मुख्य बिंदु

  • 2011-12 और 2024-25 के बीच कृषि विकास की दर समग्र जीडीपी विकास की तुलना में धीमी रही है। फसलों के बजाय संबद्ध गतिविधियां के कारण ऐसा हुआ है।

  • लगभग आधे श्रमबल को रोजगार देने के बावजूद, अर्थव्यवस्था के मूल्यवर्धन में कृषि का हिस्सा 20% से भी कम है, जो कम उत्पादकता को दर्शाता है।

  • कम कृषि उत्पादकता के पीछे विखंडित भूमि जोत, सीमित मशीनीकरण, गुणवत्तापूर्ण इनपुट की अपर्याप्त उपलब्धता और वर्षा आधारित कृषि पर निरंतर निर्भरता मुख्य कारण हैं।

  • फसल कटाई के बाद के इंफ्रास्ट्रक्चर, बाजार तक कम पहुंच और फसल बीमा को लागू करने में कमियां जैसे कारक किसानों की आय को प्रभावित करते हैं।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के दो विभाग हैं: (i) कृषि एवं किसान कल्याण और (ii) कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग किसान कल्याण से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करता है और कृषि इनपुट का प्रबंधन करता है। दूसरा विभाग कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा का समन्वय और प्रचार करता है। इस नोट में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के 2026-27 के प्रस्तावित बजट आवंटन की समीक्षा की गई है और इस क्षेत्र के प्रमुख मुद्दों पर चर्चा की गई है।

वित्तीय स्थिति

वर्ष 2026-27 में आवंटन

2026-27 में मंत्रालय को 1,40,529 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जो 2025-26 के संशोधित अनुमान से 5.4% अधिक है। मंत्रालय ने अपने बजट का 93% हिस्सा कृषि एवं किसान कल्याण विभाग और 7% कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग को आवंटित किया है।

तालिका 1: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के लिए आवंटन (करोड़ रुपए में)

 

2024-25 वास्तविक

2025-26 संअ

2026-27 बअ

संअ 2025-26 से बअ 2026-27 में परिवर्तन का %

कृषि एवं किसान कल्याण

1,29,933

1,23,089

1,30,561

6%

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा

9,811

10,281

9,967

-3%

कुल

1,39,744

1,33,370

1,40,529

5.4%

नोट: बअ- बजट अनुमान; संअ- संशोधित अनुमान।
स्रोत: व्यय बजट, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, केंद्रीय बजट 2026-27; पीआरएस।

बजट भाषण 2026-27 में प्रमुख घोषणाएं

  • भारत विस्तार (Bharat VISTAAR): कृषि पद्धतियों पर आईसीएआर पैकेज और AgriStack पोर्टल्स को एकीकृत करने के लिए एक बहुभाषी एआई टूल लॉन्च किया जाएगा। इस योजना के लिए 2026-27 में 150 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।

  • नारियल प्रोत्साहन योजना: इस योजना के अंतर्गत प्रमुख नारियल उत्पादक राज्यों में पुराने और अनुत्पादक वृक्षों को नई किस्मों और पौधों से बदलने का लक्ष्य है।

  • नारियल, चंदन, काजू, कोको और मेवों के उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए विशेष कार्यक्रम प्रस्तावित किए गए हैं। उच्च मूल्य वाली कृषि की सहायता के लिए 350 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।

व्यय की मुख्य मदें

पीएम किसान: वर्ष 2026-27 में सबसे अधिक आवंटन प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना (पीएम किसान) के लिए किया गया है। इस योजना के लिए 63,500 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जो मंत्रालय के बजट का लगभग 45% है। यह आवंटन 2025-26 के संशोधित अनुमानों के समान है। पीएम किसान एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है जिसे दिसंबर 2018 में शुरू किया गया था।[1] इस योजना के तहत, भूमिधारक किसान परिवारों को प्रति वर्ष 6,000 रुपए की आय सहायता तीन समान किस्तों में दी जाती है।इस योजना के अंतर्गत प्रति किसान लाभ शुरुआत से अब तक वही है।

एमआईएसएस: दूसरा सबसे बड़ा आवंटन (2026-27 में मंत्रालय के कुल बजट का 16%) संशोधित ब्याज सबसिडी योजना (एमआईएसएस) के लिए है। इस योजना के तहत, किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से किसानों को ऋण पर ब्याज सबसिडी प्रदान की जाती है।[2],[3] 2026-27 में इस योजना के लिए 22,600 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं जो कि 2025-26 के आवंटन के समान है।

कृष्णोन्नति योजना: कृष्णोन्नति योजना और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) कृषि मंत्रालय के अंतर्गत दो व्यापक योजनाएं हैं। आरकेवीवाई को 2007 में राज्यों को व्यापक कृषि विकास योजनाएं तैयार करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु शुरू किया गया था। वर्तमान में इस योजना के उप-घटक निम्नलिखित पर केंद्रित हैं: (i) मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता, (ii) कृषि यंत्रीकरण, (iii) फसल विविधीकरण, (iv) वर्षा आधारित क्षेत्र विकास और (v) सिंचाई। 2026-27 में इस योजना के लिए 8,550 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जो 2025-26 के संशोधित अनुमानों से 22% अधिक है। कृष्णोन्नति योजना के लिए 2026-27 में 11,200 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। कृषि विपणन योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय बागवानी मिशन और कृषि गणना (सेंसेज़) एवं सांख्यिकी योजना जैसी पूर्व की योजनाओं को इस योजना में शामिल कर दिया गया है।

तालिका 2: मंत्रालय के अंतर्गत प्रमुख योजनाओं के लिए आवंटन (करोड़ रुपए में)

 

2024-25

वास्तविक

2025-26

संअ

2026-27

बअ

संअ 2025-26 से बअ 2026-27 में परिवर्तन का %

मंत्रालय के बजट में हिस्सेदारी

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग

      इसमें

पीएम किसान सम्मान निधि

66,121

63,500

63,500

0.0%

45%

संशोधित ब्याज सहायता योजना

22,600

22,600

22,600

0.0%

16%

फसल बीमा योजना

14,473

12,267

12,200

-0.5%

9%

कृष्णोन्नति योजना

5,600

6,800

11,200

64.7%

8%

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना

7,386

7,000

8,550

22%

6%

पीएम अन्नदाता आय संरक्षण योजना (पीएम-आशा)

5,438

6,941

7,200

3.7%

5%

नमो ड्रोन दीदी

1

100

677

576.9%

0.5%

उच्च मूल्य वाली कृषि के लिए समर्थन

-

-

350

0.0%

0.2%

कृषि अवसंरचना निधि

725

900

910

1.1%

0.6%

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग

      इसमें

स्वायत्त निकाय

6,836

7,313

7,096

-3.0%

5.0%

खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए फसल विज्ञान

894

965

970

0.4%

0.7%

कृषि शिक्षा, प्रबंधन और सामाजिक विज्ञान को सुदृढ़ बनाना

621

645

515

-20.2%

0.4%

स्रोत: व्यय बजट, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, केंद्रीय बजट 2026-27; पीआरएस।

पीएम-आशा: सरकार ने तिलहन, दालों और खोपरा के उत्पादन के लिए किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने हेतु वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) शुरू किया था। सितंबर 2024 में मूल्य समर्थन योजना और बाजार हस्तक्षेप योजना को पीएम-आशा के अंतर्गत एकीकृत कर दिया गया। इस योजना के लिए 7,200 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जो 2025-26 के संशोधित अनुमान से 3.7% अधिक है।

कृषि अवसंरचना निधि (एआईएफ): कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए इस क्षेत्र में स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स से संबंधी इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण हेतु 2020 में एआईएफ की शुरुआत की गई थी।[4] इस निधि के अंतर्गत 1,00,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था, जिससे ऋण देने वाली संस्थाओं के माध्यम से 9% तक की ब्याज दर पर ऋण वितरित किए जाते हैं।[5] 2026-27 में इस निधि के लिए 910 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।

नमो ड्रोन दीदी योजना: नवंबर 2024 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन उपलब्ध कराना है, जिन्हें किसान कृषि कार्यों के लिए किराए पर ले सकते हैं। इस योजना के तहत ड्रोन की लागत का 80% तक सबसिडी दी जाती है। 2026-27 में इस योजना के लिए 677 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। 2025-26 में इस योजना पर अनुमानित व्यय 100 करोड़ रुपए है, जबकि बजट में 677 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे (जो कि 85% कम है)।

रेखाचित्र 1: मंत्रालय ने 2015-16 और 2025-26 के बीच आवंटित धनराशि का 90% उपयोग किया

नोट: वर्ष 2025-26 के लिए संशोधित अनुमानों को वास्तविक आंकड़ों के रूप में उपयोग किया गया है।
स्रोत: विभिन्न वर्षों के बजट दस्तावेज; पीआरएस।

कृषि में वृद्धि

भूमि उपयोग सांख्यिकी के अनुसार, भारतीय राज्यों में कुल 307 मिलियन हेक्टेयर भूमि का 50% हिस्सा कृषि के लिए उपयोग किया जाता है।[6] 2011-12 और 2024-25 के बीच, कृषि और संबद्ध क्षेत्र में 4% की वार्षिक दर से वृद्धि हुई, जबकि इस अवधि में कुल जीडीपी वृद्धि 6% रही (रेखाचित्र 2)। कृषि क्षेत्र के भीतर, संबद्ध क्षेत्रों के उत्पादन मूल्य में 2011-12 और 2023-24 के बीच 5% की वार्षिक दर से वृद्धि हुई, जबकि फसल क्षेत्र में 2% की वार्षिक दर से वृद्धि हुई।[7] संबद्ध क्षेत्रों में पशुपालन, वानिकी और लकड़ी कटाई, तथा मत्स्य पालन और जलीय कृषि (एक्वाकल्चर) शामिल हैं। 

