मंत्रालय: 
वित्त

बिल की मुख्य विशेषताएं

  • प्रतिभूति बाजार संहिता, 2025 में प्रतिभूति अनुबंध (रेगुलेशन) एक्ट, 1956, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) एक्ट, 1992, और (iii) डिपॉजिटरीज़ एक्ट, 1996 को एक कानून में एकीकृत करने का प्रयास किया गया है।

  • संहिता के तहत सेबी रेगुलेटर बनी रहेगी, साथ ही सेबी के खिलाफ अपील की सुनवाई के लिए प्रतिभूति अपीलीय ट्रिब्यूनल (एसएटी) की व्यवस्था बरकरार रहेगी।

  • वर्तमान में सेबी में नौ सदस्य होते हैं जिनमें एक चेयरपर्सन, तीन पदेन सदस्य और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त पांच अन्य सदस्य शामिल होते हैं। संहिता ने अन्य सदस्यों की संख्या को बढ़ाकर 11 कर दिया है।

  • चेयरपर्सन, पूर्णकालिक सदस्य और पदाधिकारी को जांच या एडजुडिकेटिंग अधिकारी नियुक्त किया जा सकता है।

  • संहिता एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉरपोरेशन और डिपॉजिटरी को मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (एमआईआईज़) के तौर पर निर्दिष्ट करती है। संहिता उन्हें सेबी की मंजूरी से उप-नियम बनाने का अधिकार देती है। एमआईआईज़ उप-नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना लगाने, सौदे रद्द करने और मुआवजा देने जैसी कार्रवाई कर सकते हैं।

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • कुछ प्रावधान सेबी की स्वतंत्रता पर असर डाल सकते हैं। उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार के पास सदस्यों और चेयरपर्सन की सेवाएं अपने विवेकाधीन खत्म करने की शक्ति है। संहिता में हितों के टकराव जैसे आधार पर उन्हें हटाने का अलग से प्रावधान है; हालांकि इसके लिए स्वतंत्र जांच की ज़रूरत नहीं है।

  • संहिता में उन आदेशों के बारे में बताया गया है जिनके खिलाफ एसएटी में अपील की जा सकती है। इसमें कुछ कार्रवाइयां शामिल नहीं हैं, जैसे पंजीकरण से इनकार करना और कुछ 'सीज़-एंड-डेसिस्ट' (काम रोकने) वाले आदेश। इसके विपरीत सेबी एक्ट, 1992 सभी आदेशों के खिलाफ एसएटी में अपील करने की अनुमति देता है।

  • यह संहिता मामलों के स्तर पर एडजुडिकेशन और जांच के कामों को अलग-अलग करने का प्रावधान करती है। इसके बजाय, वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (2013) ने शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के अनुसार, एडजुडिकेशन के लिए एक अलग कैडर बनाकर दोनों कार्यों को अलग करने का सुझाव दिया था।

  • एडजुडिकेटिंग अधिकारियों और एमआईआईज़ के पास लेनदेन को निलंबित या रद्द करने की शक्तियां हैं। ऐसे कदमों से बाजार में व्यापक अनिश्चितता पैदा हो सकती है और बाजार में भरोसे पर बुरा असर पड़ सकता है।

  • संहिता केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि वह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को गवर्नेंस और डिस्क्लोज़र से जुड़े सेबी के नियमों का पालन करने से छूट दे सकती है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों में आम निवेशकों को होने वाले जोखिमों में कोई खास अंतर नहीं हो सकता है। इससे सवाल उठता है कि क्या ये शक्तियां उचित हैं।

भाग क: बिल की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

प्रतिभूतियों यानी सिक्योरिटीज़ में शेयर (किसी कंपनी में मालिकाना हक), बॉन्ड (कर्ज जुटाने के लिए जारी) और डेरिवेटिव्स (ऐसे कॉन्ट्रैक्ट जिनकी कीमत किसी अंतर्निहित परिसंपत्तियों से तय होती है) जैसे वित्तीय साधन शामिल हैं। इनका अक्सर बाजारों (जैसे स्टॉक एक्सचेंज) में कारोबार होता है। प्रतिभूति बाजार कंपनियों को आम जनता से पूंजी जुटाने में मदद करते हैं। प्रतिभूतियों के व्यापार से मूल्य की खोज (प्राइज़ डिस्कवरी) संभव होती है, और निवेशकों को बाजार में प्रवेश करने और बाहर निकलने की सुविधा मिलती है। एक्सचेंज पर होने वाले ट्रेड में दो और संस्थाएं भी शामिल होती हैं- क्लियरिंग कॉरपोरेशन सौदों के निपटान की गारंटी देता है, और डिपॉजिटरी प्रतिभूतियों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में और दूसरे तरीकों से लेनदेन का रिकॉर्ड रखती है। बाजार में कई अन्य मध्यस्थ भी होते हैं जैसे: (i) ब्रोकर जो ग्राहकों की तरफ से ट्रेड करते हैं, (ii) निवेश सलाहकार जो निवेशकों को सही फैसले लेने में मदद करते हैं, (iii) एसेट मैनेजमेंट कंपनियां, जो निवेशकों से एकत्र किए गए धन का इस्तेमाल करके प्रतिभूतियों में ट्रेड करती हैं (जैसे म्यूचुअल फंड), और (iv) मर्चेंट बैंकर जो प्रतिभूतियां जारी करने का काम संभालते हैं और ज़रूरी सावधानी (ड्यू डिलिजेंस) बरतते हैं।

