बिल्स की मुख्य विशेषताएं
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संविधान (130वां संशोधन) बिल, 2025 में किसी मंत्री को हटाने का प्रावधान है, अगर: (i) उस पर पांच या अधिक वर्षों के कारावास से दंडनीय अपराध का आरोप है, और (ii) उसे गिरफ्तार किया गया है और लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रखा गया है।
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मंत्री को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की सलाह से क्रमशः राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा हटाया जा सकता है, या हिरासत के 31वें दिन वह स्वतः अपने पद से हट जाएगा।
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प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को लगातार 30 दिनों की हिरासत के बाद इस्तीफा देना होगा, अन्यथा उसके अगले दिन से वह पद पर नहीं रहेंगे।
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केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) पुद्दूचेरी और जम्मू एवं कश्मीर के लिए ऐसे ही दो बिल पेश किए गए हैं।
प्रमुख मुद्दे और विश्लेषण
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गिरफ्तारी और हिरासत के 31वें दिन प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के स्वतः हटने का प्रावधान करके, ये बिल संविधान के मूल ढांचे की चार विशेषताओं का उल्लंघन कर सकते हैं। संसद ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता हो।
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संसदीय प्रणाली: संसदीय प्रणाली में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के पास क्रमशः प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को चुनने और हटाने का एकमात्र अधिकार होता है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को क्रमशः सांसद और विधायक बनने के योग्य मंत्रियों की नियुक्ति का पूरा विवेकाधिकार होता है। यह बिल उनके अधिकार का उल्लंघन करता है।
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शक्तियों का पृथक्करण: जांच एजेंसियां, जो स्थायी कार्यपालिका का हिस्सा हैं, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को हटाकर सरकार को गिराने का अधिकार रखती हैं। यह विधायिका की शक्तियों का हनन है।
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संघवाद: संविधान केंद्र और प्रत्येक राज्य के लिए शक्तियां निर्धारित करता है, जहां प्रत्येक सरकार का चुनाव उसके संबंधित विधानमंडल द्वारा किया जाता है। बिल के अनुसार, प्रधानमंत्री को राज्य सरकार की जांच एजेंसियों द्वारा गिरफ़्तार करके और हिरासत में लेकर हटाया जा सकता है। इसी प्रकार, किसी मुख्यमंत्री को केंद्र या अन्य राज्य सरकारों के अधीन ऐसी एजेंसियों द्वारा हटाया जा सकता है।
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कानून का शासन: किसी मंत्री को केवल 30 दिनों की गिरफ्तारी और हिरासत के आधार पर हटाना मनमानी माना जा सकता है। इस स्तर पर, आमतौर पर दोष की आशंका का कोई न्यायिक आकलन नहीं होता है। वैधानिक ज़मानत केवल तभी लागू होती है जब आरोप पत्र 60 या 90 दिनों के भीतर (अपराध के आधार पर) दाखिल न किया जाए। आरोप पत्र दाखिल होने के बाद, न्यायाधीश यह निर्धारित करता है कि मुकदमा आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं या नहीं।
भाग क: बिल्स की मुख्य विशेषताएं
संदर्भ
संविधान के अनुच्छेद 84 और अनुच्छेद 173 के अनुसार, संसद सदस्यों (एमपी), राज्य विधानसभा सदस्यों (एमएलए)/राज्य विधानपरिषद सदस्यों (एमएलसी) का भारत का नागरिक होना और कम से कम 25 वर्ष (लोकसभा या राज्य विधानसभा के लिए) या कम से कम 30 वर्ष (राज्यसभा या राज्य विधानपरिषद के लिए) का होना आवश्यक है। संसद कानून के माध्यम से अतिरिक्त योग्यताएं भी निर्धारित कर सकती है। जनप्रतिनिधित्व एक्ट, 1951 (आरपी एक्ट, 1951) के तहत, सांसद या विधायक बनने के लिए, व्यक्ति को क्रमशः उस राज्य के किसी संसदीय क्षेत्र या किसी विधानसभा क्षेत्र का निर्वाचक (जिसे मतदाता भी कहा जा सकता है) होना चाहिए।[1]
