मंत्रालय: 
विधि एवं न्याय

बिल की मुख्‍य विशेषताएं

  • बिल राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण की स्थापना करता है जिसमें मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य सचिव, दिल्ली के प्रधान गृह सचिव शामिल हैं। प्राधिकरण अधिकारियों के तबादलों और तैनातियों तथा अनुशासनात्मक मामलों के संबंध में उपराज्यपाल (एलजी) को सुझाव देगा।

  • बिल एलजी को राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण द्वारा सुझाए गए मामलों और दिल्ली विधानसभा को बुलाने, स्थगित और भंग करने सहित कई मामलों पर अपने विवेक का प्रयोग करने का अधिकार देता है।

  • यह बिल विभागीय सचिवों को किसी भी मामले को एलजी, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के संज्ञान में लाने के लिए अधिकृत करता है जो दिल्ली सरकार को केंद्र सरकार के साथ विवाद में ला सकते हैं।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • प्राधिकरण को अधिकारियों के तबादलों और तैनातियों के संबंध में शक्तियां प्रदान करने से जवाबदेही की त्रिपक्षीय श्रृंखला टूट सकती है जो लोक सेवाओं, मंत्रियों, विधायिका और नागरिकों को जोड़ती है। यह संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांत का उल्लंघन हो सकता है, जो बुनियादी संरचना के सिद्धांत का एक हिस्सा है।

  • विधानसभा कब बुलाई जाएगी, ऐसे कई मामलों में एलजी को पूर्ण विवेकाधिकार दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि मुख्यमंत्री जरूरी सरकारी कार्य के लिए सत्र बुलाने में असमर्थ हो सकते हैं।

  • विभाग के सचिव संबंधित मंत्री से परामर्श किए बिना कुछ मामलों को सीधे एलजी, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के पास ले जाएंगे। यह कैबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी के खिलाफ जा सकता है, क्योंकि संबंधित मंत्री अपने इनपुट नहीं दे सकते।

भाग क : बिल की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) राष्ट्रपति या राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक द्वारा प्रत्यक्ष रूप से शासित होते हैं।[1]  हालांकि दिल्ली और पद्दूचेरी एक विधानमंडल और मंत्रिपरिषद वाले केंद्र शासित प्रदेश हैं।[2],[3]  दिल्ली विधानसभा के पास पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और भूमि को छोड़कर, राज्य सूची और समवर्ती सूची के तहत आने वाले विषयों पर कानून बनाने की शक्ति है।[4] दिल्ली सरकार के पास समान विषयों पर कार्यकारी शक्तियां हैं। इसके अलावा संसद के पास भी राज्य और समवर्ती सूची के उन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति है, जो दिल्ली से संबंधित हैं। उपराज्यपाल (एलजी) को दिल्ली के प्रशासक के रूप में नामित किया गया है, जो दिल्ली के मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से काम करते हैं।[5]  राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (जीएनसीटीडी) एक्ट, 1991 दिल्ली विधानसभा और दिल्ली सरकार के कामकाज के लिए रूपरेखा तैयार करता है[6]  यह विधानसभा की शक्तियों, एलजी की विवेकाधीन शक्तियों और एलजी को जानकारी प्रदान करने के मुख्यमंत्री के कर्तव्य को रेखांकित करता है।

दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच सत्ता के बंटवारे का सवाल कई मौकों पर सर्वोच्च न्यायालय में उठाया गया है।[7],[8],[9]  11 मई, 2023 को सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच सेवाओं के नियंत्रण पर अपना फैसला सुनाया।[10]  न्यायालय के सामने सवाल यह था कि दिल्ली में सेवाओं और लोक सेवकों पर दिल्ली सरकार (निर्वाचित मुख्यमंत्री के नेतृत्व में) और उपराज्यपाल (केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त) में से किसका नियंत्रण होगा। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि दिल्ली में सेवाओं पर दिल्ली सरकार का नियंत्रण होगा। यह नियंत्रण पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और भूमि के विषयों पर नहीं होगा, जिन पर केंद्र सरकार के पास विशेष शक्तियां हैं। 2023 के फैसले ने 2018 के फैसले की भी पुष्टि की जब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि एलजी के पास स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्तियां नहीं हैं और वह मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह का पालन करने के लिए बाध्य है।अधिक विवरण के लिए तालिका 2 देखें।

