सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन बिल, 2026 को 27 जुलाई, 2026 को लोकसभा पेश किया गया।[1] बिल सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) एक्ट, 2024 में संशोधन का प्रयास करता है।[2] इस एक्ट का उद्देश्य निर्दिष्ट सार्वजनिक परीक्षा प्राधिकरणों द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अनुचित साधनों के इस्तेमाल को रोकना है। इन प्राधिकरणों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) संघ लोक सेवा आयोग, (ii) कर्मचारी चयन आयोग, (iii) रेलवे भर्ती बोर्ड, (iv) बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान, (v) राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी, (vi) केंद्र सरकार के मंत्रालय और उनसे जुड़े कार्यालय, और (vii) केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य प्राधिकरण।
मई 2026 में नीट (NEET) 2026 को रद्द कर दिया गया और अगले महीने इसे दोबारा आयोजित किया गया।[3] नीट अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन प्रोग्राम के लिए प्रवेश परीक्षा है। परीक्षा रद्द करने का कारण कथित तौर पर पेपर लीक था।[4] बिल के उद्देश्य और कारणों के कथन में कहा गया है कि इसका उद्देश्य निष्पक्षता को मजबूत करना, सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ाना और समयबद्ध जांच व त्वरित सुनवाई को आसान बनाना है।1
मुख्य विशेषताएं
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दंड में बढ़ोतरी: बिल विभिन्न अपराधों के लिए कारावास की सज़ा और जुर्माने की मात्रा बढ़ाता है।
तालिका 1: एक्ट और बिल के तहत दंड
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अपराध |
एक्ट |
बिल |
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किसी व्यक्ति द्वारा अनुचित साधनों का प्रयोग |
तीन से पांच वर्ष तक का कारावास, और 10 लाख रुपए तक का जुर्माना |
5 से 10 वर्ष तक का कारावास और 50 लाख रुपए तक का जुर्माना |
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सेवा प्रदाता द्वारा अनुचित तरीके |
एक करोड़ रुपए तक का जुर्माना |
पांच करोड़ रुपए तक का जुर्माना |
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सेवा प्रदाता के प्रभारी व्यक्ति |
तीन से 10 वर्ष तक का कारावास और एक करोड़ रुपए का जुर्माना |
न्यूनतम पांच वर्ष का कारावास और पांच करोड़ रुपए का जुर्माना |
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संगठित अपराध |
पांच से 10 वर्ष तक का कारावास और न्यूनतम एक करोड़ रुपए का जुर्माना |
न्यूनतम सात वर्ष का कारावास, न्यूनतम 10 करोड़ रुपए का जुर्माना |
स्रोत: सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन बिल, 2026, सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) एक्ट, 2024; पीआरएस।
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सेवा प्रदाता पर रोक: यह कानून किसी भी सार्वजनिक परीक्षा के आयोजन की जिम्मेदारी लेने से उन सेवा प्रदाताओं पर चार वर्ष की रोक लगाता है जो अनुचित तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। यह बिल प्रतिबंध की अवधि को बढ़ाकर आठ वर्ष करता है।
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जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स: इस कानून में यह प्रावधान है कि इसके तहत किसी अपराध की जांच डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस या असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस के पद से नीचे के अधिकारी द्वारा नहीं की जाएगी। इस कानून के तहत केंद्र सरकार अपराधों की जांच किसी भी केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंप सकती है। यह बिल केंद्र सरकार को अपराधों की जांच के लिए एक स्पेशल टास्क फोर्स बनाने का अधिकार देता है।
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जांच के लिए समय-सीमा: बिल में यह भी कहा गया है कि अपराधों की जांच दो महीने के भीतर पूरी हो जानी चाहिए।
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स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट: इस बिल के तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को इस कानून के तहत अपराधों की सुनवाई के लिए एक सेशन कोर्ट को स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के तौर पर निर्दिष्ट करना होगा। स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट, भारतीय न्याय संहिता, 2023 या दूसरे कानूनों के तहत जुड़े अपराधों की सुनवाई भी उसी ट्रायल में करेंगे। हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को हर स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए एक या एक से ज्यादा स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर भी नियुक्त करने होंगे। इस कानून के तहत चल रहे सभी लंबित मामले स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट में स्थानांतरित कर दिए जाएंगे।
