स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
उच्च शिक्षा के तहत स्वायत्त संस्थानों की समीक्षा
- शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री दिग्विजय सिंह) ने 8 दिसंबर, 2025 को उच्च शिक्षा विभाग के तहत आने वाले स्वायत्त निकायों और संस्थानों- एनटीए, एनएएसी, ड्राफ्ट यूजीसी रेगुलेशंस, आईसीएचआर, आईसीपीआर, आईसीएसएसआर, आईआईएएस (शिमला) और ऑरोविले फाउंडेशन की समीक्षा पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कमिटी के प्रमुख निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रबंधन से संबंधित मुद्दे: कमिटी ने गौर किया राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा 2024 में आयोजित 14 प्रतियोगी परीक्षाओं में से कम से कम पांच में गंभीर समस्याएं थीं। इनमें परीक्षा का स्थगन, पेपर लीक, परिणामों में देरी और उत्तर कुंजी में त्रुटियों के कारण प्रश्नों को रद्द करना शामिल था। कमिटी ने यह भी गौर किया कि पेपर सेट करने, प्रबंधन और सुधार कार्यों में शामिल कई कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया जा चुका है। लेकिन इसके बावजूद उन्हें अन्य राज्यों/संगठनों से कॉन्ट्रैक्ट मिलना जारी है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) पेन-एंड-पेपर परीक्षाओं पर ध्यान केंद्रित करना, (ii) कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं को केवल सरकारी या सरकार नियंत्रित केंद्रों पर ही आयोजित करना, (iii) ऐसी कंपनियों की एक राष्ट्रव्यापी ब्लैकलिस्ट तैयार करना जिन्हें परीक्षाओं के प्रबंधन में शामिल नहीं होना चाहिए, और (iv) कोचिंग सेंटर्स की बढ़ती संख्या और उनके प्रभाव की समस्या से निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करना।
- रिक्तियां: कमिटी ने गौर किया कि कई संस्थानों में उच्च स्तरीय पदों पर रिक्तियां हैं। उसने यह भी गौर किया कि कई पदों को अतिरिक्त प्रभार दिए गए थे। उदाहरण के लिए, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अप्रैल 2025 से कार्यवाहक अध्यक्ष के अधीन कार्य कर रहा है। शिमला स्थित भारतीय उन्नत अध्ययन संस्थान (आईआईएएस) के निदेशक का पद अगस्त 2021 से अगस्त 2025 तक रिक्त रहा। कमिटी ने यह भी गौर किया कि भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (आईसीपीआर) का गठन 2022 से 2024 के बीच नहीं हुआ था और इसका कोई अध्यक्ष भी नहीं था। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के तहत आने वाले संस्थानों में फैकेल्टी पदों में से 50% से भी कम पद भरे गए थे। कमिटी ने सुझाव दिया कि ऐसे रिक्त पदों को तत्काल भरा जाना चाहिए। कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि लंबे समय के लिए अतिरिक्त प्रभार सौंपने की परंपरा से बचा जाना चाहिए।
- कमिटी ने कहा कि एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर स्तर पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के पदों को भरना कठिन है। यूजीसी के वेतनमानों के अनुसार, इन स्तरों पर कार्यरत व्यक्तियों का वार्षिक वेतन आठ लाख रुपए से अधिक होता है और वे ईडब्ल्यूएस की श्रेणी में नहीं आते। कमिटी ने एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर स्तर पर ईडब्ल्यूएस आरक्षण के कार्यान्वयन का पुनर्मूल्यांकन करने का सुझाव दिया।
- प्रत्यायन का मॉडल: कमिटी ने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए वर्तमान प्रत्यायन और पुन: प्रत्यायन प्रक्रिया लंबी और नौकरशाही जटिलताओं से भरी है। कमिटी ने द्विआधारी (बाइनरी) प्रत्यायन मॉडल को लागू करने का सुझाव दिया। यह द्विआधारी मॉडल संस्थानों को प्रत्यायित या गैर-प्रत्यायित के रूप में मान्यता देता है।
- फेलोशिप स्टाइपेंड: कमिटी ने कहा कि यूजीसी जूनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए 37,000 रुपए प्रति माह की स्कॉलरशिप देता है। जबकि भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर), आईसीपीआर और आईसीएसएसआर 17,000 रुपए से 20,000 रुपए प्रति माह देते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि स्कॉलरशिप की राशि के साथ-साथ फेलोशिप की संख्या भी बढ़ाई जाए।
- ड्राफ्ट यूजीसी रेगुलेशंस में परिवर्तन: कमिटी ने यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) रेगुलेशन, 2025 के ड्राफ्ट में निम्नलिखित बदलावों का सुझाव दिया है: (i) जाति आधारित उत्पीड़न की परिभाषा में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के उत्पीड़न को शामिल करना, (ii) विकलांगता को भेदभाव के एक आधार के रूप में शामिल करना, (iii) समता समिति के 50% से अधिक सदस्यों को वंचित समुदायों से लेना, (iv) भेदभावपूर्ण परंपराओं की एक सूची शामिल करना, (v) जाति आधारित भेदभाव के वार्षिक सार्वजनिक प्रकटीकरण का प्रावधान करना। कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि शिक्षकों की नियुक्ति और पदोन्नति के लिए यूजीसी के ड्राफ्ट दिशानिर्देशों पर केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के साथ चर्चा की जाए।
- एनईपी 2020 का कार्यान्वयन: कमिटी ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को लागू करने के लिए विश्वविद्यालयों को सहायता की आवश्यकता है। इसमें बुनियादी ढांचे, भर्ती और पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता शामिल है। कमिटी ने यह भी कहा कि ए+ प्रत्यायन प्राप्त न होने वाले विश्वविद्यालयों को ऑनलाइन पाठ्यक्रम संचालित करने की अनुमति नहीं है। कमिटी ने इस निर्णय पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया क्योंकि राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद द्वारा संचालित ग्रेडिंग प्रक्रिया में किसी संस्थान की ऑनलाइन या दूरस्थ शिक्षा प्रदान करने की क्षमता की जांच नहीं की जाती है।
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