बिल की मुख्य विशेषताएं
-
बिल 17 कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव रखता है। इसका उद्देश्य म्यूनिसिपल गवर्नेंस, मोटर वाहन रेगुलेशन, कमोडिटी बोर्ड्स, एप्रेंटिसशिप्स और निर्यात संबंधी गतिविधियों जैसे क्षेत्रों में विभिन्न अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करना है।
-
बिल कई जुर्मानों को दंड (पैनेल्टी) से बदलता है और इन दंडों को वसूलने के लिए एडजुडिकेटिंग अधिकारियों को नामित करता है।
-
बिल प्रावधान करता है कि हर तीन वर्षों में इन 17 कानूनों में जुर्माने और दंड में 10% की वृद्धि होगी। बिल यह भी कहता है कि अगर किसी एक्ट में पहले से संशोधन का तरीका निर्दिष्ट किया गया है तो एक्ट का तरीका ही लागू होगा।
-
बिल नई दिल्ली नगरपालिका परिषद एक्ट, 1994 के तहत प्रॉपर्टी टैक्स की वसूली की प्रक्रिया में संशोधन करता है। बिल निर्दिष्ट करता है कि प्रॉपर्टी टैक्स में भवन कर औऱ रिक्त भूमि कर शामिल होगा।
-
बिल लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 के तहत कई अपराधों के लिए सुधार नोटिस का प्रस्ताव रखता है। ऐसे नोटिस के तहत निर्दिष्ट समय के भीतर गैर-अनुपालन को सुधारना होगा।
प्रमुख मुद्दे और विश्लेषण
-
समान अपराधों के लिए विभिन्न कानूनों में सज़ा और दीवानी दंड अलग-अलग होते हैं। हालांकि जन विश्वास सुधार कुछ विसंगतियों को दूर करते हैं, फिर भी मतभेद कायम रह सकते हैं या फिर से उभर सकते हैं। अन्य देशों ने मानकीकृत पैमाने जैसी प्रणालियां तैयार की हैं जो विभिन्न कानूनों पर लागू होती हैं।
-
कुछ मामलों में बिल अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करता है लेकिन जुर्माने की राशि पहले जितनी ही है। कुछ अन्य मामलों में जुर्माने की राशि में संशोधन नहीं किया गया है।
-
एक जैसे अपराधों के लिए विभिन्न कानूनों में अलग-अलग सज़ा यथावत है। कुछ कानूनों में एक जैसे अपराधों के लिए दीवानी दंड का प्रावधान है, जबकि कुछ कानूनों में उन्हीं के लिए कारावास या जुर्माने की सज़ा है।
-
बिल में कुछ प्रक्रियागत चूकों के लिए कारावास या जुर्माने को बरकरार रखा गया है, तथा कुछ मामलों में कारावास को हटा दिया गया है, लेकिन जुर्माने को बरकरार रखा गया है।
-
एप्रेंटिस एक्ट, 1961 के तहत यह बिल सरकार को नियमों के जरिए दंड निर्दिष्ट करने का अधिकार देता है। एक्ट में किसी भी दिशानिर्देश के बिना अधीनस्थ विधान के जरिए दंड निर्धारित करना, अत्यधिक अधिकार सौंपने (एक्सेसिव डेलिगेशन) के बराबर हो सकता है।
-
सड़क परिवहन निगम एक्ट, 1950 के मामले में बिल कारावास के स्थान पर दंड का प्रावधान करता है, लेकिन इसमें अधिनिर्णय (एड्जुडिकेशन) या अपील तंत्र को निर्दिष्ट नहीं किया गया है।
-
बिल में कॉयर उद्योग एक्ट, 1953 के तहत बिना लाइसेंस के निर्यात के अपराध के लिए दंड को हटा दिया गया है, लेकिन इसे अपराध के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
भाग क: बिल की मुख्य विशेषताएं
संदर्भ
जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल, 2025 में 17 कानूनों में संशोधन प्रस्तावित है। यह विभिन्न क्षेत्रों में कई छोटे अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करने का प्रयास करता है, जैसे म्यूनिसिपल गवर्नेंस, मोटर वाहन रेगुलेशन, कमोडिटी बोर्ड्स, एप्रेंटिसशिप्स, और निर्यात संबंधी गतिविधियां तथा अनुपालन संबंधी दबावों को कम करने का प्रयास करता है जोकि आर्थिक गतिविधियों में रुकावट पैदा कर सकते हैं। यह बिल जुर्माने से दंडनीय कई अपराधों को दीवानी दंड में परिवर्तित करता है जिससे अदालती कार्यवाही के बिना प्रशासनिक एडजुडिकेशन संभव हो जाता है। यह बिल ऐसे दंड लगाने के लिए एडजुडिकेटिंग अधिकारियों को भी नामित करता है, साथ ही कई प्रक्रियात्मक और तकनीकी उल्लंघनों के लिए कारावास की सजा को भी हटाता है। यह बिल जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) एक्ट, 2023 पर आधारित है जिसने समान उद्देश्यों वाले 42 कानूनों में संशोधन किया था। इन सुधारों का उद्देश्य छोटे अपराधों को युक्तिसंगत करना, रेगुलेटरी अनुपालन को सरल बनाना और गवर्नेंस के प्रति अधिक सुविधाजनक, विश्वास-आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है।
2022 के बिल की समीक्षा करने वाली ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमिटी ने सुझाव दिया था कि सरकार अन्य केंद्रीय कानूनों की समीक्षा करके और भविष्य में इसी तरह के कानून लाकर इस प्रक्रिया को जारी रखे। कमिटी ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी इसी तरह के सुधार करने की सलाह दी थी। कमिटी ने यह भी सुझाव दिया था कि सरकार एक स्थायी विशेषज्ञ समूह का गठन करके इस सुधार प्रक्रिया को संस्थागत रूप दे, जो समय-समय पर विभिन्न कानूनों के उन प्रावधानों की पहचान करे जिन्हें डीक्रिमिनलाइज किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कमिटी ने यह सुझाव भी दिया था कि दंडों की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए और विभिन्न मंत्रालयों के एडजुडिकेशन तंत्र में सामंजस्य पैदा किया जाना चाहिए ताकि उनके प्रवर्तन में एकरूपता आए और भविष्य में उनके परिणाम का सही अनुमान लगाया जा सके।[1] 2025 के बिल को लोकसभा की एक सिलेक्ट कमिटी (चेयर: श्री तेजस्वी सूर्या) को भेजा गया है।
मुख्य विशेषताएं
बिल 17 कानूनों में संशोधन करता है जिनमें दिल्ली नगर निगम एक्ट, 1957, एप्रेंटिस एक्ट, 1961, मोटर वाहन एक्ट, 1988, नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) एक्ट, 1994 और लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 शामिल हैं।
-
कुछ अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करना: बिल कई अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करता है। उदाहरण के लिए, मोटर वाहन एक्ट, 1988 के तहत, मानसिक या शारीरिक रूप से अयोग्य व्यक्ति द्वारा वाहन चलाना जुर्माने के साथ दंडनीय है। इसके बजाय बिल इस अपराध के लिए दीवानी दंड का प्रावधान करता है।
-
कारावास को हटाना: कई मामलों में, बिल कुछ अपराधों के लिए कारावास को हटाता है। उदाहरण के लिए बिजली एक्ट, 2003 के तहत, किसी आदेश या निर्देश का पालन न करने पर तीन महीने तक का कारावास, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। बिल इन अपराधों के लिए कारावास को हटाता है और इसके बजाय केवल जुर्माना लगाता है।
-