संविधान के अनुच्छेद 102, अनुच्छेद 191 और दसवीं अनुसूची सांसदों/विधायकों की अयोग्यता के आधार निर्धारित करते हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करना, (ii) मानसिक रूप से विकृत होना, (iii) दिवालिया होना, (iv) भारतीय नागरिक न रहना, और (v) दलबदल। अयोग्यता का निर्णय राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई), या सदन के सभापति या अध्यक्ष की राय पर किया जाता है। आरपी एक्ट, 1951 अयोग्यता के अतिरिक्त आधार निर्दिष्ट करता है जैसे: (i) कुछ अपराधों के तहत दोषसिद्धि, (ii) भ्रष्ट आचरण, और (iii) चुनाव व्यय का लेखा प्रस्तुत करने में विफलता।[2] अयोग्यता का निर्णय न्यायपालिका, राष्ट्रपति या ईसीआई द्वारा अयोग्यता के आधार पर किया जाता है।
संविधान में सांसदों/विधायकों पर लागू होने वाले प्रावधानों के अलावा किसी मंत्री की योग्यता या अयोग्यता के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं है। हालांकि अनुच्छेद 75(1बी) और अनुच्छेद 164(1बी) के तहत, दलबदल के कारण अयोग्य घोषित किया गया कोई सांसद/एमएलए/एमएलसी अपने कार्यकाल की समाप्ति या पुनर्निर्वाचन तक मंत्री पद के लिए भी अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
कई उच्च-स्तरीय आयोगों ने माना है कि दोषसिद्धि को अयोग्यता का आधार बनाने से राजनीति का अपराधीकरण नहीं रुक सकता, क्योंकि राजनीतिक रूप से प्रभुत्वशाली विधायकों को दोषी साबित करना बहुत मुश्किल होता है। इसके बजाय आयोगों ने यह सुझाव दिया है कि उन मामलों में आरोप तय होने पर अयोग्यता को लागू कर दिया जाए जिनमें अदालत यह तय करती है कि मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं।[3],[4],[5],[6],[7]
संविधान (130वां संशोधन) बिल, 2025 को अगस्त 2025 में लोकसभा में पेश किया गया था। इस बिल में गंभीर अपराधों के लिए लगातार 30 दिनों तक गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए मंत्रियों के स्वतः पद से हटने का प्रावधान है। इसी तरह के प्रावधानों वाले दो अन्य बिल पुद्दूचेरी और जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेशों के लिए पेश किए गए। इन बिल्स को ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमिटी (चेयर: सुश्री अपराजिता सारंगी) को भेज दिया गया है।
मुख्य विशेषताएं
संविधान (130वां संशोधन) बिल, 2025 में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्र या राज्य सरकार के किसी अन्य मंत्री को गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तार और हिरासत में लिए जाने पर पद से हटाने का प्रावधान है। यह इन प्रावधानों को केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली पर भी लागू करता है। इन प्रावधानों को केंद्र शासित प्रदेश पुद्दूचेरी और जम्मू-कश्मीर पर लागू करने के लिए दो अन्य बिल पेश किए गए हैं।
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मंत्रियों को हटाना: किसी मंत्री को पद से हटाया जा सकता है, अगर: (i) उस पर पांच वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध का आरोप हो, और (ii) उसे गिरफ्तार किया गया हो और लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रखा गया हो। राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा क्रमशः प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की सलाह पर मंत्री को पद से हटा दिया जाएगा या हिरासत के लगातार 31वें दिन खुद ही वह पदच्युत हो जाएगा।