प्रतिभूतियां जारी करने वालों, इनसाइडर्स और मध्यस्थों के पास आम तौर पर निवेशकों की तुलना में ज़्यादा जानकारी होती है। इससे हेरफेर और गलत काम की गुंजाइश बनती है, और बाजार में भरोसा कम हो सकता है। प्रतिभूति बाजार की विफलता का असर वित्तीय प्रणाली पर भी पड़ सकता है। इन चिंताओं को दूर करने के लिए, प्रतिभूति बाजारों और उनमें काम करने वाली संस्थाओं को रेगुलेट किया जाता है। भारत में प्रतिभूति बाजारों को मुख्य रूप से तीन कानूनों के जरिए रेगुलेट किया जाता है: (i) प्रतिभूति अनुबंध (रेगुलेशन) एक्ट, 1956, (ii) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) एक्ट, 1992, और (iii) डिपॉज़िटरीज़ एक्ट, 1996। 1956 का एक्ट प्रतिभूतियों में लेनदेन और स्टॉक एक्सचेंजों के कामकाज को रेगुलेट करता है। 1992 का एक्ट निम्न की स्थापना करता है: (i) प्रतिभूतियों में निवेशकों के हितों की रक्षा और प्रतिभूति बाजार को बढ़ावा देने और रेगुलेट करने के लिए रेगुलेटर के तौर पर सेबी, और (ii) सेबी के फैसलों के खिलाफ अपीलॉ की सुनवाई के लिए प्रतिभूति अपीलीय ट्रिब्यूनल। 1996 का एक्ट डिपॉज़िटरीज़ को रेगुलेट करता है।

2013 में वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (चेयर: जस्टिस बी. एन. श्रीकृष्ण) ने कहा था कि सरकार से स्वतंत्र रेगुलेटर: (i) यह पक्का करके कानूनी निश्चितता को बेहतर बनाता है कि रेगुलेटरी तरीका राजनीतिक बदलावों के साथ न बदले, और (ii) रेगुलेशन का काम करने के लिए बेहतर तकनीकी जानकारी वाले विशेष श्रमबल को तैयार करने में मदद करता है।[1]

लोकसभा में प्रतिभूति बाजार संहिता, 2025 को पेश किया गया ताकि तीन कानूनों को एक कानून में एकीकृत किया जा सके। संहिता के उद्देश्यों और कारणों के कथन में कहा गया है कि मौजूदा कानून को कई दशकों पहले लागू किया गया था। इसलिए बदलते रेगुलेटरी तौर-तरीकों, तकनीक में हो रहे विकास और प्रतिभूति बाजार के बदलते स्वरूप के मद्देनजर इसकी समीक्षा ज़रूरी थी। इस संहिता को वित्त मामलों की विभागीय स्थायी समिति (स्टैंडिंग कमिटी) (अध्यक्ष: श्री भर्तृहरि महताब) के पास भेजा गया है।

मुख्य विशेषताएं 

प्रतिभूति बाजार संहिता, 2025 का उद्देश्य इन कानूनों को निरस्त करके उनके स्थान पर नए कानून लाना है: (i) प्रतिभूति अनुबंध (रेगुलेशन) एक्ट, 1956, (ii) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) एक्ट, 1992, और (iii) डिपॉजिटरी एक्ट, 1996। बिल में कई प्रावधान बरकरार हैं। सेबी और प्रतिभूति अपीलीय ट्रिब्यूनल (एसएटी) को भी बहाल रखा गया है। मुख्य परिवर्तन इस प्रकार हैं:

  • सेबी की संरचना: वर्तमान में सेबी में नौ सदस्य होते हैं: (i) चेयरपर्सन, (ii) वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के दो अधिकारी, (iii) आरबीआई का एक अधिकारी, और (iv) केंद्र द्वारा नियुक्त पांच अन्य सदस्य, जिनमें से कम से कम तीन पूर्णकालिक सदस्य होने चाहिए। संहिता अन्य सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 11 करती है। इनमें से कम से कम पांच पूर्णकालिक सदस्य होने चाहिए।

  • बोर्ड के सदस्यों के हितों का टकराव: सेबी कानून के तहत सेबी के किसी सदस्य के लिए, जो किसी कंपनी का निदेशक है, अपने कुछ हितों का खुलासा करना अनिवार्य है। इसमें किसी मामले में अपने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आर्थिक हित शामिल हैं। उसे ऐसे मामलों पर विचार-विमर्श या निर्णय लेने में भाग नहीं लेना चाहिए। बिल में इस प्रावधान का विस्तार किया गया है। इसके तहत किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित, जिसे नियमों द्वारा निर्दिष्ट किया जा सकता है, वाले सभी सदस्यों को शामिल किया गया है। इसमें परिवार के किसी सदस्य के हित भी शामिल हैं। इसमें बोर्ड के सदस्यों को हटाने का एक नया आधार जोड़ा गया है। यह उस व्यक्ति पर लागू होगा जिसने ऐसा कोई वित्तीय या अन्य हित अर्जित किया हो जिससे उसके कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका हो।