अपराधों को हटाना: बिल कुछ अपराधों को समाप्त करता है। उदाहरण के लिए कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ निर्यात विकास अथॉरिटी एक्ट, 1985 के तहत किसी अधिकारी के काम में रुकावट डालना और बही खातों को ना दिखाना, एक ऐसा अपराध है, जिसके लिए छह महीने तक का कारावास, 1,000 रुपए का जुर्माना या दोनों भुगतने पड़ सकते हैं। बिल इन अपराधों को समाप्त करता है।
-
जुर्माने और सजा में संशोधन: बिल निर्दिष्ट कानूनों में कई अपराधों के लिए जुर्माने और दंड को बढ़ाता है। प्रत्येक तीन वर्षों में इन जुर्मानों और दंड की न्यूनतम राशि में 10% की वृद्धि होगी।
-
अपराध के पहले मामले में दंड को हटाना: बिल कुछ कानूनों में संशोधन करके अपराध के पहले मामले पर चेतावनी का प्रावधान करता है। उदाहरण के लिए, केंद्रीय रेशम बोर्ड एक्ट, 1948 में गलत जानकारी देने पर कारावास, जुर्माना या दोनों का दंड दिया जाता है। बिल इसमें संशोधन करके पहले अपराध की स्थिति में चेतावनी जारी करने और बाद के अपराधों के लिए आर्थिक दंड लगाने का प्रावधान करता है।
-
सुधार नोटिस: लीगल मीट्रोलॉजी एक्ट, 2009 के तहत नॉन स्टैंडर्ड बाट और माप के निर्माण, उपयोग या बिक्री जैसे कई अपराधों के लिए जुर्माने का प्रावधान है। इसके बजाय, बिल में प्रावधान है कि पहली बार अपराध करने पर सुधार नोटिस जारी किया जा सकता है। इन नोटिसों में एक निश्चित समय सीमा के भीतर गैर-अनुपालन को सुधारना होगा। इसके बाद के अपराधों के लिए जुर्माने का प्रावधान होगा।
-
एडजुडिकेशन और अपील: केंद्र सरकार दंड के निर्धारण के लिए एक या उससे अधिक एडजुडिकेटिंग अधिकारियों को नियुक्त कर सकती है। ये अधिकारी सबूत के लिए व्यक्तियों को सम्मन कर सकते हैं और संबंधित कानूनों के उल्लंघन के संबंध में जांच कर सकते हैं। बिल इन अधिकारियों द्वारा जारी आदेशों के लिए अपीलीय तंत्र भी निर्दिष्ट करता है। उदाहरण के लिए एनडीएमसी एक्ट, 1994 के तहत न्यूनतम असिस्टेंट कमीश्नर पद के अधिकारी को एडजुडिकेटिंग अधिकारी नियुक्त किया जाएगा। इसी प्रकार एडजुडिकेटिंग अधिकारी से एक रैंक ऊपर के अधिकारी को अपीलीय अथॉरिटी के रूप में नियुक्त किया जाएगा।
-
संपत्ति कर प्रणाली: यह बिल एनडीएमसी एक्ट, 1994 की संपत्ति कर प्रणाली में संशोधन करता है। बिल निर्दिष्ट करता है कि संपत्ति कर में भवन कर और रिक्त भूमि कर शामिल होंगे। यह रिक्त भूमि और भवनों के आधार मूल्य और संपत्ति कर के निर्धारण एवं संशोधन के तरीके की सिफारिश करने के लिए एक नगर मूल्यांकन समिति का गठन करता है। निम्नलिखित अपराधों के लिए एक महीने से सात वर्ष तक का कारावास और कर चोरी की गई राशि का कम से कम 50% जुर्माना देना होगा: (i) संपत्ति कर का भुगतान जानबूझकर न करना, (ii) समय पर संपत्ति कर का रिटर्न दाखिल करने में जानबूझकर विफल रहना, और (iii) एसेसमेंट रिटर्न में गलत जानकारी देना। बिल विज्ञापन कर लगाने से संबंधित प्रावधानों को भी हटाता है।
ख: मुख्य मुद्दे और विश्लेषण
दंड में सुसंगति सुनिश्चित करने के लिए एक मानकीकृत संरचना की जरूरत है
