राज्यसभा में राष्ट्रीय एंटी डोपिंग बिल, 2021 पारित होने के लिए आज सूचीबद्ध है। पिछले हफ्ते लोकसभा ने इस बिल को पारित कर दिया था। बिल खेलों में एंटी-डोपिंग नियमों के उल्लंघनों के लिए एक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाता है। खेल संबंधी स्टैंडिंग कमिटी ने इसकी समीक्षा की थी और लोकसभा में बिल को पारित करते समय, उसमें कमिटी के कुछ सुझावों को शामिल किया गया था।

एथलीट्स खेल प्रदर्शन में सुधार करने के लिए कुछ प्रतिबंधित पदार्थों का उपभोग करते हैं। इसे डोपिंग कहा जाता है। विश्व स्तर पर विश्व एंटी-डोपिंग एजेंसी (वाडा) डोपिंग को रेगुलेट करती है। 1999 में स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के तौर पर इसकी स्थापना की गई थी। वाडा का मुख्य काम, सभी प्रकार के खेलों और देशों में एंटी-डोपिंग रेगुलेशंस को विकसित करना, उनके बीच सामंजस्य पैदा करना और उनका समन्वय करना है। इसके लिए एजेंसी विश्व एंटी-डोपिंग संहिता (वाडा कोडतथा उसके मानकों के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करती है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम बिल द्वारा प्रस्तावित फ्रेमवर्क की जरूरत के बारे में बात कर रहे हैं और बता रहे हैं कि लोकसभा में बिल पर क्या चर्चा हुई।

भारत में डोपिंग

हाल ही में दो एथलीट्स डोपिंग टेस्ट पास नहीं कर पाए और उन्हें अस्थायी सस्पेंशन का सामना करना पड़ रहा है। इससे पहले भी भारतीय एथलीट्स एंटी-डोपिंग नियमों का उल्लंघन करते पाए गए हैं। वाडा के अनुसार, 2019 में डोपिंग के नियमों के सबसे ज्यादा उल्लंघन रूस (19%), इटली (18%) और भारत (17%) के एथलीट्स ने किए थे। डोपिंग के नियमों के सबसे ज्यादा उल्लंघन बॉडी-बिल्डिंग (22%), एथलेटिक्स (18%), साइकिलिंग (14%) और वेटलिफ्टिंग (13%) में किए गए। खेलों में डोपिंग पर काबू पाने के लिए वाडा यह अपेक्षा करती है कि सभी देशों में एंटी-डोपिंग गतिविधियों को रेगुलेट करने के लिए फ्रेमवर्क हों जिनका प्रबंधन उनके संबंधित राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग संगठन करें। 

वर्तमान में भारत में डोपिंग को राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग एजेंसी रेगुलेट करती है जिसकी स्थापना 2009 में सोसायटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत गठित स्वायत्त निकाय के तौर पर की गई थी। मौजूदा फ्रेमवर्क के साथ एक समस्या है, वह यह कि एंटी-डोपिंग नियम कानून समर्थित नहीं है, इसलिए अदालतों में उन्हें चुनौती मिलती रहती है। इसके अतिरिक्त नाडा भी वैधानिक समर्थन के अभाव में एथलीट्स पर प्रतिबंध लगाती है। ऐसे मामलों को देखते हुए संसद की खेल संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (2021) ने सुझाव दिया था कि खेल विभाग को एंटी-डोपिंग कानून लाना चाहिए। यूएसए, यूके, जर्मनी और जापान जैसे देशों ने एंटी-डोपिंग गतिविधियों को रेगुलेट करने के लिए कानूनों को लागू किया है।  

राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग बिल, 2021 द्वारा प्रस्तावित फ्रेमवर्क

