मंत्रालय: 
शिक्षा

बिल की मुख्य विशेषताएं

  • बिल तीन मौजूदा रेगुलेटर्स का स्थान लेगा: (i) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), (ii) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद, और (iii) राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद।

  • बिल के तहत उच्च शिक्षा के लिए एकमात्र रेगुलेटरी आयोग- विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (आयोग) की स्थापना की गई है।  आयोग में तीन परिषदें होंगी: नियामक परिषद, प्रत्यायन परिषद और मानक परिषद।

  • आयोग तकनीकी शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और आर्किटेक्चर शिक्षा को रेगुलेट करेगा। इसमें मेडिकल, लीगल और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों को शामिल नहीं किया गया है। केंद्र सरकार अन्य व्यावसायिक परिषदों को भी अधिसूचित कर सकती है। इसके बाद उन परिषदों के जरिए रेगुलेट होने वाले संस्थान भी इस बिल के दायरे में आ जाएंगे।

  • वर्तमान में, जो एचईआईज़ डिग्री दे सकते हैं, उन्हें यूजीसी एक्ट, 1956 के तहत परिभाषित किया जाता है। बिल नियामक परिषद को अनुमति देता है कि वे केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी के साथ दूसरे एचईआईज़ को भी डिग्री देने के लिए अधिकृत कर सकती है।

  • इस एक्ट का बार-बार उल्लंघन करने पर 75 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जाएगा। बिना पूर्व मंजूरी के, विश्वविद्यालय स्थापित करने पर कम से कम दो करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है। 

प्रमुख मुद्दे और विश्‍लेषण

  • इस बिल के प्रावधान उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआईज़) की स्वायत्तता में कोई खास सुधार नहीं कर सकते। कुछ मामलों में इन संस्थानों को पहले से मिली स्वायत्तता को वापस लिया जा सकता है। इसमें कुछ मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों को अपने घटक संस्थान स्थापित करने के लिए मिली स्वायत्तता को वापस लेना भी शामिल है।

  • वर्तमान में राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों का कामकाज उनके खुद के विशेष कानूनों के तहत चलता है, जिसमें उन्हें शैक्षिक और शोध की स्वायत्तता मिलती है। यह नया बिल ऐसे संस्थानों को भी इस नए आयोग और उसकी परिषदों के दायरे में लाता है। 

  • धनराशि आवंटित और उसे प्रदान करना, यूजीसी का मुख्य कार्य है। बिल इसे आयोग या उसकी परिषदों के एक कार्य के रूप में शामिल नहीं करता। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीआई), 2020 ने सुझाव दिया था कि रेगुलेशन, मान्यता, वित्त पोषण और मानक निर्धारित करने के लिए चार कार्य क्षेत्रों (वर्टिकल) वाला एक सर्वोच्च निकाय स्थापित किया जाए। बिल वित्त पोषण को छोड़कर, इनमें से तीन को स्थापित करता है।  

  • बिल सभी पेशेवर पाठ्यक्रमों के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं करता। इसके तहत तकनीकी, प्रबंधन और शिक्षक प्रशिक्षण को आयोग के दायरे में रखा गया है। आर्किटेक्चर पढ़ाने वाले संस्थान तो इस आयोग के नियमों से चलेंगे, लेकिन काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर भी एक पेशेवर निकाय के रूप में काम करती रहेगी। मेडिकल, लीगल और अन्य पाठ्यक्रमों को इस बिल से बाहर रखा गया है। यह एनईपी (2020) के अनुकूल है जिसने इन पाठ्यक्रमों को बाहर रखने की सलाह दी थी। हालांकि अन्य विशेषज्ञ समितियों ने सुझाव दिया था कि देश की सभी पेशेवर शिक्षा को सिर्फ एक ही रेगुलेटर के तहत लाया जाना चाहिए।

  • परिषदों के फैसलों के खिलाफ केंद्र सरकार से अपील की जा सकती है। यह व्यवस्था अन्य रेगुलेटर्स, जैसे सेबी और ट्राई की प्रक्रिया से एकदम अलग है।

भाग क: बिल की मुख्य विशेषताएं

संदर्भ

शिक्षा समवर्ती सूची में आने वाला विषय है, जिसका अर्थ यह है कि केंद्र और राज्यों, दोनों को शिक्षा से संबंधित कानून बनाने का अधिकार है। केंद्र सरकार के पास एचईआईज़ के मानकों को तय करने और उनमें तालमेल बैठाने की शक्ति है (संघ सूची की प्रविष्टि 66), जबकि विश्वविद्यालयों को स्थापित करने, उन्हें रेगुलेट और बंद करने का अधिकार राज्यों के पास है (राज्य सूची की प्रविष्टि 32)। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) सामान्य विषयों की पढ़ाई करने वाले एचईआईज़ को रेगुलेट करता है जोकि शिक्षा के स्तर को तय करता, उन्हें बरकरार रखता और अनुदान जारी करता है। वहीं तकनीकी शिक्षा को अखिल भारतीय शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) द्वारा रेगुलेट किया जाता है। अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों, जैसे कानून, मेडिसिन और आर्किटेक्चर को पेशेवर निकायों के जरिए रेगुलेट किया जाता है। राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों (जैसे आईआईटी) को उनके कानून रेगुलेट करते हैं।