वर्तमान में विभिन्न कानूनों में समान अपराधों के लिए अलग-अलग दंड का प्रावधान है। समान स्तर की क्षति या दोषसिद्धि के बावजूद दंड अलग-अलग हो सकते हैं। समान अपराधों के लिए एक कानून में दीवानी दंड और दूसरे में आपराधिक जुर्माना और/या कारावास हो सकता है। इसके अलावा, आपराधिक जुर्माने और दीवानी दंड का मौद्रिक मूल्य अपरिवर्तित रह सकता है, जिससे समय के साथ उनका निवारक प्रभाव कम हो सकता है। जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) एक्ट, 2023 और जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल, 2025 चुनिंदा कानूनों (क्रमशः 42 कानून और 17 कानून) में इनमें से कुछ मुद्दों को संबोधित करते हैं, जिसमें हर तीन वर्ष में जुर्माने और दंड में 10% की वृद्धि शामिल है। ऐसे मुद्दे अन्य कानूनों में अनसुलझे रह सकते हैं। इसके अलावा बिल के तहत आने वाले कानूनों में अगर भविष्य में संशोधन किया जाता है तो ये कानून ऐसे अंतरों को फिर से पेश कर सकते हैं।
अन्य देशों ने इन मुद्दों को हल करने के लिए वैकल्पिक दृष्टिकोण अपनाए हैं। उदाहरण के लिए यूनाइटेड किंगडम में स्टैंडर्ड स्केल सिस्टम का उद्देश्य छोटे अपराधों के लिए जुर्माने के निर्धारण में एकरूपता सुनिश्चित करना है।[2] यह लेवल 1 से लेवल 5 तक, जुर्माने के पांच स्तर निर्धारित करता है। प्रत्येक स्तर पर अधिकतम राशि तक का जुर्माना लगाया जाता है। प्रत्येक कानून में जुर्माने की निश्चित राशि निर्धारित करने के बजाय, अपराधों को स्टैंडर्ड स्केल के एक स्तर से जोड़ा जाता है। इससे सभी जुर्माने एक ही संशोधन के माध्यम से एक साथ अपडेट किए जा सकते हैं। इसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया में पैनेल्टी युनिट सिस्टम, पैनेल्टी युनिट्स के जरिए जुर्माने का प्रावधान करता है। इसमें हरेक युनिट एक निर्धारित मौद्रिक मूल्य का प्रतिनिधित्व करती है।[3] इस प्रणाली में सरकार रेगुलेशंस के जरिए पैनेल्टी युनिट की वैल्यू एडजस्ट कर सकती है जिससे प्रत्येक कानून में संशोधन किए बिना सभी जुर्माने अपने आप अपडेट हो जाते हैं।
कुछ कानूनों में दंड और जुर्मानों में संशोधन नहीं किया गया, जिससे प्रभावी निवारण संभव नहीं हो सकता
यह बिल कारावास या जुर्माने के स्थान पर दीवानी दंड का प्रावधान करके कई अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करता है। हालांकि, कुछ मामलों में बिल के तहत जुर्माना राशि एक्ट के समान ही रहेगी। उदाहरण के लिए, एनडीएमसी एक्ट, 1994 के तहत 25 रुपए से 100 रुपए तक के जुर्माने से दंडनीय कुछ अपराधों को उसी स्तर के सिविल दंड से बदल दिया गया है। 1994 में कानून के लागू होने के बाद से जुर्माने की ये राशियां अपरिवर्तित रही हैं।
कुछ अन्य मामलों में बिल ने जुर्माने में संशोधन नहीं किया है (उदाहरण के लिए तालिका 1 और तालिका 2 देखें)। दंड को इस स्तर पर रखने से निवारण कमजोर हो सकता है, क्योंकि उल्लंघन की लागत गैर-अनुपालन से होने वाले संभावित लाभों की तुलना में बहुत कम हो सकती है। हालांकि बिल के क्लॉज 3 में हर तीन वर्ष में दंड में 10% की स्वतः वृद्धि का प्रावधान है। लेकिन यह वृद्धि एक निम्न आधार से शुरू होगी, जिससे इसकी प्रभावशीलता सीमित हो जाएगी।
तालिका 1: ऐसे अपराध जिन्हें बिल डीक्रिमिनलाइज करता है लेकिन दीवानी दंड अपरिवर्तित या कम बने हुए हैं (राशि रुपए में)
|
एक्ट |
सेक्शन |
अपराध |
एक्ट के तहत आपराधिक जुर्माना |
बिल के तहत दीवानी दंड |
|
दिल्ली नगर निगम एक्ट, 1957 |
128 (1) (2) |