बिल वैधानिक निकाय के रूप में नाडा के गठन का प्रयास करता है जिसके प्रमुख महानिदेशक होंगे और उनकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी। एजेंसी के कार्यों में एंटी-डोपिंग गतिविधियों की योजना बनाना, उन्हे लागू और उनकी निगरानी करना, तथा एंटी-डोपिंग के नियमों के उल्लंघनों की जांच करना शामिल है। एंटी-डोपिंग नियमों के उल्लंघन के नतीजों को निर्धारित करने के लिए एक राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग डिसिप्लिनरी पैनल बनाया जाएगा। पैनल में कानूनी विशेषज्ञ, मेडिकल प्रैक्टीशनर और रिटायर एथलीट्स होंगे। इसके अतिरिक्त डिसिप्लिनरी पैनल के फैसलों के खिलाफ अपील की सुनवाई के लिए राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग अपील पैनल बनाया जाएगा। एंटी-डोपिंग नियमों का उल्लंघन करते पाए जाने वाले एथलीट्स निम्नलिखित के अधीन हो सकते हैं: (i) परिणाम डिस्क्वालिफाई हो सकते हैं जिसमें मेडल, प्वाइंट्स और पुरस्कार को जब्त करना शामिल है, (ii) एक निर्दिष्ट अवधि तक किसी प्रतिस्पर्धा या आयोजन में भाग नहीं ले पाना, (iii) वित्तीय प्रतिबंध, और (iv) अन्य परिणाम, जिन्हें निर्दिष्ट किया जा सकता है। टीम स्पोर्ट्स के परिणामों को रेगुलेशंस के जरिए निर्दिष्ट किया जाएगा। 

शुरुआत में बिल में संरक्षित एथलीट्स के लिए कोई प्रावधान नहीं था लेकिन जब स्टैंडिंग कमिटी ने सुझाव दिए तो ऐसे एथलीट्स से संबंधित प्रावधानों को बिल में शामिल कर लिया गया। केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित व्यक्तियों को निर्दिष्ट किया जाएगा। वाडा कोड के अनुसार, एक संरक्षित व्यक्ति वह है: (i) जिसकी आयु 16 वर्ष से कम है, या (ii) उसकी आयु 18 वर्ष से कम है और उसने ओपन श्रेणी में किसी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग नहीं लिया है, या (iii) अपने देश के कानूनी ढांचे के अनुसार उसमें कानूनी क्षमता का अभाव है।

बिल से संबंधित मुद्दे औऱ लोकसभा में चर्चा

बिल पर चर्चा के दौरान सदस्यों ने कई मुद्दों को उठाया। हम यहां उनकी चर्चा कर रहे हैं-

नाडा की स्वतंत्रता

इस पर जो तमाम मुद्दे उठाए गए, उनमें से एक था, नाडा के महानिदेशक की स्वतंत्रता। वाडा में यह अपेक्षित है कि राष्ट्रीय एंटी डोपिंग संगठन का कामकाज स्वतंत्र हो, चूंकि उसे अपनी सरकार और राष्ट्रीय खेल निकायों के बाहरी दबाव को सामना करना पड़ सकता है और इससे उसके फैसले प्रभावित हो सकते हैं। पहले, बिल में महानिदेशक की क्वालिफिकेशन निर्दिष्ट नहीं है, और इसे नियमों के जरिए अधिसूचित करने के लिए छोड़ दिया गया है। दूसरा, केंद्र सरकार महानिदेशक को दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर या ऐसे अन्य आधार पर कार्यालय से हटा सकती है। इन प्रावधानों को केंद्र सरकार के विवेकाधीन छोड़ने से महानिदेशक के स्वतंत्र कामकाज पर असर पड़ सकता है।

एथलीट्स की प्राइवेसी

नाडा के पास एथलीट्स के कुछ पर्सनल डेटा को जमा करने की शक्ति होगी, जैसे: (i) सेक्स या जेंडर, (ii) मेडिकल हिस्ट्री, और (iii) एथलीट्स के पते-ठिकाने की जानकारी (आउट ऑफ कंपीटीशन टेस्टिंग और सैंपल कलेक्शन के लिए)। सांसदों ने एथलीट्स की प्राइवेसी को बरकरार रखने के संबंध में भी चिंता जताई। अपने जवाब में केंद्रीय खेल मंत्री ने सदन को आश्वासन दिया कि डेटा जमा और शेयर करने के दौरान प्राइवेसी के सभी अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन किया जाएगा। डेटा सिर्फ संबंधित अथॉरिटीज़ के साथ शेयर किया जाएगा। बिल के अंतर्गत नाडा प्राइवेसी और व्यक्तिगत सूचना के संरक्षण हेतु अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप एथलीट्स के पर्सनल डेटा को जमा और इस्तेमाल करेगा। यह विश्व एंटी-डोपिंग संहिता के आठ अनिवार्य मानकों में से एक है। केंद्रीय खेल मंत्री ने जितने संशोधन पेश किए, उनमें से एक संशोधन ने प्राइवेसी और व्यक्तिगत सूचना के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के पालन से संबंधित प्रावधान को हटा दिया है। 