तालिका 1: उच्च शिक्षा संस्थान (अप्रैल 2026 तक)

संस्थान के प्रकार

रेगुलेटर

एचईआईकी संख्या

विश्वविद्यालय

 विश्वविद्यालय अनुदान आयोग

1,290

तकनीकी संस्थान

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद

8,489

शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान

राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद

17,752

मेडिकल कॉलेज

राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद

823

आर्किटेक्चर कॉलेज

वास्तुकला परिषद (काउंसिल ऑफ आर्किटेक्टर)

362

लॉ कॉलेज

भारतीय विधिज्ञ परिषद

-

नोट: मेडिकल कॉलेजों में केवल वे कॉलेज शामिल हैं जो कम से कम अंडरग्रेजुएट कोर्स कराते हैं। स्रोत: यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई और वास्तुकला परिषद की वेबसाइट्स (27 अप्रैल, 2026 को एक्सेस; एमबीबीएस पढ़ाने वाले कॉलेजों की सूची, एनएमसी; पीआरएस।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान उच्च शिक्षा के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में बदलाव संबंधी सुझाव देने के लिए कई समितियों का गठन किया गया।[1],[2]  2020 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को जारी किया गया जिसने उच्च शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन का सुझाव दिया।[3]  उसका कहना था कि एक सर्वोच्च भारतीय उच्च शिक्षा आयोग का गठन किया जाए और उसके तहत चार परिषदें शामिल हों।3 ये परिषदें रेगुलेशन, मान्यता से संबंधित कार्य करें, संभावित शिक्षण परिणामों की संरचना तैयार करें और अनुदान प्रदान करें। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल, 2025 में ऐसी ही संरचना का प्रस्ताव है, यह एक सर्वोच्च आयोग होगा और तीन परिषदें, रेगुलेशन, मानक स्थापित करने और मान्यता प्रदान करने का कार्य करेंगी। इस बिल को 16 दिसंबर, 2025 को ज्वाइंट पार्लियमेंटरी कमिटी (चेयर: सुश्री दग्गूबती पुरंदेश्वरी) को भेजा गया। हम यहां बिल की मुख्य विशेषताओ और मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।

मुख्य विशेषताएं

  • रेगुलेटरी निकाय: बिल के तहत उच्च शिक्षा के लिए सर्वोच्च रेगुलेटरी निकाय के रूप में विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (आयोग) की स्थापना की गई है। यह यूजीसी, एआईसीटीई, और एनसीटीई का स्थान लेता है। आयोग में नियामक परिषद, प्रत्यायन परिषद और मानक परिषद होंगी। यह तकनीकी शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और आर्किटेक्टर शिक्षा को रेगुलेट करेगा। अन्य पेशेवर पाठ्यक्रम जैसे मेडिसिन और लॉ को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।

  • आयोग की संरचना: आयोग में एक अध्यक्ष और 12 सदस्य होंगे। सदस्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) तीनों परिषदों के अध्यक्ष (प्रेसिडेंट्स), (ii) केंद्र सरकार के उच्च शिक्षा सचिव, (iii) पांच प्रख्यात विशेषज्ञ, और (iv) राज्य के उच्च शिक्षा संस्थानों के दो प्रख्यात शिक्षाविद। अध्यक्ष का चयन केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा।

  • परिषदों की संरचना: प्रत्येक परिषद का नेतृत्व एक अध्यक्ष (प्रेसिडेंट) करेगा और परिषद में अधिकतम 14 सदस्य होंगे। परिषदों के सदस्यों में प्रख्यात विशेषज्ञ, केंद्रीय उच्च शिक्षा विभाग द्वारा नामित एक सदस्य और अन्य दो परिषदों द्वारा नामित सदस्य शामिल होंगे। परिषद के अध्यक्षों और पूर्णकालिक सदस्यों का चयन एक खोज एवं चयन समिति द्वारा किया जाएगा। नियामक परिषद और मानक परिषद में राज्य सरकार का का एक नामित व्यक्ति भी शामिल होगा (राज्य रोटेशन के आधार पर उन्हें बदलते रहेंगे)।