  • जांच और एडजुडिकेशन: वर्तमान में सेबी किसी भी व्यक्ति को जांच या एडजुडिकेटिंग अधिकारी के रूप में नियुक्त कर सकता है। वह डिवीज़न चीफ़ या उससे ऊपर के रैंक के किसी अधिकारी को एडजुडिकेटिंग अधिकारी के तौर पर नियुक्त कर सकता है। संहिता में इसके बजाय सेबी को अपने अध्यक्ष, पूर्णकालिक सदस्यों और पदाधिकारियों (एडजुडिकेटिंग अधिकारियों के लिए डिवीज़न प्रमुख या उससे ऊपर के अधिकारी) में से किसी को भी जांच या एडजुडिकेटिंग अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है। कोई व्यक्ति किसी मामले में एडजुडिकेटिंग अधिकारी नहीं हो सकता, अगर उसने उस मामले में: (i) निरीक्षण या जांच को मंज़ूरी दी हो या ये कार्य किए हों, (ii) एडजुडिकेटिंग अधिकारी को नियुक्त करने का फ़ैसला किया हो, (iii) समझौते की अर्ज़ी पर विचार किया हो, या (iv) कोई अंतरिम आदेश पारित किया हो। संहिता के अनुसार, सेबी उल्लंघन की तारीख के आठ साल बाद किसी भी निरीक्षण या जांच का आदेश नहीं दे सकता। वर्तमान में ऐसी कोई समय-सीमा नहीं है। यह सीमा उन मामलों पर लागू नहीं होगी जिनका प्रतिभूति बाजार पर व्यापक असर पड़ता है और उन मामलों पर भी नहीं, जिन्हें जांच एजेंसियों ने भेजा है।

  • मध्यस्थ और एमआईआईज़: संहिता में विभिन्न संस्थाओं के लिए पंजीकरण की आवश्यकता को बरकरार रखा गया है। स्टॉक ब्रोकर, परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियां और निवेश सलाहकार जैसे मध्यस्थों को निवेश गतिविधि या व्यवसाय करने के लिए सेबी के साथ पंजीकरण कराना होगा। इस बिल में मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (एमआईआईज़) का सेबी के साथ पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। एमआईआईज़ में स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉजिटरी और क्लियरिंग कॉरपोरेशन शामिल हैं। संहिता सेबी को निवेशकों के विशिष्ट वर्गों के पंजीकरण की आवश्यकता का अधिकार देती है। साथ ही संहिता सेबी को मध्यस्थों या निवेशकों के पंजीकरण की शक्तियां एमआईआईज़ को सौंपने का अधिकार भी देती है। एमआईआईज़, सेबी की मंज़ूरी से अनुबंधों को रेगुलेट और नियंत्रित करने, और सदस्यों व बाजार के भागीदारों के कामकाज के लिए उप-नियम बना सकते हैं। नियमों का उल्लंघन होने पर एमआईआईज़ जुर्माना लगाने, सौदा रद्द करने और मुआवज़ा देने जैसी कार्रवाई कर सकते हैं।

  • शिकायत निवारण और ओम्बड्सपर्सन: संहिता सेबी को निवेशक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने की शक्ति देती है। सेबी सेवा प्रदाताओं को भी शिकायत निवारण तंत्र गठित करने का निर्देश दे सकता है। साथ ही सेबी को शिकायतों के निवारण के लिए ओम्बड्सपर्सन नियुक्त करने का भी अधिकार दिया गया है।

  • अपराध और दंड: वर्तमान में तीनों कानूनों के तहत, कानून, नियमों या रेगुलेशंस का उल्लंघन करने पर दंड के अतिरिक्त कारावास, जुर्माना या दोनों भुगतने पड़ सकते हैं। संहिता इन प्रावधानों को हटाती है और इसके स्थान पर केवल निर्दिष्ट उल्लंघनों के लिए मौद्रिक दंड का प्रावधान करता है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) पंजीकरण न कराना, (ii) झूठे बयान देना, (iii) रिकॉर्ड न रखना, और (iv) सेवा प्रदाताओं द्वारा कुछ चूक। इसमें कुछ अपराधों के लिए कारावास का प्रावधान बरकरार रखा गया है, जैसे: (i) एडजुडिकेटिंग अधिकारियों के निर्दिष्ट आदेशों या जांच अधिकारियों के निर्देशों का पालन न करना और (ii) बाजार दुरुपयोग। बाजार दुरुपयोग को ऐसी गतिविधियों के रूप में परिभाषित किया गया है जिनमें इनसाइडर ट्रेडिंग, निवेशकों को धोखा देना, गैर सार्वजनिक जानकारी रखते हुए प्रतिभूतियों में लेनदेन करना या प्रतिभूतियों के बाजार मूल्यों में हेरफेर करने के लिए शक्ति का दुरुपयोग करना शामिल है।

: मुख्य मुद्दे और विश्लेषण

सेबी की स्वतंत्रता

संहिता भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को प्रतिभूति बाजार का रेगुलेटर बनाती है। इसमें सेबी के चेयरपर्सन और दूसरे सदस्यों की नियुक्ति, उन्हें हटाने और उनकी सेवा की शर्तों से संबंधित प्रावधान हैं। हम यहां इन प्रावधानों से जुड़े कुछ मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।