राज्यों में अधिक संख्या में टेस्टिंग लेबोरेट्रीज़ की स्थापना

वर्तमान में भारत में एक राष्ट्रीय डोप टेस्टिंग लेबोरेट्री (एनडीटीएल) है। सांसदों ने टेस्टिंग की क्षमता को बढ़ाने के लिए राज्यों में टेस्टिंग लेबोरेट्रीज़ की स्थापना की मांग उठाई। इसके जवाब में मंत्री ने कहा कि अगर भविष्य में जरूरत हुई तो सरकार राज्यों में और टेस्टिंग लेबोरेट्रीज़ बनाएगी। इसके अतिरिक्त टेस्टिंग क्षमता बढ़ाने के लिए निजी लैब भी बनाए जा सकते हैं। खेल संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (2022) ने अधिक बड़ी संख्या में डोप टेस्टिंग लेबोरेट्रीज़ खोलने की जरूरत पर भी जोर दिया, विशेष रूप से हर राज्य में एक, ताकि देश की जरूरत पूरी की जा सके और एंटी-डोपिंग विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्रों में देश दक्षिण एशिया क्षेत्र का अगुवा बन सके। 

अगस्त 2019 में वाडा ने इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स फॉर लेबोरेटरीज (आईएसएलका पालन नहीं करने के लिए एनडीटीएल पर छह महीने का सस्पेंशन लगाया था। फिर आईएसएल का पालन न करने के कारण जुलाई 2020 में इस सस्पेंशन को और छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया था। दूसरा सस्पेंशन तब तक प्रभावी रहता, जब तक कि एनडीटीएल आईएसएल का अनुपालन नहीं करती। हालांकि निलंबन को जनवरी 2021 में और छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया क्योंकि कोविड-19 के कारण वाडा लेबोरेट्री का ऑन-साइट एसेसमेंट नहीं कर सकती थी। दिसंबर 2021 में वाडा ने एनडीटीएल की मान्यता बहाल कर दी

जागरूकता बढ़ाना

भारत में बहुत से एथलीट्स एंटी-डोपिंग नियमों और प्रतिबंधित पदार्थों के प्रति जागरूक नहीं हैं। जागरूकता के अभाव में वे सप्लीमेंट्स के जरिए प्रतिबंधित पदार्थों का सेवन कर लेते हैं। सांसदों ने कहा कि एंटी-डोपिंग के संबंध में जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है। मंत्री ने सदन को बताया कि पिछले एक वर्ष में नाडा ने एंटी-डोपिंग संबंधी जागरूकता पैदा करने के लिए 100 हाइब्रिड वर्कशॉप्स चलाईं। बिल नाडा को इस बात के लिए तैयार करेगा कि वह एंटी-डोपिंग पर ज्यादा से ज्यादा जागरूकता अभियान चलाए और अनुसंधान करे। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक अथॉरिटी (एफएसएसएआई) के साथ काम कर रही है ताकि एथलीट्स के डायटरी सप्लिमेंट्स को टेस्ट किया जा सके। 

बिल की समीक्षा करते हुए खेल संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (2022) ने सुझाव दिया था कि देश में एंटी-डोपिंग इकोसिस्टम में सुधार तथा उसे मजबूत करने के लिए अनेक उपाय किए जाएं। इन उपायों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) ‘डोप फ्री सर्टिफाइड सप्लिमेंट्स की लेबलिंग और इस्तेमाल के लिए रेगुलेटरी कार्रवाई करना, और (iii) एथलीट्स द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सप्लिमेंट्स के लिए स्वतंत्र निकायों के डोप-फ्री सर्टिफिकेशन को अनिवार्य करना।

