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खान

खान और खनिज (विकास और रेगुलेशन) संशोधन बिल, 2026 को 10 अगस्त, 2026 को लोकसभा में पेश किया गया। इस नोट में बिल की मुख्य विशेषताओं और कुछ विचारणीय मुद्दों को प्रस्तुत किया गया है।

संदर्भ

संविधान के तहत, संसद को खानों और खनिज विकास को रेगुलेट करने का अधिकार है, उस सीमा तक जहां संसद कानून द्वारा सार्वजनिक हित में ऐसे रेगुलेशन को आवश्यक घोषित करती है (संघ सूची की प्रविष्टि 54)। राज्यों के पास संघ सूची के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, खानों और खनिज विकास को रेगुलेट करने का अधिकार है (राज्य सूची की प्रविष्टि 23)। राज्यों को खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने का भी अधिकार है, जो खनिज विकास से संबंधित संसदीय कानून के तहत लगाई गई किन्हीं सीमाओं के अधीन है (राज्य सूची की प्रविष्टि 50)।

खान और खनिज (विकास और रेगुलेशन) एक्ट, 1957 (एमएमडीआर एक्ट) खानों और खनिज विकास और रेगुलेशन से जुड़ा मुख्य केंद्रीय कानून है।[1] यह एक्ट केंद्र सरकार को सार्वजनिक हित में खानों और खनिज विकास को रेगुलेट करने की अनुमति देता है। यह केंद्र सरकार को खनिजों के संरक्षण और व्यवस्थित विकास के लिए नियम बनाने का अधिकार भी देता है। यह एक्ट मुख्य खनिजों (जिनका रेगुलेशन केंद्र सरकार करती है) और लघु खनिजों (जिनका रेगुलेशन राज्य सरकारें करती हैं) के बीच अंतर करता है। इस एक्ट के तहत, खनिज कनसेशंस जैसे कि पूर्वेक्षण (प्रॉस्पेक्टिंग) लाइसेंस और खनन पट्टे राज्य सरकारों द्वारा दिए जाते हैं, और इनमें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित नियमों और नीलामी प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। इसके अलावा केंद्र सरकार रॉयल्टी की दरें भी तय करती है, जो राज्य सरकारें पट्टाधारकों से वसूल करती हैं।

2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इन बातों की जांच की थी: (i) क्या एमएमडीआर एक्ट, 1957 के तहत खनन गतिविधियों पर वसूली गई रॉयल्टी को टैक्स माना जा सकता है, (ii) क्या भूमि और भवनों पर टैक्स लगाने की राज्यों की शक्ति खनिज युक्त भूमि पर भी लागू होती है, और (iii) क्या संसद खानों और खनिजों पर टैक्स लगाने की राज्य विधानसभा की शक्तियों को सीमित कर सकती है।[2] अदालत ने कहा था कि रॉयल्टी कोई टैक्स नहीं है। यह एक ऐसा भुगतान है जो खनिज अधिकारों का उपभोग करने के अनुबंधीय दायित्व से पैदा होता है। अदालत ने यह भी माना था कि राज्य विधानसभाओं के पास खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की विधायी शक्ति है। हालांकि खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की राज्यों की शक्ति को संसद के एक कानून द्वारा सीमित किया जा सकता है जिसमें पूरी तरह से रोक लगाना भी शामिल हो सकता है (राज्य सूची की प्रविष्टि 50)। अदालत ने यह भी कहा था कि एमएमडीआर एक्ट, 1957 राज्यों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाता है। इसके अलावा अदालत ने यह फैसला भी सुनाया था कि राज्यों की भूमि पर टैक्स लगाने की शक्ति (राज्य सूची की प्रविष्टि 49) खानों और खदानों पर भी लागू होती है। ऐसी भूमि पर खनिज के मूल्य या उत्पादन के आधार पर टैक्स लगाया जा सकता है। संसद खनिज युक्त भूमि पर टैक्स लगाने की राज्यों की शक्तियों को सीमित नहीं कर सकती है।