  • परिषदों के कार्य: नियामक परिषद निम्नलिखित कार्यों के लिए जिम्मेदार होगी: (i) किसी एचईआई को स्थापित करने के लिए न्यूनतम मानकों को तय करना और उनका पालन सुनिश्चित करना, (ii) एचईआईज़ को समयबद्ध तरीके से स्वायत्तता प्रदान करना, और (iii) एचईआईज़ के खिलाफ हितधारकों से मिलने वाली शिकायतों का निवारण करना। मानक परिषद उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों के लिए शिक्षण परिणामों और एचईआईज़ के लिए न्यूनतम शैक्षणिक मानकों को तैयार करने के लिए जिम्मेदारी होगी। मान्यता परिषद एचईआईज़ के लिए एक मान्यता ढांचा और प्रणाली विकसित करने के लिए जिम्मेदार होगी। यह संस्थानों को मान्यता देने का काम भी करेगी और मान्यता देने वाले अन्य संस्थानों को पैनल में शामिल करेगी।

  • सदस्यों को हटाना: आयोग या परिषदों के अध्यक्ष, प्रेसिडेंट या किसी भी पूर्णकालिक सदस्य को इन आधारों पर हटाया जा सकता है: (i) दिवालिया होना, (ii) नैतिक अधमता वाले अपराध के लिए दोषी ठहराया जाना, (iii) शारीरिक या मानसिक अक्षमता, या (iv) शक्तियों का दुरुपयोग। अंशकालिक सदस्यों को केंद्र सरकार के सुझाव पर, निर्धारित तरीके से हटाया जा सकता है।

  • डिग्री देना: डिग्री केवल इनके द्वारा ही दी जा सकती है: (i) कोई विश्वविद्यालय (जो किसी केंद्रीय या राज्य कानून द्वारा स्थापित हो या यूजीसी एक्ट, 1956 के तहत मानद विश्वविद्यालय हो), या (ii) कोई संस्थान जिसे किसी केंद्रीय कानून द्वारा विशेष अधिकार दिया गया हो, या (iii) अन्य उच्च शिक्षा संस्थान जिन्हें केंद्र सरकार की पूर्व मंज़ूरी से नियामक परिषद ने अधिकृत किया हो।

  • दंड: नियामक परिषद कानून के उल्लंघन के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों पर दंड लगा सकती है। उल्लंघन की संख्या के आधार पर ये जुर्माना अलग-अलग स्तरों पर लगाया जाएगा। अगर सरकार की मंज़ूरी के बिना कोई एचईआई शुरू किया जाता है, तो उस पर कम से कम दो करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है और संस्थान को बंद भी किया जा सकता है। आयोग या परिषद के आदेशों के खिलाफ अपील केंद्र सरकार के पास की जा सकेगी।

: मुख्य मुद्दे और विश्लेषण

उच्च शिक्षा को रेगुलेट करना

उच्च शिक्षा को देश भर में कुछ मानकों को लागू करने, उच्च शिक्षण संस्थानों के बीच तालमेल बैठाने और शिक्षा में पहुंच, लागत और समानता जैसे मुद्दों को हल करने के लिए रेगुलेट किया जाता है।[4] एक मुख्य सवाल यह है कि उच्च शिक्षण संस्थानों को कैसे रेगुलेट किया जाए और कैसे उनके मानकों को बहाल रखा जाए, साथ ही उनकी स्वायत्तता भी सुनिश्चित हो। इसके अलावा शिक्षा की गुणवत्ता, उच्च शिक्षा तक पहुंच और उच्च शिक्षण संस्थानों के वित्त पोषण से जुड़े सवाल भी हैं। इनमें से कुछ पर यहां चर्चा की गई है।

उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता: स्वायत्तता से उच्च शिक्षण संस्थानों को शोध और नए प्रयोग करने की आजादी मिलती है, और इससे वे डिजाइन और संगठन में विविधता ला सकते हैं।स्वायत्तता के विभिन्न पहलू होते हैं। अकादमिक स्वायत्तता में स्वतंत्र रूप से स्कूल/प्रोग्राम्स/कोर्स शुरू करने, विद्यार्थियों का दाखिला करने और परीक्षाएं आयोजित करने का अधिकार शामिल है। प्रशासनिक स्तर पर स्वयत्तता में नियुक्तियां और अन्य कार्मिक मामले और रोजाना का कामकाज शामिल है। स्वतंत्र रूप से धनराशि का उपयोग करने, शुल्क लेने और अन्य स्रोतों से संसाधन जुटाने का अधिकार, वित्तीय स्वायत्तता का अंग है।