भारत 25 मार्च, 2020 से लॉकडाउन में है। इस दौरान अनिवार्य वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन और सप्लाई न करने वाली गतिविधियों को पूरी तरह या आंशिक रूप से रोक दिया गया था। यात्री रेलों और हवाई उड़ानों को भी बंद कर दिया गया था। लॉकडाउन ने प्रवासियों को बुरी तरह प्रभावित किया है, उद्योगों के बंद होने से उनमें से बहुत से लोगों की नौकरियां चली गई हैं और वे अपने मूल निवास स्थानों से दूर दूसरे स्थानों में फंसे हुए हैं तथा वापस जाना चाहते हैं। इसके बाद सरकार ने प्रवासियों के लिए राहत उपायों की घोषणा की है और प्रवासियों के लिए यह व्यवस्था की है कि वे अपने मूल निवास स्थान वापस जा सकें। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे प्रवासियों की समस्याओं को महसूस करते हुए सरकार के परिवहन और राहत प्रबंध की समीक्षा की। 9 जून को न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिए कि वे फंसे हुए शेष प्रवासियों के लिए परिवहन का पूरा प्रबंध करें और इस बात का ध्यान रखते हुए राहत उपाय करें कि लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों को रोजगार मिलना आसान हो। इस ब्लॉग में हम भारत में प्रवास से संबंधित कुछ तथ्यों को पेश कर रहे हैं, साथ ही सरकार के राहत उपायों का सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त यह भी बता रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवासी लोगों के लिए लॉकडाउन से संबंधित क्या निर्देश जारी किए हैं।

प्रवासियों पर एक नजर

जब लोग अपने निवास स्थान को छोड़कर देश के भीतर किसी दूसरे स्थान पर (आंतरिक प्रवास) या किसी अन्य देश में  (अंतरराष्ट्रीय प्रवास) पलायन करते हैं तो उसे प्रवास कहते हैं। प्रवास पर सरकार के हालिया आंकड़े 2011 की जनगणना से प्राप्त किए जा सकते हैं। जनगणना के अनुसार, भारत में 2011 में 45.6 करोड़ प्रवासी थे (जनसंख्या का 38%), जबकि 2001 में इनकी संख्या 31.5 करोड़ थी (जनसंख्या का 31%)। 2001 और 2011 के बीच जनसंख्या 18और प्रवासियों की संख्या 45बढ़ गई। 2011 में 99प्रवास आंतरिक था, और आप्रवासियों (अंतरराष्ट्रीय प्रवासी) का हिस्सा सिर्फ 1% था।[1] 

प्रवास की प्रवृत्तियां

आंतरिक प्रवास को मूल स्थान और गंतव्य के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। वर्गीकरण का एक अन्य प्रकार हैi) ग्रामीण-ग्रामीण, iiग्रामीण-शहरी, iiiशहरी-ग्रामीण, और ivशहरी-शहरी। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में 21 करोड़ ग्रामीण-ग्रामीण प्रवासी थे जिनका आंतरिक प्रवास में 54हिस्सा था (जनगणना में ऐसे 5.3 करोड़ लोगों के संबंध में यह वर्गीकृत नहीं किया जा सका कि उनका मूल निवास स्थान ग्रामीण क्षेत्र है या शहरी क्षेत्र)। ग्रामीण-शहरी और शहरी-ग्रामीण, प्रत्येक किस्म का पलायन करने वाले लगभग 8 करोड़ लोग थे। लगभग 3 करोड़ शहरी-ग्रामीण प्रवासी थे (आंतरिक प्रवास का 7%)।  

प्रवास को वर्गीकृत करने का एक अन्य तरीका है: (iराज्यों के भीतर, और (iiअंतरराज्यीय। 2011 में सभी आंतरिक प्रवास में राज्यों के भीतर प्रवास का हिस्सा 88था (39.6 करोड़ व्यक्ति)।1 