खान और खनिज (विकास और रेगुलेशन) संशोधन बिल, 2026 में राज्यों के खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर टैक्स लगाने की शक्तियों पर पाबंदियां लगाई गई हैं। बिल के उद्देश्यों और कारणों के कथन में कहा गया है कि किसी उचित सीमा के अभाव में राज्यों द्वारा असमान रूप से टैक्स और अन्य लेवी (शुल्क) लगाने से कई समस्याएं पैदा हुई हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) खनन क्षेत्र पर टैक्स का भारी बोझ, (ii) खनन कार्य शुरू होने के बाद अचानक और अप्रत्याशित रूप से टैक्स, सेस और अन्य लेवी लागू कर देना, (iii) खनिज उत्पादन या उसके डिस्पैच पर कई तरह के टैक्स और लेवी लगाना, (iv) अलग-अलग राज्यों में टैक्स की अलग-अलग दरें, और (v) ऐसे टैक्स और लेवी को पिछली तारीख से लागू करना। बिल में कहा गया है कि इन समस्याओं से खनन की लागत बढ़ती है, खनिजों की निकासी के काम को बढ़ावा नहीं मिलता और खनन कार्य व्यावसायिक रूप से अव्यावहारिक हो सकते हैं। यह बिल इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास करता है।

मुख्य विशेषताएं

  • खनिज युक्त भूमि का रेगुलेशन: एक्ट केंद्र सरकार को खानों के रेगुलेशन और खनिजों के विकास को नियंत्रित करने का अधिकार देता है। यह बिल केंद्र सरकार को खनिज युक्त भूमि के रेगुलेशन को नियंत्रित करने का अधिकार भी देता है। खनिज युक्त भूमि ऐसी ज़मीन होती है जिसमें केंद्र सरकार द्वारा नियमों के तहत निर्धारित मापदंडों के अनुसार खनिज मौजूद हों।

  • राज्यों की लेवी पर रोक: यह बिल राज्य सरकारों को निर्दिष्ट लेवी लगाने से रोकता है, जब तक कि वे केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों या प्रतिबंधों के अनुसार न हों। यह प्रतिबंध निम्नलिखित पर लगने वाले किसी भी टैक्स, सेस या ऐसी ही दूसरी लेवी पर लागू होगा: (i) खनिज अधिकारों पर, या (ii) खनिज युक्त भूमि पर, चाहे वे खनिज की मात्रा, खनिज के मूल्य, रॉयल्टी या किसी अन्य आधार पर तय की गई हों। इस संशोधन कानून के लागू होने से पहले राज्यों का जो भी टैक्स बकाया है या वसूला नहीं गया है, वह अमान्य माना जाएगा (यानी रद्द माना जाएगा)। हालांकि जो टैक्स पहले जमा या वसूला जा चुका है, उसे वापस नहीं किया जाएगा।

 

विचारणीय मुद्दे

संसद के पास खनिज युक्त भूमि को रेगुलेट करने की विधायी क्षमता नहीं हो सकती

एमएमडीआर एक्ट, 1957 के तहत, केंद्र सरकार सार्वजनिक हित में खानों के रेगुलेशन और खनिज विकास को नियंत्रित करती है। बिल में यह भी कहा गया है कि खनिज युक्त भूमि भी केंद्र सरकार के नियंत्रण में होंगी। ऐसी भूमि को ऐसी ज़मीन के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें निर्धारित मापदंडों के अनुसार खनिज मौजूद हों। बिल राज्यों को खनिज अधिकारों या खनिज युक्त भूमि पर कोई भी टैक्स या सेस लगाने से भी रोकता है, सिवाय उन शर्तों या प्रतिबंधों के जो केंद्र सरकार ने तय किए हों। इसमें खनिज की मात्रा, मूल्य या रॉयल्टी पर आधारित कोई भी लेवी शामिल है। हालांकि संसद के पास खनिज युक्त भूमि को रेगुलेट करने की विधायी क्षमता नहीं हो सकती है।

