स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
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पब्लिक एकाउंट्स कमिटी (चेयर: श्री के. सी. वेणुगोपाल) ने 12 अगस्त, 2026 को 'ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों में छोटे हथियारों का निर्माण' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी ने कुछ अतिरिक्त पूछताछ और सिफारिशों के साथ वर्ष 2022 को समाप्त हुए वर्ष के लिए इसी विषय पर कैग की रिपोर्ट की समीक्षा की है। ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां उन रक्षा निर्माण इकाइयों को कहा जाता है, जिन्हें भारतीय सशस्त्र बलों, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और राज्य पुलिस बलों जैसी संस्थाओं के लिए छोटे हथियारों और उपकरणों का निर्माण करने के लिए स्थापित किया गया था। 2021 में केंद्र सरकार ने ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) को भंग कर दिया था और इसके तहत आने वाली 41 फैक्ट्रियों को सात रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में बांट दिया था। इन्हीं में से एक है, एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (एडब्ल्यूईआईएल)। कैग की रिपोर्ट और कमिटी की रिपोर्ट में तीन छोटे हथियार निर्माण कारखानों में होने वाले निर्माण की समीक्षा की गई है, जो सभी एडब्ल्यूईआईएल के अंतर्गत आते हैं। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव इस प्रकार हैं:
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सीमित मांग: कमिटी ने गौर किया कि 2015-16 से 2019-20 के बीच, छोटे हथियार निर्माण कारखानों के मुख्य निर्माण उत्पादों के लिए सशस्त्र बलों की तरफ से मांग बहुत कम थी, या मांग थी ही नहीं। सिर्फ गृह मंत्रालय के तहत आने वाले सुरक्षा बलों ने इन हथियारों की मांग की थी। हालांकि गृह मंत्रालय की यह मांग छोटी फैक्ट्रियों की पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए नाकाफी थी। निगमीकरण के बाद, ऑर्डर हासिल करने के लिए एडब्ल्यूईआईएल को अब अन्य निर्माताओं के साथ भी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। कमिटी ने सुझाव दिया कि फैक्ट्रियों की क्षमता को बेकार पड़े रहने से बचाने के लिए थल सेना, गृह मंत्रालय, राज्य पुलिस बलों और एडब्ल्यूईआईएल को मिलकर एक बहुवर्षीय रोलिंग मांग योजना बनानी चाहिए। इसके अलावा, कमिटी ने मांग के पैटर्न का विस्तृत अध्ययन करने और उसके बाद फैक्ट्रियों में अपने हिसाब से मशीनों और सुविधाओं में जरूरी बदलाव करने का सुझाव दिया।
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इन्वेंट्री का जमा होना (बिना बिका माल): कमिटी ने कहा कि मार्च 2020 तक चुनिंदा तीन छोटे हथियारों की फैक्ट्रियों में 641 करोड़ रुपए की इन्वेंट्री जमा थी। इसमें से 56% हिस्सा कार्य प्रगति (यानी आधा बना हुआ माल) के तौर पर दर्ज था। इसके अलावा, कमिटी ने पाया कि स्टोर में माल रखने की अवधि 156 से 241 दिन थी, जबकि निर्धारित सीमा 135 दिन की है। कमिटी ने इन्वेंट्री के कुशलतापूर्वक प्रबंधन के लिए वार्षिक स्टॉक वैरिफिकेशन जैसे तरीकों को अपनाने की सलाह दी। साथ ही, कमिटी ने ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों को निम्नलिखित सुझाव भी दिए: (i) लागत-दक्षता के पैमानों को शामिल करके इन्वेंट्री के प्रबंधन को मज़बूत करना, (ii) मांग का अनुमान लगाने की प्रक्रियाओं में सुधार करना, और (iii) मांग में होने वाले उतार-चढ़ाव को बेहतर ढंग से संभालने के लिए इन्वेंट्री प्रबंधन के तरीकों में बदलाव करना।