विशेषज्ञ समितियों ने कहा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों और उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों, दोनों को पूरी स्वायत्तता नहीं मिलती।1,2,उदाहरण के लिए यूजीसी कई मामलों के संबंध में नियम तय करता है, जैसे: (i) उच्च शिक्षण संस्थानों के गवर्नेंस की संरचना, (ii) भौतिक बुनियादी ढांचा, (iii) फैकेल्टी की संख्या और उनकी योग्यताएं, (iv) पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश, और (v) शिक्षण के न्यूनतम मानक।[5] एआईसीटीई और एनसीटीई पाठ्यक्रम शुरू करने, विद्यार्थियों की प्रवेश संख्या (इनटेक साइज) जैसे मामलों को रेगुलेट करते हैं।[6],[7]  उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए यूजीसी के दिशानिर्देशों का दायरा कैंपस के भीतर और बाहर, विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तक बढ़ गया है।[8]  उदाहरण के लिए एक्सकर्शन और शैक्षणिक यात्राओं के दौरान कम से कम दो शिक्षकों (एक महिला शिक्षक सहित) का होना अनिवार्य है। उच्च शिक्षण संस्थानों को माता-पिता/अभिभावकों से सहमति पत्र लेना होता है। ये दिशानिर्देश इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि अधिकांश विद्यार्थी 18 वर्ष से अधिक आयु के होंगे और इस प्रकार भारतीय कानून के तहत उन्हें वयस्क माना जाता है। उनके लिए कोई कानूनी अभिभावक नहीं होंगे। 

अधिकतर विशेषज्ञ समितियों ने यह प्रस्ताव रखा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों को अधिक स्वायत्तता दी जाए।1,3 हालांकि उनके द्वारा प्रस्तावित संरचनाएं अक्सर डिग्री देने की शक्तियों, पाठ्यक्रम, फैकेल्टी की भर्ती और वित्तपोषण को रेगुलेट करके, उच्च शिक्षण संस्थानों के कामकाज को नियंत्रित करती हैं। कुछ विशेषज्ञों ने एक मजबूत एक्रिडिटेशन प्रणाली के साथ उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए अधिक स्वायत्तता की हिमायत की है।[9],[10],[11],[12]  उन्होंने उल्लेख किया है कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा।

गुणवत्ता: उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता का मूल्यांकन विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है। इनमें उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना की आवश्यक शर्तें, शिक्षा के न्यूनतम मानक/मानदंड और एक्रिडिटेशन शामिल हैं। कई विशेषज्ञ समितियों ने कहा है कि एक प्रदाता के रूप में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करने की प्रणाली बेहद जटिल है और यह एक रुकावट के रूप में काम करती है।1,4  प्रवेश की शर्तें भी काफी हद तक इनपुट केंद्रित हैं, जो भूमि, भवन, पूंजी आदि से संबंधित हैं।4  एक विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए कानून की जरूरत होती है।[13]  उच्च शिक्षण संस्थानों को स्थापित करने के लिए राज्य सरकार, संबद्ध विश्वविद्यालय, यूजीसी और पेशेवर निकायों (अगर लागू हो) से अनुमति लेनी होती है।[14]  

एक्रिडिटेशन, जोकि एक स्वैच्छिक प्रक्रिया है, स्टेकहोल्डर्स को एचईआई के बारे में जानकारी देती है। यशपाल समिति (2010) ने कहा था कि गुणवत्ता के न्यूनतम मानक तय करने की बजाय, इस तरह की जानकारी साझा करने से स्टेकहोल्डर्स को खराब गुणवत्ता वाले शिक्षा प्रदाताओं से बचाया जा सकेगा।2  राष्ट्रीय मूल्यांकन और एक्रिडिटेशन परिषद (एनएएसी), जो यूजीसी द्वारा स्थापित एक स्वायत्त निकाय है, संस्थानों को मान्यता देने के लिए जिम्मेदार है। एक्रिडिटेशन के लिए उपयोग किए जाने वाले मानदंडों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) पाठ्यक्रम, (ii) टीचिंग-लर्निंग इवैल्यूएशन यानी कॉलेज में शिक्षण पद्धतियों, विद्यार्थियों के सीखने के स्तर और परीक्षा की निष्पक्षता का आकलन, (iv) नेतृत्व और प्रबंधन, (v) नवाचार और सर्वोत्तम कार्य पद्धतियां, और (vi) विद्यार्थियों का प्रदर्शन।[15] इसी तरह राष्ट्रीय एक्रिडिटेशन बोर्ड (एनबीए) तकनीकी पाठ्यक्रमों को मान्यता प्रदान करता है।[16] हालांकि एक्रिडिटेशन प्रणाली में कई समस्याएं देखी गई हैं। एनएएसी और एनबीए में क्षमता से जुड़ी कमियां, और एक्रिडिटेशन की प्रक्रियाओं में भाग लेने के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों में इच्छा की कमी देखी गई है।[17] 2022 तक भारत में केवल 20% कॉलेज और 38% विश्वविद्यालय ही मान्यता प्राप्त हैं।[18]  शिक्षा से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2025) ने एनएएसी में रिश्वतखोरी के मामलों का उल्लेख किया था।[19]  उच्च शिक्षण संस्थानों को गलत तरीके से उच्च एक्रिडिटेशन रैंक का दावा करते हुए भी पाया गया था।16 

