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पीडीएफ

पूर्वोत्तर भारत में वेक्टर आधारित बीमारियां

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: प्रो. राम गोपाल यादव) ने 7 अगस्त, 2026 को 'पूर्वोत्तर भारत में वेक्टर आधारित बीमारियां' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी ने मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी प्रमुख वेक्टर-जनित बीमारियों (वीबीडीज़) की समीक्षा की, जिसमें पूर्वोत्तर क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया। कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • वैक्सीनेशन का दायरा बढ़ाना और मानकीकृत उपचार: कमिटी ने कहा कि येलो फीवर, डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टीके उपलब्ध हैं। हालांकि भारत में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत केवल जापानी इंसेफेलाइटिस का टीका ही मुफ़्त दिया जाता है। कमिटी ने डेंगू हैमरेजिक फीवर जैसी बीमारियों के गंभीर चरणों के लिए तय इलाज के तरीकों (प्रोटोकॉल) की कमी पर भी गौर किया। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) टीके बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, (ii) डेंगू और चिकनगुनिया के लिए देश में ही टीके का विकास, (iii) तेज़ी से टीके बनाने और दूर-दराज़ के इलाकों तक पहुंचाने के लिए नई तकनीकों को लागू करना, और (iv) वेक्टर-जनित बीमारियों के गंभीर चरणों के लिए रोग विशिष्ट मानक प्रोटोकॉल (उपचार नियमावली)।

  • इंफ्रास्ट्रक्चर और मानव संसाधन क्षमता: कमिटी ने राज्य और नगर-निगम स्तरों पर प्रशिक्षित कीट-वैज्ञानिकों (एंटोमोलोजिस्ट्स) की भारी कमी पर गौर किया; कई स्वीकृत पदों पर गैर-विशेषज्ञ काम कर रहे थे। कमिटी ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में प्रयोगशालाओं के इंफ्रास्ट्रक्चर के वितरण में भी कमियां पाईं। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) योग्य कीट-वैज्ञानिकों की भर्ती प्रक्रिया में तेज़ी लाना, (ii) नॉर्थ ईस्टर्न रीजनल एंटोमोलॉजी ट्रेनिंग हब बनाना, और (iii) पूर्वोत्तर में वायरल रिसर्च और डायग्नोस्टिक प्रयोगशालाओं के नेटवर्क का विस्तार करना।

  • बीमारियों की रियल-टाइम निगरानी: कमिटी ने कहा कि दुर्गम क्षेत्रों और कमज़ोर फ़ीडबैक सिस्टम की वजह से पूर्वोत्तर क्षेत्र में डेटा इकट्ठा करना और निगरानी रखना बड़ी चुनौतियां हैं। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए एक खास पोर्टल बनाना या हर मॉनसून से पहले और बाद में "नॉर्थ-ईस्ट वेक्टर सर्विलांस बुलेटिन" जारी करना, (ii) इंटीग्रेटेड हेल्थ इनफॉर्मेशन प्लेटफ़ॉर्म (आईएचआईपी) के ज़रिए रिपोर्टिंग को मज़बूत करना, (iii) स्थानीय भाषाओं में मोबाइल ऐप और हेल्पलाइन बनाना जिनमें टू-वे एसएमएस-आधारित फ़ॉलो-अप की सुविधा हो, (iv) बीमारी के हॉटस्पॉट का पता लगाने के लिए एआई-आधारित अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम लागू करना, और (v) नागरिकों द्वारा भेजी गई तस्वीरों से वेक्टर की पहचान करने के लिए मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करना। आईएचआईपी सरकार का रियल-टाइम डिजिटल डैशबोर्ड है जहां राज्य वीबीडी मामलों का डेटा तुरंत अपलोड करते हैं, जिससे पुराने पेपर-आधारित रिपोर्टिंग सिस्टम की जगह ली जा सके।

  • क्षेत्रीय और सीमा पारीय समन्वय: कमिटी ने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पास होने के कारण, मौसमी प्रवास से संक्रमण फैलने का खतरा रहता है। कमिटी ने गौर किया कि कहा कि पारिस्थितिक कारक, जैसे धान के खेतों के पास अनियंत्रित सुअर पालन पूर्वोत्तर क्षेत्र में जापानी इंसेफेलाइटिस के फैलने में भूमिका निभाते हैं। कमिटी ने बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार के साथ वेक्टर-जनित बीमारियों पर सीमा-पारीय तालमेल की व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया। साथ ही, कमिटी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जाने वाली सर्वोत्तम पद्धतियों के अनुसार सुअर पालन को रेगुलेट करने का भी सुझाव दिया।

  • वेक्टर से निपटने के लिए विशेष रणनीतियां: कमिटी ने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में बीमारी का बोझ निम्नलिखित से प्रभावित होता है: (i) मौसम और पर्यावरण की स्थिति, (ii) सामाजिक-आर्थिक कारक, (iii) व्यवहार संबंधी पैटर्न, और (iv) स्वास्थ्य सेवा में प्रणालीगत कमियां। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) एक क्षेत्र-विशिष्ट और बहुक्षेत्रीय रणनीति विकसित की जाए, (ii) विभिन्न वेक्टर-जनित रोग नियंत्रण केंद्रों और पूर्वोत्तर क्षेत्र के बीच तालमेल को मजबूत किया जाए, और (iii) लंबे समय तक चलने वाली कीटनाशक-युक्त मच्छरदानियों (एलएलआईएनज़) और आर्टेमिसिनिन-बेस्ड कॉम्बिनेशन थेरेपी (एसीटी) की सार्वभौमिक कवरेज सुनिश्चित की जाए। एलएलआईएनज़ कीटनाशक-युक्त मच्छरदानियां होती हैं जो मच्छरों के काटने से बचाती हैं और मच्छरों को मारती हैं। एसीटी एक चिकित्सकीय प्रोटोकॉल है जिसका उपयोग मलेरिया के इलाज के लिए किया जाता है।

  • आदिवासी समुदायों के साथ चुनौतियां: कमिटी ने आदिवासी समुदायों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और टीकाकरण को प्रभावित करने वाली सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक चुनौतियों पर गौर किया। कमिटी ने यह कहा कि कई ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में नियमित स्वास्थ्य रिपोर्टिंग प्रणाली न होने के कारण बीमारियों के फैलने की जानकारी समय पर नहीं मिल पाती और उनकी रिपोर्टिंग भी कम होती है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) घर-घर जाकर निगरानी और जागरूकता अभियान चलाना, (ii) मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) और कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर को मिलने वाले इंसेंटिव की समय-समय पर समीक्षा करना, (iii) पूर्वोत्तर में 'हर बस्ती में एक आशा' के नियम का सख्ती से पालन करना, और (iv) ज़्यादा जोखिम वाले इलाकों में वेक्टर-कंट्रोल (बीमारी फैलाने वाले जीवों को नियंत्रित करने) के खास उपाय करना।

 

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

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