रेखाचित्र 2: वर्ष 2011-12 और 2024-25 के बीच कृषि क्षेत्र में वृद्धि अस्थिर रही है (% में)

स्रोत: सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय; पीआरएस।

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई, 2025) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वद्धि में यह अंतर कृषि क्षेत्र के भीतर क्रमिक विविधीकरण को उजागर करता है।इसमें पाया गया कि यह विविधीकरण बदलती मांग के पैटर्न, नीतिगत समर्थन और तकनीकी सुधारों को दर्शाता है।

भारत के कुल आर्थिक उत्पादन में कृषि और संबद्ध क्षेत्र का योगदान सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) के हिस्से के रूप में 18% है। हालांकि आर्थिक उत्पादन में कम योगदान के बावजूद, यह क्षेत्र भारत के लगभग 46% श्रमबल को रोजगार प्रदान करता है (रेखाचित्र 3)।

रेखाचित्र 3: कृषि और संबद्ध क्षेत्र में सबसे अधिक श्रमबल काम करता है (% में)

 

स्रोत: राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, एमओएसपीआई; पीआरएस।

विचारणीय मुद्दे

भारत में कृषि क्षेत्र को मूल्य श्रृंखला में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें फसलों की कम उत्पादकता, वर्षा आधारित कृषि पर निर्भरता, उत्पादन के कारकों तक असमान और अपर्याप्त पहुंच और राज्यों में बढ़ता जल संकट शामिल है।

निम्न कृषि उत्पादकता

कृषि उत्पादकता को कुल कृषि उत्पादन और कुल इनपुट (जिसमें भूमि, श्रम, उर्वरक और मशीनरी शामिल हैं) के अनुपात के रूप में मापा जाता है। किसानों की आय दोगुनी करने संबंधी समिति (डीएफआई, 2018) ने पाया कि भारत में विभिन्न फसलों की उत्पादकता अन्य देशों की तुलना में कम है (तालिका 3)।[8]  उसने कहा कि बेहतर इनपुट प्रबंधन और लंबी फसल अवधि के कारण ऐसे देशों में औसत फसल उपज अधिक होती है।

तालिका 3: प्रमुख फसलों की वैश्विक उपज की तुलना (किलोग्राम/हेक्टेयर में)

देश

उपज (किग्रा/हेक्टेयर)

धान

 

      भारत

4,229

      चीन

7,076

      बांग्लादेश

4,891

      इंडोनेशिया

5,238

गेहूं

 

      भारत

3,537

      चीन

5,855

      रूस

3,551

      यूएस

3,127

मक्का

 

      भारत

3,387

      यूएसए

10,880

      चीन

6,436

      रूस

5,999

गन्ना

 

      भारत

84,906

      ब्राजील

73,393

      थाईलैंड

60,388

      चीन

79,822

स्रोत: Unified Portal for Agricultural Statistics, 3 जनवरी, 2026 को प्राप्त जानकारी; पीआरएस।

कृषि लागत और मूल्य आयोग (2025) ने कृषि में उच्च उपज अंतराल के लिए निम्नलिखित कारणों का उल्लेख किया: (i) इनपुट और सेवाओं की अनुपलब्धता, (ii) खंडित भूमि जोत, और (iii) कृषि मशीनीकरण की कमी।

डीआईएफ समिति (2018) ने विभिन्न फसलों की उपज में अंतराल को कम करके कृषि उत्पादकता बढ़ाने का सुझाव दिया था। समिति ने बाजार तक पहुंच में सुधार, उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति में वृद्धि, कृषि श्रमबल की उत्पादकता में वृद्धि और जल एवं उर्वरक प्रबंधन में सुधार के माध्यम से इसे प्राप्त करने का सुझाव दिया था।

भूमि जोत का टुकड़ों में बंटा होना

परिचालन (कृषि) जोत को ऐसी भूमि के रूप में परिभाषित किया जाता है जो पूर्णतः या आंशिक रूप से कृषि उत्पादन के लिए उपयोग की जाती है और एक व्यक्ति द्वारा एक इकाई के रूप में संचालित की जाती है।[9] कृषि गणना (सेंसेज़) के आंकड़ों (2015-16) के अनुसार, भारत के कृषि क्षेत्र में सीमांत और लघु कृषि जोतों का वर्चस्व है।[10] इन आंकड़ों के अनुसार, कुल भूमि जोतों का लगभग 68% हिस्सा सीमांत भूमि जोतों (1 हेक्टेयर से कम) का था, जबकि कुल परिचालन क्षेत्रों में इन सीमांत जोतों की हिस्सेदारी सिर्फ 24% थी।

रेखाचित्र 4: कृषि जोत की आकार के अनुसार संख्या और क्षेत्रफल (कुल का % के रूप में)

स्रोत: कृषि सांख्यिकी एक नज़र में, 2022; कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, 5 अप्रैल, 2023; पीआरएस।

डीएफआई समिति ने पाया कि पिछले कुछ वर्षों में भूमि जोतों का औसत आकार घट गया है। अर्ध-मध्यम, मध्यम और वृहद भूमि जोतों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। वहीं दूसरी ओर, 1980-81 और 2010-11 के बीच सीमांत और लघु भूमि जोतों की संख्या में वृद्धि हुई है। समिति ने परिचालन योग्य भूमि जोतों के औसत आकार में इस गिरावट का कारण ग्रामीण जनसंख्या में वृद्धि को बताया। इसके अतिरिक्त, कृषि भूमि के गैर-कृषि कार्यों में उपयोग के कारण कृषि क्षेत्र में भी कमी आई है।

रेखाचित्र 5: कृषि योग्य भूमि का औसत आकार (हेक्टेयर में)

स्रोत: कृषि गणना (सेसेज़) 2015-16; पीआरएस।

राष्ट्रीय किसान आयोग (चेयर: एम.एस. स्वामीनाथन) ने पाया कि खंडित और बिखरी हुई कृषि जोत उत्पादकता के लिए एक बड़ी चुनौती है।10  जोतों के औसत आकार में कमी उत्पादन के पैमाने, तकनीक को अपनाने, किसान के पास बची पैदावार, ऋण उपलब्धता और अन्य सहायता सेवाओं तक पहुंच को प्रभावित करती है।10 

डीएफआई समिति (2018) ने पाया कि किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) और ग्राम उत्पादक संगठन (वीपीओ) कृषि मूल्य श्रृंखला के विभिन्न चरणों में छोटे और सीमांत किसानों को ‘बड़े पैमाने पर संचालन के लाभ’ प्रदान करते हैं।[11] समिति ने यह भी पाया कि ऐसे संगठन प्रत्येक किसान सदस्य की सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ाते हैं और उसने 2022-23 तक कम से कम 7,000 एफपीओ और वीपीओ की स्थापना का सुझाव दिया था।11 

सरकार ने 2020 में 10,000 एफपीओ के गठन और प्रोत्साहन के लिए एक केंद्रीय क्षेत्र योजना शुरू की।[12] यह योजना कुल 6,865 करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ शुरू की गई थी।12 इस योजना के तहत, प्रत्येक एफपीओ को तीन साल की अवधि के लिए 18 लाख रुपए की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।12 31 दिसंबर, 2025 तक इस योजना के तहत 10,000 एफपीओ पंजीकृत हो चुके हैं।12  2026-27 में इस योजना के लिए 500 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। यह 2025-26 के संशोधित अनुमानों से 14% कम है।

ऋण तक पहुंच

कृषि मूल्य श्रृंखला के अनेक चरणों में, कच्चे माल की खरीद से लेकर फसल कटाई के बाद की प्रक्रियाओं तक, समय पर और किफायती ऋण की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण बाधा है। कृषि आपूर्ति श्रृंखला के अनेक चरणों में किसानों को कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) फसल के मौसम की शुरुआत में, (ii) उत्पादन और कटाई के बाद के चरणों में, (iii) कृषि मशीनरी में निवेश के लिए, और (iv) कटाई, प्रसंस्करण, परिवहन और मार्केटिंग के लिए।

नीति आयोग (2022) की एक रिपोर्ट में भारतीय किसानों के बीच औपचारिक ऋण अंतर का उल्लेख किया गया है।[13] रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के लगभग 30% कृषि परिवारों ने गैर-संस्थागत स्रोतों से ऋण लिया है। इन स्रोतों में मुख्य रूप से रिश्तेदार, मित्र या अनौपचारिक साहूकार शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि नाबार्ड के एक सर्वेक्षण (2018) के अनुसार, दो हेक्टेयर से कम आकार के भूखंड वाले किसानों ने गैर-संस्थागत ऋणदाताओं से अधिक ऋण लिया है (रेखाचित्र 6)।

रेखाचित्र 6: कृषि परिवारों के बीच बकाया ऋणों का वितरण (प्रतिशत में)

स्रोत: ग्रामीण भारत में कृषि परिवारों और परिवारों की भूमि एवं जोत का स्थिति आकलन, 2019; पीआरएस।

कृषि क्षेत्र को संस्थागत ऋण का प्रवाह 2012-13 और 2023-24 के बीच 14% की वार्षिक दर से बढ़ा है।[14]  संस्थागत ऋण 2012-13 में 6 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2023-24 में 25 लाख करोड़ रुपए हो गया है।14

किसानों को सस्ती दरों पर किफायती ऋण उपलब्ध कराने के लिए, सरकार ने 1998 में किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी योजना) शुरू की थी।[15] इसका उद्देश्य फसल कटाई के बाद के खर्चों, मार्केटिंग ऋणों, किसान परिवारों की उपभोग संबंधी आवश्यकताओं, कृषि परिसंपत्तियों के रखरखाव के लिए पूंजी और खेती के लिए अल्पकालिक ऋण आवश्यकताओं के लिए ऋण उपलब्ध कराना है।15 