पहुंच: एनपीए (2020) का लक्ष्य 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) को 50% तक पहुंचाना है। उच्च शिक्षा में जीईआर का अर्थ है, 18-23 आयु वर्ग के लोगों की कुल संख्या के मुकाबले उच्च शिक्षा में नामांकित विद्यार्थियों का अनुपात। 2021-22 तक भारत में जीईआर 28% है।[20] यह अनुसूचित जातियों के लिए 26% और अनुसूचित जनजातियों के लिए 21% है।20  2021-22 तक दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में उच्च शिक्षण संस्थानों का घनत्व ज्यादा है।20  नामांकन बढ़ाने के लिए गुणवत्ता से समझौता किए बिना मौजूदा बुनियादी ढांचे के विस्तार की आवश्यकता होती है।जैसा कि, ऊपर उल्लेख किया गया है, विशेषज्ञों ने यह गौर किया कि नए उच्च शिक्षण संस्थान स्थापित करने की मौजूदा प्रणाली शिक्षा प्रदाताओं के लिए एक प्रवेश बाधा के रूप में कार्य करती है।1,10    

वित्तपोषण: उच्च शिक्षण संस्थान सार्वजनिक और निजी स्रोतों से वित्त हासिल कर सकते हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि उच्च शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाकर जीडीपी का 1.5% किया जाना चाहिए।2022-23 तक उच्च शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी का 0.5% है।[21] निजी उच्च शिक्षण संस्थान फीस के जरिए वित्त जुटा सकते हैं, हालांकि अदालतों ने कहा है कि फीस शोषणकारी (मनमानी या अनुचित) नहीं हो सकती।[22]  जबकि उच्च शिक्षण संस्थानों को अपनी फीस तय करने की स्वायत्तता है और वे विकास के लिए कुछ अतिरिक्त धन जुटा सकते हैं, राज्य इस फीस को रेगुलेट करने के लिए समितियां गठित कर सकते हैं।22  वित्तपोषण में एक मुख्य समस्या यह है कि यूजीसी एक रेगुलेटर के साथ अनुदान देने वाले निकाय के रूप में भी काम करता है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि अनुदान देने की शक्तियां एक स्वतंत्र निकाय को दी जानी चाहिए जिसका रेगुलेशन पर कोई असर नहीं होना चाहिए।1  एनईपी (2020) ने सुझाव दिया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों को वित्तपोषण, उनकी संस्थागत विकास योजना और उनके कार्यान्वयन के संबंध में हुई प्रगति के आधार पर प्रदान किया जाना चाहिए।

तालिका 2: उच्च शिक्षा के रेगुलेशन की अंतरराष्ट्रीय प्रणालियां

रेगुलेशन के पहलू

अंतरराष्ट्रीय उदाहरण

रेगुलेशन की संरचना

यूएसए में उच्च शिक्षा के लिए कोई केंद्रीयकृत रेगुलेटर नहीं है।[23] इंग्लैंड और जर्मनी में उप-राष्ट्रीय स्तर पर रेगुलेटर्स हैं।[24]  चीन और सिंगापुर में सरकार रेगुलेटर के रूप में काम करती है।[25],[26] 

प्रशासनिक और अकादमिक स्वायत्तता

इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में पंजीकृत एचईआईज़ की गवर्निंग बॉडीज़ के लिए कानूनन शैक्षणिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देना अनिवार्य है।[27],[28]  इंग्लैंड में विश्वविद्यालय अपने गवर्नेंस की संरचना खुद तय कर सकते हैं, गवर्निंग बॉडीज़ के प्रमुखों का चुनाव या नियुक्ति कर सकते हैं, और अन्य कर्मचारियों को काम पर रख सकते हैं।24  चीन और सिंगापुर में वरिष्ठ पदाधिकारियों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका होती है लेकिन अन्य सभी फैकेल्टी और कर्मचारियों की भर्ती में उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वतंत्रता प्राप्त है।[29],[30] ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, सिंगापुर और यूएसए में उच्च शिक्षण संस्थान स्वतंत्र रूप से विद्यार्थियों के लिए प्रवेश के नियमों को निर्धारित कर सकते हैं।23,26,27,28 शिक्षकों को पाठ्यक्रम विकसित करने की स्वायत्तता भी दी जाती है। चीन में उच्च शिक्षा कानून उच्च शिक्षण संस्थानों को शोध करने, तकनीक विकसित करने औऱ विदेशी संस्थानों के साथ सहयोग करने की स्वायत्तता प्रदान करता है।29 