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परिचालन की उच्च लागत: कमिटी ने कहा कि 2015-16 और 2019-20 के बीच चुनिंदा छोटे हथियारों के कारण तीन फैक्ट्रियों को कुल 366 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था। निगमीकरण के बाद 2023-24 और 2025-26 के बीच इन तीनों फैक्ट्रियों का कुल नुकसान 234 करोड़ रुपए रहा। कमिटी ने यह भी कहा कि उच्च उत्पादन लागत और उत्पादन लागत से कम पर निर्गम मूल्य (इश्यू प्राइज़) तय होना इस नुकसान के मुख्य कारण रहे हैं। कमिटी के सुझाव निम्नलिखित हैं: (i) सरकारी फैक्ट्रियों में हथियार बनाने का खर्च कम करने के लिए, उसकी तुलना निजी कंपनियों के मैन्यूफैक्चरिंग के खर्च से की जाए, और (ii) राजस्व बढ़ाने के लिए उत्पादों में विविधता लाई जाए, जैसे कि घरेलू लाइसेंस प्राप्त सिविलियन बाजार के लिए खेल और शिकार की राइफलों का निर्माण करना, या निजी उपकरण निर्माताओं के लिए स्पेयर पार्ट्स बनाना।
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गुणवत्ता के मुद्दे: ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों के उत्पादों को सेना को सौंपने से पहले गुणवत्ता आश्वासन महानिदेशालय (डीजीक्यूए) द्वारा अच्छी तरह से जांचा जाता है। 2015-16 और 2019-20 के बीच, सेना ने चार छोटे हथियारों से जुड़ी 269 दुर्घटनाओं की रिपोर्ट की। कमिटी ने कहा कि गुणवत्ता में कमियों के कारण उत्पादों को बड़ी संख्या में वापस किया जा रहा था। इसके अलावा, उत्पादों में एक ही तरह की कमियां बार-बार सामने आ रही थीं। कमिटी ने यह भी कहा कि एडब्लूईआईएल ने गुणवत्ता में सुधार के लिए कुछ उपाय लागू किए हैं, जैसे कि कारणों की पहचान करने के लिए एक जांच समिति का गठन और और सुधारात्मक उपायों का सुझाव देना। कमिटी ने नए और संशोधित गुणवत्ता दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए एक सख्त निगरानी प्रणाली का सुझाव दिया है। इसके अलावा, कमिटी ने कमियों की जल्द पहचान करने के लिए अंतिम चरण की जांच (एंड ऑफ लाइन इंस्पेक्शंस) के बजाय निर्माण के दौरान ही गुणवत्ता जांच का सुझाव दिया।
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अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) परियोजनाएं: कमिटी ने कहा कि ओएफबी की आरएंडडी परियोजनाओं में से कोई भी परियोजना अपने तय समय पर पूरी नहीं हो सकी। इनमें से कुछ परियोजनाओं को बीच में ही बंद कर दिया गया। इसके साथ ही कमिटी ने यह भी पाया कि अलग-अलग फैक्ट्रियों में एक ही तरह के आरएंडडी पर दोहरा काम हो रहा था जिससे संसाधन बर्बाद हो रहे थे। फैक्ट्रियों के निगमीकरण के बाद कमिटी ने यह भी देखा कि अब नए उत्पादों को विकसित करने के लिए आपस में तालमेल के प्रयास किए जा रहे हैं। कमिटी ने यह सुझाव दिया कि आरएंडडी परियोजनाओं को समय पर औऱ सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए एक मजबूत निगरानी प्रणाली बनाई जाए ताकि भविष्य में काम में देरी न हो।
समिति ने गौर किया कि एडब्लूईआईएल ने अपने संसाधनों का 2% से 3% हिस्सा आरएंडडी में लगाने का लक्ष्य रखा है। कमिटी ने माना कि उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने और राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने के लिए आरएंडडी बहुत ज़रूरी है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों में आरएंडडी गतिविधियों के लिए बजट का ज़्यादा हिस्सा आवंटित करना, और (ii) सशस्त्र बलों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए चालू आरएंडडी परियोजनाओं की समीक्षा करना।
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