केंद्र सरकार अपनी मर्जी से सदस्यों और चेयरपर्सन की सेवाओं को समाप्त कर सकती है

सेबी एक्ट, 1992 के तहत केंद्र सरकार बोर्ड के चेयरपर्सन या सदस्यों की सेवाएं खत्म कर सकती है। ऐसा तीन महीने का नोटिस देकर, या नोटिस के बदले तीन महीने का वेतन और भत्ते देकर किया जा सकता है। संहिता में ये प्रावधान बरकरार रखे गए हैं। इन प्रावधानों से सेवाकाल की सुरक्षा कम होती है, जिससे सेबी की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। उल्लेखनीय है कि संहिता में कुछ विशिष्ट आधार पर पद से हटाने का अलग से प्रावधान है। इनमें दिवालियापन, मानसिक रूप से अस्वस्थ होना, नैतिक पतन वाले अपराध के लिए दोषी ठहराया जाना, हितों का टकराव या पद का गलत इस्तेमाल शामिल हैं।

पद से हटाने के लिए किसी स्वतंत्र जांच की जरूरत नहीं

संहिता के तहत, अगर किसी सदस्य को (i) हितों के टकराव, या (ii) पद के दुरुपयोग के आधार पर हटाया जाना है, तो केंद्र सरकार के लिए ज़रूरी है कि वह उस सदस्य को अपनी बात रखने का मौका दे। कुछ दूसरे कानूनों में भी पद से हटाने के खिलाफ़ अतिरिक्त सुरक्षा उपाय दिए गए हैं। जैसे बिजली एक्ट, 2003 के तहत, ऐसे ही आधार पर हटाने के लिए जांच और विद्युत अपीलीय ट्रिब्यूनल के चेयरपर्सन (जो उच्च न्यायालय के मौजूदा या पूर्व मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश होते हैं) की सिफारिश जरूरी है।[2] प्रतिस्पर्धा एक्ट, 2002 के तहत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जांच और सिफारिश जरूरी है।[3] वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) ने सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रिया और नतीजों को सार्वजनिक करने का सुझाव दिया था।1

नियुक्ति का तरीका केंद्र सरकार के निर्धारित नियमों पर छोड़ा गया

संहिता में प्रावधान है कि बोर्ड के चेयरपर्सन और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी। नियुक्ति का तरीका तय नियमों के अनुसार होगा। इसके विपरीत, कुछ अन्य कानूनों में नियुक्तियों का सुझाव देने के लिए चयन समिति का प्रावधान है। इनमें केंद्रीय बिजली रेगुलेटरी आयोग (सीईआरसी) और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) से जुड़े कानून शामिल हैं।[4]  इन समितियों की संरचना भी कानून में निर्दिष्ट है। संहिता में ऐसे प्रावधान नहीं हैं। एफएसएलआरसी ने कहा था कि रेगुलेटर की स्वतंत्रता बढ़ाने के लिए, कानून में चयन समिति का प्रावधान होना चाहिए।साथ ही, उसने यह भी सुझाव दिया था कि समिति के ज़्यादातर सदस्य सरकार से जुड़े हुए नहीं होने चाहिए।

वर्तमान में सेबी एक्ट, 1992 के तहत केंद्र सरकार को नियुक्ति का तरीका निर्दिष्ट करने का अधिकार है। 1992 के एक्ट के तहत बने नियम एक समिति को सेबी में नियुक्तियों का सुझाव देने का अधिकार देते हैं।[5] कैबिनेट सेक्रेटरी इस समिति के अध्यक्ष होते हैं और अन्य सदस्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) प्रधानमंत्री के एडीशनल प्रिंसिपल सेक्रेटरी, (ii) आर्थिक मामलों के विभाग के सेक्रेटरी, (iii) केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन बाहरी विशेषज्ञ, और (iv) सेबी का चेयरपर्सन (पूर्णकालिक सदस्यों के चयन के लिए)।

कार्यकाल के बाद की कूलिंग ऑफ अवधि अन्य समान कानूनों की तुलना में कम

संहिता बोर्ड के चेयरपर्सन और पूर्णकालिक सदस्यों को पद छोड़ने के एक वर्ष बाद तक कुछ विशेष प्रकार के रोजगार से रोकती है। इसमें किसी सरकारी संस्था या प्रतिभूति बाजार से जुड़े किसी भी पक्ष के साथ नौकरी करना शामिल है। अपवाद के मामलों में केंद्र सरकार की पहले से मंज़ूरी लेनी होती है। ऐसी पाबंदियां हितों के टकराव की आशंका को रोकने के लिए लगाई जाती हैं। रेगुलेटर बनाने वाले कई अन्य कानूनों में भी ऐसी ही पाबंदियां हैं। हालांकि ज़्यादातर मामलों में यह अवधि दो वर्ष की होती है।[6]