एक्रिडिटेशन

एक्रिडिटेशन किसी संस्थान के लिए या फिर विशिष्ट पाठ्यक्रमों/कोर्सज़ के लिए किया जा सकता है। यूएसए में यह एक स्वैच्छिक प्रक्रिया है। इसका उपयोग नए पाठ्यक्रम/कोर्स शुरू करने के लिए एक अनिवार्य शर्त के रूप में, या सरकारी फंड प्राप्त करने के लिए भी किया जा सकता है (जैसे इंग्लैंड और यूएसए में)।23,24,[31]

स्रोत: एंडनोट 23 से 31 देखें; पीआरएस।

एचईआईज़ की स्वायत्तता

बिल के उद्देश्यों और कारणों के कथन में उल्लेख किया गया है कि इस बिल से ऐसे सुधारों की उम्मीद है जो बेहतर प्रदर्शन करने वाले उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता को बढ़ावा देंगे। नियामक परिषद के प्रस्तावित कार्यों में से एक यह भी है कि वह उच्च शिक्षण संस्थानों को धीरे-धीरे और निश्चित समय के भीतर स्वायत्तता प्रदान करे। हालांकि यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई के अधिकांश कार्यों को बरकरार रखा गया है और उन्हें आयोग और उसकी परिषदों के तहत शामिल कर दिया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि यह बिल उच्च शिक्षण संस्थानों को दी जाने वाली स्वायत्तता को कैसे बढ़ाएगा। यह सवाल भी उठता है कि क्या उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता को सीधे बिल में ही निर्दिष्ट किया जाना चाहिए या इसे तय करने का अधिकार बाद में रेगुलेटर के प्रत्यायोजित विधान (नियम बनाने की शक्ति) के भरोसे छोड़ देना चाहिए।  

दूसरी तरफ उच्च शिक्षण संस्थानों को पहले से दी गई कुछ स्वायत्तता को वापस ले सकता है। 2018 में यूजीसी ने न्यूनतम एक्रिडिटेशन स्कोर हासिल करने वाले विश्वविद्यालयों को कुछ मामलों में स्वायत्तता प्रदान करने वाले नियम जारी किए थे।[32] इसमें यूजीसी की अनुमति के बिना, घटक इकाइयां/ऑफ-कैंपस केंद्र खोलने की शक्ति शामिल है।32 यह उन कोर्स/पाठ्यक्रमों/केंद्रों पर लागू होता है जिन्हें सरकार द्वारा वित्त पोषित नहीं किया जाता है। 2018 से अब तक 60 से अधिक विश्वविद्यालयों को इन नियमों के तहत कुछ स्वायत्तता प्राप्त हो चुकी है।[33]  हालांकि बिल प्रावधान करता है कि कोई भी मौजूदा या नया मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय केवल नियामक परिषद की पूर्व स्वीकृति से ही घटक कॉलेज, ऑफ-कैंपस और मल्टीपल कैंपस बना सकता है।

राष्ट्रीय महत्व के संस्थान स्वायत्तता गंवा सकते हैं

संसद द्वारा राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों (जैसे आईआईटी और आईआईएम) के तौर पर स्थापित उच्च शिक्षण संस्थानों को उनके अपने खास कानूनों के तहत रेगुलेट किया जाता है और उन्हें अकादमिक और शोध के कामों में स्वायत्तता हासिल होती है।[34]  इसमें विद्यार्थियों के प्रवेश की प्रक्रिया तय करने, कोर्स तैयार करने और परीक्षा आयोजित करने की स्वायत्तता शामिल है।34  यह बिल ऐसे सभी संस्थानों को आयोग के दायरे में लाता है। बिल में ऐसे संस्थानों की स्वायत्तता की रक्षा के लिए नियम बनाने का प्रावधान है। ऐसा केंद्र सरकार की पूर्व मंज़ूरी से किया जा सकता है।

एचईआईज़ के रेगुलेशन में केंद्र सरकार की भूमिका

मानव संसाधन विकास से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी (2012) ने कहा था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में स्वायत्तता को बढ़ावा देने वाले रेगुलेटरी बॉडीज़ को खुद भी स्वायत्त होना चाहिए।[35]  बिल ऐसी परिस्थितियां तैयार करता है, जब रेगुलेटर को भी कुछ कार्य करने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति की जरूरत होगी।

कुछ एचईआईज़ को डिग्री देने के लिए अधिकृत करने हेतु केंद्र सरकार की मंज़ूरी ज़रूरी है

यूजीसी एक्ट, 1956 के तहत, सिर्फ़ निम्नलिखित संस्थान ही डिग्री दे सकते हैं: (i) केंद्र या राज्य कानून के तहत बना विश्वविद्यालय, (ii) संसद के एक्ट से डिग्री देने के लिए खास तौर पर अधिकृत संस्थान, और (iii) मानद विश्वविद्यालय।[36]  यूजीसी की जांच और सुझाव के बाद, केंद्र सरकार योग्य संस्थानों को मानद विश्वविद्यालय का दर्जा देती है।[37]  इसके बाद ये संस्थान अपने नाम से डिग्री दे सकते हैं। कॉलेज उस विश्वविद्यालय के नाम से डिग्री देते हैं जिससे वे जुड़े होते हैं।  