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प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को पद से हटाना: प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के मामले में उसे हिरासत के 31 वें दिन तक इस्तीफा देना होगा। ऐसा न करने पर, वह स्वतः ही पद पर बहाल नहीं रहेगा।
ख: मुख्य मुद्दे और विश्लेषण
बिल संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन कर सकते हैं
बिल में प्रस्ताव है कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी मंत्री को लगातार 30 दिनों तक गिरफ्तार करके हिरासत में रखा जाता है, तो उन्हें स्वतः ही पद से हटा दिया जाएगा। यह पांच वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध के लिए हिरासत पर लागू होता है। इसके तहत निर्वाचित सरकारों या मंत्रियों को केवल आरोपों के आधार पर और दोष सिद्ध होने से पहले ही पद से हटाया जा सकता है। इस कार्रवाई में केवल जांच एजेंसियां ही शामिल हो सकती हैं, तथा न्यायालय अपराध की आशंका का आकलन किए बिना गिरफ्तारी की वैधता और जमानत की पात्रता की जांच कर सकता है।
इसलिए ये बिल भारतीय संविधान के मूल ढांचे की चार विशेषताओं का उल्लंघन कर सकते हैं। ये इस प्रकार हैं: (i) संसदीय लोकतंत्र, (ii) शक्तियों का पृथक्करण, (iii) संघवाद, और (iv) कानून का शासन। मूल ढांचे का सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय ने परम पावन केशवानंद भारती श्रीपदागलवरु बनाम केरल राज्य (1973) मामले में निर्धारित किया था।[8] न्यायालय ने कहा था कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन वह संविधान की आवश्यक विशेषताओं, यानी उसके "मूल ढांचे" में बदलाव नहीं कर सकती। हम यहां इन मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।
लोकतंत्र का संसदीय स्वरूप
पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य (1998) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संसदीय लोकतंत्र को संविधान के मूल ढांचे का एक अंग माना था।[9] ये बिल निम्नलिखित आधारों पर संसदीय लोकतंत्र के स्वरूप का उल्लंघन कर सकते हैं:
प्रधानमंत्री को नियुक्त करने या हटाने की लोकसभा की शक्तियों का उल्लंघन: संसदीय लोकतंत्र में किसी भी सांसद को प्रधानमंत्री के रूप में चुनने का एकमात्र अधिकार लोकसभा के पास है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और वह एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसे लोकसभा में विधायकों के बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है।[10] अगर प्रधानमंत्री विधायकों के बहुमत का विश्वास खो देते हैं, तो लोकसभा के पास उन्हें हटाने का एकमात्र अधिकार है। गिरफ्तारी और हिरासत के 31वें दिन प्रधानमंत्री के स्वयं हटने का प्रावधान करके, बिल प्रभावी रूप से स्थायी कार्यपालिका, यानी जांच एजेंसियों, जो लोगों द्वारा निर्वाचित नहीं हैं, को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह प्रधानमंत्री की पद पर बहाली का निर्धारण करे।
मंत्रिपरिषद के चयन में प्रधानमंत्री के विवेकाधिकार को कमज़ोर करना: प्रधानमंत्री को अपनी मंत्रिपरिषद के चयन और उसकी बहाली का संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त विवेकाधिकार है। गिरफ्तारी और हिरासत के 31वें दिन मंत्रियों के स्वतः हटने का प्रावधान इस विवेकाधिकार को सीमित कर सकता है, क्योंकि जांच एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई मंत्रिपरिषद की संरचना को सीधे प्रभावित कर सकती है। मनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि मंत्रियों का चयन प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का "संवैधानिक विशेषाधिकार" है।[11]
राज्यों में मुख्यमंत्री और मंत्री: राज्यों में मुख्यमंत्री और मंत्रियों से संबंधित बिल के प्रावधानों पर भी यही तर्क लागू होता है।
शक्ति का पृथक्करण