अंतरराज्यीय प्रवास के संबंध में कई भिन्नताएं हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में 5.4 करोड़ अंतरराज्यीय प्रवासी हैं। 2011 में उत्तर प्रदेश और बिहार अंतरराज्यीय प्रवास के सबसे बड़े स्रोत थे, जबकि महाराष्ट्र और दिल्ली सबसे बड़े गंतव्य (या प्राप्तकर्ता) राज्य। उत्तर प्रदेश के लगभग 83 लाख निवासियों और बिहार के 63 लाख निवासियों ने अस्थायी या स्थायी रूप से दूसरे राज्यों में पलायन किया। 2011 तक भारत के लगभग 60 लाख लोगों ने महाराष्ट्र में पलायन किया। 

रेखाचित्र 1: अंतरराज्यीय प्रवास (लाख में) 

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NoteA net out-migrant state is one where more people migrate out of the state than those that migrate into the state.   Net in-migration is the excess of incoming migrants over out-going migrants.  

SourcesCensus 2011; PRS.

आंतरिक प्रवास के कारण और प्रवासी श्रमिक बल का आकार

2011 में राज्यों के भीतर अधिकतर प्रवास (70%) का कारण विवाह और परिवार था, जिसमें पुरुष और महिला प्रवासियों के बीच भिन्नताएं थीं। 83% महिलाओं ने विवाह और परिवार के कारण पलायन किया था। ऐसा करने वाले पुरुषों की संख्या 39% थी। 8% लोगों ने काम के लिए राज्य के भीतर पलायन किया था (21% पुरुष प्रवासी और 2% महिला प्रवासी)।

अंतरराज्यीय प्रवासियों में काम के लिए पलायन करने वाले अधिक थे। 50% पुरुष और 5% महिलाएं अंतरराज्यीय प्रवासी थे। जनगणना के अनुसार, 2011 में 4.5 करोड़ प्रवासी श्रमिक थे। हालांकि माइग्रेशन पर वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार, जनगणना में प्रवासी श्रमिकों की संख्या का कम आकलन किया गया था। महिला प्रवासियों के पलायन को परिवार के कारण दर्ज किया गया, चूंकि यही मुख्य कारण है। हालांकि बहुत सी महिलाएं पलायन के बाद रोजगार में संलग्न हो जाती हैं जोकि काम संबंधी कारणों से महिलाओं के पलायन में प्रदर्शित नहीं होता है।[2]  

आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के अनुसार, जनगणना में अस्थायी प्रवासी श्रमिकों की आवाजाही के पूरे आंकड़े भी मौजूद नहीं हैं। 2007-08 में एनएसएसओ ने भारत के प्रवासी श्रमिकों की संख्या सात करोड़ अनुमानित की थी (श्रम बल का 29%)। आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 ने 2001-2011 के बीच छह करोड़ अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों का अनुमान लगाया था। आर्थिक सर्वेक्षण ने यह अनुमान भी लगाया था कि 2011-2016 के बीच हर वर्ष औसत 90 लाख लोगों ने काम के सिलसिले में यात्रा की।  

रेखाचित्र 2: राज्य के भीतर प्रवास के कारण 

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SourcesCensus 2011; PRS.
 रेखाचित्र 3: अंतरराज्यीय प्रवास के कारण 

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SourcesCensus 2011; PRS.

प्रवासी श्रमिकों की समस्याएं

संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ई) सभी नागरिकों को भारत के परिक्षेत्र के किसी भी भाग में निवास और बसने का अधिकार देता है, जोकि आम जनता के हित या किसी अधिसूचित जनजाति के संरक्षण हेतु उचित प्रतिबंध के अधीन है। हालांकि काम के लिए प्रवास करने वाले लोगों को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है: i) सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य लाभ की कमी और न्यूनतम सुरक्षा कानूनों का पूरी तरह से लागू न होना, ii) सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के जरिए दिए जाने वाले खाद्य पदार्थों जैसे राज्य प्रदत्त लाभों की पोर्टिबिलिटी का अभाव, और iii) शहरी क्षेत्रों में सस्ते आवास और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता में कमी।2    

अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक एक्ट, 1979 (आईएसएमडब्ल्यू एक्ट) के अंतर्गत संरक्षणों का पूरी तरह से लागू न होना 