भूमि या भवन के हस्तांतरण की सूचना देने में विफलता। |
50 |
50 |
|
319 |
भूतल के दरवाजों आदि को इस प्रकार परिवर्तित करने की अपेक्षा का अनुपालन न करना कि वे बाहर की ओर न खुलें |
50 |
50 |
|
|
एनडीएमसी एक्ट, 1994 |
74 (1) (2) |
भूमि या भवन के हस्तांतरण की सूचना देने में विफलता। |
50 |
50 |
|
122 |
दायित्व का खुलासा करने में विफलता। |
100 |
100 |
स्रोत: संबंधित एक्ट्स, जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल, 2025; पीआरएस।
तालिका 2: उन अपराधों के उदाहरण जिन्हें बिल ने न तो डीक्रिमिनलाइज किया है और न ही उनके तहत जुर्माने की राशि में कोई बदलाव किया है
|
एक्ट |
सेक्शन |
अपराध |
एक्ट के तहत जुर्माना (रुपए में) |
अंतिम संशोधित राशि (वर्ष) |
|
एनडीएमसी एक्ट, 1994 |
173 |
नगरपालिका की नाली से जुड़ी नालियों की वस्तुओं को क्षति पहुंचाना या उनके मुक्त प्रवाह में बाधा उत्पन्न करना। |
50 |
1994 |
|
186 (4) |
पाइप या नाली को बंद करने, हटाने या मोड़ने के अनुरोध का अनुपालन न करना। |
50, 5 रोजाना |
1994 |
|
|
दिल्ली नगर निगम एक्ट, 1957 |
397 (1) (2) (3) |
उपद्रव करना। |
50 |
1957 |
|
421 |
बिना लाइसेंस के या लाइसेंस के विपरीत आवास गृह, भोजन गृह, चाय की दुकान आदि चलाना। |
100 |
1957 |
|
|
ड्रग्स और कॉस्मैटिक्स एक्ट, 1940 |
34एए |
तंग करने वाली तलाशी। |
1,000 |
1983 |
नोट: केवल वे अपराध शामिल किए गए हैं जिनमें 2015 के बाद संशोधन नहीं किया गया है। स्रोत: संबंधित एक्ट्स, जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल, 2025; पीआरएस।
विभिन्न कानूनों में एक समान अपराधों के लिए दंड में असंगति
यह बिल अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करने और कारोबारी सुगमता तथा जीवन सुगमता में सुधार के लिए एडजुडिकेशन का प्रावधान करता है। हालांकि विभिन्न संशोधित कानूनों में समान श्रेणियों के अपराधों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जा रहा है। कुछ मामलों में कारावास जारी रहेगा, कुछ में जुर्माना बना रहेगा, और कुछ मामलों में दंड या चेतावनी का प्रावधान किया जा रहा है। एक मामले में 200 रुपए के मौजूदा जुर्माने को छह महीने तक के कारावास, 5,000 रुपए तक के जुर्माने या दोनों से बदल दिया गया है (देखें तालिका 3 और 4)।
तालिका 3: बिल द्वारा संशोधित कानूनों में भिन्न दंड वाले समान अपराधों के उदाहरण
|
अपराध |
एक्ट |
सेक्शन |
एक्ट के तहत दंड
|
बिल द्वारा संशोधित सेक्शन? |
बिल के तहत दंड |
|
|
जुर्माना/कारावास |
जुर्माना/कारावास |
दीवानी दंड |
||||
|
तंग करने वाली तलाशी |
ड्रग्स और कॉस्मैटिक्स एक्ट, 1940 |
34एए |
1,000 रुपए तक |
नहीं |
- |
- |
|
लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 |
42 |
एक वर्ष तक का कारावास, 10,000 रुपए तक का जुर्माना या दोनों |
नहीं |
- |
- |
|
|
सड़कों पर प्रॉजेक्शन |
दिल्ली नगर निगम एक्ट, 1957 |
317(1) |
200 रुपए |
हां |
छह महीने तक का कारावास, 5,000 रुपए तक का जुर्माना, या दोनों |
- |
|
एनडीएमसी एक्ट, 1994 |
211 |
200 रुपए, 50 रुपए रोजाना |
हां |
- |
200 रुपए, 50 रुपए रोजाना |
|
स्रोत: संबंधित एक्ट्स, जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल, 2025; पीआरएस।