दिल्ली में सेवाओं पर नियंत्रण पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद 19 मई, 2023 को जीएनसीटीडी (संशोधन) अध्यादेश, 2023 को जारी किया गया।[11] अध्यादेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई जिसने अब याचिका की सुनवाई शुरू कर दी है।[12]  जीएनसीटीडी (संशोधन) बिल, 2023 को लोकसभा में 1 अगस्त, 2023 को पेश किया गया। यह बिल अध्यादेश को निरस्त करता है और 19 मई, 2023 से पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा (बिल में किए गए परिवर्तनों के लिए तालिका 1 देखें)।

मुख्य विशेषताएं

  • राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण: बिल राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण की स्थापना करता है जोकि दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) को सेवाओं से संबंधित मामलों पर सुझाव देगा। इनमें निम्नलिखित मामले शामिल हैं: (i) तबादले और तैनाती, (ii) विजिलेंस से संबंधित मामले, (iii) अनुशासनात्मक कार्यवाहियां, और (iv) अखिल भारतीय सेवाओं (भारतीय पुलिस सेवा को छोड़कर), और डीएएनआईसीएस के ग्रुप ए की अभियोजन स्वीकृति।

  • प्राधिकरण में निम्नलिखित शामिल होंगे: (i) अध्यक्ष के रूप में दिल्ली के मुख्यमंत्री, (ii) सदस्य सचिव के रूप में दिल्ली सरकार के प्रधान गृह सचिव, और (iii) सदस्य के रूप में दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव। केंद्र सरकार प्रधान सचिव और मुख्य सचिव, दोनों की नियुक्ति करेगी। प्राधिकरण के सभी निर्णय उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत के आधार पर लिए जाएंगे। एक बैठक के लिए कोरम दो व्यक्ति हैं।

  • लेफ्टिनेंट गवर्नर की शक्तियां: एक्ट के तहत ऐसे मामले, जिनमें एलजी अपने विवेक से कार्य कर सकते हैं, वे हैं: (i) दिल्ली विधानसभा की विधायी क्षमता के बाहर के मामले लेकिन जो एलजी को सौंपे गए हैं, या (ii) ऐसे मामले जहां उनसे कानून द्वारा अपने विवेक से कार्य करना या कोई न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कार्य करना अपेक्षित है। बिल निर्दिष्ट करता है कि ऐसे मामलों में एलजी अपने विवेक से कार्य करेंगे। बिल एलजी की विवेकाधीन भूमिका का दायरा बढ़ाता है, और उन्हें प्राधिकरण के सुझावों को मंजूरी देने या उन्हें पुनर्विचार के लिए वापस लौटाने की शक्तियां भी देता है। अगर एलजी और प्राधिकरण के विचारों में मतभेद होता है तो उस स्थिति में एलजी का निर्णय ही अंतिम होगा।

  • मंत्रियों द्वारा मामलों का निस्तारण: दिल्ली सरकार का कोई मंत्री अपने ध्यान में लाए गए मामलों के निपटान के संबंध में स्थायी आदेश जारी कर सकता है। आदेश संबंधित विभाग के सचिव के परामर्श से जारी किया जाना चाहिए। किसी भी आदेश को जारी करने से पहले कुछ मामलों को मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के माध्यम से एलजी को प्रस्तुत किया जाना चाहिए जिन पर एलजी की राय ली जाएगी। इनमें निम्नलिखित को प्रभावित करने वाले प्रस्ताव शामिल हैं: (i) दिल्ली की शांति, (ii) दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार, सर्वोच्च न्यायालय, या अन्य राज्य सरकारों के बीच संबंध, (iii) विधानसभा को बुलाना, सत्रावसान और भंग करना, और (iv) वे मामले जिन पर एलजी को अपने विवेकाधिकार से आदेश देना है।

  • सचिवों के कर्तव्य: इसके अतिरिक्त संबंधित विभाग के सचिव को कुछ मामलों को एलजी, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के संज्ञान में लाना होगा। इनमें ऐसे मामले शामिल हैं जो दिल्ली सरकार को केंद्र या किसी राज्य सरकार, सर्वोच्च न्यायालय या दिल्ली उच्च न्यायालय के साथ विवाद में ला सकते हैं।