भूमि राज्य सूची की प्रविष्टि 18 के तहत आने वाला विषय है। राज्य विधानसभा के पास भूमि पर टैक्स लगाने की शक्ति भी होती है (राज्य सूची की प्रविष्टि 49)। वे संसद द्वारा कानून के माध्यम से लगाई गई सीमाओं के अधीन खनिज अधिकारों पर भी टैक्स लगा सकते हैं (राज्य सूची की प्रविष्टि 50)। सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में फैसला सुनाया था कि खनिज युक्त भूमि प्रविष्टि 49 के तहत आने वाली भूमि के दायरे में ही आती है और राज्य उत्पादित खनिजों की मात्रा या देय रॉयल्टी को टैक्स के पैमाने के रूप में इस्तेमाल करके ऐसी भूमि पर टैक्स लगा सकते हैं।अदालत ने यह भी माना था कि संसद खनिज विकास से संबंधित कानून के माध्यम से प्रविष्टि 50 के तहत खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की राज्यों की शक्ति पर सीमाएं लगा सकती है। हालांकि संसद की यह शक्ति प्रविष्टि 49 के तहत भूमि पर टैक्स लगाने की राज्यों की शक्ति पर लागू नहीं होती है।

संघ सूची की प्रविष्टि 54 के तहत संसद खानों और खनिज विकास को रेगुलेट कर सकती है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि प्रविष्टि 54 एक सामान्य रेगुलेटरी शक्ति है और खनिज विकास कानून के तहत सीमाएं लगाने की संसद की शक्ति केवल खनिज अधिकारों के टैक्सेशन पर लागू होती है (प्रविष्टि 50), न कि भूमि के टैक्सेशन पर (प्रविष्टि 49)।

बिल को पिछली तारीख से लागू करना असंवैधानिक हो सकता है

बिल में प्रावधान है कि इस संशोधन कानून के लागू होने से पहले राज्यों का जो भी टैक्स बकाया है या वसूला नहीं गया है, वह अमान्य माना जाएगा (यानी रद्द माना जाएगा)। हालांकि जो टैक्स पहले जमा या वसूला जा चुका है, उसे वापस नहीं किया जाएगा। कानून को पिछली तारीख से लागू करने से दो समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के निर्देशों को अमान्य करना, असंवैधानिक हो सकता है

2024 के अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि राज्यों के पास खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर टैक्स लगाने का अधिकार है।अदालत ने निर्देश दिया था कि 1 अप्रैल, 2005 से शुरू होने वाली अवधि के लिए टैक्स की मांग उठाई जा सकती है, लेकिन इसके लिए किस्तों में भुगतान का शेड्यूल तय करना होगा। यह बिल उन टैक्स या लेवी को पिछली तारीख से अमान्य कर देगा, जिन्हें बिल के लागू होने से पहले किसी राज्य ने जमा नहीं किया था या वसूल नहीं किया था।

सर्वोच्च न्यायालय (1993) ने कहा है कि संसद पिछली तारीख से कानून में बदलाव कर सकती है और किसी पुराने फैसले के आधार को भी बदल सकती है। बशर्ते ऐसा करने के लिए संसद के पास विधायी क्षमता हो और वह वास्तव में फैसले के कानूनी आधार को खत्म कर दे।[3]  अदालत ने माना था कि संसद सिर्फ ऐसा कानून बनाकर किसी अदालती फैसले को बेअसर नहीं कर सकती, जो उसे अमान्य या गैर बाध्यकारी घोषित करता हो।3 ऐसा कदम न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में विधायिका का दखल माना जाएगा। यह बिल फैसले के आधार को बदले बिना, पिछली तारीख से अदालत के निर्देशों को रद्द करने की कोशिश कर रहा है जोकि इस सिद्धांत का उल्लंघन हो सकता है।