यह बिल उपरिलिखित पहली दो श्रेणियों के संस्थानों को डिग्री देने का अधिकार देता है। नियामक परिषद, केंद्र सरकार की मंज़ूरी से दूसरे संस्थानों को भी यह अधिकार दे सकती है। इससे नियामक परिषद की स्वतंत्रता पर सवाल उठता है। बैंकिंग जैसे दूसरे क्षेत्र, जिनका व्यवस्था पर बड़ा असर होता है, उनमें रेगुलेटर के पास नए प्रदाताओं को प्रवेश की अनुमति देने का अधिकार होता है। भारतीय रिज़र्व बैंक कानून में तय नियमों के आधार पर निजी कंपनी को बैंकिंग का काम शुरू करने के लिए लाइसेंस देता है।[38] लाइसेंस देने में केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं होती। वह सिर्फ़ लाइसेंस रद्द करने के आरबीआई के फ़ैसले के खिलाफ अपील की सुनवाई कर सकती है।38

परिषदों के लिए बाहरी सहायता लेने हेतु केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक है

बिल के अनुसार, आयोग और परिषद ऐसे किसी भी व्यक्ति या संस्था के साथ जुड़ सकते हैं जिनकी मदद उनके काम को पूरा करने में सहायक हो। इसके लिए केंद्र सरकार की मंज़ूरी ज़रूरी है। अभी, यूजीसी और एआईसीटीई केंद्र सरकार की मंज़ूरी के बिना ही ऐसे कामों के लिए लोगों के साथ जुड़ सकते हैं। एनसीटीई एक्ट, 1993 में भी ऐसा ही प्रावधान है। ऐसे मामलों में केंद्र सरकार की मंज़ूरी की ज़रूरत होने से आयोग और परिषद के स्वतंत्र कामकाज पर असर पड़ सकता है।

एचईआईज़ का कामकाज

यूजीसी का मुख्य काम विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों को धनराशि आवंटित और वितरित करना है।36  बिल के वित्तीय वक्तव्य में कहा गया है कि केंद्रीय स्तर पर वित्तपोषित उच्च शिक्षण संस्थानों का वित्तपोषण आयोग के दायरे से बाहर होगा और उच्च शिक्षण संस्थानों को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के जरिए अनुदान संवितरित किए जाएंगे। एनईपी (2020) ने एक अलग संरचना का प्रस्ताव रखा था। उसने एक अंब्रैला रेगुलेटर की परिकल्पना की थी जिसके चार वर्टिकल होंगे, जो रेगुलेशन करेंगे, मान्यता प्रदान करेंगे, वित्त पोषण करेंगे और मानक निर्धारित करेंगे।3  बिल तीन की स्थापना तो करता है, लेकिन वित्तपोषण को छोड़ देता है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (एनकेसी, 2009) ने भी वित्तपोषण की व्यवस्था का सुझाव दिया था जिसके पास केंद्र सरकार से अलग कामकाज की स्वायत्तता हो।1 उसने सुझाव दिया था कि यूजीसी सिर्फ धनराशि संवितरित करने का काम करे (दूसरे कार्यों को स्वतंत्र रेगुलेटर को सौंपा जाए)।

पेशेवर शिक्षा के रेगुलेशन में असंगतियां

अभी भारत में पेशेवर शिक्षा को 16 पेशेवर परिषदें रेगुलेट करती हैं (तालिका 1)।[39]  ये संस्थाएं पेशेवर प्रैक्टिस के लिए मानक तय करती हैं और इस पेशे में आने के लिए परीक्षाएं आयोजित करती हैं। वे उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए भौतिक बुनियादी ढांचा, पाठ्यक्रम, कर्मचारियों की योग्यता और अकादमिक मानदंडों के लिए नियम भी तय कर सकती हैं।6,7  

यह बिल सभी पेशेवर पाठ्यक्रमों पर एक जैसा लागू नहीं होता है। तकनीकी शिक्षा (जो अभी एआईसीटीई एक्ट, 1987 के तहत रेगुलेट होती है) और शिक्षक शिक्षा (एनसीटीई एक्ट, 1993 के तहत) को इस आयोग के दायरे में लाया जा रहा है और मौजूदा रेगुलेटर्स को खत्म किया जा रहा है। आर्किटेक्चर की पढ़ाई कराने वाले संस्थानों को आयोग रेगुलेट करेगा। हालांकि, काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर एक पेशेवर निकाय के तौर पर काम करती रहेगी और आयोग की परिषदों में उसका प्रतिनिधित्व होगा। यह बिल केंद्र सरकार को पेशेवर परिषदों को अधिसूचित करने की भी अनुमति देता है; इन परिषदों के तहत आने वाले संस्थान इस बिल के दायरे में आएंगे। हालांकि, इसमें कुछ पेशेवर पाठ्यक्रमों को साफ तौर पर छूट दी गई है, जिनमें लीगल, मेडिकल और वेटेरिनरी प्रोग्राम्स शामिल हैं।