मार्च 2025 तक, कुल 7.7 करोड़ केसीसी चालू थे, जिनकी कुल बकाया राशि 10.2 लाख करोड़ रुपए थी।[16] कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 2025-26 में केसीसी के तहत सीमा को तीन लाख रुपए से बढ़ाकर पांच लाख रुपए कर दिया।[17]  2006-07 में ब्याज सबसिडी योजना शुरू की गई थी जिसके तहत किसानों को 7% ब्याज पर केसीसी ऋण उपलब्ध कराए गए थे। इस योजना को 2022 में संशोधित ब्याज सबसिडी योजना (एमआईएसएस) के रूप में परिवर्तित किया गया, जिसके तहत किसान 7% की रियायती ब्याज दर पर अल्पकालिक ऋण प्राप्त कर सकते हैं।

10,000 एफपीओ के गठन और प्रोत्साहन योजना के तहत, प्रत्येक एफपीओ को तीन साल की अवधि में 18 लाख रुपए तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।[18]  इसके अतिरिक्त एफपीओ के प्रत्येक किसान सदस्य को 2,000 रुपए तक का मैचिंग इक्विटी अनुदान प्रदान किया जा रहा है, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति एफपीओ 15 लाख रुपए तक है।18  सरकार पात्र ऋण देने वाली संस्थाओं से प्राप्त ऋणों के लिए प्रति एफपीओ एक करोड़ रुपए तक की क्रेडिट गारंटी भी जारी कर रही है।18  31 दिसंबर, 2025 तक एफपीओ को 663 करोड़ रुपए की क्रेडिट गारंटी जारी की गई है और लगभग 6,500 एफपीओ को 431 करोड़ रुपए मैचिंग इक्विटी अनुदान के रूप में वितरित किए गए हैं। 18

अच्छी क्वालिटी की वस्तुओं तक पहुंच

नीति आयोग (2022) ने कृषि उत्पादकता में सुधार के लिए उच्च उपज वाली किस्मों के बीजों के उपयोग को बढ़ाने, सिंचाई कवरेज का विस्तार करने, उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग में सुधार करने और कृषि के अधिक मशीनीकरण के महत्व पर प्रकाश डाला।13 

अच्छे बीजों तक पहुंच

2018 में, डीएफआई समिति ने पाया कि गुणवत्तापूर्ण बीजों के उपयोग से कृषि उत्पादकता में 15-20% की वृद्धि हो सकती है।[19]  इसके अतिरिक्त उसने कहा कि पानी, उर्वरक और खेती के तरीकों जैसे अन्य इनपुट के कुशल प्रबंधन से उत्पादकता को 45% तक और बढ़ाया जा सकता है।19 इसलिए, कृषि में उत्पादकता बढ़ाने और जलवायु अनुकूलन सुधारने के लिए गुणवत्तापूर्ण बीजों का उपयोग महत्वपूर्ण है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (2025) की एक रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों तक अपर्याप्त पहुंच भारतीय किसानों के सामने आने वाली प्रमुख बाधाओं में से एक है।[20]  इसमें यह उल्लेख किया गया है कि बड़ी संख्या में नई किस्मों के जारी होने के बावजूद उन्नत बीजों को अपनाने की दर काफी कम रही है।20

नीति आयोग (2018) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि खेतों में बचाए गए बीज अक्सर खराब गुणवत्ता वाले और कमज़ोर होते हैं।[21]  इससे फसलों की उत्पादकता और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।21  भारत में किसान वर्तमान में खरीदे गए बीजों या पिछली फसल से बचाए गए बीजों का उपयोग करते हैं।

बीज प्रतिस्थापन अनुपात (एसएसआर) में यह मापा जाता है कि किसान द्वारा बचाए गए बीजों की तुलना में कुल फसल क्षेत्र के कितने हिस्से में प्रमाणित बीजों की बुवाई की गई है।21  नीति आयोग का कहना है कि राज्यों में कम एसआरआर के तमाम कारणों में से एक यह है कि मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन है। आयोग का यह कहना भी है कि कुल कृषि क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में बचाए गए बीज बोए जाते हैं (तालिका 4)।21 इसके अतिरिक्त प्रमाणित बीज पर्याप्त रूप से फलों, सब्जियों, फूलों और उच्च मूल्य वाली फसलों के लिए ही उपलब्ध हैं।21 हालांकि चावल और गेहूं जैसी कम मूल्य और अधिक मात्रा वाली फसलों के लिए पर्याप्त बीज की आपूर्ति नहीं की जाती है।21 नीति आयोग (2018) ने पाया कि वांछित स्तर के एसआरआर को प्राप्त करने के लिए अच्छी किस्म के पर्याप्त बीज का उत्पादन करने की आवश्यकता है।21

तालिका 4: भारत में प्रमुख फसलों के लिए बीज प्रतिस्थापन दर (प्रतिशत में)

फसल

2011-12

2019-20

2025-26*

2030-31*

चावल

36

38

40

43

गेहूं

33

42

41

45

पोषक अनाज

42

41

55

58

मक्का

57

68

64

66

दालें

25

42

44

48

तिलहन

48

44

45

45

गन्ना

10

10

10

10

नोट: *2025-26 और 2030-31 के लिए एसआरआर का अनुमान नीति आयोग द्वारा 2011-12 और 2021-22 के बीच की वृद्धि के आधार पर लगाया गया है।
स्रोत: फसल प्रबंधन, कृषि इनपुट, मांग और आपूर्ति, नीति आयोग, 2024; पीआरएस।

2025-26 के केंद्रीय बजट में उच्च उपज वाले बीजों पर एक राष्ट्रीय मिशन की घोषणा की गई थी, जिसके लिए कुल 100 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था। हालांकि 2025-26 के संशोधित अनुमानों के अनुसार, मिशन के तहत कोई भी धनराशि उपयोग नहीं की गई है। इसके अलावा, 2026-27 के लिए भी मिशन हेतु कोई धनराशि आवंटित नहीं की गई है। मिशन की घोषणा निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ की गई थी: (i) 100 से अधिक बीज किस्मों की व्यावसायिक उपलब्धता सुनिश्चित करना, (ii) जलवायु और कीट प्रतिरोधी उच्च उपज वाली किस्मों (एचवाईवी) के बीजों का विकास और प्रसार करना, और (iii) एचवाईवी बीजों पर अनुसंधान को मजबूत करना।21

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने नवंबर 2025 में सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए बीज बिल, 2025 का ड्राफ्ट जारी किया।[22]  इस ड्राफ्ट बिल का उद्देश्य बीजों और रोपण सामग्री की गुणवत्ता को रेगुलेट करना है ताकि किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध हो सकें। इसका उद्देश्य नकली और घटिया गुणवत्ता वाले बीजों की बिक्री पर अंकुश लगाना भी है।22 

नीति आयोग (2025) ने बेहतर उपज और उत्पादकता के लिए अनुसंधान और विकास में निरंतर निवेश के महत्व को रेखांकित किया।[23] 2025 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भारत की पहली जीनोम-संपादित चावल की किस्मों का विकास किया।[24]  उन्नत किस्मों से निम्नलिखित लाभ मिलने की उम्मीद है: (i) उपज में 19% की वृद्धि, (ii) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20% की कमी, (iii) 7,500 घन मीटर सिंचाई जल की बचत, और (iv) सूखा, लवणता और जलवायु तनाव के प्रति बेहतर सहनशीलता।24 

वर्षा आधारित कृषि और सिंचाई पद्धतियों पर निर्भरता

राष्ट्रीय स्तर पर सिंचाई के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र 2000-01 में कुल कृषि योग्य क्षेत्र के 44% से बढ़कर 2023-24 में 63% हो गया है। शेष कृषि योग्य क्षेत्र वर्षा आधारित कृषि के अंतर्गत है।[25]  इसके अलावा, खेती में सिंचाई की सुविधा सभी फसलों के लिए एक जैसी नहीं है (तालिका 5)।

तालिका 5: विभिन्न फसलों के अंतर्गत सिंचित क्षेत्र (2022-23, हजार हेक्टेयर में)

फसल

खेती योग्य क्षेत्र

सिंचित क्षेत्र

सिंचित क्षेत्र का %

चावल

49,525

34,140

69%

ज्वार

3,639

459

13%

बाजरा

7,574

963

13%

गेहूं

34,994

33,434

96%

चना

9,790

3,860

39%

गन्ना

6,794

6,716

99%

स्रोत: भूमि उपयोग सांख्यिकी 2022-23; पीआरएस।

2020 में भारत में कुल वार्षिक भूजल निकासी का 89% हिस्सा केवल कृषि के लिए उपयोग किया गया।13 इसके बावजूद भारत में सिंचाई पुरानी और पानी बर्बाद करने वाली है।19 डीएफआई समिति (2018) ने पाया कि प्रचलित सिंचाई प्रणाली के तहत, सृजित सिंचाई क्षमता और उपयोग की गई सिंचाई क्षमता के बीच व्यापक अंतर है।19

कुशल सिंचाई से फसलों की पैदावार बढ़ाने, पानी का बेहतर उपयोग करने और घटते भूजल संसाधनों पर दबाव कम करने में मदद मिलती है।[26]  भारत में चावल, गेहूं, कपास और सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों के लिए प्रति टन पानी की आवश्यकता (एक टन फसल के उत्पादन में उपयोग किए गए पानी के घन मीटर के रूप में मापी गई) अन्य प्रमुख देशों की तुलना में काफी अधिक है (तालिका 6)।