परम पावन केशवानंद भारती श्रीपदागलवरु बनाम केरल राज्य (1973) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का पृथक्करण संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।[12] संसदीय लोकतंत्र में विधायिका के पास सरकार को चुनने और बर्खास्त करने का विशेष अधिकार होता है। इसी सिद्धांत को दिल्ली की एनसीटी सरकार बनाम भारत संघ (2023) मामले में दोहराया गया, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने "जवाबदेही की त्रिस्तरीय श्रृंखला" की व्याख्या की, यानी (i) स्थायी कार्यपालिका सरकार के प्रति जवाबदेह है (ii) सरकार विधायिका के प्रति जवाबदेह है, और (iii) विधायिका जनता के प्रति जवाबदेह है।[13]
बिल में प्रस्ताव है कि अगर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को लगातार 30 दिनों तक गिरफ़्तार करके हिरासत में रखा जाता है, तो उन्हें स्वतः ही पद से हटा दिया जाएगा। सिर्फ़ गिरफ़्तारी और हिरासत के आधार पर पद से हटाकर, ये बिल प्रभावी रूप से प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को पद से हटाने का अधिकार स्थायी कार्यपालिका को देते हैं। इससे शक्तियों का पृथक्करण कमज़ोर हो सकता है, लोकतांत्रिक जवाबदेही की श्रृंखला बाधित हो सकती है, और नौकरशाही या जांच एजेंसियों को निर्वाचित सरकारों के कार्यकाल को प्रभावित करने का अधिकार मिल सकता है।
संघवाद
भारत में संघवाद दो स्तरों की सरकार को अनिवार्य बनाता है– संघ और राज्य। परम पावन केशवानंद भारती श्रीपदागलवरु बनाम केरल राज्य (1973) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि "संविधान का संघीय स्वरूप" उसके मूल ढांचे का हिस्सा है।[14] एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) मामले में भी इसे पुष्ट किया गया था।[15] न्यायालय ने कहा था कि ये शक्तियां संघ और राज्यों के बीच इस प्रकार विभाजित हैं कि प्रत्येक अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकता है। ये बिल निम्नलिखित आधारों पर संघवाद के सिद्धांत का उल्लंघन कर सकते हैं:
एक स्तर की सरकार को दूसरे स्तर की सरकार को हटाने की अनुमति: ये बिल एक ऐसी व्यवस्था कायम करते हैं जिसके तहत केंद्र सरकार के अधीन किसी कानून प्रवर्तन एजेंसी द्वारा गिरफ्तारी और हिरासत के परिणामस्वरूप राज्य के मुख्यमंत्री को उनकी गिरफ्तारी और हिरासत के 31वें दिन पद से हटाया जा सकेगा। इसके परिणामस्वरूप राज्य सरकार को हटाया जा सकेगा। इसी प्रकार, किसी राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में आने वाली कोई कानून प्रवर्तन एजेंसी किसी राज्य के कानून के तहत प्रधानमंत्री या किसी अन्य राज्य के मुख्यमंत्री को गिरफ़्तार करके और हिरासत में लेकर पद से हटा सकती है। इसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार या उस राज्य की सरकार को हटाया जा सकेगा।
मंत्रिपरिषद के चयन में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के विवेकाधिकार को कमजोर करना: गिरफ्तारी और हिरासत के 31वें दिन मंत्रियों के स्वतः हटने का प्रावधान करके, सरकार के एक स्तर की जांच एजेंसियों द्वारा शुरू की गई आपराधिक प्रक्रिया, दूसरे स्तर की सरकार के प्रमुख के अपने मंत्रिपरिषद के चयन और उसे बहाल रखने के विवेकाधिकार को सीमित कर सकती है।
कानून का शासन
संविधान का अनुच्छेद 21 यह गारंटी देता है कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा उसके जीवन या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समता और कानून के समान संरक्षण का प्रावधान करता है, जिसकी व्याख्या न्यायालय ने मनमानी के निषेध के रूप में की है। कानून के शासन में मनमानी के विरुद्ध सुरक्षा के रूप में न्यायिक समीक्षा भी शामिल है।[16] इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि कानून का शासन संविधान के मूल ढांचे का एक अनिवार्य अंग है।[17]