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सुनवाई के लिए समय-सीमा: बिल में कहा गया है कि सुनवाई रोज़ाना होनी चाहिए, जब तक कि वहां मौजूद सभी गवाहों के बयान न ले लिए जाएं। अगर जरूरी हो, तो अदालत लिखित में कारण दर्ज करके सुनवाई को अगले दिन के लिए टाल सकती है। चार्जशीट दाखिल होने की तारीख से तीन महीने के अंदर सुनवाई पूरी हो जानी चाहिए। स्थानांतरित किए गए लंबित मामलों में सुनवाई स्थानांतरण की तारीख से तीन महीने के अंदर पूरा हो जानी चाहिए।
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अपील: बिल में यह भी कहा गया है कि स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसलों, सज़ा या आदेशों के खिलाफ अपील उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों की पीठ के सामने की जाएगी। अपील को, जहां तक हो सके, स्वीकार किए जाने के तीन महीने के भीतर निपटाया जाना चाहिए। अपील आदेश के 30 दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिए। पर्याप्त कारण होने पर उच्च न्यायालय देरी से दायर की गई अपील पर विचार सकता है, लेकिन 90 दिनों के बाद किसी भी अपील पर विचार नहीं किया जाएगा।
विचारणीय मुद्दे
जांच, एडजुडिकेशन और अपील
इस बिल का उद्देश्य जांच, मुकदमे की सुनवाई और अपील को पूरा करने के लिए एक समय-सीमा वाली प्रक्रिया निर्धारित करना है। हम यहां इन प्रावधानों से जुड़े कुछ मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
मुकदमे की सुनवाई पूरा करने की अनिवार्य समय-सीमा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ हो सकती है
बिल में कहा गया है कि चार्जशीट दाखिल होने की तारीख से तीन महीने के अंदर सुनवाई पूरी होनी चाहिए। इसमें यह भी कहा गया है कि उच्च न्यायालय अपील मंजूर होने के बाद, जहां तक हो सके, तीन महीने के अंदर उस पर फ़ैसला करे। 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आपराधिक कार्यवाही पूरी करने के लिए कोई समय-सीमा तय करना न तो उचित है, न ही व्यावहारिक और न ही कानूनी तौर पर जायज़ है।[5] न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल समय बीत जाने के आधार पर मुकदमे या आपराधिक कार्यवाही को खत्म करने के लिए क्रिमिनल कोर्ट्स बाध्य नहीं हैं।5
एक निश्चित समय-सीमा के बाद अपील पर रोक के संबंध में अदालतों के परस्पर विरोधी फैसले
बिल में यह भी कहा गया है कि फ़ैसले, सज़ा या आदेश की तारीख़ के 90 दिनों के बाद उच्च न्यायालय द्वारा किसी भी अपील पर “विचार नहीं किया जाएगा” (no appeal “shall” be entertained)। राष्ट्रीय जांच एजेंसी एक्ट, 2008 में भी यही प्रावधान है।[6] उच्च न्यायालयों की इस बात पर अलग-अलग राय रही है कि क्या उनके पास 90 दिनों के बाद अपील को मंजूर करने का अधिकार है। बॉम्बे हाई कोर्ट (2023) ने फैसला सुनाया था कि अगर आवेदक द्वारा ठोस कारण देने के बावजूद इस प्रावधान को अनिवार्य माना जाता है, तो यह न्याय का मज़ाक उड़ाने जैसा होगा।[7] अदालत ने "shall" (अनिवार्य) शब्द के प्रभाव को कम करते हुए इसे "may" (वैकल्पिक/विवेकाधीन) के रूप में पढ़ा, जिससे उच्च न्यायालय को विवेकाधीन फैसला लेने की छूट मिल गई।7 इसी तरह दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अगर विधायिका द्वारा लगाई गई ऐसी कोई रोक जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित करती है तो इसे अनिवार्य नहीं माना जा सकता है।[8] उसने माना था कि यह कानून सिर्फ डायरेक्टरी है, अनिवार्य नहीं। हालांकि, मद्रास हाई कोर्ट (2024) ने फैसला सुनाया था कि इस मामले में अदालत के पास कोई विवेकाधीन शक्ति नहीं है।[9] न्यायालय ने माना था कि जब प्रावधान का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट और असंदिग्ध हो और विधायी मंशा साफ हो तो कानून के शब्दों के प्रभाव को कम करके नहीं पढ़ा (रीडिंग डाउन सिद्धांत) जा सकता।9 फरवरी 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम उपाय के तौर पर निर्देश दिया कि एनआईए एक्ट के तहत अपीलों को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जाएगा क्योंकि वे 90 दिनों की समय सीमा बीत जाने के बाद दायर की गई हैं।[10]
अगर जांच की समय-सीमा पूरी नहीं होती है, तो इसके लिए कोई और प्रावधान नहीं है
बिल में कहा गया है कि जांच दो महीने के अंदर पूरी हो जानी चाहिए। हालांकि, अगर तय समय-सीमा के अंदर जांच पूरी नहीं होती है, तो इसके लिए कोई प्रावधान नहीं है। यह दूसरे कानूनों से अलग है। लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट, 2013 के तहत शुरुआती पूछताछ और जांच की समय-सीमा बढ़ाने के लिए लिखित में कारण बताना ज़रूरी है।[11] इसी तरह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) एक्ट, 1989 के तहत, संबंधित अधिकारी को जांच पूरी करने और 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करने में हुई देरी का कारण लिखित में बताना होगा।[12]