आईएसएमडब्ल्यू एक्ट में अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों के लिए संरक्षणों का प्रावधान है। प्रवासियों को काम पर रखने वाले ठेकेदारों से निम्नलिखित की अपेक्षा की जाती है: (iवे लाइसेंसशुदा होंगे, (iiसरकारी अथॉरिटीज़ में प्रवासियों को रजिस्टर करेंगे, और (iii) श्रमिकों के लिए एक पासबुक की व्यवस्था करेंगे जिसमें उनकी पहचान दर्ज होगी। ठेकेदार द्वारा दिए जाने वाले वेतन और संरक्षणों (आवास, मुफ्त मेडिकल सुविधा, प्रोटेक्टिव कपड़े) से संबंधित दिशानिर्देश भी कानून में दिए गए हैं। 

दिसंबर 2011 में श्रम संबंधी स्टैंडिंग कमिटी की एक रिपोर्ट में कहा गया कि आईएसएमडब्ल्यू एक्ट के अंतर्गत श्रमिकों का पंजीकरण बहुत कम था और उन्हें एक्ट में दिए गए संरक्षण भी प्राप्त नहीं थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि केंद्र सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस और लाभप्रद प्रयास नहीं किए कि ठेकेदार और नियोक्ता श्रमिकों को अनिवार्य रूप से रजिस्टर करें, ताकि उन्हें एक्ट के अंतर्गत लाभ मिल सकें। 

सरकारी लाभ की पोर्टेबिलिटी की कमी

अगर प्रवासी एक स्थान पर सरकारी लाभ हासिल करने के लिए रजिस्टर होते हैं तो दूसरे स्थान पर जाने पर उन्हें उन लाभों से वंचित होना पड़ता है। यह पीडीएस के अंतर्गत पात्रताओं के संबंध में विशेष रूप से सही है। पीडीएस के अंतर्गत लाभ हासिल करने के लिए जरूरी राशन कार्ड राज्य सरकारों द्वारा जारी किए जाते हैं और वे विभिन्न राज्यों के बीच पोर्टेबल नहीं होते। इस प्रणाली में पीडीएस से अंतरराज्यीय प्रवासियों को बाहर कर दिया जाता है, बशर्ते अगर वे अपने गृह राज्य में अपना कार्ड सरेंडर कर दें और मेजबान राज्य में नया कार्ड ले लें।

शहरी क्षेत्रों में सस्ते आवाज और बुनियादी सुविधाओं का अभाव 

2015 में शहरी आबादी में प्रवासियों का अनुपात 47था।1  इसी वर्ष आवासन और शहरी मामलों के मंत्रालय ने शहरी क्षेत्रों में प्रवासियों को ऐसी सबसे बड़ी आबादी के रूप में चिन्हित किया था जिन्हें शहरों में घरों की जरूरत है। चूंकि शहरों में निम्न आय वाले अपने घर और किराए के घर पर्याप्त संख्या में मौजूद नहीं हैं। इससे शहरों में अनौपचारिक बसाहटें और स्लम्स फैलते हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) केंद्र सरकार की एक योजना है जोकि आर्थिक रूप से कमजोर तबके और निम्न आय वाले समूहों को आवास उपलब्ध कराती है। योजना के अंतर्गत निम्नलिखित   सहायता दी जाती है: i) स्लम्स का पुनर्वास, ii) होम लोन के लिए सबसिडाइज्ड क्रेडिट, iii) नए मकान बनाने या अपने स्वामित्व वाले मौजूदा मकान को विस्तार देने के लिए 1.5 लाख रुपए तक की सबसिडी, और iv) निजी क्षेत्र की पार्टनरशिप में सस्ती आवासीय इकाइयों की उपलब्धता बढ़ाना। चूंकि आवास राज्य का विषय है, इसलिए सस्ते आवास के लिए राज्यों के दृष्टिकोण में भिन्नताएं हैं।2 