तालिका 4: एक ही एक्ट के अंतर्गत अलग-अलग दंड वाले समान अपराधों के उदाहरण
|
एक्ट |
क्लॉज/सेक्शन |
अपराध |
जुर्माना/कारावास/दंड |
|
ड्रग्स और कॉस्मैटिक्स एक्ट, 1940 |
27 |
गलत ब्रांड वाली/मिलावटी/नकली दवाओं का निर्माण, बिक्री, वितरण या लाइसेंस के बिना। |
एक वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक का कारावास, जुर्माना (श्रेणी के आधार पर)। |
|
33-I (1) (ए) |
गलत ब्रांड वाली, मिलावटी आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी दवाओं का निर्माण/बिक्री, या बिना लाइसेंस के। |
एक वर्ष तक का कारावास और 20,000 रुपए या मूल्य का तीन गुना जुर्माना, जो भी ज्यादा हो। |
|
|
33-I (1) (बी) |
नकली आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी दवाओं का निर्माण/बिक्री। |
एक से तीन वर्ष तक का कारावास और 50,000 रुपए या मूल्य का तीन गुना जुर्माना, जो भी ज्यादा हो। |
|
|
बिजली एक्ट, 2003 |
142 |
आयोग के निर्देशों का पालन न करना। |
एक लाख रुपए तक का जुर्माना; लगातार अपराध करने पर 6,000 रुपए प्रतिदिन। |
|
146 |
सामान्य आदेशों का पालन न करना। |
10,000 रुपए से 10 लाख रुपए तक का जुर्माना। |
स्रोत: संबंधित एक्ट्स, जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल, 2025; पीआरएस।
मामूली प्रक्रियागत अपराधों के लिए कारावास और आपराधिक जुर्माना बरकरार रखा गया है
बिल का एक प्रमुख उद्देश्य न्यायिक बोझ को कम करना और आपराधिक दंडों के स्थान पर दीवानी दंडों को लागू करके विश्वास-आधारित शासन को बढ़ावा देना है। हालांकि कई कानूनों में प्रक्रियागत या रेगुलेटरी चूक, जैसे कि सूचना न देना या प्रशासनिक आदेश का पालन न करना, पर कारावास का प्रावधान जारी है (निम्नलिखित तालिका 5 देखें)। ये अपराध आमतौर पर तकनीकी या प्रक्रियागत गैर-अनुपालन से जुड़े होते हैं, न कि प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचाने से। इन्हें क्रिमिनल अपराध के रूप में बरकरार रखना, कारोबारी सुगमता में सुधार और अनावश्यक मुकदमेबाजी को कम करने के बिल के घोषित उद्देश्य के विपरीत हो सकता है।
तालिका 5: प्रक्रियागत गैर-अनुपालन के उदाहरण जो क्रिमिनल अपराध के रूप में बरकरार हैं
|
एक्ट |
सेक्शन |
अपराध |
दंड |
|
एनडीएमसी एक्ट, 1994 |
238 (1) |
भवन निर्माण के इरादे की सूचना न देना। |
छह महीने तक का कारावास, 5,000 रुपए तक का जुर्माना, या दोनों। |
|
दिल्ली नगर निगम एक्ट, 1957 |
334 (1) |
किसी भवन में परिवर्तन करने के इरादे की सूचना न देना। |
छह महीने तक का कारावास, 5,000 रुपए तक का जुर्माना या दोनों। |
|
बिजली एक्ट, 2003 |
146 |
एक्ट के तहत किसी भी आदेश/निर्देश का पालन करने में विफलता। |
10,000 रुपए से 10,00,000 रुपए तक का जुर्माना। |
|
लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 |
41 |
झूठा प्रतिवेदन। |
पहली बार अपराध करने पर सुधार का नोटिस, दूसरी बार अपराध करने पर 5,000 रुपए तक जुर्माना, इसके बाद अंतिम अपराध के बराबर जुर्माना, पांच लाख रुपए तक। |
स्रोत: संबंधित एक्ट्स, जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल, 2025; पीआरएस।
कुछ मामलों में कारावास को हटा दिया गया है लेकिन आपराधिक जुर्माना बरकरार है