आपराधिक प्रक्रिया के तहत, पुलिस पहले एक प्राथमिकी दर्ज करती है और जांच करती है, तथा पर्याप्त सबूत मिलने पर आरोप पत्र दायर करती है। फिर अदालत तथ्यों की जांच करती है और अगर उसकी राय में यह मानने के लिए पर्याप्त आधार है कि आरोपी ने अपराध किया है, तो वह आरोप तय करती है। इसके बाद मुकदमा शुरू होता है।[18]
इन तीनों बिल के तहत केवल आरोप के आधार पर किसी मंत्री को हटाया जा सकता है या सरकार को बर्खास्त किया जा सकता है (प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को हटाने के मामले में) और 30 दिनों के लिए हिरासत में रखा जा सकता है। इस स्तर पर, आमतौर पर दोष की आशंका का कोई न्यायिक निर्धारण नहीं होता। इसके अलावा गिरफ्तारी से दोष का पता नहीं चलता या यह साबित नहीं होता कि मुकदमे के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। यह प्रावधान मनमाना हो सकता है और संविधान के मूल ढांचे के अनुरूप नहीं हो सकता। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (बीएनएसएस, 2023) के तहत, किसी अपराध के होने के उचित संदेह पर या जांच के उद्देश्य से गिरफ्तारी की जा सकती है।[19] गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए, लेकिन न्यायिक जांच गिरफ्तारी के आधार और प्रक्रियात्मक अनुपालन की पुष्टि तक ही सीमित है। वह 60 दिनों तक की न्यायिक हिरासत को भी अधिकृत कर सकता है, जिसके बाद वैधानिक ज़मानत दी जाती है (गंभीर अपराधों के लिए 90 दिन)। इसमें पहले 40 दिनों के भीतर 15 दिनों तक की पुलिस हिरासत (लगातार या कुछ-कुछ अवधि के लिए) शामिल हो सकती है (अगर उपरोक्त वैधानिक ज़मानत 90 दिनों के बाद है तो पहले 60 दिन)।[20] इस स्थिति में अदालतें आरोपों के गुण-दोष का मूल्यांकन नहीं करतीं। मामले का वास्तविक मूल्यांकन केवल आरोप तय होने के समय होता है। यहां तक कि उस स्तर पर भी, दोष का कोई पता नहीं चलता। विशेष कानूनों जैसे कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) एक्ट, 1967 और धन शोधन निवारण (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग) एक्ट, 2002 के तहत न्यायाधीश को किसी व्यक्ति को जमानत पर रिहा करने से पहले प्राइमा फेशिया मामले की उपस्थिति का निर्धारण करना होता है।[21],[22] 30 दिन की समय सीमा के कारण किसी भी न्यायिक जांच से पहले ही मंत्री को हटाया जा सकता है, जिससे मनमानी की चिंता बढ़ जाती है। वर्तमान में मंत्रियों को हटाने का कोई अलग प्रावधान नहीं है लेकिन अगर वे सांसद बनने के लिए अयोग्य ठहराए जाते हैं, तो उन्हें परोक्ष रूप से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। संविधान और आरपी एक्ट, 1951 के तहत, सांसदों और एमएलए/एमएलसी की अयोग्यता का निर्णय निम्नलिखित द्वारा किया जाता है: (i) राष्ट्रपति या राज्यपाल, जो लाभ के पद, दिवालियापन या मानसिक विकृति जैसे आधारों पर भारतीय निर्वाचन आयोग की बाध्यकारी राय पर कार्य करते हैं; (ii) दलबदल के मामलों में अध्यक्ष/सभापति; या (iii) न्यायपालिका, कुछ अपराधों के लिए दोषसिद्धि पर। प्रत्येक मामले में अयोग्यता न्यायिक या संवैधानिक निर्धारण से उत्पन्न होती है कि व्यक्ति ने किसी विशिष्ट कानूनी या संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन किया है।
[1]. Chapter I and Chapter II, Part II (Qualifications and Disqualifications), Representation of the People Act, 1951, https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/2096/9/A1951-43.pdf.
[2]. Chapter III (Disqualifications for Membership of Parliament and State Legislatures), Part II (Qualifications for Membership of State Legislatures), Representation of the People Act, 1951, https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/2096/9/A1951-43.pdf.