एनईपी (2020) ने सुझाव दिया था कि पेशेवर परिषद को बिना किसी रेगुलेटरी भूमिका के, मानक तय करने वाली संस्थाओं के तौर पर काम करना चाहिए।3  वे अपने विषय में करिकुलम फ्रेमवर्क उपलब्ध कराएंगी और शिक्षण और शोध के बीच तालमेल बिठाएंगी।3  हालांकि एनईपी (2020) ने मेडिकल और लीगल शिक्षा को नियामक परिषद के अधिकार क्षेत्र से साफ तौर पर बाहर रखा था।3 एनकेसी (2009) ने सुझाव दिया था कि इंजीनियरिंग, मेडिकल और लॉ समेत सभी पेशेवर शिक्षा को एक ही रेगुलेटर के दायरे में लाया जाए।1 पेशेवर परिषद सिर्फ़ पेशेवर संगठन की भूमिका निभाएंगी, जिसके तहत वे परीक्षाएं आयोजित करेंगी और उस पेशे में प्रैक्टिस करने के लिए लाइसेंस देंगी।1  

परिषद के निर्देशों के खिलाफ अपील केंद्र सरकार के पास की जा सकती है

बिल में कहा गया है कि परिषद के किसी भी निर्देश के खिलाफ अपील केंद्र सरकार के पास की जा सकेगी और केंद्र सरकार का फैसला मानना ​​ज़रूरी होगा। यह तरीका कुछ दूसरे रेगुलेटर की अपील की व्यवस्था से अलग है। दूसरे क्षेत्रों में रेगुलेटर के फैसलों के खिलाफ अपील की सुनवाई न्यायिक ट्रिब्यूनल करते हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) एक्ट, 1992 के तहत सेबी के आदेशों के खिलाफ अपील की सुनवाई के लिए प्रतिभूति अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाया गया है।[40]  दूरसंचार विवाद निवारण और अपीलीय ट्रिब्यूनल, भारतीय दूरसंचार रेगुलेटरी अथॉरिटी के निर्देशों के खिलाफ अपील की सुनवाई करता है।40  2010 में, लोकसभा ने राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर शिक्षा ट्रिब्यूनल बनाने के लिए एक बिल पारित किया था, लेकिन राज्यसभा में मतदान से पहले ही 2014 में यह बिल लैप्स हो गया।[41]  ये ट्रिब्यूनल उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों और दूसरे कर्मचारियों, और विद्यार्थियों, विश्वविद्यालयों और रेगुलेटरी अथॉरिटीज़ जैसे दूसरे स्टेकहोल्डर्स से जुड़े विवादों का निपटारा करते।

अंशकालिक कर्मचारियों को हटाने के आधार नहीं दिए गए हैं

यह बिल परिषद के पूर्णकालिक सदस्यों को हटाने के आधार बताता है; जिसमें सदस्य-सचिव और ऐसे शिक्षाविद शामिल हैं, जो प्रोफेसर के पद के नीचे के न हों। हालांकि, इसमें अंशकालिक सदस्यों (हर परिषद के 14 में से आठ सदस्य) को हटाने के आधार नहीं बताए गए हैं। इन सदस्यों में एक्सपर्ट, काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर के प्रतिनिधि और राज्य के उच्च शिक्षण संस्थानों और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के शिक्षाविद शामिल हैं। इन आधारों को केंद्र सरकार द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में तय किया जाएगा। यह ज़रूरत से ज़्यादा अधिकार सौंपने जैसा हो सकता है।


[1]. Report of the National Knowledge Commission, 2006-2009, https://www.aicte.gov.in/downloads/nkc.pdf.

[2]. Report of the Committee to Advise on Renovation and Rejuvenation of Higher Education, 2009, https://prsindia.org/files/bills_acts/bills_parliament/1970/Yashpal%20Committee%20report.pdf.

[3]. National Education Policy, 2020.

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[5]. Website of University Grants Commission as accessed on March 20, 2026, https://www.ugc.gov.in/regulations.

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[33]. “In a historic decision, 60 Higher Educational Institutions granted autonomy by UGC”, Press Information Bureau, Ministry of Education, March 20, 2018; List of Central Universities granted Graded Autonomy under UGC (Categorization of Universities (only) for Grant of Graded Autonomy) Regulations, February 29, 2024.

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[40]. The Securities and Exchange Board of India Act, 1992 and the Telecom Regulatory Authority of India Act, 1997.

[41]. The Educational Tribunals Bill, 2010.

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