कुछ कानूनों में बिल कारावास की सजा को हटाता है, लेकिन आपराधिक जुर्माने को बरकरार रखता है। उदाहरण के लिए बिजली एक्ट, 2003 के तहत, आदेशों या निर्देशों का पालन न करने पर वर्तमान में तीन महीने तक का कारावास, एक लाख रुपए तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। बिल इसके स्थान पर 10,000 रुपए से 10 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाता है। इसी प्रकार ड्रग और कॉस्मैटिक्स एक्ट, 1940 के तहत, ऐसे प्रावधानों, जिनमें कोई दंड निर्दिष्ट नहीं किया गया है, का उल्लंघन करने पर छह महीने तक का कारावास और 10,000 रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। बिल में इसके स्थान पर 30,000 रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। 2022 की कमिटी ने कहा था कि कारावास के स्थान पर सिर्फ जुर्माना लगाने से बिल का उद्देश्य पूरी तरह से प्राप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि मुकदमेबाजी जारी रहती है।1 कमिटी ने सुझाव दिया था कि जहां भी संभव हो, कारावास के स्थान पर ऐसे अपराधों को आपराधिक कानून के अंतर्गत रखने की बजाय, निर्दिष्ट कार्यकारी प्राधिकारियों द्वारा निर्धारित दंड लगाया जाए।1 कमिटी ने कहा था कि प्रक्रिया में छोटी-मोटी चूक न्यायपालिका पर अनावश्यक बोझ डालती हैं और गंभीर अपराधों से ध्यान भटकाती हैं।1
कई अपराधों के लिए वैकल्पिक दंड का अभाव
भारतीय न्याय संहिता, 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 ने छोटे अपराधों जैसे कि मामूली चोरी, सार्वजनिक उपद्रव और मानहानि के लिए वैकल्पिक सजा के रूप में सामुदायिक सेवा की शुरुआत की।[4],[5] हालांकि बिल में तुलनीय अपराधों के लिए इस दृष्टिकोण को शामिल नहीं किया गया है, उदाहरण के लिए, एनडीएमसी एक्ट, 1994 या दिल्ली नगर निगम एक्ट, 1957 के तहत उपद्रव से संबंधित अपराध।
नियमों के तहत दंड का निर्धारण अत्यधिक अधिकार सौंपने के बराबर हो सकता है
एप्रेंटिस एक्ट, 1961 के अंतर्गत अपराधों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) आवश्यक जानकारी प्रदान करने में विफलता, (ii) बिना अनुमति के एप्रेंटिस से ओवरटाइम करवाना, और (iii) एप्रेंटिसशिप कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन करना। इन अपराधों के लिए 500 रुपए से 1,000 रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। बिल इन अपराधों को डीक्रिमिनलाइज करता है। इसमें पहले अपराध के लिए एक एडवाइजरी का प्रावधान है। इसके बाद के अपराधों के लिए चेतावनी, निंदा या दीवानी दंड दिया जाएगा। हालांकि बिल में न तो दीवानी दंड की राशि निर्दिष्ट की गई है और न ही दंड की राशि की कोई सीमा (उच्च या निम्न) निर्धारित की गई है। दंड अधीनस्थ विधान के माध्यम से निर्धारित किया जाएगा, जो विधायी शक्ति का अत्यधिक प्रत्यायोजन (एक्सेसिव डेलिगेशन) यानी कार्यपालिका को अत्यधिक अधिकार सौंपने के बराबर हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय (1960) ने कहा है कि अधीनस्थ विधान को निर्देशित करने वाले स्पष्ट मानकों, मानदंडों या सिद्धांतों के अभाव में कार्यपालिका का विवेकाधिकार अनुमत सीमा से अधिक हो सकता है।[6] यह तर्क दिया जा सकता है कि दंड एक्ट में ही निर्धारित किए जाने चाहिए, न कि अधीनस्थ विधान पर छोड़े जाने चाहिए।