फास्ट ट्रैक कोर्ट में लंबित मामले और उनमें लगने वाला समय
इस बिल में प्रावधान है कि हर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश द्वारा एक सेशन कोर्ट को स्पेशल फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के तौर पर नामित किया जाए ताकि निर्णय की प्रक्रिया में तेजी आए। दूसरे कानूनों में भी ऐसे ही प्रावधान हैं। उदाहरण के लिए, लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण एक्ट, 2012 (पॉक्सो) भी हर ज़िले के लिए एक सेशन कोर्ट को स्पेशल कोर्ट के तौर पर नामित करने का प्रावधान करता है।[13] बलात्कार और पॉक्सो मामलों के लिए फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (एफटीएससी) बनाने की एक केंद्र-प्रायोजित योजना अक्टूबर 2019 में शुरू की गई थी।[14] इसमें पॉक्सो मामलों के लिए खास कोर्ट भी शामिल हैं। अप्रैल 2026 तक 775 एफटीएससी काम कर रहे थे, जिनमें 398 विशेष पॉक्सो कोर्ट शामिल थे।14 2023 से इन अदालतों में दो लाख से ज़्यादा मामले लंबित हैं (तालिका 2)।14 पॉक्सो मामलों में अगस्त 2025 तक, एफटीएससी में सुनवाई में लगने वाला औसत समय आंध्र प्रदेश में 257 दिन से लेकर दिल्ली में 1,717 दिन तक था।[15] अगस्त 2025 में, कानून और न्याय मंत्रालय ने पाया कि जहां नियमित अदालतों में बलात्कार और पॉक्सो एक्ट के मामलों के निपटारे की औसत दर प्रति अदालत प्रति माह 3.26 मामले है, वहीं एफटीएससी प्रति अदालत प्रति माह औसतन 9.51 मामलों का निपटारा करते हैं।[16]
2012 में विधि आयोग ने पाया था कि निचली अदालतों में देरी के कारणों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) कुछ या सभी आरोपियों का मौजूद न होना या विचाराधीन कैदियों को पेश न किया जाना, और जब बहुत सारे आरोपी हों तो यह समस्या और बढ़ जाती है, (ii) फरार आरोपियों को पकड़ने और पेश करने में पुलिस की तरफ से कोशिशों की कमी, (iii) सरकारी गवाहों के न आने की वजह से बार-बार सुनवाई टलना, (iv) वकीलों का बिना सही वजह के सुनवाई टालने की मांग करना, (v) निचली अदालतों के न्यायाधीशों द्वारा केस मैनेजमेंट के असरदार तरीकों का इस्तेमाल न करना जैसे सही टाइम शेड्यूल तय न करना और सुनवाई में निरंतरता सुनिश्चित न कर पाना, (vi) हर महीने ज़रूरी संख्या में मामले निपटाने के बाद जजों का ढीला रवैया, और (vii) अदालतों की अपर्याप्त संख्या और कर्मचारियों की कमी।[17]
तालिका 2: साल के अंत में बलात्कार और पॉक्सो मामलों के लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में लंबित मामले
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वर्ष |
दर्ज |
निस्तारित |
लंबित |
|
2023 |
81,471 |
76,319 |
2,02,175 |
|
2024 |
88,902 |
85,595 |
2,04,122 |
|
2025 |
1,43,936 |
66,500 |
2,45,579 |
स्रोत: अतारांकित प्रश्न संख्या 588, राज्यसभा, कानून एवं न्याय मंत्रालय, 23 जुलाई, 2026 को उत्तर दिया गया; पीआरएस।
जांच की समय-सीमा का पालन
इस बिल की तरह ही, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (जिसने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान लिया है) में यह ज़रूरी है कि बलात्कार और पॉक्सो मामलों की जांच दो महीने के अंदर पूरी हो जाए।[18] इसी तरह, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) एक्ट, 1989 के तहत जांच पूरी करने और चार्जशीट दाखिल करने के लिए 60 दिन का समय तय है।12 2024 में इन कानूनों के तहत जांच के लिए लंबित मामलों में से 40% से ज़्यादा मामले छह महीने से ज़्यादा समय से लंबित थे।[19],[20]
तालिका 3: 2024 के अंत में जांच के लिए लंबित मामले
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एक्ट |
जांच के लिए लंबित मामले |
6 महीने तक |
6 महीने से 1 वर्ष |
1 से 3 वर्ष |
3 वर्ष से अधिक |
||||
|
मामले |
% हिस्सा |
मामले |
% हिस्सा |
मामले |
% हिस्सा |
मामले |
% हिस्सा |
||
|
आईपीसी/बीएनएसएस के तहत बलात्कार के मामले |
8,905 |
4,037 |
45% |
2,437 |
27% |
2,071 |
23% |
360 |
4% |
|
पॉक्सो एक्ट |
21,256 |
11,674 |
55% |
6,000 |
28% |
3,175 |
15% |
407 |
2% |
|
अजा और अजजा (अत्याचार निवारण) एक्ट |
3,525 |
1,193 |
34% |
994 |
28% |
1,286 |
36% |
52 |
1% |
स्रोत: क्राइम इन इंडिया 2024 रिपोर्ट, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो; पीआरएस।
[1] The Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026, as introduced in Lok Sabha on July 27, 2026, https://prsindia.org/files/bills_acts/bills_parliament/2026/Public_Examinations_Bill_2026.pdf.