तालिका 6: फसलों के लिए जल उपयोग (घन मीटर प्रति टन में)

फसल

भारत

यूएस

चीन

चावल

4,254

1,903

1,972

गेहूं

1,654

849

690

सोयाबीन

4,124

1,869

2,617

गन्ना

159

103

117

कपास के बीज

8,264

2,535

1,419

स्रोत: राष्ट्रीय जल मिशन, जल शक्ति मंत्रालय और नीति आयोग; पीआरएस।

2022-23 में कुल सिंचित क्षेत्र का 49% हिस्सा ट्यूबवेल के माध्यम से सिंचित किया गया था (रेखाचित्र 7)।25  जल संसाधन से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2023) ने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में सिंचाई के लिए भूजल के अत्यधिक दोहन पर गौर किया। कमिटी ने इस अत्यधिक दोहन का मुख्य कारण धान और गन्ने जैसी अधिक जल खपत करने वाली फसलों की व्यापक खेती को बताया।25  अन्य कारकों में कुछ फसलों के लिए सुनिश्चित बाजार खरीद और पानी, बिजली और उर्वरकों की अत्यधिक सबसिडी वाली कीमतें शामिल हैं।25 नाबार्ड (2018) के अनुसार, पानी की अत्यधिक खपत करने वाली ये फसलें देश के कुछ सबसे जल-दुर्लभ क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जिसके कारण इन राज्यों में भूजल भंडार में गंभीर कमी आ रही है।25

रेखाचित्र 7: कुल फसल क्षेत्र के लिए सिंचाई के स्रोत (प्रतिशत में)

स्रोत: भूमि उपयोग सांख्यिकी 2022-23; पीआरएस।

डीएफआई समिति (2018) ने सिंचाई सुविधाओं के कम उपयोग के लिए निम्नलिखित कारण बताए: (i) नहर प्रणालियों का अपर्याप्त रखरखाव, (ii) किसानों की कम भागीदारी, (iii) भूमि उपयोग पैटर्न में परिवर्तन, और (iv) मृदा क्षरण।19 इसमें पाया गया कि कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा पानी की अत्यधिक खपत करने वाली प्राथमिक फसलों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।19  समिति ने धान और गन्ने जैसी अधिक पानी की खपत वाली फसलों के बजाय कम पानी की खपत वाली फसलों को अपनाने का सुझाव दिया।19

कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी, 2025) ने पाया कि ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिंचाई सहित कुशल सिंचाई तकनीक सटीक सिंचाई के माध्यम से जल अपव्यय को कम करने में सहायक होती हैं। जल उपयोग दक्षता में सुधार और सिंचाई कवरेज के विस्तार के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2015-16 में शुरू की गई थी (रेखाचित्र 8)। इस योजना को निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ शुरू किया गया था: (i) सिंचाई के अंतर्गत क्षेत्र बढ़ाना, (ii) खेत में जल उपयोग की दक्षता में सुधार करना, (iii) सटीक सिंचाई को बढ़ावा देना, (iv) जलभंडारों के पुनर्भरण को बढ़ाना और (v) सतत जल संरक्षण पद्धतियों को बढ़ावा देना।[27]

रेखाचित्र 8: प्रति बूंद अधिक फसल घटक के अंतर्गत वार्षिक क्षेत्रफल (लाख हेक्टेयर में)

स्रोत: प्रति बूंद अधिक फसल डैशबोर्ड, 6 फरवरी, 2026 को प्राप्त जानकारी; पीआरएस।

इस योजना के अंतर्गत केवल एक घटक ही वर्तमान में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत 'प्रति बूंद अधिक फसल' घटक एक सूक्ष्म सिंचाई योजना है जिसका उद्देश्य जल दक्षता को बढ़ाना है।  

उर्वरकों का उपयोग

आयात पर निर्भरता

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रत्येक फसल मौसम के प्रारंभ से पहले उर्वरकों की माहवार आवश्यकता का आकलन किया जाता है।[28]  रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधीन उर्वरक विभाग देश में उर्वरकों की पर्याप्त और समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी है।28 मंत्रालय उर्वरकों के उत्पादन, आयात और वितरण की योजना बनाकर किसानों को किफायती कीमतों पर उर्वरक उपलब्ध करके, यह सुनिश्चित करता है।

भारत में रासायनिक उर्वरकों की खपत 2001-02 में प्रति हेक्टेयर 92 किलोग्राम उर्वरक से बढ़कर 2024-25 में प्रति हेक्टेयर 150 किलोग्राम हो गई है।25 कुल खपत में से नाइट्रोजनयुक्त (N) उर्वरकों का हिस्सा 67%, फॉस्फेटयुक्त (P) उर्वरकों का 25% और पोटाशयुक्त (K) उर्वरकों का 7% है।25

रेखाचित्र 9: नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाशयुक्त उर्वरकों की खपत (किलोग्राम प्रति हेक्टेयर में)

स्रोत: कृषि सांख्यिकी एक नज़र में, 2024-25; पीआरएस।

देश उर्वरक उत्पादन के लिए कच्चे माल के आयात पर अत्यधिक निर्भर है। कुल पोटाश और फॉस्फेट की खपत का लगभग 89% और 28% आयात के माध्यम से पूरा होता है। रसायन और उर्वरक से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2025) ने गौर किया कि देश में फॉस्फेट का भंडार अपर्याप्त है और पोटाश का कोई भंडार नहीं है (तालिका 7)।[29] इससे उर्वरक उत्पादन के लिए देश आयात पर निर्भर हो गया है। कमिटी (2025) ने भारत में उर्वरकों के घरेलू उत्पादन और खपत के बीच अंतर पर गौर किया। 2024-25 में, 329 लाख टन एनपीके उर्वरकों की कुल आवश्यकता के मुकाबले, घरेलू स्तर पर केवल 148 लाख टन का उत्पादन हुआ। कमिटी (2025) ने विभाग को सुझाव दिया कि वह नई उर्वरक परियोजनाओं और क्षमता संवर्धन पहलों को समय पर पूरा करने के उपायों में तेजी लाए।29 उसने यह सुझाव दिया कि नई इकाइयां स्थापित करने के लिए वित्तीय और कर प्रोत्साहनों के माध्यम से पीएंडके उर्वरक उत्पादन क्षमता का विस्तार किया जाए।29

तालिका 7: विभिन्न देशों में फॉस्फेट चट्टान के भंडार

देश

भंडार (लाख टन में)

मोरक्को और पश्चिमी सहारा

5,00,000

चीन

32,000

मिस्र

28,000

अल्जीरिया

22,000

ब्राजील

16,000

दक्षिण अफ्रीका

16,000

सऊदी अरब

14,000

ऑस्ट्रेलिया

11,000

रूस

6,000

इजराइल

530

भारत

460

स्रोत: रिपोर्ट संख्या 15, रसायन एवं उर्वरक से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी, 1 दिसंबर 2025; पीआरएस।

2001-02 और 2024-25 के बीच, एनपीके उर्वरकों की खपत में सालाना औसतन 2.8% की दर से वृद्धि हुई।25 इसकी तुलना में एनपीके उर्वरकों का घरेलू उत्पादन सालाना औसतन केवल 0.1% की दर से बढ़ा।25 इस अवधि के दौरान एनपीके उर्वरकों के आयात में सालाना 5.2% की वृद्धि हुई।25 इसलिए, खपत में हुई अधिकांश वृद्धि आयात में वृद्धि के माध्यम से पूरी की जा रही है।

रेखाचित्र 10: उर्वरकों का उत्पादन और आयात (लाख टन में)

स्रोत: कृषि सांख्यिकी एक नज़र में, 2024-25; पीआरएस।

रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित उपयोग

सरकार उर्वरकों के उत्पादन पर मैन्यूफैक्चरर्स को सबसिडी देती है। पोषक तत्व आधारित सबसिडी (एनबीएस) योजना के तहत, उर्वरकों में निहित पोषक तत्वों के प्रति किलोग्राम पर एक निश्चित राशि की सबसिडी दी जाती है।[30]  उर्वरकों का एमआरपी बाजार मूल्यों के आधार पर निर्धारित किया जाता है और उर्वरक कंपनियों द्वारा तय किया जाता है।30 सरकार मैन्यूफैक्चरर्स को एक निश्चित सबसिडी देती है, जिसे वार्षिक/अर्धवार्षिक आधार पर अधिसूचित किया जाता है।30 

देश में किसानों द्वारा उपयोग किए जाने वाले रासायनिक उर्वरकों की व्यापक किस्मों में यूरिया, डीएपी, एमओपी, एनपीकेएस और एसएसपी शामिल हैं। यूरिया उर्वरकों को छोड़कर, एनबीएस योजना इन सभी उर्वरकों पर लागू होती है।29

सरकार यूरिया उर्वरकों पर भी सबसिडी देती है। यूरिया सबसिडी योजना के तीन घटक हैं: (i) घरेलू यूरिया उत्पादन इकाइयों को दी जाने वाली स्वदेशी यूरिया सबसिडी, (ii) आयातित यूरिया सबसिडी, और (iii) देश भर में यूरिया के परिवहन के लिए माल ढुलाई संबंधी सबसिडी। वर्तमान योजना के तहत, किसानों को 45 किलोग्राम यूरिया के एक बैग के लिए 242 रुपए के वैधानिक रूप से अधिसूचित एमआरपी पर यूरिया उपलब्ध कराया जाता है। रसायन और उर्वरक से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2025) का कहना है कि नाइट्रोजनयुक्त या यूरिया आधारित उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग किया जाता है, जिससे असंतुलन पैदा होता है।29 उसका कहना है कि उर्वरकों के अंधाधुंध और असंतुलित उपयोग से कई पोषक तत्वों की कमी हो सकती है और आने वाले वर्षों में मिट्टी के स्वास्थ्य में गिरावट आ सकती है।29 कमिटी (2024) ने यह भी गौर किया था कि चूंकि पी और के उर्वरकों की कीमतें नियंत्रण मुक्त हैं, इसलिए इन उर्वरकों की बाजार कीमतों में वृद्धि हुई है।[31]  इसके चलते किसानों ने सस्ते यूरिया उर्वरक का अत्यधिक इस्तेमाल किया है।31 स्टैंडिंग कमिटी (2024) ने सरकार को अपनी एनबीएस नीति की समीक्षा करने की सलाह दी है ताकि किसानों द्वारा यूरिया के अत्यधिक उपयोग को बढ़ावा देने वाले कारणों को दूर किया जा सके।31