सड़क परिवहन निगम एक्ट में एडजुडिकेशन और अपील तंत्र का अभाव है
सड़क परिवहन निगम एक्ट, 1950 के अनुसार, एक्ट के तहत नियमों का उल्लंघन करने पर 500 रुपए तक का जुर्माना और उल्लंघन जारी रहने पर प्रतिदिन 20 रुपए का अतिरिक्त जुर्माना लगाया जा सकता है। बिल इसके स्थान पर दीवानी दंड का प्रावधान करता है। हालांकि बिल दीवानी दंड लगाने के लिए उत्तरदायी एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी को निर्दिष्ट नहीं करता है, न ही ऐसे आदेशों को चुनौती देने के लिए कोई अपीलीय तंत्र बनाता है। बिल द्वारा संशोधित किए जा रहे कुछ अन्य कानूनों, जैसे दिल्ली नगर निगम एक्ट, 1957 और एप्रेंटिस एक्ट, 1961 में बिल एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी और अपीलीय अथॉरिटीज़ को निर्दिष्ट करता है। जन विश्वास बिल, 2022 ने भी इसी प्रकार कई अपराधों को डीक्रिमिनलाइज किया है और आपराधिक दंडों के स्थान पर दीवानी दंडों का प्रावधान किया है। 2022 की कमिटी ने कहा था कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक्ट में एडजुडिकेशन और अपील हेतु एक समतुल्य तंत्र प्रदान किया जाना चाहिए।1
कॉयर उद्योग एक्ट के तहत बिना लाइसेंस के निर्यात के अपराध के लिए कोई दंड नहीं है
कॉयर उद्योग एक्ट, 1953 में कॉयर बोर्ड द्वारा जारी लाइसेंस के बिना कॉयर रेशे, धागे और अन्य कॉयर उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध है। इस प्रावधान का उल्लंघन करने पर 500 रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। बिल दंड का प्रावधान करने वाले सेक्शन को हटाता है, जिससे बिना लाइसेंस के ऐसे उत्पादों के निर्यात पर लगने वाला जुर्माना हट जाता है, लेकिन बिल में यह कृत्य अपराध ही बना हुआ है।
[1]. Report of the Joint Committee on the Jan Vishwas (Amendment of Provisions) Bill, 2022, Lok Sabha, March 20, 2023, https://sansad.in/getFile/lsscommittee/Joint%20Committee%20on%20the%20Jan%20Vishwas%20(Amendment%20of%20Provisions)%20Bill,%202022/17_Joint_Committee_on_the_Jan_Vishwas_(Amendment_of_Provisions)_Bill_2022_1.pdf?source=loksabhadocs.
[2]. Section 122, The Sentencing Act, 2020, United Kingdom, https://www.legislation.gov.uk/ukpga/2020/17/group/THIRD/part/7/chapter/1/crossheading/magistrates-court/enacted.
[3]. Section 4AA, Crimes Act, 1914, Australia, https://classic.austlii.edu.au/au/legis/cth/consol_act/ca191482/.
[4]. Sections 224, 301, 353, 353 (2), Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, https://www.mha.gov.in/sites/default/files/2024-04/250884_2_english_01042024.pdf.
[5]. Sections 4F, 202, 209, 226, 303, 355, Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023, https://www.mha.gov.in/sites/default/files/250883_english_01042024.pdf.
[6]. Hamdard Dawakhana and Anr. v Union of India and ORs, Supreme Court of India, AIR 1960 SC 554, https://api.sci.gov.in/jonew/judis/274.pdf.
डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