भाग ख: प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

बिल संविधान का उल्लंघन हो सकता है

केंद्र सरकार को दिल्ली में सेवाओं पर नियंत्रण देने से मूलभूत संरचना का उल्लंघन हो सकता है

बिल कुछ मामलों पर एलजी को सुझाव देने के लिए एक प्राधिकरण की स्थापना करता है। इन मामलों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) तबादले और तैनाती, (ii) विजिलेंस से संबंधित मामले, और (iii) दिल्ली में अधिकारियों की अनुशासनात्मक कार्यवाहियां। प्राधिकरण में तीन सदस्य हैं, जिनमें से दो (मुख्य सचिव और प्रधान गृह सचिव) केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त सदस्य हैं। ये सदस्य वास्तव में दिल्ली के मुख्यमंत्री को आउटवोट कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त बिल एलजी को प्राधिकरण के सुझावों को रद्द करने की शक्ति प्रदान करता है। इसलिए बिल प्रभावी रूप से केंद्र सरकार को दिल्ली में सेवाओं पर अधिकार देता है। अगर दिल्ली सरकार का लोक सेवकों पर नियंत्रण नहीं होगा, तो वह अपने अधिकार क्षेत्र में किसी भी क्षेत्र में कोई भी कार्यक्रम लागू नहीं कर सकती है। यह जवाबदेही की त्रिपक्षीय श्रृंखला का उल्लंघन कर सकता है, जो संसदीय लोकतंत्र की एक अनिवार्य विशेषता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 के हालिया फैसले में इस सिद्धांत को समझाया है।10 उसने कहा है कि लोकतांत्रिक सरकार जवाबदेही की त्रिपक्षीय श्रृंखला पर टिकी हुई है: (i) लोक सेवक मंत्रियों के प्रति जवाबदेह हैं, (ii) मंत्री विधायिका के प्रति जवाबदेह हैं, और (iii) विधायिका मतदाताओं के प्रति जवाबदेह है।10  लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को अपनी सरकार की सेवा में तैनात सरकारी अधिकारियों पर नियंत्रण रखने और उन्हें जवाबदेह बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए।10  जवाबदेही की त्रिपक्षीय श्रृंखला की पहली कड़ी को तोड़कर, बिल संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के विपरीत हो सकता है। 

2018 के निर्णय में जिस सिद्धांत को समझाया गया था, 2023 का निर्णय उसी को दोहराता है। वह यह है कि मंत्री अपने संबंधित विभाग में सरकारी अधिकारियों द्वारा किए गए प्रत्येक कार्य के लिए विधायिका के समक्ष जिम्मेदारी लेते हैं।हालांकि बिल के तहत, दिल्ली के मंत्री नौकरशाही संबंधी विलंब के लिए अपने सरकारी अधिकारियों को जिम्मेदार नहीं ठहरा पाएंगे।    

एलजी मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए मजबूर नहीं हो सकते हैं

अनुच्छेद 239एए के अनुसार, एलजी को अपने विवेक से कार्य करने के अलावा, मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना होगा।5,8  जीएनसीटीडी कार्य संचालन नियम, 1993 में प्रावधान है कि किसी भी आदेश को जारी करने से पहले कुछ मामलों को मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के माध्यम से एलजी को प्रस्तुत किया जाना चाहिए जिन पर एलजी की राय ली जाएगी।[13]  इन मामलों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) दिल्ली की शांति, (ii) दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार, सर्वोच्च न्यायालय, या अन्य राज्य सरकारों के बीच संबंध, और (iii) विधानसभा को बुलाना, सत्रावसान और भंग करना। बिल उल्लिखित मामलों का विस्तार करते हुए इसमें केंद्र सरकार के साथ दिल्ली सरकार के संबंधों को भी शामिल करता है। इसके अतिरिक्त यह एलजी की शक्तियों का विस्तार करता है क्योंकि अब इन मामलों में उनकी एकमात्र विवेकाधीन शक्ति होगी। अगर एलजी और मुख्यमंत्री के बीच मतभेद होता है तो एलजी की राय को प्राथमिकता दी जाएगी।

