https://www.legislation.gov.uk/ukpga/2023/6/pdfs/ukpga_20230006_en.pdf.

[75] Brazilian Agricultural Research Corporation (EMBRAPA), Regulatory framework of genome editing in Brazil and worldwide, 2021, https://www.alice.cnptia.embrapa.br/bitstream/doc/1132164/1/Regulatory-framework-of-genome-CAP-5.pdf.   

 

[76] “Human Gene Therapy Products Incorporating Human Genome Editing”, Food and Drug Administration, January 2024, https://www.fda.gov/media/156894/download. 

[77] Cohen, I. G., & Adashi, E. Y. (2016).  The FDA is prohibited from going germline: U.S. Congress precludes human germline modification. Science, 353(6299), 545–546, https://www.science.org/doi/10.1126/science.aag2960. 

[78] “Regulation (EU) No 536/2014 of the European Parliament and of the Council of 16 April 2014 on clinical trials on medicinal products for human use, and repealing Directive 2001/20/EC Text with EEA relevance”, European Union, May 27, 2014, https://eur-lex.europa.eu/legal-content/EN/TXT/?uri=celex:32014R0536. 

[79] “Regulation (EC) No 1394/2007 of the European Parliament and of the Council of 13 November 2007 on advanced therapy medicinal products and amending Directive 2001/83/EC and Regulation (EC) No 726/2004 (Text with EEA relevance)”, European Union, December 10, 2007, https://eur-lex.europa.eu/eli/reg/2007/1394/oj/eng. 

[80] Law No. 11.105 (Biosafety Law), Republic of Brazil, https://www.wipo.int/wipolex/en/legislation/details/8300. 

[81] Human Fertilisation and Embryology Act 1990, United Kingdom, https://www.legislation.gov.uk/ukpga/1990/37/contents. 

[82] “4.2.5 Human embryo research and cloning ban”, NIH Grants Policy Statement website, as accessed on November 18, 2025, https://grants.nih.gov/grants/policy/nihgps/HTML5/section_4/4.2.4_human_embryo_research_and_cloning_ban.htm. 

[83] Rules for the manufacture, use/import/export, and storage of hazardous micro-organisms/ Genetically engineered organisms or cells, Ministry of Environment and Forests, December 1989, https://ibkp.dbtindia.gov.in/DBT_Content_Test/CMS/Guidelines/20181115121526033_Rules-for-the-manufacture-use-import-export-and-storage-1989.pdf. 

[84] Guidelines for the Safety Assessment of Genome Edited Plants, Department of Biotechnology, Ministry of Science and Technology, May 17, 2022,  https://dbtindia.gov.in/sites/default/files/Final_%2011052022_Annexure-I%2C%20Genome_Edited_Plants_2022_Hyperlink.pdf. 

[85] Grohmann, L., Keilwagen, J., Duensing, N., Dagand, E., Hartung, F., Wilhelm, R., Bendiek, J., & Sprink, T. (2019).  Detection and Identification of Genome Editing in Plants: Challenges and Opportunities.  Frontiers in plant science, 10, 236,  https://doi.org/10.3389/fpls.2019.00236. 

[86] European Network of GMO Laboratories (2019).  Detection of food and feed plant products obtained by new mutagenesis techniques (JRC Technical Report No. JRC116289).  Publications Office of the European Union, https://gmo-crl.jrc.ec.europa.eu/doc/JRC116289-GE-report-ENGL.pdf.  

[87] Secretariat of the Convention on Biological Diversity (2022).  Synthetic biology (CBD Technical Series No. 100).  Montreal, Canada: Secretariat of the Convention on Biological Diversity, https://www.cbd.int/doc/publications/cbd-ts-100-en.pdf. 

[88] Genetic Testing, MedlinePlus Genetics, US National Library of Medicine, https://medlineplus.gov/download/genetics/understanding/testing.pdf. 

[89] Chandrasekharan, S., & Fiffer, M. (2010).  Impact of gene patents and licensing practices on access to genetic testing for hearing loss.  Genetics in medicine, 12(4 Suppl), S171–S193,  https://doi.org/10.1097/GIM.0b013e3181d7b053.

[90] “Directive 98/44/EC of the European Parliament and of the Council of 6 July 1998 on the legal protection of biotechnological inventions”, European Union, Directive - 98/44 - EN - EUR-Lex. 

[91] Assoc. for Molecular Pathology v. Myriad Genetics, Inc., 569 U.S. 576 (2013), https://supreme.justia.com/cases/federal/us/569/576/. 

[92] Section 3, Indian Patents Act 1970, https://ipindia.gov.in/writereaddata/portal/ev/sections/ps3.html. 

[93] O’Sullivan, J. W., Raghavan, S., Marquez-Luna, C., Luzum, J. A., Damrauer, S. M., Ashley, E. A., O'Donnell, C. J., Willer, C. J., Natarajan, P. (2022).  Polygenic risk scores for cardiovascular disease: A scientific statement from the American Heart Association, Circulation, 146(8), https://doi.org/10.1161/CIR.0000000000001077.

 

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