सीएसीपी (2025) ने गौर किया कि पी और के उर्वरकों की तुलना में यूरिया पर अधिक सबसिडी  के कारण नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों की अत्यधिक खपत हो रही है (तालिका 8)।20  एन:पी:के उर्वरकों के प्रयोग के लिए आदर्श अनुपात 4:2:1.31 अनुशंसित है।31 नीति आयोग (2022) ने कहा कि जैविक खाद के नियमित प्रयोग और फसल अवशेषों के पुनर्चक्रण के बिना मिट्टी के स्वास्थ्य को बरकरार नहीं रखा जा सकता है।13

तालिका 8: नाइट्रोजन और फास्फोरस आधारित उर्वरकों का अखिल भारतीय खपत अनुपात

वर्ष

N : P : K अनुपात

आदर्श अनुपात

4 : 2 : 1

2018-19

6.6 : 2.6 : 1

2019-20

7.3 : 2.9 : 1

2020-21

6.5 : 2.8 : 1

2021-22

7.7 : 3.1 : 1

2022-23

11.8 : 4.6 : 1

2023-24

10.9 : 4.4 : 1

स्रोत: खरीफ फसलों के लिए मूल्य नीति, 2025-26, कृषि लागत और मूल्य आयोग; पीआरएस।

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने वर्ष 2026-27 में एनबीएस और यूरिया सबसिडी योजना (रेखाचित्र 11) के लिए 1,70,799 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। अनुमान है कि वर्ष 2026-27 में कुल उर्वरक सबसिडी केंद्र सरकार के कुल बजट का 3.2% होगी।

रेखाचित्र 11: P&K और यूरिया उर्वरकों पर दी जाने वाली उर्वरक सबसिडी (करोड़ रुपए में)

स्रोत: विवरण 7, विभिन्न वर्षों के केंद्रीय बजट; पीआरएस।

केंद्र सरकार की कुल उर्वरक सबसिडी के खर्च में 2015-16 और 2026-27 के बीच औसतन 8% वार्षिक वृद्धि हुई है (बअ)। उर्वरक की मैन्यूफैक्चरिंग के माल की बढ़ती लागत, भू-राजनीतिक तनाव, विश्वव्यापी आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और चीन से निर्यात प्रतिबंधों के कारण 2022-23 में सबसिडी पर व्यय बहुत अधिक बढ़ गया।[32] 

प्रसार सेवाएं

नीति आयोग (2022) का कहना है किसानों को वैज्ञानिक ज्ञान, उन्नत तकनीक और खेती के बेहतर तरीके उपलब्ध कराने के लिए प्रसार सेवाओं का होना बहुत जरूरी है।13  प्रसार सेवाएं कितानों को वैज्ञानिक अनुसंधान और खेती का नया ज्ञान देने में मदद करती हैं।[33]  भारत में ये सेवाएं सरकारी एजेंसियों, कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों, निजी कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से दी जाती हैं। डीएफआई समिति (2018) ने प्रसार सेवाओं की उपलब्धता में कई समस्याओं को चिन्हित किया था जिनमें कर्मचारियों की कमी, गतिविधियों में तालमेल न होना और उनका सीमित होना, किसानों तक सही तरीके से न पहुंचना, कमजोर निगरानी प्रणाली और अपर्याप्त पहुंच शामिल हैं।[34]  आर्थिक सर्वेक्षण (2025-26) में भी यह गैर किया कि प्रसार सेवाओं के वितरण में अभी भी इन्हीं समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।[35] 

सरकार ने जून 2023 में पीएम प्रोग्राम फॉर रेस्टोरेशन, अवेयरलेन जनरेशन, नरिश्मेंट एंड एमेलियोरेशन ऑफ मदर अर्थ (पीएम-प्रणाम) योजना शुरू की।[36]  इस योजना का उद्देश्य उन राज्यों को प्रोत्साहन देना है जो एक वर्ष में रासायनिक उर्वरकों (यूरिया, डीएपी, एनपीके और एमओपी) के उपयोग को कम करने में सक्रिय रूप से योगदान देते हैं।[37]  इस योजना के तहत, राज्यों को पिछले तीन वर्षों की औसत खपत की तुलना में उर्वरक खपत में कमी के आधार पर अनुदान दिया जाता है। हालांकि, फरवरी 2026 तक किसी भी राज्य को कोई प्रोत्साहन राशि जारी नहीं की गई है।37

फसल बीमा

सरकार किसानों को बुवाई से पहले से लेकर कटाई के बाद तक सभी अप्रतिबंधित प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए फसल बीमा प्रदान करती है। कृषि बीमा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना (आरडब्ल्यूबीसीआईएस) के अंतर्गत प्रदान किया जाता है। इन योजनाओं में अधिसूचित खाद्य फसलों, तिलहन और बागवानी फसलों की खेती करने वाले सभी किसान शामिल हैं, जिनमें बटाईदार और किरायेदार किसान भी शामिल हैं।[38] 2026-27 में सरकार ने फसल बीमा योजनाओं के लिए 12,200 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं, जो 2025-26 के संशोधित अनुमानों के समान है।

पीएमएफबीवाई के तहत, किसानों को बीमा कवरेज प्रदान किया जाता है, जिसके लिए खरीफ फसलों पर अधिकतम 2% और रबी फसलों पर 1.5% का प्रीमियम देना होता है। व्यावसायिक और बागवानी फसलों के लिए किसानों द्वारा देय अधिकतम प्रीमियम 5% है। मौजूदा प्रीमियम और किसानों द्वारा भुगतान किए गए प्रीमियम के बीच का शेष हिस्सा सरकार द्वारा वहन किया जाता है। यह प्रीमियम सबसिडी केंद्र और राज्यों के बीच समान रूप से साझा की जाती है। कुछ राज्य किसानों के प्रीमियम का हिस्सा भी वहन कर रहे हैं, जहां किसान को केवल एक रुपया देना होता है।[39] इन राज्यों में महाराष्ट्र, ओड़िशा, मेघालय, पुद्दूचेरी और झारखंड शामिल हैं।

डीएफआई समिति (2018) ने पाया कि 2014-15 में कुल फसल क्षेत्र (जीसीए) का केवल 20% ही बीमाकृत था। समिति ने सरकार के उस लक्ष्य का भी उल्लेख किया जिसके तहत 2019 तक बीमा कवरेज को बढ़ाकर लगभग 50% तक पहुंचाना था।[40]  2022 में कुल फसल क्षेत्र का 28% (621 लाख हेक्टेयर) पीएमएफबीवाई और आरडब्ल्यूबीसीआईएस के तहत बीमाकृत था।[41],[42] 

रेखाचित्र 12: हाल के वर्षों में किसान दावों में गिरावट

नोट: सभी वर्षों के आंकड़े पीएमएफबीवाई डैशबोर्ड पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार है।
स्रोत: पीएमएफबीवाई डैशबोर्ड (18 फरवरी, 2026 को प्राप्त जानकारी); पीआरएस।

औसतन, 2016 से 2024 के बीच दोनों योजनाओं के तहत किसानों को प्रति वर्ष 21,288 करोड़ रुपए के दावों का भुगतान किया गया है। हालांकि, योजना के तहत भुगतान किए गए दावों की राशि 2025 में घटकर मात्र 576 करोड़ रुपए रह गई है, जबकि उसी वर्ष बीमित क्षेत्र में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। इसी प्रकार, केंद्र और राज्य द्वारा भुगतान किए गए प्रीमियम में भी 2025 में 10,092 करोड़ रुपए की कमी आई है (रेखाचित्र 13)।

रेखाचित्र 13: केंद्र, राज्यों और किसानों द्वारा योजना के तहत भुगतान किए गए प्रीमियम (करोड़ रुपए में)

स्रोत: पीएमएफबीवाई डैशबोर्ड, 18 फरवरी, 2026 को प्राप्त जानकारी; पीआरएस।

कृषि से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2021) ने गौर किया था कि दावों के निपटान में देरी पीएमएफबीवाई के कार्यान्वयन की प्रमुख चुनौतियों में से एक है।[43] उसने दावों के निपटान में देरी के निम्नलिखित कारण बताए: (i) उपज संबंधी आंकड़ों के ट्रांसमिशन में देरी, (ii) प्रीमियम सबसिडी में राज्य के हिस्से का देरी से जारी होना, (iii) राज्यों द्वारा उपज संबंधी डेटा को देरी से जारी करना, और (iv) बीमा कंपनियों और राज्यों के बीच उपज संबंधी विवाद।43 कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि अगर देरी का कारण राज्य द्वारा सबसिडी का भुगतान न करना है, तो किसान द्वारा भुगतान किया गया प्रीमियम ब्याज सहित वापस कर दिया जाना चाहिए।43 

कृषि से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2024) ने दो हेक्टेयर तक की भूमि वाले छोटे किसानों के लिए अनिवार्य सार्वभौमिक फसल बीमा प्रदान करने की संभावनाएं तलाशने का सुझाव दिया।[44] 