ये प्रावधान इस सिद्धांत का उल्लंघन कर सकते हैं कि एलजी उन मामलों में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करेंगे जो मंत्रिपरिषद की कार्यकारी क्षमता के भीतर आते हैं। प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के फैसले का भी खंडन करते हैं जिसमें कहा गया था कि निर्णय लेने की शक्ति निर्वाचित सरकार के पास है।8 

उदाहरण के लिए 1991 के एक्ट के तहत, एलजी के पास विधानसभा को बुलाने, स्थगित करने और भंग करने की शक्ति है।हालांकि वह मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं। बिल एलजी को मंत्रिपरिषद के निर्णय को रद्द करने और इन मामलों पर एकमात्र विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करने की अनुमति देता है। इसका मतलब यह है कि मुख्यमंत्री किसी भी जरूरी सरकारी कामकाज के लिए विधानसभा का सत्र नहीं बुला सकेगा।

बिल में कुछ शब्द अस्पष्ट हैं

एलजी की एकमात्र विवेकाधीन शक्तियां

एक्ट के तहत, ऐसे मामले जहां एलजी अपने विवेक से कार्य कर सकते हैं, वे इस प्रकार हैं: (i) दिल्ली विधानसभा की विधायी क्षमता के बाहर के मामले लेकिन जो एलजी को सौंपे गए हैं, या (ii) ऐसे मामले जहां उनसे कानून द्वारा अपने विवेक से कार्य करना या कोई न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कार्य करना अपेक्षित है। बिल निर्दिष्ट करता है कि इन मामलों में एलजी स्वविवेक से कार्य करेंगे। यह स्पष्ट नहीं है कि एलजी का 'स्वविवेक', 'विवेक' से कैसे भिन्न है।

एलजी के संज्ञान में लाए गए कुछ मामलों के मानदंड व्यापक हो सकते हैं

बिल के तहत संबंधित विभाग के सचिव को कुछ मामलों को एलजी, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के संज्ञान में लाना होगा। इनमें ऐसे मामले शामिल हैं जो दिल्ली सरकार को केंद्र या किसी राज्य सरकार, सर्वोच्च न्यायालय या दिल्ली उच्च न्यायालय के साथ विवाद में ला सकते हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि किन मामलों को विवादास्पद माना जाएगा।

इसके अलावा यह प्रावधान विभाग के सचिवों को संबंधित मंत्री से परामर्श किए बिना कुछ मामलों को सीधे एलजी, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के पास लाने में सक्षम बनाता है। इससे नियंत्रण की सामान्य श्रृंखला टूट जाएगी क्योंकि मंत्रालय से संबंधित मुद्दों पर संबंधित मंत्री का कोई इनपुट नहीं होगा। यह कैबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत के भी खिलाफ जा सकता है।

तालिका 1: 2023 के अध्यादेश और 2023 के बिल में परिवर्तित प्रमुख प्रावधानों के बीच तुलना

जीएनसीटीडी (संशोधन) अध्यादेश, 2023

2023 के बिल में परिवर्तन

  • सेवाओं पर दिल्ली की विधायी शक्ति हटा दी गई।
  • कोई उल्लेख नहीं।
  • किसी भी कानून के तहत अधिकारियों, बोर्ड, आयोगों, वैधानिक निकायों या पदाधिकारियों को नियुक्त करने की शक्ति राष्ट्रपति के पास होगी।
  • प्राधिकरणों, बोर्ड, आयोगों, वैधानिक निकायों या पदाधिकारियों को नियुक्त करने की शक्ति निम्नलिखित के पास होगी: (i) संसद के किसी भी कानून के लिए राष्ट्रपति, और (ii) दिल्ली विधानमंडल के किसी भी कानून के लिए एलजी।
  • लोक सेवा प्राधिकरण केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को एक वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा, जिसे संसद और दिल्ली विधानसभा में पेश किया जाएगा।
  • कोई उल्लेख नहीं।
  • प्रशासनिक महत्व का कोई भी मामला जिसे राष्ट्रपति या दिल्ली के मुख्यमंत्री जरूरी समझें, किसी भी आदेश जारी करने से पहले एलजी को प्रस्तुत किया जाएगा।
  • प्रशासनिक महत्व का कोई भी मामला जिसे दिल्ली के मुख्यमंत्री जरूरी समझें, किसी भी आदेश को जारी करने से पहले एलजी को प्रस्तुत किया जाएगा।