बोर्ड का नियंत्रण अपने हाथ में लेने से पहले सुनवाई का कोई मौका नहीं

संहिता केंद्र सरकार को कुछ विशिष्ट आधार पर बोर्ड का नियंत्रण अपने हाथ में लेने का अधिकार देती है। इन आधार में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) गंभीर आपातकालीन स्थिति, जब सेबी अपने काम और ज़िम्मेदारियां पूरी करने में असमर्थ हो, (ii) केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करने में सेबी की लगातार नाकामी, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति या कामकाज पर बुरा असर पड़ता हो, या (iii) जनहित। हालांकि संहिता बोर्ड का नियंत्रण केंद्र सरकार द्वारा लेने से पहले सुनवाई का कोई अवसर प्रदान नहीं करती। यह सीसीआई, पीएफआरडीए और इरडाई की स्थापना करने वाले कई दूसरे कानूनों से अलग है।[7]  इसका एक अपवाद आरबीआई एक्ट है, जो सुनवाई के अवसर के बिना बोर्ड को हटाने की अनुमति देता है।[8]

एसएटी के सामने अपील का दायरा सीमित किया गया

सेबी एक्ट, 1992 के तहत, सेबी या उसके एडजुडिकेटिंग अधिकारियों के किसी भी आदेश से पीड़ित कोई भी व्यक्ति एसएटी में अपील कर सकता है। इसके बजाय, संहिता उन आदेशों की श्रेणियां निर्दिष्ट करती है जिनके खिलाफ एसएटी में अपील की जा सकती है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) एडजुडिकेटिंग अधिकारियों के अंतरिम और अंतिम आदेश, (ii) सेबी के समीक्षा आदेश, (iii) पंजीकरण रद्द करने के आदेश, और (iv) एमआईआईज़ के सभी आदेश, जिनमें एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉरपोरेशंस और डिपॉजिटरी शामिल हैं। संहिता कुछ आदेशों को एसएटी में अपील के दायरे से बाहर रखती है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) सेबी द्वारा किसी मध्यस्थ या एमआईआई को पंजीकरण देने से इनकार करना, (ii) एडजुडिकेशन के दौरान 'सीज़-एंड-डेसिस्ट' (काम रोकने के) आदेश, और (iii) रिकवरी अधिकारियों की कार्यवाही। यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसे आदेशों के साथ अलग तरह से व्यवहार क्यों किया जाना चाहिए। ऐसे फैसलों से पीड़ित व्यक्तियों को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करके उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना होगा।

जांच और एडजुडिकेशन

एडजुडिकेशन का काम संरचनात्मक रूप से अलग नहीं है

संहिता के तहत, बोर्ड एक या ज़्यादा लोगों को जांच अधिकारी या एडजुडिकेशन अधिकारी के तौर पर काम करने का निर्देश दे सकता है। ऐसे लोग बोर्ड के चेयरपर्सन, पूर्णकालिक सदस्यों या अधिकारियों में से हो सकते हैं। कोई व्यक्ति किसी मामले के लिए एडजुडिकेशन अधिकारी नहीं हो सकता, अगर उसने उस मामले में: (i) निरीक्षण या जांच को मंज़ूरी दी हो या ये कार्य किए हों, (ii) एडजुडिकेशन अधिकारी नियुक्त करने का फ़ैसला किया हो, (iii) निपटान के आवेदन पर विचार किया हो, या (iv) कोई अंतरिम आदेश पारित किया हो। इसलिए, जांच और एडजुडिकेशन को अलग-अलग करने का काम हर मामले के स्तर पर होगा। इसके विपरीत एफएसएलआरसी ने शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के आधार पर रेगुलेटर के भीतर प्रशासनिक, रेगुलेटरी और एडजुडिकेशन से जुड़े कामों को अलग-अलग करने का सुझाव दिया था।1  उसने एडजुडिकेशन के लिए अधिकारियों का एक अलग कैडर बनाने का प्रस्ताव दिया था। ये अधिकारी किसी दूसरे काम में शामिल नहीं होंगे। एडजुडिकेशन के आदेशों की समीक्षा रेगुलेटर के निर्दिष्ट सदस्यों के सामने रखी जाएगी। प्रतिस्पर्धा एक्ट, 2002 के तहत, जांच का काम विशेष तौर पर करने के लिए डायरेक्टर जनरल का कार्यालय स्थापित किया गया है, जिससे जांच और एडजुडिकेशन (जो आयोग करता है) अलग-अलग हो जाते हैं।[9]

जांच और एडजुडिकेटिंग अधिकारी के तौर पर काम करने वाले बोर्ड के सदस्यों के सुपरवाइजरी कामों में टकराव संभव