फसल कटाई के बाद का इंफ्रास्ट्रक्चर

फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान से तात्पर्य फसल कटाई और उपभोग के बीच खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और मात्रा में होने वाली गिरावट से है।[45]  फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान से खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।45 कई कृषि और संबंधित उत्पाद मौसमी और जल्दी खराब होने वाले होते हैं, जिन्हें कम समय के भीतर प्रसंस्करण की आवश्यकता होती है।

2020-21 में फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान का आकलन करने के लिए किए गए एक अध्ययन के अनुसार, 2020-21 में कृषि उपज का कुल नुकसान लगभग 69 मिलियन मीट्रिक टन (कुल कृषि उपज का 5.5%) होने का अनुमान लगाया गया था।45 इनमें अनाज, दालें, तिलहन, फल, सब्जियां, बागान फसलें और पशुधन उत्पाद शामिल हैं (तालिका 9)।45

तालिका 9: वर्ष 2020-21 में फसल कटाई के बाद हुए नुकसान

श्रेणी

कितनी मात्रा का नुकसान (मिलियन टन में)

मौद्रिक नुकसान (करोड़ रुपए में)

पशु उत्पाद

3

29,871

फल

7.3

29,545

सब्जियां

12

27,459

अनाज

12.5

26,001

बागवानी फसलें

30.6

16,413

तिलहन

2.1

10,925

दालें

1.4

9,289

कुल

68.9

1,49,503

स्रोत: भारत में कृषि उत्पादों में कटाई के बाद होने वाले नुकसान के निर्धारण हेतु अध्ययन- 2022, एनएबीसीओएन, एमओएफपीआई; पीआरएस।

इन वस्तुओं के खराब होने के कारण लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।45 मौद्रिक नुकसान में सबसे बड़ा हिस्सा जल्द खराब होने वाली वस्तुओं का था, जैसे फल और सब्जियां और पशु उत्पाद।45 कृषि से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2024) ने गौर किया कि फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए प्रसंस्करण और स्टोरेज के लिए अनुकूल नीतियों और बुनियादी ढांचे के विकास की आवश्यकता है।[46]  कटाई, संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण और पैकेजिंग जैसे सभी चरणों में इन उपायों की आवश्यकता होती है।

इस समस्या के समाधान के लिए, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय पीएम किसान संपदा योजना लागू कर रहा है। इस योजना का उद्देश्य स्टोरेज और परिवहन के इंफ्रास्ट्रक्चर, कृषि-प्रसंस्करण क्लस्टर और खाद्य प्रसंस्करण एवं संरक्षण क्षमताओं का निर्माण करना है।

डीएफआई समिति (2018) ने गौर किया था कि प्रचुर मात्रा में आपूर्ति और सुनिश्चित मूल्य के अभाव में उपज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बर्बाद हो जाता है।10 ऐसे मामलों में, किसान कभी-कभी मजबूरी में बिक्री के कारण लॉजिस्टिक्स की लागत भी वसूल नहीं कर पाते हैं।10

खाद्य पदार्थों के नष्ट होने का एक अन्य कारण उपभोक्ताओं और खेत के बीच स्टोरेज की कमी और पुरानी तकनीक है।10 डॉ. सौमित्र चौधरी समिति (2012) का अनुमान था कि देश में 61 मिलियन टन कोल्ड स्टोरेज की जरूरत है।[47]  इस समिति का गठन तत्कालीन योजना आयोग द्वारा किया गया था। जनवरी 2025 तक सभी राज्यों में कुल कोल्ड स्टोरेज क्षमता 39.7 मिलियन टन आंकी गई थी।14

अगस्त 2024 में निम्नलिखित के लिए एआईएफ योजना का विस्तार किया गया: (i) वित्तपोषण सुविधा अवधि को 2023-24 से बढ़ाकर 2025-26 तक करना, (ii) समग्र परिचालन अवधि को 2029-30 से बढ़ाकर 2032-33 तक करना, (iii) पात्र लाभार्थियों में कृषि उपज बाजार समितियों और राज्य एजेंसियों को शामिल करना, और (iv) पात्र परिसंपत्तियों के दायरे को एकीकृत प्रसंस्करण परियोजनाओं और सामुदायिक स्तर की कृषि अवसंरचना परिसंपत्तियों को शामिल करने के लिए विस्तृत करना।[48] 

18 फरवरी, 2026 तक लगभग 1.43 लाख परियोजनाओं के लिए कुल 60,583 करोड़ रुपए वितरित किए जा चुके हैं।[49]  इन ऋणों के माध्यम से प्राथमिक प्रसंस्करण इकाइयों, गोदामों, छंटाई और वर्गीकरण इकाइयों और कोल्ड स्टोरेज परियोजनाओं सहित विभिन्न परियोजनाओं के लिए धनराशि उपलब्ध कराई गई है। 2026-27 में, एआईएफ को 910 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जो 2025-26 के संशोधित अनुमानों से 1.1% अधिक है।

कृषि मार्केटिंग

सरकार ने 2014 में कृषि मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर योजना (एएमआई) शुरू की। इस योजना के तहत, किसानों, व्यक्तियों, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों, सहकारी समितियों, कृषि उद्यमियों और राज्य एजेंसियों को स्टोरेज और कृषि मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

मार्च 2024 तक एएमआई योजना के तहत कुल 69,101 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।[50] इन परियोजनाओं के लिए योजना के तहत 6,301 करोड़ रुपए की सबसिडी जारी की गई है।50   

भारत में कृषि बाजारों का रेगुलेशन कृषि उपज मार्केटिंग समितियों (एपीएमसी) द्वारा किया जाता है। एपीएमसी की स्थापना राज्य सरकारों द्वारा की जाती है। एपीएमसी निम्नलिखित तरीकों से व्यापार को रेगुलेट करती हैं: (i) व्यापारियों/कमीशन एजेंट्स को लाइसेंस प्रदान करना, (ii) एपीएमसी बाजार में कृषि उपज की बिक्री पर बाजार शुल्क/सेस लगाना, और (iii) व्यापार को सुगम बनाने के लिए बाजारों के भीतर जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करना।[51] 

राष्ट्रीय किसान आयोग (2006) ने सुझाव दिया था कि खेतों से पांच किलोमीटर के दायरे में एक बाजार होना चाहिए, जिसकी दूरी पैदल या बैलगाड़ी से एक घंटे में तय की जा सके। 2019 में कृषि से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी ने कहा कि इस मानदंड को पूरा करने के लिए देश में 41,000 बाजारों की आवश्यकता होगी। 2023 में देश में एपीएमसी की 7,085 मंडियां थीं।[52]

2016 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) की शुरुआत की, जो एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है जिसका उद्देश्य मौजूदा एपीएमसी मंडियों को कृषि उत्पादों के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार में एकीकृत करना है।[53]  इस योजना के तहत, सरकार पोर्टल के साथ एकीकरण के लिए प्रति एपीएमसी बाजार को मुफ्त सॉफ्टवेयर और 75 लाख रुपए तक की वित्तीय सहायता प्रदान करती है। जनवरी 2026 तक 23 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों की 1,522 मंडियों को ई-नाम से एकीकृत किया जा चुका था।[54]  कृषि से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2019) ने उन राज्यों में ई-नाम योजना के दायरे को बढ़ाने का सुझाव दिया जहां एपीएमसी बाजार मौजूद नहीं हैं।

किसान उत्पादक संगठन

डीएफआई समिति (2018) ने कहा था कि एफपीओज़ को मार्केटिंग और फसल कटाई के बाद के कामों पर भी जोर देना चाहिए।[55]  समिति ने यह भी गौर किया था कि बाजार से जुड़ाव की कमी के कारण, किसानों का संयुक्त उत्पादन केवल स्थानीय बाजारों तक ही सीमित रह जाता है।55  समिति ने एफपीओज़ को कई बड़े मांग केंद्रों से जोड़ने का सुझाव दिया था।55  इससे किसानों की उपज तेजी से बिकेगी और उन्हें मुनाफा भी जल्दी मिलेगा।55

एफपीओ योजना के तहत, क्लस्टर आधारित व्यावसायिक संगठनों (सीबीबीओ) को एफपीओ से जोड़ा जा रहा है ताकि उन्हें पांच साल तक पेशेवर मार्गदर्शन सहायता प्रदान की जा सके।18  सीबीबीओ पारंपरिक मंडी प्रणाली और स्थानीय बाजारों के बाहर खरीदारों और प्रोसेसरों के साथ एफपीओ को जोड़ने में लगे हुए हैं।18

इसके अतिरिक्त एफपीओ को ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) और गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शामिल किया जा रहा है। 30 जून, 2025 तक, ओएनडीसी प्लेटफॉर्म पर 9,000 से अधिक एफपीओ और जीईएम पोर्टल पर 216 एफपीओ शामिल हो चुके हैं।[56]  इससे एफपीओ को अपने कृषि उत्पादों को डिजिटल रूप से बेचने की सुविधा मिली है।56 इसके अतिरिक्त, 171 व्यावसायिक संगठनों ने कच्चे माल, तैयार कृषि उत्पादों और कृषि वस्तुओं की खरीद के लिए लगभग 500 एफपीओ के साथ बैकवर्ड मार्केट लिंकेज स्थापित किए हैं।56

लाभकारी मूल्य निर्धारण और खरीद

न्यूनतम समर्थन मूल्य: सरकार कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के सुझावों के आधार पर 22 कृषि फसलों के लिए एमएसपी निर्धारित करती है। एमएसपी केंद्र सरकार द्वारा घोषित वह सुनिश्चित मूल्य है जिस पर केंद्र और राज्य सरकारें तथा उनकी एजेंसियां ​​किसानों से खाद्यान्न खरीदती हैं।[57]  वर्ष 2025-26 के लिए धान और गेहूं की एमएसपी क्रमशः 23.7 रुपए प्रति किलोग्राम और 25.9 रुपए प्रति किलोग्राम निर्धारित की गई है।[58] 

