स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश
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ग्रामीण विकास और पंचायती राज से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: श्री सप्तगिरि शंकर उलाका) ने 5 अगस्त, 2026 को 'पंचायत की त्रि-स्तरीय प्रणाली में समन्वय के विशेष संदर्भ के साथ संविधान के 73वें संशोधन कानून के कार्यान्वयन का प्रभाव' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। संविधान के 73वें संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं को स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के रूप में स्थापित किया और उन्हें संवैधानिक दर्जा दिया। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव इस प्रकार हैं:
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शक्तियों का हस्तांतरण: कमिटी ने गौर किया कि अलग-अलग राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं को कायों, वित्तीय संसाधनों और कर्मचारियों का हस्तांतरण एक जैसा नहीं है। कमिटी ने देखा कि पंचायती राज संस्थाएं अक्सर खुद से शासन करने वाली स्वतंत्र संस्थाओं के बजाय राज्य सरकारों की योजनाओं को लागू करने वाली एजेंसियों के तौर पर काम करती हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि पंचायती राज मंत्रालय को एक व्यापक समीक्षा ढांचा बनाना चाहिए और समय-समय पर छह आयामों के आधार पर राज्यों की रैंकिंग जारी करनी चाहिए: (i) ढांचा, (ii) कार्य, (iii) वित्त, (iv) अधिकारी/कर्मी, (v) क्षमता संवर्धन, और जवाबदेही। इसके साथ ही, कमिटी ने मंत्रालय को पंचायती राज संस्थाओं के कामकाज की एक व्यापक समीक्षा करने और अगली पीढ़ी के सुधारों के लिए एक रोडमैप तैयार करने का सुझाव दिया। इस रोडमैप में निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए: (i) लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को और गहरा करना, (ii) संस्थागत क्षमता और वित्तीय स्थिरता को मजबूत करना, (iii) डिजिटल गवर्नेंस सुनिश्चित करना, और (iv) नागरिकों की अधिक भागीदारी तय करना।
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वित्तीय सशक्तीकरण: कमिटी ने गौर किया कि पंचायतें अनुदान पर निर्भर रहती हैं और उनके पास अपना राजस्व जुटाने की क्षमता सीमित है। इससे उनकी स्वायत्तता और कार्यक्षमता सीमित हो जाती है। कमिटी ने कहा कि 16वें वित्त आयोग के अनुदान का एक हिस्सा अपना राजस्व जुटाने के प्रदर्शन से जुड़ा है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) पंचायतों के अपने राजस्व स्रोतों को मजबूत करने की रणनीति, (ii) राज्य वित्त आयोगों का समय पर गठन, और (iii) अपना राजस्व बढ़ाने और वित्तीय प्रबंधन में सुधार के लिए प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन।
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मध्यवर्ती और जिला पंचायतें: संविधान एक त्रि-स्तरीय व्यवस्था की परिकल्पना करता है जिसमें ग्राम पंचायत (गांव), पंचायत समिति (ब्लॉक) और जिला परिषद (जिला) शामिल हैं। कमिटी ने गौर किया कि शक्तियां मुख्य रूप से ग्राम पंचायत स्तर पर ही केंद्रित हैं, जिससे ब्लॉक और जिला पंचायतों के पास सीमित अधिकार रह जाते हैं। यह स्थिति एकीकृत योजना और समन्वय को बुरी तरह प्रभावित करती है। कमिटी ने कार्यकारी अधिकारियों पर अत्यधिक निर्भरता और उच्च स्तरों पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की सीमित भूमिका को लेकर भी चिंता जताई है। उसने निम्नलिखित को सुनिश्चित करने का सुझाव दिया: (i) ब्लॉक और जिला स्तर की योजनाएं, ग्राम पंचायत विकास योजनाओं में चिन्हित कमियों और अंतरालों के साथ समायोजित कर तैयार की जाएं, और (ii) राज्य सरकारें विभिन्न स्तरों के बीच तय किए गए अनुदान-साझाकरण अनुपात का सख्ती से पालन करें।
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पंचायत के लिए खास कैडर: कमिटी ने कहा कि एक पंचायत सचिव अक्सर चार से पांच पंचायतों का काम देखता है, जिससे सेवाओं पर बुरा असर होता है। पंचायत कैडर सरकारी कर्मचारियों का एक खास समूह होता है जिन्हें पंचायतों के लिए नियुक्त किया जाता है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) पंचायत के लिए खास कैडर बनाना, और (ii) हर ग्राम पंचायत के लिए एक खास पंचायत सचिव की व्यवस्था चरणबद्ध तरीके से करना।
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महिलाओं का प्रतिनिधित्व: कमिटी ने गौर किया कि भले ही पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधियों में महिलाओं की संख्या लगभग आधी है, लेकिन प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व (किसी और की जगह काम करना) अभी भी बड़े पैमाने पर होता है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व के खिलाफ़ जारी आधिकारिक दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू करना, और (ii) महिला प्रतिनिधियों के लिए खास प्रशिक्षण और मेंटरिंग की व्यवस्था करना।
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ग्राम सभाओं को फिर से सक्रिय करना: कमिटी ने गौर किया कि कई इलाकों में ग्राम सभा की बैठकें अब ज़्यादातर सिर्फ़ दिखावे की रह गई हैं और उनमें लोगों की भागीदारी कम हो रही है। कमिटी ने कहा कि मंत्रालय की 2021 के आधिकारिक दिशानिर्देश, जिसका विषय 'ग्राम सभाओं को जीवंत बनाना' है, में साल में कम से कम छह (हर दो महीने में एक) और ज़्यादा से ज़्यादा 12 (हर महीने एक) बैठकें करने की सलाह दी गई है, जिसमें सदस्यों की कम से कम 10% उपस्थिति (कोरम) ज़रूरी है। कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) भागीदारी बढ़ाने के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, लोगों को एकजुट करने के प्रयासों और जागरूकता अभियानों का इस्तेमाल करना, और (ii) ग्राम सभा के कामकाज की गुणवत्ता और प्रभाव की समय-समय पर समीक्षा करना।
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