[2] The Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024, https://upload.indiacode.nic.in/view-casepdf?type=act&id=AC_CEN_26_36_00009_A2024-01_1719556801892.
[3] “NEET (UG) 2026 — Decision on the Examination of 3 May 2026”, National Testing Agency, May 12, 2026, https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s37bc1ec1d9c3426357e69acd5bf320061/uploads/2026/05/202605122066418251.pdf.
[4] “CBI Registers Case in alleged Paper Leak in NEET-UG 2026”, Press Information Bureau, Ministry of Home Affairs, May 12, 2026, https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2260410®=48&lang=2.
[5] Appeal (Crl.) 535 of 2000, P. Ramachandra Rao vs State of Karnataka, Supreme Court of India, April 16, 2002, https://api.sci.gov.in/jonew/judis/18409.pdf.
[6] Section 21(5), The National Investigation Agency Act, 2008, https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/2054/3/a2008-34.pdf.
[7] Faizal Hasamali Mirza @ Kasib vs The State of Maharashtra and Anr, Bombay High Court, September 14, 2023, https://indiankanoon.org/doc/162677555/.
[8] Farhan Shaikh vs State (National Investigation Agency), Delhi High Court, July 16, 2019, https://indiankanoon.org/doc/159552816/.
[9] Union Of India vs Abdul Razaak, Madras High Court, October 30, 2024, https://indiankanoon.org/doc/108080231/.
[10] Order dated February 4, 2025, Writ Petition (Civil) No. 1076/2019, Sajal Awasthi vs Union of India, Supreme Court of India, https://api.sci.gov.in/supremecourt/2019/29494/29494_2019_1_18_59081_Order_04-Feb-2025.pdf.
[11] Section 20(4), 20(5), The Lokpal and Lokayuktas Act, 2013, https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/2122/1/201401.pdf.
[12] Section 4(2)(e), The Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989, https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/15338/1/scheduled_castes_and_the_scheduled_tribes.pdf.
[13] Section 28, POCSO Act, 2012, https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/2079/1/AA2012-32.pdf.
[14] Unstarred Question No. 588, Rajya Sabha, Ministry of Law and Justice, Answered on July 23, 2026, https://sansad.in/getFile/annex/271/AU588_fFB3f3.pdf?source=pqars.
[15] Unstarred Question No. 2215, Lok Sabha, Ministry of Law and Justice, Answered on August 1, 2025, https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/185/AU2215_cUlAnb.pdf?source=pqals.
[16] “Scheme of Fast Track Special Courts”, Press Information Bureau, Ministry of Law and Justice, August 8, 2025, https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2154103®=48&lang=2.
[17] Report No. 239: Expeditious Investigation and Trial of Criminal Cases Against Influential Public Personalities, Law Commission, March 2012, https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s3ca0daec69b5adc880fb464895726dbdf/uploads/2022/08/2022081021-2.pdf.
[18] Section 193, Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, https://www.mha.gov.in/sites/default/files/2024-04/250884_2_english_01042024.pdf.
[19] Table 17A.5, Period of IPC/BNS-Cases Pending Investigation – 2024, Crime in India 2024 Report, National Crime Records Bureau, https://www.ncrb.gov.in/uploads/files/TABLE17A51.pdf.
[20] Table 17A.6, Period of SLL-Cases Pending Investigation – 2024, Crime in India 2024 Report, National Crime Records Bureau, https://www.ncrb.gov.in/uploads/files/TABLE17A61.pdf.
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