रेखाचित्र 14: सीएसीपी द्वारा धान और गेहूं के लिए अनुशंसित एमएसपी (रुपए प्रति किलोग्राम में)

स्रोत: कृषि लागत और मूल्य आयोग, 15 फरवरी, 2026 को प्राप्त जानकारी; पीआरएस।

2006 में राष्ट्रीय किसान आयोग ने फसलों के लिए एमएसपी को उत्पादन लागत के भारित औसत से कम से कम 50% अधिक निर्धारित करने का सुझाव दिया था। मंत्रालय ने 2018-19 में इस सुझाव को माना और सभी खरीफ और रबी फसलों के लिए एमएसपी में इतनी वृद्धि की गई कि किसानों को उनकी लागत पर कम से कम 50% का मुनाफा मिल सके।[59] 

A2 फसल उत्पादन में लगने वाली लागत को दर्शाता है, और FL पारिवारिक श्रम की लागत को दर्शाता है।26  A2+FL उत्पादन लागत और पारिवारिक श्रम के मूल्य को दर्शाता है।26  C2 उत्पादन लागत होती है जिसमें पारिवारिक श्रम, स्वामित्व वाली भूमि का किराया मूल्य और भूमि को छोड़कर अचल पूंजी पर ब्याज जैसी अन्य लागतें शामिल हैं।26           

तालिका 10: वर्ष 2025-26 में फसलों के लिए एमएसपी

फसल

उत्पादन लागत

(रुपए प्रति किलो में)

A2+FL के अनुपात के रूप में एमएसपी

C2 के अनुपात के रूप में एमएसपी

A2+FL

C2

एमएसपी

धान

15.8

20.9

23.7

1.5

1.1

गेहूं

12.4

18.0

25.9

2.1

1.4

ज्वार

24.7

32.1

37.0

1.5

1.2

बाजरा

17.0

22.1

27.8

1.6

1.3

मक्का

15.1

19.5

24.0

1.6

1.2

जौ

13.6

18.6

21.5

1.6

1.2

चना

37.0

48.8

58.8

1.6

1.2

स्रोत: कृषि लागत और मूल्य आयोग, 15 फरवरी, 2026 को प्राप्त जानकारी; पीआरएस।

2024-25 में कुल गेहूं और चावल उत्पादन का क्रमशः 23% और 49% सरकार द्वारा खरीदा गया। अकेले पंजाब, मध्य प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान ने 2024-25 में कुल गेहूं खरीद का 96% हिस्सा खरीदा।[60]  वहीं पंजाब, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओड़िशा जैसे राज्यों ने 2024-25 में कुल चावल खरीद का 59% हिस्सा खरीदा।

कृषि से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2024) ने देश में कानूनी रूप से बाध्यकारी एमएसपी प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया था। कमिटी ने कहा था कि एमएसपी को कानूनी मान्यता देने से किसानों को सुनिश्चित आय प्राप्त होगी और वे कृषि पद्धतियों में अधिक निवेश कर सकेंगे। हालांकि डीएफआई समिति (2018) ने कहा कि सभी फसलों के लिए एमएसपी को कानूनी मान्यता देने से खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। समिति ने गौर किया कि जब अधिक फसलें एमएसपी पर बेची जाएंगी, तो ये लागत उपभोक्ताओं पर डाली जा सकती है, जिससे खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।  

दालों की खरीद: भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और खेती करने वाला देश है। वैश्विक स्तर पर कुल खेती वाले क्षेत्र में भारत का योगदान 38% है और दुनिया की कुल दालों के उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 28% है।[61] 

मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत, जब भी बाजार में फसलों की कीमतें एमएसपी से नीचे गिरती हैं तो सरकार दखल देकर उन फसलों की खरीद करती है। यह खरीद नेफेड, एसएफएसी और एफसीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से की जाती है। हालांकि यह खरीद मुख्य रूप से दालों, तिलहन और कपास तक ही सीमित रही है। बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत, एमएसपी के दायरे में न आने वाली बागवानी फसलों की खरीद तब की जाती है जब बाजार मूल्य में 10% से अधिक की गिरावट आती है।

2026-27 में पीएम-आशा योजना के लिए 7,200 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जो 2025-26 के संशोधित अनुमानों से 4% अधिक है। 2018-19 से, पीएम-आशा ने 195 लाख मीट्रिक टन दालों, तिलहन और खोपरा की खरीद के माध्यम से 99 लाख किसानों लाभ पहुंचाया।[62]

2025-26 में दालों की खरीद के लिए दलहन मिशन शुरू करने की घोषणा करते हुए एक बजट बनाया गया था। इस योजना के लिए 2025-26 में 1,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। संशोधित अनुमानों के अनुसार, इस योजना के तहत कोई धनराशि उपयोग नहीं की गई है। 2026-27 में भी इस योजना के लिए कोई आवंटन नहीं किया गया है। 2024-25 में, कुल दलहन उत्पादन का लगभग 3% पीएसएस के तहत खरीदा गया था। भारत में, खाद्य मुद्रास्फीति मुख्य रूप से सब्जियों और दालों के कारण होती है।35 आरबीआई (2024) ने गौर किया कि कीमतों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए, दालों की खरीद को बढ़ाना और उसे सुचारू रूप से लागू करना आवश्यक है।

प्रत्यक्ष लाक्ष अंतरण के जरिए आय समर्थन: इस योजना की शुरुआत से लेकर अब तक पीएम-किसान योजना के तहत लाभार्थियों को 21 किस्तों में 4.09 लाख करोड़ रुपए वितरित किए जा चुके हैं।[63]  इस योजना के तहत, राशि सीधे किसान के आधार से जुड़े बैंक खाते में हस्तांतरित की जाती है। हालांकि, 6 फरवरी, 2026 तक लगभग 30 लाख किसान ऐसे थे जिनके आधार बैंक खातों से जुड़े नहीं थे।63  कृषि एवं किसान कल्याण से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2020) ने कहा था कि इस योजना के अंतर्गत केवल भूमिधारक किसान परिवार ही शामिल हैं।[64]  कमिटी ने भूमिहीन और काश्तकार किसानों को भी इसका लाभ देने का सुझाव दिया।64

 

[1] Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, “Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi (PM‑KISAN)”, PM‑KISAN portal, as accessed on January 29, 2026, https://pmkisan.gov.in/#About.

[2] “Cabinet approves continuation of Modified Interest Subvention Scheme (MISS) for FY 2025-26 with existing 1.5% Interest Subvention (IS)”, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, May 28, 2025, https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2131989&reg=3&lang=2.

[3] Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, “Frequently Asked Questions – Kisan Credit Card (KCC)”, KCC portal, as accessed on January 29, 2026, 2026, https://fasalrin.gov.in/faq.  

[4] Unstarred Question No. 398, Lok Sabha, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, February 4, 2025, https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/184/AU398_h9RqVn.pdf?source=pqals.

[5] Starred Question No. 101, Lok Sabha, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, July 20, 2024, https://eparlib.nic.in/bitstream/123456789/2977765/1/AS101_Zv2zbg.pdf.

[6] Land Use Statistics – 2022-23, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, September 2024, https://desagri.gov.in/wp-content/uploads/2024/09/Final-file-of-LUS-2022-23-for-uploading.pdf.

[7] Statistical Report on Value of Output from Agriculture and Allied Sectors (2011-12 to 2023-24), Ministry of Statistics and Programme Implementation, June 27, 2025, https://www.mospi.gov.in/sites/default/files/publication_reports/Brochure2025_r.pdf.

[8] Volume VIII, Report of the Committee for Doubling Farmers’ Income, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, December 2017, https://agriwelfare.gov.in/Documents/DFI%20Vol-8B.pdf.

[9] Land Holdings and Agricultural Census, National Statistics Commission, as accessed on February 3, 2026, https://nsc.mospi.gov.in/49-land-holdings-and-agricultural-census.

[10] Volume II, Report of the Committee on Doubling Farmers’ Income, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, August 2017,  https://agriwelfare.gov.in/Documents/DFI%20Volume%202.pdf.

[11] Volume XIII, Report of the Committee on Doubling Farmers’ Income, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, January 2018, https://agriwelfare.gov.in/Documents/DFI%20Volume%2013.pdf.

[12] “Central Schemes Support Farmers, FPOs and SHGs to Boost Income and Rural Entrepreneurship”, Press Information Bureau, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, February 3, 2026, https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2222801&reg=3&lang=2.

[13] A New Paradigm for Indian Agriculture: From Agroindustry to Agroecology, NITI Aayog, March 2023, https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2023-03/A-New-Paradigm-for-Indian-Agriculture-from-Agroindustry-to-Agroecology.pdf.

[14] Agricultural Statistics at a Glance 2023, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, September 5, 2024, https://desagri.gov.in/wp-content/uploads/2024/09/Agricultural-Statistics-at-a-Glance-2023.pdf.

[15] “Factsheet – Kisan Credit Card,” Press Information Bureau, Others, January 17, 2022, https://www.pib.gov.in/FactsheetDetails.aspx?Id=148600&reg=3&lang=2.

[16] Unstarred Question No 2500, Lok Sabha, Ministry of Finance, August 4, 2025, https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/185/AU2500_MY7k37.pdf?source=pqals.

[17] Budget Speech, Union Budget 2025-26, https://www.indiabudget.gov.in/doc/Budget_Speech.pdf.

[18] Starred Question No. 30, Lok Sabha, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, February 4, 2025, https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/184/AS30_0J4V1W.pdf?source=pqals.