लॉकडाउन के दौरान सरकार ने प्रवासी श्रमिकों के लिए क्या कदम उठाए 

लॉकडाउन के दौरान अनेक अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों ने अपने गृह राज्यों को लौटने का प्रयास किया। चूंकि सार्वजनिक परिवहन बंद था, प्रवासियों ने पैदल ही अपने गृह राज्य को चलना शुरू कर दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने विभिन्न राज्यों के बीच समन्वय के आधार पर बसों और श्रमिक विशेष ट्रेनों की अनुमति दी।[3],[4] 1 मई और 3 जून के बीच 58 लाख से अधिक प्रवासियों को विशेष ट्रेनों से तथा 41 लाख को बसों से वापस भेजा गया। सरकार द्वारा उठाए गए अन्य कदमों में निम्नलिखित शामिल हैं-

परिवहन: 28 मार्च को केंद्र सरकार ने राज्यों को इस बात के लिए अधिकृत किया कि वे यात्रा करने वाले प्रवासियों को आवास उपलब्ध कराने के लिए आपदा प्रतिक्रिया कोष को इस्तेमाल कर सकते हैं। राज्यों को सलाह दी गई कि वे राजमार्गों पर राहत शिविर लगाएं जहां मेडिकल सुविधाएं भी मौजूद हों ताकि लॉकडाउन के दौरान लोग वहां रह सकें।

29 अप्रैल को जारी आदेश में गृह मंत्रालय ने राज्यों को इस बात की अनुमति दी कि वे प्रवासियों को बसों के जरिए भेजने के लिए व्यक्तिगत रूप से समन्वय करें। 1 मई को भारतीय रेलवे ने श्रमिक विशेष ट्रेनों के साथ यात्री सेवा शुरू की (22 मार्च के बाद पहली बार) ताकि अपने गृह राज्यों के बाहर फंसे प्रवासियों की आवाजाही संभव हो। 1 मई और 3 जून के बीच भारतीय रेलवे ने 4,197 श्रमिक ट्रेनों के जरिए 59 लाख प्रवासियों की वापसी सुनिश्चित की। सबसे अधिक गुजरात और महाराष्ट्र से ट्रेनें प्रवासियों को लेकर गईं और सबसे अधिक उत्तर प्रदेश और बिहार में उन्हें छोड़ा।[5]  उल्लेखनीय है कि ये रुझान मुख्य रूप से 2011 की जनगणना के आंकड़ों में प्रदर्शित प्रवास के पैटर्न के अनुरूप हैं।

खाद्य वितरण: 1 अप्रैल को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वे प्रवासी श्रमिकों के लिए राहत शिविरों में खाने, सैनिटेशन और मेडिकल सेवाओं की व्यवस्था करें। 14 मई को आत्मनिर्भर भारत अभियान की दूसरी श्रृंखला के अंतर्गत वित्त मंत्री ने घोषणा की कि उन प्रवासी श्रमिकों को दो महीने के लिए मुफ्त खाद्यान्न दिया जाएगा, जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं। इससे आठ करोड़ प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवारों को लाभ होने की उम्मीद है। वित्त मंत्री ने यह भी घोषणा की कि मार्च 2021 तक वन नेशन वन राशन कार्ड को लागू किया जाएगा ताकि पीडीएस के अंतर्गत पोर्टेबल लाभ प्रदान किए जा सकें। इससे भारत में उचित दर की किसी भी दुकान से राशन लिया जा सकेगा।

आवासआत्मनिर्भर भारत अभियान में प्रवासी श्रमिकों और शहरी गरीबों के लिए एक योजना शुरू की गई है ताकि उन्हें पीएमएवाई के अंतर्गत सस्ते किराए पर आवासीय इकाइयां उपलब्ध कराई जा सकें। योजना में जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी आवासीय मिशन (जेएनएनयूआरएम) के अंतर्गत उपलब्ध मौजूदा आवासों का इस्तेमाल तथा सरकारी एवं निजी एजेंसियों को किराए के लिए नई सस्ती इकाइयों के निर्माण को प्रोत्साहित करना प्रस्तावित है। इसके अतिरिक्त मध्यम आय वर्ग के लिए पीएमएवाई के अंतर्गत क्रेडिट लिंक्ड सबसिडी योजना हेतु अतिरिक्त धनराशि आबंटित की गई है। 