स्रोत: जीएनसीटीडी (संशोधन) अध्यादेश, 2023, जीएनसीटीडी (संशोधन) बिल, 2023; पीआरएस।

 

तालिका 2: दिल्ली पर प्रमुख कानूनों और फैसलों का क्रम

वर्ष

घटनाक्रम

1956

  • राज्य पुनर्गठन एक्ट पारित किया गया। दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में वर्गीकृत किया गया।

1991-92

  • दिल्ली को विधानमंडल वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाने के लिए 69वां संवैधानिक संशोधन (अनुच्छेद 239एए) पारित किया गया।
  • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (जीएनसीटीडी) एक्ट, 1991 पारित किया गया।
  • 70वां संवैधानिक संशोधन पारित हो गया जिसमें यह प्रावधान था कि संसद के कुछ कानूनों (अनुच्छेद 239एए में संशोधन) को संविधान में संशोधन नहीं माना जाएगा।

2015

  • गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी की और दिल्ली विधानसभा से सेवाओं पर नियंत्रण छीना और एलजी को उसके संबंध में केंद्र सरकार के कार्यों का निर्वहन करने का अधिकार दे दिया।

2016

  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि सेवाएं दिल्ली विधानसभा और कार्यपालिका के दायरे से बाहर हैं।7

2018

  • सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि एलजी को दिल्ली के मंत्रिपरिषद की "सहायता और सलाह" पर कार्य करना चाहिए।8

2019

  • दो न्यायाधीशों की पीठ ने सेवाओं के मुद्दे पर फैसला सुनाते हुए खंडित फैसला दिया।9

2021

  • केंद्र सरकार ने जीएनसीटीडी एक्ट, 1991 में संशोधन किया, उन मामलों की सूची का विस्तार किया जिनमें एलजी की राय अनिवार्य थी। संशोधन में बताया गया कि एलजी किस प्रकृति के बिल्स को राष्ट्रपति को भेज सकते हैं।

2023

  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि दिल्ली में सेवाओं पर दिल्ली सरकार का नियंत्रण है।10
  • केंद्र सरकार ने दिल्ली विधानमंडल के दायरे से "सेवाओं" को बाहर करते हुए जीएनसीटीडी एक्ट, 1991 में संशोधन के लिए एक अध्यादेश जारी किया।
  • 1 अगस्त, 2023 को जीएनसीटीडी (संशोधन) बिल, 2023 को लोकसभा में पेश किया गया जोकि इस अध्यादेश का स्थान लेता है।

स्रोत: राज्य पुनर्गठन एक्ट, 1956, संविधान (साठवां संशोधन) एक्ट, 1991, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार एक्ट, 1991, संविधान (सत्तरवां संशोधन) एक्ट, 1992, एस.ओ. 1368(ई), अधिसूचना, गृह मंत्रालय, 26 मई 2015, डब्ल्यू.पी.(सी) संख्या 5888/2015 राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार बनाम भारत संघ, 2016, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) एक्ट, 2021, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अध्यादेश, 2023, दिल्ली एनसीटी सरकार बनाम भारत संघ (2018), दिल्ली एनसीटी सरकार बनाम भारत संघ (2023); पीआरएस।

 

[1]. Article 239, The Constitution of India.

[2]. Clause 2(a), Article 239AA, The Constitution of India.

[3]. Article 239 A, The Constitution of India.

[4]. Clause 3(a), Article 239AA, The Constitution of India.

[5]. Clause 4, Article 239AA, The Constitution of India

[7]. Writ Petition (civil), No. 7887 of 2015, Rajendra Prasad vs Govt of NCTD, Delhi High Court, August 4, 2016.

[8]. Civil Appeal No 2357 of 2017, Government of NCT of Delhi vs Union of India, Supreme Court, July 04, 2018.

[9]. Civil Appeal No 2357 of 2017, Government of NCT of Delhi vs Union of India, Supreme Court, February 14, 2019.

[10]. Civil Appeal No 2357 of 2017, Government of NCT of Delhi vs Union of India, Supreme Court, May 11, 2023.

[12]. Order, Writ Petition (c) No. 678 of 2023, Government of NCT of Delhi vs Union of India, Supreme Court, July 20, 2023.

[13]. Rule 23, The Transaction of Business of the Government of National Capital Territory of Delhi Rules, 1993.

 

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