संहिता बोर्ड के चेयरपर्सन और सदस्यों को जांच करने वाले या एडजुडिकेशन अधिकारी के तौर पर काम करने की अनुमति देती है। इससे ऐसी स्थिति बन सकती है, जहां सुपरविज़न या तो उसी व्यक्ति द्वारा किया जाता है या पद में किसी जूनियर अधिकारी द्वारा। सवाल यह है कि क्या यह उचित है। उदाहरण के लिए, बोर्ड किसी एडजुडिकेटिंग अधिकारी की कार्यवाही के रिकॉर्ड की जांच कर सकता है। वह जुर्माना बढ़ाने का आदेश भी दे सकता है। जब चेयरपर्सन या पूर्णकालिक सदस्य ही एडजुडिकेशन अधिकारी होते हैं, तो वे अपने ही आदेश की समीक्षा में शामिल हो सकते हैं। इसी तरह, अगर जांच रिपोर्ट समय पर जमा नहीं की जाती है, तो जांच अधिकारी को संबंधित पूर्णकालिक सदस्य से समय बढ़ाने का अनुरोध करना होगा। इसके मायने यह हैं कि एक जांच अधिकारी के तौर पर चेयरपर्सन को अपने से निचले पद के अधिकारी से मंज़ूरी लेनी होगी। बोर्ड के चेयरपर्सन और सदस्य सेबी के मामलों के सामान्य निरीक्षण और निर्देशन एवं प्रबंधन के लिए भी ज़िम्मेदार होते हैं। यह तर्क दिया जा सकता है कि निरीक्षण में जांच और एडजुडिकेशन की व्यापक निगरानी भी शामिल है। चेयरपर्सन या सदस्य, जो जांच या एडजुडिकेटिंग अधिकारी के तौर पर काम कर रहे हैं, वे उसी काम की निगरानी करेंगे, जिसे वे खुद कर रहे हैं। सेबी एक्ट, 1992 के तहत, बोर्ड डिवीज़न चीफ़ या उससे ऊपर के पद के अधिकारियों को एडजुडिकेटिंग अधिकारी के तौर पर नियुक्त कर सकता है।

लेनदेन की निरस्त या रद्द करने की शक्तियां क्या उचित हैं

संहिता एडजुडिकेटिंग अधिकारियों को अधिकार देती है कि वे प्रतिभूति बाजार के सेवा प्रदाताओं, बाजार के भागीदारों या प्रतिभूति बाजार से जुड़े अन्य लोगों को निर्देश जारी कर सकते हैं। ये निर्देश तब जारी किए जा सकते हैं, जब निम्नलिखित के लिए ज़रूरी हो: (i) निवेशकों के हित में या बाजार के व्यवस्थित विकास के लिए, (ii) सेवा प्रदाताओं या बाजार के भागीदारों के कामकाज को ऐसे संचालित होने से रोकने के लिए जो निवेशकों या प्रतिभूति बाजार के हितों के लिए हानिकारक हो, या (iii) ऐसी संस्थाओं के उचित प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए। इन निर्देशों में निम्न शामिल हो सकते हैं: (i) क्लियरिंग कॉरपोरेशन द्वारा अनुबंधों की क्लियरिंग को निरस्त करना, और (ii) स्टॉक एक्सचेंज पर किसी भी ट्रेड या कॉन्ट्रैक्ट को पूरा होने को रद्द करना या अमान्य करना। इसी तरह यह संहिता एमआईआईज़ को किसी भी लेनदेन या अनुबंध को रद्द करने का अधिकार भी देती है। ऐसा उनके उप-नियमों के उल्लंघन की स्थिति में किया जा सकता है। एमआईआईज़ में एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉरपोरेशन और डिपॉजिटरी शामिल हैं। संहिता में इस बारे में कोई और जानकारी नहीं दी गई है कि ऐसी कार्रवाई कब की जा सकती है। स्पष्ट सुरक्षा उपायों के बिना, ऐसे कदमों से प्रतिभूति बाजार में भरोसे पर बुरा असर पड़ सकता है।

एफएसएलआरसी ने यह गौर किया था कि किसी लेनदेन को रद्द करने या पलटने के लिए उससे जुड़े सभी निर्भर लेनदेन को भी पलटना होगा।1 इससे बाजार में ज़्यादा अनिश्चितता पैदा होगी। जब कोई ट्रेड पूरा होता है, तो उसमें प्रतिभागी जोखिम प्रबंधन और मूल्य निर्धारण के लिए उसकी निश्चितता पर निर्भर करते हैं। एफएसएलआरसी ने सुझाव दिया था कि लेनदेन में निश्चितता होनी चाहिए और किसी भी परिस्थिति में उन्हें रद्द नहीं किया जाना चाहिए।1  सेबी ने कहा था था कि विश्व स्तर पर संशोधन और कैंसिलेनशन की अनुमति आम तौर पर केवल तभी दी जाती है, जब: (i) ट्रेड किसी तकनीकी या सिस्टम की गड़बड़ी की वजह से हुआ हो, (ii) कीमतें स्पष्ट तौर पर त्रुटिपूर्ण हों, या (iii) ट्रेड पूरा होने से बाजार के सही कामकाज पर खतरा हो।[10] 

क्या एडजुडिकेशन की प्रक्रिया को नियमों पर छोड़ना उचित है

संहिता में यह प्रावधान है कि एडजुडिकेशन की कार्यवाही सेबी द्वारा रेगुलेशन के ज़रिए निर्दिष्ट तरीके से की जाएगी। यह सेबी एक्ट, 1992 से अलग है जिसमें केंद्र सरकार को नियमों के ज़रिए एडजुडिकेशन का तरीका तय करने का अधिकार दिया गया है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या एडजुडिकेशन करने वाली संस्था को ही उससे जुड़ी प्रक्रिया तय करनी चाहिए। इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य एडजुडिकेशन की कार्यवाही का सामना कर रहे लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है।[11] उदाहरण के लिए, अभी नियमों के तहत आदेश में संक्षिप्त कारण दर्ज करना ज़रूरी है। संहिता में ऐसी कोई ज़रूरत नहीं बताई गई है।