[19] Volume VII, Report of the Committee on Doubling Farmers’ Income, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, March 2018, https://agriwelfare.gov.in/Documents/DFI%20Volume%207.pdf.

[20] Price Policy for Kharif Crops: Marketing Season 2025‑26, Commission for Agricultural Costs and Prices, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, Government of India, 2025, https://cacp.da.gov.in/Document/EnglishReports/KharifReports2025-26_20250825125215821.pdf.

[21] “Demand & Supply Projections Towards 2033”, Working Group Report on Demand and Supply Projections towards 2032, NITI Aayog, February 2018, https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2021-08/Working-Group-Report-Demand-Supply-30-07-21.pdf.

[22] The Draft Seeds Bill, 2025, Department of Agriculture and Farmers Welfare, 2025, https://seednet.gov.in/CMS/Home/NewsEvents/Seeds%20Bill%202025%20Seed%20Net.pdf

[23] Reimagining Agriculture: Roadmap for Frontier Technology‑Led Transformation, NITI Aayog, November 2025, https://niti.gov.in/sites/default/files/2025-10/Reimagining_Agriculture_Roadmap_for_Frontier_Technology_Led_Transformation.pdf

[24]  “Union Agriculture Minister Shri Shivraj Singh Chouhan Announces Two Genome-Edited Rice Varieties Developed in India”, Press Information Bureau, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, May 4, 2025, https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2126802&reg=3&lang=2.

[26] Price Policy for Rabi Crops – Marketing Season 2026-27, Commission for Agricultural Costs & Prices, July 2025, https://cacp.da.gov.in/Document/EnglishReports/ViewQuestionare%20(2)_20251110111404262.pdf.

[27] Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, as accessed on February 6, 2026, https://pmksy.gov.in/AboutPMKSY.aspx.

[29] Report No. 15, “Self-Sufficiency In Production Of Fertilizers With A View To Curb Import Of Fertilizers-Review Of Constraints Thereof”, Standing Committee on Chemicals and Fertilisers, December 1, 2025, https://sansad.in/getFile/lsscommittee/Chemicals%20&%20Fertilizers/18_Chemicals_And_Fertilizers_15.pdf?source=loksabhadocs.

[30] Report No. 43, “Planning For Fertilizers Production And Import Policy On Fertilizers Including Gst And Import Duty Thereon”, Standing Committee on Chemicals and Fertilisers, August 9, 2023, https://sansad.in/getFile/lsscommittee/Chemicals%20&%20Fertilizers/17_Chemicals_And_Fertilizers_43.pdf?source=loksabhadocs.

[31] Report No. 52, “Action Taken by the Government on the Observations/Recommendations of the Committee contained in their Forty-Third Report (Seventeenth Lok Sabha) on ‘Planning for Fertilizers Production and Import Policy on Fertilizers Including GST and Import Duty thereon’ of the Ministry of Chemicals and Fertilizers”, Standing Committee on Chemicals and Fertilisers, February 8, 2024, https://sansad.in/getFile/lsscommittee/Chemicals%20&%20Fertilizers/17_Chemicals_And_Fertilizers_52.pdf?source=loksabhadocs.

[32] “Fertilizer prices expected to remain higher for longer,” World Bank Open Data Blog, World Bank, May 11, 2022, https://blogs.worldbank.org/en/opendata/fertilizer-prices-expected-remain-higher-longer

[33] “Extension – Schemes and Initiatives,” Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, as accessed on January 31, 2026, https://agriwelfare.gov.in/en/Extenson.

[34] Volume XIV, Report of the Committee on Doubling Farmers’ Income, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, September 2018, https://agriwelfare.gov.in/Documents/DFI_Volume_14.pdf.

[36] “PM PRANAM – Scheme Details,” Department of Fertilisers, Ministry of Chemicals and Fertilisers, as accessed on February 04, 2026, https://fert.gov.in/en/offerings/schemes-services/pm-pranam.

[37] Starred Question No. 211, Ministry of Chemicals and Fertilisers, February 13, 2026, https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/187/AS211_SXmaPc.pdf?source=pqals.

[38] Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana – Operational Guidelines, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, https://pmfby.amnex.co.in/pmfby/pdf/operational_guidelines_pmfby.pdf

[40] Volume X, Report of the Committee on Doubling Farmers’ Income, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, April 2018, https://agriwelfare.gov.in/Documents/DFI%20Vol-10.pdf.

[41] “PMFBY – Graphical Dashboard,” Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, as accessed on February 6, 2026, https://pmfby.gov.in/adminStatistics/graphicalDashboard.

[42] Annual Report 2024‑25, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, 2025, https://www.agriwelfare.gov.in/Documents/AR_Eng_2024_25.pdf

[43] Report No. 29, “Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana - An Evaluation”, Standing Committee on Agriculture and Farmers Welfare, August 10, 2021, https://sansad.in/getFile/lsscommittee/Agriculture,%20Animal%20Husbandry%20and%20Food%20Processing/17_Agriculture_29.pdf?source=loksabhadocs

[44] Report No. 1, “Demands for Grants (2024-25)”, Standing Committee on Agriculture and Farmers Welfare, December 17, 2024, https://sansad.in/getFile/lsscommittee/Agriculture,%20Animal%20Husbandry%20and%20Food%20Processing/18_Agriculture_Animal_Husbandry_and_Food_Processing_1.pdf?source=loksabhadocs.

[45] Study to determine post-harvest losses of agri produces in India, NABARD Consultancy Services, Ministry of Food Processing Industries, December 7, 2022, https://www.mofpi.gov.in/sites/default/files/phl_study_final_report_07.12.2022_2.pdf

[46] Report No. 67, Standing Committee on Agriculture, Animal Husbandry, and Food Processing: ‘Scheme for creation/expansion of food processing and preservation capacities – an evaluation’, Lok Sabha, February 7, 2024, https://sansad.in/getFile/lsscommittee/Agriculture,%20Animal%20Husbandry%20and%20Food%20Processing/17_Agriculture_Animal_Husbandry_and_Food_Processing_67.pdf?source=loksabhadocs.

[47] Report of the Committee on Encouraging Investments in Supply Chains including Provisions for Col Storage for More Efficient Distribution of Farm Produce, Development Policy Division, Planning Commission, May 2012, https://nccd.gov.in/PDF/DSCC_Report_final.pdf.

[48] “Agricultural Infrastructure Fund (AIF) Scheme” Press Information Bureau, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, August 28, 2024, https://static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2024/aug/doc2024828382201.pdf.

[49] “Agricultural Infrastructure Fund – Dashboard,” Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, as accessed on February 10, 2026, https://agriinfra.dac.gov.in/Home/Dashboard.

[50] Progress of Storage Infrastructure assisted under Agricultural Marketing Infrastructure (AMI) as on March 31, 2024, Directorate of Marketing and Inspection, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, https://dmi.gov.in/Documents/ProgressReportofAMIasonMarch2024.pdf.

[51] Report No. 62, Standing Committee on Agriculture (2018-19): ‘Agriculture Marketing and Role of Weekly Gramin Haats’, Lok Sabha, January 3, 2019,  https://loksabhadocs.nic.in/lsscommittee/Agriculture,%20Animal%20Husbandry%20and%20Food%20Processing/16_Agriculture_62.pdf.

[52] Unstarred Question No. 588, Lok Sabha, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, February 6, 2024, https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/1715/AU588.pdf?source=pqals

[53] “eNAM: Transforming Agricultural Trade into a Seamless Experience”, Press Information Bureau, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, February 20, 2024, https://pib.gov.in/FactsheetDetails.aspx?Id=149061#:~:text=The%20initiative%20was%20launched%20by,system%20and%20online%20payment%20facility

[54] e-NAM Dashboard, as accessed on February 13, 2026, https://enam.gov.in/web/.

[55] Volume IV, Report of the Committee on Doubling Farmers’ Income, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, 2017, https://agriwelfare.gov.in/Documents/DFI%20Volume%204.pdf.

[56] “Linkage of FPOs with Industries”, Press Information Bureau, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, July 25, 2025, https://www.pib.gov.in/PressReleseDetailm.aspx?PRID=2148519&reg=3&lang=2

[57] Essential Commodities Act, 1955, as amended, Government of India, https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/2113/1/201320.pdf.

[58] “Minimum Support Price – MSP Portal,” Commission for Agricultural Costs and Prices, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, as accessed on February 16, 2026, https://cacp.da.gov.in/Home/MSP.

[59] “Serving Farmers and Saving Farming” Fifth Report, National Commission on Farmers, October 4, 2006, https://agriwelfare.gov.in/sites/default/files/NCF5%20Vol.-1%20%281%29.pdf.

[60] “UPAG – Unified Portal for Agricultural Statistics,” Government of Uttar Pradesh, as accessed on February 16, 2026, https://upag.gov.in/.

[61] Strategies and Pathways for Accelerating Growth in Pulses towards the Goal of Atmanirbharta, NITI Aayog, 2025, https://niti.gov.in/sites/default/files/2025-09/Strategies-and-Pathways-for-Accelerating-Growth-in-Pulses-towards-the-Goal-of-Atmanirbharta.pdf

[62] “Empowering Farmers through PM-AASHA”, Press Information Bureau, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, December 18, 2024, https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2085530#.

[63] Unstarred Question No 1080, Lok Sabha, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare, February 10, 2026, https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/187/AU1810_CAbf2W.pdf?source=pqals.

[64] Report No. 9, “Demand for Grants (2020-21)”, Standing Committee on Agriculture, Lok Sabha, March 3, 2020, https://sansad.in/getFile/lsscommittee/Agriculture,%20Animal%20Husbandry%20and%20Food%20Processing/17_Agriculture_9.pdf?source=loksabhadocs.

 

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