टैक्स देनदारियों के मामले में कंपनियों के साथ असमान व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हो सकता है

इस बिल के तहत, जिन खनन कंपनियों को खनन से जुड़ी कोई बकाया राशि चुकानी थी, उन्हें अब वह राशि नहीं चुकानी होगी। हालांकि जिन कंपनियों ने ऐसी बकाया राशि पहले ही चुका दी है, उन्हें वह राशि वापस नहीं मिलेगी। इस तरह, यह बिल उन खनन कंपनियों के साथ असमान व्यवहार कर सकता है जिन्होंने अपना टैक्स चुका दिया था, बनाम जिन्होंने भुगतान में देरी की थी। यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हो सकता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि यह प्रावधान मनमाना है, क्योंकि यह उन लोगों को राहत देता है जिन्होंने अपनी देनदारी नहीं चुकाई थी, जबकि उन लोगों को ऐसी राहत देने से इनकार करता है जिन्होंने कानून का पालन किया था।

राज्यों के टैक्सेशन पर प्रतिबंध लगाने की जिम्मेदारी केंद्र को सौंपना एक्सेसिव डेलिगेशन हो सकता है

बिल राज्यों को खनिज अधिकारों या खनिज युक्त भूमि पर टैक्स लगाने से रोकता है। इसमें खनिज की मात्रा, मूल्य या रॉयल्टी पर आधारित कोई भी लेवी शामिल है। राज्य ऐसा केवल केंद्र सरकार द्वारा तय की गई शर्तों या पाबंदियों के अनुसार ही कर सकते हैं।

राज्य सूची की प्रविष्टि 50 के तहत, राज्य विधानसभाएं खनिज अधिकारों पर टैक्स को रेगुलेट कर सकती हैं, लेकिन यह संसदीय कानून के तहत लगाई गई किन्हीं सीमाओं के अधीन है। यह बिल राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर टैक्स लगाने से रोकता है और यह प्रावधान करता है कि वे ऐसे टैक्स केवल केंद्र सरकार द्वारा तय शर्तों या प्रतिबंधों के अनुसार ही लगा सकते हैं। प्रविष्टि 50 के तहत राज्य अपनी टैक्स लगाने की शक्तियों का किस हद तक इस्तेमाल कर सकते हैं, इसे विधायी नीति का मामला माना जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय (1951) ने यह माना है कि ज़रूरी विधायी कार्य को किसी और को नहीं सौंपा जा सकता, और विधायिका को खुद ही विधायी नीति और सिद्धांत तय करने चाहिए, जबकि सिर्फ़ सहायक मामलों को ही कार्यपालिका पर छोड़ा जा सकता है।[4]  इसलिए, बिल में इन शर्तों और प्रतिबंधों को कैसे तय किया जाए, इस बारे में कोई भी दिशानिर्देश का न होना, एक्सेसिव डेलिगेशन के बराबर हो सकता है। इस संदर्भ में एक्सेसिव डेलिगेशन का अर्थ है, संसद द्वारा कानून बनाने का अपना मुख्य अधिकार खुद इस्तेमाल न करके, केंद्र सरकार को असीमित शक्तियां सौंपना।


[1]. Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957, https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/19380/1/mmdr_act%2C1957.pdf.

[2]. Mineral Area Development Authority vs Steel Authority of India Limited, the Supreme Court of India, July 25, 2024

https://api.sci.gov.in/supremecourt/1999/9012/9012_1999_1_1501_54138_Judgement_25-Jul-2024.pdf.

[3]. State of Haryana and Others vs Karnal Co-Op Farmers' Society Limited, the Supreme Court of India, March 4, 1993, https://sapi.sci.gov.in/jonew/judis/12161.pdf.

[4]. Re Delhi Laws Act, 1912, the Supreme Court of India, May 23, 1951. https://api.sci.gov.in/jonew/judis/1184.pdf.

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