वित्तीय सहायताकुछ राज्य सरकारों (जैसे बिहारराजस्थान और मध्य प्रदेश) ने लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों के लिए वन टाइम कैश ट्रांसफर की घोषणा की है। उत्तर प्रदेश सरकार ने लौटने वाले प्रवासियों के लिए, जिन्हें क्वारंटाइन में रहने की जरूरत है, के लिए 1,000 रुपए के मेनटेंस भत्ते की घोषणा की। 

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने देश में अलग-अलग भागों में फंसे प्रवासी श्रमिकों की स्थिति की समीक्षा की और कहा कि इस स्थिति में सरकार की प्रतिक्रिया अपर्याप्त है और उसमें तमाम खामियां हैं। 

  • 26 मई को अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को आदेश जारी किया कि उन्होंने प्रवासी श्रमिकों के संबंध में जो भी उपाय किए हैं, उसकी जानकारी सौंपे।  
  • 28 मई को अदालत ने केंद्र और राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को अंतरिम निर्देश दिए कि वे प्रवासी श्रमिकों के लिए निम्नलिखित सुनिश्चित करें: i) प्रवासी श्रमिकों से ट्रेन या बसों का किराया नहीं लिया जाएगा, ii) फंसे हुए प्रवासियों को संबंधित राज्य/केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों द्वारा मुफ्त भोजन दिया जाना चाहिए और इस सूचना को प्रचारित किया जाना चाहिए, iii) राज्य प्रवासियों के परिवहन के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को सरल बनाएंगे और उसे स्पीड-अप करेंगे, और iv) प्रवासियों को रिसीव करने वाले राज्य लास्ट माइल ट्रांसपोर्ट, हेल्थ स्क्रीनिंग और दूसरी सुविधाएं मुफ्त उपलब्ध कराएंगे। 
  • अपने पहले के निर्देशों को दोहराते हुए 5 जून को (पूरा आदेश 9 जून को जारी किया गया) सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को निम्नलिखित सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी किया: i) जो भी श्रमिक देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे हुए हैं और अपने मूल स्थान को लौटना चाहते हैं, उनकी परिवहन की व्यवस्था को 15 दिनों में पूरा किया जाए, ii) प्रवासी श्रमिकों की पहचान को तुरंत पूरा किया जाए और प्रवासियों के रजिस्ट्रेशन को पुलिस स्टेशनों और स्थानीय अथॉरिटीज़ में विकेंद्रित किया जाए, iii) प्रवासी श्रमिकों के रिकॉर्ड्स रखे जाएं और उनमें उनके पूर्व रोजगार के स्थान और उनकी दक्षता की प्रकृति का भी उल्लेख हो, और iv) ब्लॉक स्तर पर काउंसिंग सेंटर्स बनाए जाएं जहां केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं और रोजगार के दूसरे क्षेत्रों की जानकारी प्रदान की जाए। अदालत ने राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को निर्देश दिया कि लॉकडाउन के आदेशों का कथित उल्लंघन के लिए प्रवासी श्रमिकों के खिलाफ आपदा प्रबंधन कानून के सेक्शन 51 के अंतर्गत प्रॉसीक्यूशन/शिकायतों को वापस लेने पर विचार किया जाए। 

[1] Census, 2011, Office of the Registrar General & Census Commissioner, Ministry of Home Affairs.

[2] Report of Working Group on Migration, Ministry of Housing and Urban Poverty Alleviation, January 2017, http://mohua.gov.in/upload/uploadfiles/files/1566.pdf.

[3] Order No40-3/2020-DM-(A), Ministry of Home Affairs, April 29, 2020, https://prsindia.org/files/covid19/notifications/4233.IND_Movement_of_Persons_April_29.pdf

[4] Order No40-3/2020-DM-(A), Ministry of Home Affairs, May 1, 2020, https://prsindia.org/files/covid19/notifications/IND_Special_Trains_May_1.jpeg. 

[5] “Indian Railways operationalizes 4197 “Shramik Special” trains till 3rd June, 2020 (0900hrsacross the country and transports more than 58 lacs passengers to their home states through Shramik Special” trains since May 1, Press Information Bureau, Ministry of Railways, June 3, 2020, https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1629043