[3]. Para 5.4, Part V, 170th Report: Reform of the Electoral Laws, 15th Law Commission of India, 1999, https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s3ca0daec69b5adc880fb464895726dbdf/uploads/2022/08/2022082424.pdf.
[4]. Part V, Report Number 244: Electoral Disqualifications, 20th Law Commission of India, 2014, https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s3ca0daec69b5adc880fb464895726dbdf/uploads/2022/08/2022081612.pdf.
[5]. Proposal for Electoral Reforms, Election Commission of India, August 2, 2004, https://hindi.eci.gov.in/files/file/3106-electoral-reforms/?do=download&r=7150&confirm=1&t=1&csrfKey=4892be0a82973e1f1807b7bc69e794c0.
[6]. Para 4.12.2, National Commission to Review the Working of the Constitution Report, Ministry of Law, Justice and Company Affairs, April 2, 2002, https://legalaffairs.gov.in/sites/default/files/chapter%204.pdf.
[7]. Para 2.1.3.3.2, Fourth Report: Ethics in Governance, Second Administrative Reforms Committee, January 2007, https://darpg.gov.in/sites/default/files/ethics4.pdf.
[8]. Page 2 and 8, His Holiness Kesavananda Bharati Sripadagalavaru v State of Kerala, Supreme Court of India, April 24, 1973, https://cdn.s3waas.gov.in/s3ec0490f1f4972d133619a60c30f3559e/documents/aor_notice_circular/1.pdf.
[9]. P.V. Narasimha Rao v State, Supreme Court of India, April 17, 1998, https://api.sci.gov.in/jonew/judis/13280.pdf .
[10]. S.P. Anand, Indore v. H.D. Deve Gowda and others, Supreme Court of India, November 6, 1996, https://api.sci.gov.in/jonew/judis/14816.pdf.
[11]. Para 12, page 123, Manoj Narula v Union of India, Writ Petition (Civil) No. 289 of 2005, Supreme Court of India, August 27, 2014, https://api.sci.gov.in/jonew/judis/41850.pdf.
[12]. Para 316, His Holiness Kesavananda Bharati Sripadagalavaru v State of Kerala, Supreme Court of India, April 24, 1973, https://cdn.s3waas.gov.in/s3ec0490f1f4972d133619a60c30f3559e/documents/aor_notice_circular/1.pdf.
[13]. Para 106, Page 72, Government of NCT of Delhi vs Union of India, Supreme Court of India, May 11, 2023, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2016/29357/29357_2016_1_1501_44512_Judgement_11-May-2023.pdf.
[14]. His Holiness Kesavananda Bharati Sripadagalavaru v State of Kerala, Supreme Court of India, April 24, 1973, https://cdn.s3waas.gov.in/s3ec0490f1f4972d133619a60c30f3559e/documents/aor_notice_circular/1.pdf.
[15]. S.R. Bommai v Union of India, Supreme Court of India, March 11, 1994, https://api.sci.gov.in/jonew/judis/11570.pdf.
[16]. Page 19, ADM Jabalpur v. S.S. Shukla, Supreme Court of India, April 28, 1976, https://api.sci.gov.in/jonew/judis/5622.pdf.
[17]. Para 687, Page 4, Indira Nehru Gandhi v. Raj Narain, Supreme Court of India, November 07, 1975, https://api.sci.gov.in/jonew/judis/21398.pdf.
[18]. Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, https://prsindia.org/files/bills_acts/bills_parliament/2023/Bharatiya_Nagarik_Suraksha_Sanhita,_2023.pdf.
[19]. Section 35, Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, https://prsindia.org/files/bills_acts/bills_parliament/2023/Bharatiya_Nagarik_Suraksha_Sanhita,_2023.pdf.
[20]. Section 187(3), Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, https://www.indiacode.nic.in/handle/123456789/20099.
[21]. Section 43D, Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967, https://www.mha.gov.in/sites/default/files/A1967-37.pdf.
[22]. Section 45, Prevention of Money Laundering Act, 2002, https://www.indiacode.nic.in/handle/123456789/2036.
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