जांच अधिकारियों का न्यूनतम रैंक निर्दिष्ट नहीं

संहिता के तहत, सेबी के किसी भी अधिकारी को जांच अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया जा सकता है। एक जांच अधिकारी सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत दीवानी अदालत की शक्तियों का इस्तेमाल करता है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) बही खातों का पता लगाना और उन्हें पेश करवाना, (ii) व्यक्तियों को समन जारी करना और अदालत में हाजिर होने का कानूनी आदेश देना, (iii) रिकॉर्ड की जांच करना, और (iv) गवाहों और दस्तावेजों की जांच करना। इसके अलावा वह अधिकारी तलाशी और ज़ब्ती की कार्रवाई की मंज़ूरी के लिए विशेष न्यायालय में आवेदन कर सकता है। इसके विपरीत आयकर एक्ट, 2025 एक निर्दिष्ट रैंक से ऊपर के अधिकारियों को ही तुलनात्मक जांच की शक्तियां देता है।[12] पीएफआरडीए एक्ट, 2013 के तहत तलाशी और ज़ब्ती की शक्तियों का इस्तेमाल पीएफआरडीए का वह अधिकारी कर सकता है, जिसका रैंक कम से कम केंद्र सरकार के गैज़ेटेड अधिकारी के बराबर हो।[13]

जांच और एडजुडिकेशन पूरा करने के लिए कोई बाहरी समय सीमा नहीं

संहित के तहत जांच 180 दिनों के अंदर पूरी होनी चाहिए। अगर इस समय सीमा में जांच रिपोर्ट जमा नहीं की जाती है, तो जांच अधिकारी को समय बढ़ाने की मांग करनी होगी। सेबी अधिकारी को और जांच करने और पूरक रिपोर्ट जमा करने का निर्देश भी दे सकता है। संहिता में यह निर्दिष्ट नहीं है कि समय सीमा कितनी बार बढ़ाई जा सकती है, और समय सीमा बढ़ाए जाने पर जांच की अधिकतम समय सीमा क्या होगी। इसके अलावा, पूरक जांच पूरी करने या एडजुडिकेटिंग अधिकारी द्वारा अंतिम आदेश जारी करने के लिए भी कोई समय सीमा तय नहीं है।

क्या पीएसयूज़ को कॉरपोरेट गवर्नेंस के नियमों से छूट देना उचित है

यह संहिता सेबी को इश्यूअर (पूंजी जुटाने वाली कंपनियों) के लिए कुछ मामलों में नियम बनाने का अधिकार देती है, जैसे: (i) वे बाजार से कैसे पूंजी जुटाएंगी, (ii) न्यूनतम ऑफर साइज़ क्या होगा, (iii) प्रतिभूतियों को जारी करना और उनका हस्तांतरण, (iv) क़ॉरपोरेट गवर्नेंस की आवश्यकताएं, (v) इश्यूअर की तरफ से डिस्क्लोज़र, और (vi) जोखिम प्रबंधन। संहिता केंद्र सरकार को सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयूज़) को ऐसी या सभी नियमों से छूट देने का अधिकार देती है। यह जनहित में हो सकता है। इन प्रावधानों का उद्देश्य जनता से पूंजी जुटाने वाली कंपनियों में पारदर्शिता और अच्छे कामकाज के तरीके लागू करके निवेशकों के धन को सुरक्षित रखना है। सवाल यह है कि क्या ऐसी छूट उचित है। निवेशकों के सामने आने वाले जोखिम इस आधार पर बहुत अलग नहीं हो सकते कि इश्यूअर सरकारी है या निजी।

मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (एमआईआईज़)

संहिता एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉरपोरेशंस और डिपॉजिटरिज़ को एमआईआई निर्दिष्ट करती है। सरकार संस्थाओं की अन्य श्रेणियों को भी एमआईआई के तौर पर अधिसूचित कर सकती है।

एमआईआईज़ का रेगुलेटरी कामकाज

संहिता एमआईआईज़ को कुछ रेगुलेटरी काम सौंपती है। वह उन्हें अनुबंधों के रेगुलेशन और नियंत्रण तथा अपने सदस्यों एवं बाजार भागीदारों के आचरण के लिए उप-नियम बनाने की शक्ति देती है। उप-नियमों के मामलों में निवेशकों के हितों की रक्षा करना, जोखिम प्रबंधन, दुरुपयोग को रोकने के उपाय, किसी भी सेवा का लाभ उठाने के नियम एवं शर्तें और प्रतिभूतियों की लिस्टिंग शामिल हैं। उप-नियमों का उल्लंघन करने पर एमआईआईज़ निम्नलिखित कार्रवाई कर सकते हैं: (i) जुर्माना लगाना, (ii) सदस्यता से हटाना, (iii) लेनदेन या अनुबंधों को रद्द करना, और (iv) मुआवज़ा देने का आदेश देना। एमआईआईज़ के आदेशों के खिलाफ अपील सीधे एसएटी में की जा सकती है। इसके अलावा सेबी मध्यस्थों या निवेशकों की किसी भी श्रेणी को पंजीकृत करने की शक्ति किसी एमआईआई को सौंप सकती है। एमआईआईज़ लाभ कमाने वाली संस्थाएं हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या बाजार की गतिविधियों से कमाई करने वाली कंपनी उन गतिविधि का निष्पक्ष रूप से संचालन कर पाएगी। निवेशकों की रक्षा करने वाले किसी भी उपाय से एमआईआई के राजस्व में कमी आ सकती है। संहिता कुछ नियंत्रण और संतुलन प्रदान करती है। उदाहरण के लिए, उप-नियमों के लिए सेबी की पूर्व मंज़ूरी ज़रूरी है। सेबी उप-नियमों में बदलाव का निर्देश दे सकता है या खुद बदलाव कर सकता है। सेबी, एमआईआईज़ के गवर्निंग बोर्ड को हटाने का सुझाव दे सकता है। यह व्यापार या जनहित में एमआईआईज़ का पंजीकरण रद्द कर सकता है। स्वामित्व के मानदंडों के अनुसार, सदस्य सामूहिक रूप से इक्विटी के एक निर्दिष्ट प्रतिशत से अधिक के मालिक नहीं हो सकते। इसके अतिरिक्त एमआईआई के बोर्ड में स्वतंत्र सदस्य होने अनिवार्य हैं।

एमआईआईज़ के गवर्निंग बोर्ड को हटाने की शक्तियां अन्य कानूनों से भिन्न

संहिता केंद्र सरकार को सेबी के सुझावों पर एमआईआईज़ के गवर्निंग बोर्ड को हटाने या उसकी जगह नया बोर्ड लाने का अधिकार देता है। ये प्रावधान अन्य कानूनों के बोर्ड को हटाने (या भंग करने), उनके आधार और अवधि के मामले में अलग हैं।[14] 

तालिका 1: रेगुलेटेड संस्थाओं के गवर्निंग बोर्ड को हटाने के प्रावधान

एक्ट/बिल

प्राधिकरण

आधार

अवधि

प्रतिभूति बाजार संहिता, 2025

सेबी के सुझावों पर केंद्र सरकार

निर्दिष्ट नहीं

निर्दिष्ट नहीं

आरबीआई एक्ट, 1934

आरबीआई

निम्नलिखित शामिल हैं: (i) वित्तीय स्थिरता, (ii) जनहित, (iii) कंपनी का उचित प्रबंधन सुश्चित करना।

पांच वर्ष तक

बीमा एक्ट, 1938

इरडाई

अपने पॉलिसीधारकों के हितों के लिए हानिकारक तरीके से कारोबार करना

एक साल तक; बढ़ाया जा सकता है

पीएफआरडीए एक्ट, 2013

पीएफआरडीए

एक्ट या रेगुलेशंस का उल्लंघन

निर्दिष्ट नहीं

स्रोत: देखें एंडनोट 14; पीआरएस।

निवेशक शिकायत निवारण संबंधी उपायों के लिए सेबी के पास विवेकाधीन शक्तियां

संहिता निवेशक शिकायत निवारण के लिए फ्रेमवर्क प्रदान करती है। सेबी निवेशक चार्टर और शिकायत निवारण तंत्र बना सकती है और ओम्बड्सपर्सन निर्दिष्ट ‘कर सकती है’। इस प्रकार, यह प्रावधान ऐसे उपाय करने का निर्णय पूरी तरह से सेबी के विवेकाधीन छोड़ देता है।

 

[1]. Volume 1: Analysis and Recommendations, Report of the Financial Sector Legislative Reforms Commission, March, 2013, https://dea.gov.in/files/other_reports_documents/FSLRCReportVol1.pdf.

[2]. Section 90, The Electricity Act, 2003.

[3]. Section 11(3), The Competition Act, 2002.

[4]. Section 78, The Electricity Act, 2003; Section 9, The Competition Act, 2002.

[6]. Section 89(5), The Electricity Act, 2003; Section 7, The Pension Fund Regulatory and Development Authority Act, 2013; Section 8, Insurance Regulatory and Development Authority of India Act, 1999; Section 12, The Competition Act, 2002; Section 5(8), The Telecom Regulatory Authority of India Act, 1997.

[7]. Section 44, The Pension Fund Regulatory and Development Authority Act, 2013; Section 19, The Insurance Regulatory and Development Authority of India Act, 1999; Section 56, The Competition Act, 2002.

[8]. Section 30, The Reserve Bank of India Act, 1934.

[9]. Section 16, The Competition Act, 2002.

[10]. Review of policy for trade cancellation / annulment, Securities and Exchange Board of India,  https://www.sebi.gov.in/sebi_data/attachdocs/1381312419464.pdf.

[11]. Rule 5(3), The SEBI (Procedure for Holding Inquiry and Imposing Penalties) Rules, 1995, https://bit.ly/451lWBJ.

[12]. Section 246, The Income-tax Act, 2025.

[13]. Section 17, The Pension Fund Regulatory and Development Authority Act, 2013.

[14]. Section 45IE, The Reserve Bank of India Act, 1934; Section 52A, The Insurance Act, 1938; Section 31, The Pension Fund Regulatory and Development Authority Act, 2013.

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